Category: शिक्षा

  • वाक्य रचना की अशुद्धियाँ, पदक्रम और अन्वय

    वाक्य रचना की अशुद्धियाँ, पदक्रम और अन्वय

    वाक्य रचना व्याकरण के नियमों के अनुसार होनी चाहिए! इसमें उसकी सार्थकता बनी रहती है! व्याकरण के नियमों की अनदेखी करके वाक्य-रचना करने से वे अशुद्ध और अप्रभावशाली हो जाते हैं; जैसे – पकड़ो अवश्य चोर है, ये वाक्य व्याकरण सम्मत नहीं है! वाक्यों की शुद्धता के लिए ‘पदक्रम’ और ‘अन्वय’ का पालन करना अनिवार्य होता है!

     

    १. पदक्रम ( Order ) – पदक्रम में निम्नलिखित बिन्दुओं का पालन किया जाता है –

    (i) वाक्यों में आने वाले प्रत्येक पद का क्रम निश्चित होता है! इसमें कर्ता वाक्य के आरंभ में, कर्म मध्य में और क्रिया का प्रयोग अंत में किया जाता है; जैसे – मैंने नाटक में भाग लिया!

    (ii) जिसके विषय में प्रश्न किया जाता है, प्रश्नवाचक पद उससे पहले आता है; जैसे – मनोहर किस डॉक्टर के पास गया?

    (iii) विस्मयादिसूचक और संबोधन पद वाक्य के आरंभ में आते हैं; जैसे – शाबाश! हमें तुम पर गर्व हैं!

    (iv) पूर्वकालिक क्रिया सदा मुख्य क्रिया से पहले आती है; जैसे – प्रतिभा ने बर्फ डालकर शरबत पिलाया!

    (v) विशेषणों का प्रयोग संज्ञा से पहले किया जाता है; जैसे – मेरी सफेद कमीज कहाँ है?

    (vi) क्रिया-विशेषणों का प्रयोग क्रिया से पहले किया जाता है; जैसे – विद्यार्थी धीरे धीरे गाते हैं!

    (vii) मत, नहीं, न – इन निषेधात्मक पदों का प्रयोग क्रिया से पहले किया जाता है; जैसे – बाजार में बिकने वाले कटे फल मत खाओ!

    (viii) प्रत्येक पद का उचित प्रयोग किया जाता है; जैसे – बाजार चलाकर साईकिल जाओ (अशुद्ध है)! – साईकिल चलाकर बाजार जाओ (शुद्ध है)!

    (ix)यदि ‘न’ का प्रयोग अनुरोध करने के लिए किया जाता है तो इसे वाक्य के अंत में लिखते और बोलते हैं; जैसे – हमारे साथ चलिए न!, मान जाइए न!

    (x) ही, तक, भी, मात्र, केवल, भर, तो आदि निपात या अवधारक पदों का प्रयोग उस पद के पश्चात् किया जाता है, जिन पदों पर बल दिया जाता है; जैसे – रेशमा बंगलौर ही जाएगी! मुकेश लस्सी भी पीना चाहता है!

    (xi) करण, संप्रदान, अपादान, संबंध – इन कारकों का प्रयोग कर्ता और कर्म के मध्य किया जाता है; जैसे – मनीषा का भाई पूना चला गया!

     

    २. अन्वय ( Co-ordination ) – वाक्य में आने वाले विभिन्न पदों जैसे – लिंग, वचन, कारक, पुरुष और काल आदि में एकरूपता होती है! इसके अनुसार ही क्रिया का प्रयोग होता है! इन पदों में होने वाली एकरूपता को अन्वय कहते हैं!

    (क) कर्ता और क्रिया में अन्वय :

    (i) यदि वाक्य का कर्ता विभक्ति रहित हो तो क्रिया सदा कर्ता के अनुसार होती है; जैसे – रामू बरतन माँजता है!

    (ii) यदि कर्ता के साथ ‘ने’ विभक्ति का प्रयोग होता है तो क्रिया कर्म के अनुसार होती है; जैसे – कवयित्रियों ने गीत गाए! वासुदेव ने चूड़ियाँ मंगाई!

    (iii) यदि कर्ता और कर्म दोनों के साथ विभक्ति का प्रयोग किया जाता है तो क्रिया पुल्लिंग और एकवचन होती है; जैसे – अध्यापिका ने छात्रा को डांटा! मम्मी ने दूध को उबाला!

    (iv) यदि कर्ता एक से अधिक होते हैं और उनके साथ विभक्ति नहीं लगती तो क्रिया कर्ताओं के लिंग के अनुसार होती है! ये कर्ता और आदि से समुच्चयबोधक से जुड़े होते हैं; जैसे – मनोज, रमेश और सुरेश पुस्तकें बेच रहे हैं!

    (v) कर्ता के लिंग का पता न होने पर क्रिया पुल्लिंग होती है; जैसे – कोई घंटी बजा रहा है!

    (vi) विभाक्तिरहित कर्ता यदि ‘या’ से जुड़े होते हैं तो क्रिया अंतिम कर्ता के अनुसार होती है; जैसे – फूल माली या मालिन लाएगी!

    (vii) यदि वाक्य में कर्ता के रूप में क्रमशः मध्यपुरुष, अन्य पुरुष और उत्तम पुरुष आएँ तो क्रिया उत्तमपुरुष के लिंग के अनुसार तथा बहुवचन होती है; जैसे – तुम, वह और मैं एकसाथ परिक्षा देने चलेंगे!

    (viii) यदि एकवचन कर्ता का प्रयोग आदर-सम्मान के लिए किया जाता है तो क्रिया बहुवचन होती है; जैसे – डॉ अनिरुद्ध प्रसाद विमल समारोह के विशिष्ठ-अतिथि होंगे!

     

    ३. विशेष्य (संज्ञा) और विशेषण में अन्वय :

    (i) संज्ञा के लिंग के अनुसार विशेषण का लिंग होता है; जैसे – रमा का बड़ा पुत्र इंजिनियर है!

    (ii) यदि वाक्य में अनेक संज्ञाएँ हों और उनके लिए एक ही विशेषण आए तो विशेषण के लिंग और वचन उस विशेषण के बाद आई संज्ञा के अनुसार होते हैं; जैसे – उस बेंच पर मोटी महिला और पुरुष बैठे हैं!

    (iii) यदि एक संज्ञा के लिए कई विशेषण आएँ तो विशेषण के लिंग और वचन संज्ञा के अनुसार होंगे; जैसे – प्यारा, दुलारा और नन्हा सोनू मुस्करा रहा था!

     

    ४. संज्ञा और सर्वनाम का अन्वय :

    (i) संज्ञा के स्थान पर आने वाले सर्वनाम के लिंग और वचन, संज्ञा के लिंग और वचन के अनुसार होते हैं; जैसे – भैया आया है और वह कुछ दिन रहेगा!

    (ii) आदर और सम्मानसूचक संज्ञाओं के स्थान पर आने वाले सर्वनामों का प्रयोग बहुवचन के रूप में होता है; जैसे – गुरु जी आए तो सबने उन्हें प्रणाम किया!

    (iii) किसी विशेष वर्ग के लिए प्रयुक्त होने वाले संज्ञा पदों के स्थान पर आने वाला ‘मैं’ सर्वनाम पद ‘हम’ हो जाता है; जैसे – रमेश ने कहा कि हमें भगवान महावीर का अनुसरण करना चाहिए!

     

    और पढ़ें (Next Topics) : विराम चिह्न क्या होता है और इसका क्या महत्व है?

     

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  • विराम चिह्न क्या होता है और इसका क्या महत्व है?

    विराम चिह्न क्या होता है और इसका क्या महत्व है?

    ‘विराम’ का शाब्दिक अर्थ होता है ठहरावI भावों और विचारों की अभिव्यक्ति को स्पष्ट एवं बोधगम्य बनाने के लिए विराम-चिह्नों ( Viram Chinh ) का प्रयोग आवश्यक हैI

    आपने देखा होगा की बोलते समय सभी वाक्यों को लगातार नहीं बोला जाताI व्यक्ति अपने मन की बात को स्पष्ट और बोधगम्य बनाने के लिए बिच बिच में रुकता हैI कहीं हम अधिक समय रुकते हैं तो कहीं कमI कहीं हम अधिक बल देते हैं और कहीं कमI वाक्य के बोलने में उसके स्वर में उतार चढ़ाव आता है, तभी उसकी प्रस्तुति सहज ग्राह्य बनती हैI

    लिखित भाषा में स्थान विशेष पर रुकने अथवा उतार चढ़ाव आदि को दिखाने के लिए विभिन्न प्रकार के चिह्नों का सहारा लेना पड़ता हैI ये चिह्न ही विराम चिह्न ( Viraam Chinha ) कहलाते हैंI उदहारण के लिए –

    रवि आगरा जाएगा I (सामान्य सूचना कथन)

    रवि आगरा जाएगा ? (प्रश्नवाचक कथन)

    रवि आगरा जाएगा ! (आश्चर्यसूचक कथन)

    उपर्युक्त वाक्यों में I, ?, ! ये संकेत (चिह्नों) ही वाक्यों के अर्थ में अंतर दे रहे हैंI जबकि तीनों वाक्य रूप और संरचना की दृष्टि से एक ही हैंI मौखिक या बोलचाल की भाषा में ऐसी अनेक युक्तियाँ हैं ( जैसे रुकना, कहीं बल देना, कहीं भिन्न भिन्न अनुतान के साथ बोलना आदि) जिनका प्रयोग प्रायः हर भाषा बोलचाल के समय करता हैI लिखित भाषा में इन्हीं मौखिक युक्तियों के लिए विराम चिह्न बना लिए गए हैंI इनसे वाक्य-विन्यास और भावों की अभिव्यक्ति में स्पष्टता आ जाती है और सौंदर्य भी बढ़ जाता है; जैसे –

    १. रोको मत जाने दो (अर्थ स्पष्ट नहीं है)

    २. रोको, मत जाने दो (अर्थ स्पष्ट है)

    ३. रोको मत, जाने दो (अर्थ सपष्ट है)

     

    भावों और विचारों को स्पष्ट करने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग वाक्य के बिच या अंत में किया जाता है, उन्हें विराम-चिह्नों कहते हैंI हिंदी में प्रचलित प्रमुख विराम-चिह्न निम्नलिखित हैं –

    1. पूर्ण विराम  –  I
    2. अर्द्ध विराम  –  ;
    3. अल्प विराम  –  ,
    4. प्रश्नसूचक  –  ?
    5. विस्मयसूचक  –  !
    6. उद्धरण चिह्न  –  ‘ ‘
    7. योजक चिह्न  –   –
    8. कोष्ठक –  ( )
    9. लाघव या संक्षेपक –  ०
    10. त्रुटिपद या हंसपद  –  ^
    11. विवरण चिह्न  –  :—-
    12. उपविराम  –  :
    13. निर्देशक चिह्न  –  —-

     

    १. पूर्ण विराम (Full Stop) – सामान्य वाक्य के पूरा होने पर अंत में पूर्ण विराम का प्रयोग किया जाता हैI इसका चिह्न (I) होता हैI इस चिह्न को खड़ी पाई कहते हैंI वाक्य चाहे कितना सरल हो या संयुक्त हो अथवा मिश्र हो, यदि सामान्य कथन वाला वाक्य है तो अंत में पूर्ण विराम का प्रयोग किया जाता है; जैसे – पुष्पा ने निबंध लिख लिएI

     

    २. अर्द्ध विराम (Semi Colon) – इसका प्रयोग पूर्ण विराम से कम समय तक ठहराव के लिए करते हैंI इसका चिह्न (;) होता है! इसका प्रयोग उदाहरण देते समय, समानाधिकार उपवाक्यों के बिच, किसी उपवाक्य पर विशेष बल देने, दो तीन वर्गों के बिच में तथा मिश्र और संयुक्त वाक्य में विपरीत अर्थ प्रकट करने वाले उपवाक्यों के बिच में करते हैं; जैसे – नाटक समाप्त हुआ; दर्शक चले गएI

     

    ३. अल्प विराम (Comma) – अल्प विराम का प्रयोग वहाँ किया जाता है जहाँ अर्द्ध विराम से कम समय के लिए ठहराव होता हैI इसका चिह्न ( , ) होता हैI अल्प विराम का प्रयोग समान शब्दों को अलग करने के लिए, वाक्य के बिच में आए उपवाक्य को अलग करने के लिए, किसी शब्द पर बल देने के लिए, पत्रों के संबोधन और समापन के लिए, उद्धरण से पहले, हाँ या नहीं के बाद, तारीख को अलग करने के लिए, उपाधियों को अलग अलग दर्शाने के लिए, पता लिखते समय और एक ही शब्द या वाक्यांश की पुनरावृति होने पर इसका प्रयोग होता है; जैसे – दौड़ो, दौड़ो आग लग गईI ईमानदारी, इसे आज पूछता कौन है?

     

    ४. प्रश्नसूचक ( Sign of Interrogation ) – प्रायः प्रश्न किए जाने वाले वाक्यों के अंत में प्रयोग किया जाता हैI इसका चिह्न ( ? ) होता हैI इसका प्रयोग प्रश्नवाचक वाक्यों के अंत में, संदेह या अनिश्चय के भाव पैदा करने के लिए, व्यंग प्रकट करने के लिए और यदि एक ही वाक्य में कई प्रश्नसूचक उपवाक्य हों तो पूरे वाक्य की समाप्ति पर ही प्रश्नसूचक चिह्न लगाया जाता है; जैसे – क्या तुमने काम कर लिया ?

     

    ५. विस्मयसूचक (Sign of Exclamation ) – विस्म्यादिसूचक का प्रयोग विस्मय, हर्ष, घृणा, शोक आदि भावों को प्रकट करने के लिए किया जाता हैI इसका चिह्न ( ! ) होता है; जैसे – इतनी लंबी दीवार!

     

    ६. उद्धरण या अवतरण चिह्न ( Inverted Commas ) – उद्दरण चिह्न का प्रयोग किसी कथन को मूलक के रूप में लिखने के लिए करते हैंI इसे अवतरण चिह्न भी कहा जाता हैI इसका चिह्न ( “…” ) तथा ( ‘……’ ) होता हैI

     

    ७. योजक चिह्न (Hyphen ) – योजक प्रयोग समान स्तर के दो शब्दों को जोड़ने के लिए तथा तुलना करने के लिए जाता हैI इसका चिह्न ( – ) होता हैI

     

    ८. कोष्ठक ( Bracket ) – कोष्ठक का प्रयोग अंको और अक्षरों के क्रम, शब्दों के विशेष अर्थ या भाव को प्रकट करने के लिए तथा एकांकी और नाटक में संकेत तथा भाव प्रकट करने के लिए किया जाता है; जैसे – फुलवारी गीत (कवि – अशोक लव) में बच्चों के गीत हैंI

     

    ९. लाघव या संक्षेपक चिह्न ( Sign of Abbrevation ) – शब्दों के संक्षिप्त रूप करने के लिए लाघव चिह्न का प्रयोग होता हैI इसका चिह्न ( ० ) होता है; जैसे – मास्टर ऑफ़ आर्ट्स – एम०ए०

     

    १०. त्रुटीपूरक या हंसपद (^) – कई बार लिखते समय बिच में कोई शब्द छुट जाता है तो उस स्थान पर त्रुटीपूरक चिह्न लगाकर उस शब्द को लिख दिया जाता हैI इसका चिह्न तो कुछ कुछ लैम्डा जैसा होता है लेकिन अंग्रेजी कंप्यूटर कीपैड पर ये चिह्न उपलब्ध न होने के कारण हम इस चिह्न ( ^ ) का प्रयोग कर रहे हैंI

     

    ११. विवरण ( Sign of Following ) – व्यक्तियों, स्थानों और वस्तुओं आदि का विवरण देने के लिए विवरण चिह्न का प्रयोग किया जाता हैI इसका चिह्न :—- होता हैI

     

    १२. उपविराम (Colon ) – उपविराम चिह्न का प्रयोग कई रूपों में किया जाता है; जैसे – निर्देश, संवाद-लेखन, शीर्षक, उदहारण आदि के लिएI इसका चिह्न ( : ) होता हैI इसे अपूर्ण विराम भी कहते हैं; जैसे – विज्ञान : वरदान या अभिशापI

     

    १३. निर्देशक चिह्न ( Dash ) – निर्देशक चिह्न योजक से थोड़ा बड़ा होता हैI  निर्देशक का प्रयोग व्याख्यान करने, निर्देश देने और संवाद लेखन के लिए किया जाता हैI इसका चिह्न ( —– ) है; जैसे – रूपा —– अध्यापिका की भूमिका माँ से बढ़कर होती हैI

     

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  • अलंकार, अलंकार के भेद और अलंकारों में अंतर

    अलंकार, अलंकार के भेद और अलंकारों में अंतर

    अलंकारों का प्रयोग कविता में किया जाता है! इससे कविता के सौंदर्य में अभिवृद्धि होती है! अलंकार ( Alankar ) शब्द का अर्थ सौंदर्य की वृद्धि करने वाला होता है! जैसे आभूषण से नारी की सुंदरता में वृद्धि होती है, इसी प्रकार कविता में अलंकारों के प्रयोग से उसकी सुंदरता में और वृद्धि हो जाती है!

     

    अलंकार ( Alankaar ) के भेद :

    १.  शब्दालंकार   २.  अर्थालंकार

     

    १. शब्दालंकार : जहाँ शब्दों के कारण काव्य में सौंदर्य और चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है! जैसे – दामिनी दमक रही घन माहीं! शब्दालंकार के निम्नलिखित भेद प्रमुख हैं – (i) अनुप्रास  (ii) यमक  (iii) श्लेष

     

    (i) अनुप्रास – अनुप्रास शब्द का अर्थ है, किसी वस्तु को अनुक्रम में रखना! समान वर्णों की आवृति के कारण कविता में जहाँ सौंदर्य, संगीत और चमत्कार होता है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है! जैसे – मुदित महीपति मंदिर आए! इसमें ‘म’ वर्ण की आवृति हुई है!

    (ii) यमक – कविता की जिन पंक्तियों में एक शब्द एक से अधिक बार आता है और हर बार अलग अलग अर्थ देता है, वहाँ यमक अलंकार होता है! जैसे – रति – रति शोभा सब रति के शरीर की!

    (iii) श्लेष – श्लेष शब्द का अर्थ है – चिपकना! जहाँ एक शब्द के साथ अनेक अर्थ चिपके हों अर्थात् कविता की जिन पंक्तियों में कोई शब्द एक ही बार आए और अलग अलग अर्थ दे, वहाँ श्लेष अलंकार होता है! जैसे – मधुबन की छाती को देखो, सूखी कितनी इसकी कलियाँ!

     

    २. अर्थालंकार : काव्य में जहाँ अर्थ के कारण सौंदर्य और चमत्कार होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है! जैसे – जीवन ठूंठ सा नीरस हो गया! अर्थालंकार के निम्नलिखित प्रमुख भेद हैं – (i) उपमा  (ii) रूपक  (iii) उत्प्रेक्षा  (iv) अतिशयोक्ति  (v) अन्योक्ति  (vi) मानवीकरण

     

    (i) उपमा – यह सादृश्यमूलक अलंकार है! कविता की जिन पंक्तियों में किसी व्यक्ति, प्राणी या वस्तु आदि के गुण – अवगुण, रूप, स्वाभाव और स्थिति आदि की तुलना और समानता किसी दूसरे के साथ होती है, तो वहाँ उपमा अलंकार होता है! जैसे – मखमल के झूले पड़े हाथी सा टीला! उपमा अलंकार के दो भेद – (1) पूर्ण उपमा  (2) लुप्त उपमा , और चार अंग – (क) उपमेय  (ख) उपमान  (ग) साधारण धर्म  (घ) वाचक शब्द होते हैं!

    (क) उपमेय – वह व्यक्ति या वस्तु जिसका वर्णन किया जाता है, उपमेय कहलाता है, अर्थात् जिस व्यक्ति, प्राणी या वस्तु की तुलना की जाती है, उसे उपमेय कहते हैं! उपमेय को प्रस्तुत वस्तु भी कहते हैं! इसमें टीला उपमेय है!

    (ख) उपमान – जिस प्रसिद्ध वस्तु या व्यक्ति के साथ उपमेय की समानता बताई जाती है, अर्थात् जिस व्यक्ति या वस्तु के साथ तुलना की जाती है, उसे उपमान कहते हैं! इसमें हाथी उपमान है!

    (ग) साधारण धर्म – उपमेय और उपमान के बिच पाए जाने वाले समान रूप और गुण को साधारण धर्म कहते हैं! जैसे – दूध सा सफ़ेद चौक – इसमें चौक उपमेय है, दूध उपमान है और सफ़ेद साधारण धर्म है!

    (घ) वाचक – जो शब्द उपमेय और उपमान में समानता या तुलना प्रकट करता है, उसे वाचक कहते हैं! ऊपर के उदाहरणों में ‘सा’ वाचक शब्द है! अन्य वाचक शब्द है – जैसा, ऐसा, से, सा, सी, समान, सरिस, सदृश, ज्यों, तरह, तुल्य, नाई, जैसहि, तैसहि आदि!

    (1) पूर्ण उपमा – कविता की जिन पंक्तियों में उपमा के चारों अंग – उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द होते है, वहाँ पूर्ण उपमा अलंकार होता है! जैसे – दूध-सा सफ़ेद चौक, में पूर्ण उपमा है!

    (2) लुप्त उपमा – जिन पंक्तियों में उपमा के चारों अंगों में से किन्हीं अंगों का लोप होता है! वहाँ लुप्त उपमा अलंकार होता है! जैसे मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला, में साधारण धर्म लुप्त है!

     

    (ii) रूपक – जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए वहाँ रूपक अलंकार होता है! इसमें साधारण धर्म और वाचक नहीं होते! उपमेय और उपमान के मध्य प्रायः योजक चिह्न का प्रयोग किया जाता है – मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों! इसमें चंद्र को ही खिलौना कहा गया है!

     

    (iii) उत्प्रेक्षा – जहाँ रूप, गुण आदि की समानता के कारण उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है! इसमें मानों, ज्यों, मनु, जनु, जानो, मनहु, जनहु आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है! जैसे – सोहत ओढ़े पित पट स्याम सलोने गात! मनो नीलमणि सैल पर आतप परयो प्रभात! यहाँ श्रीकृष्ण के साँवले शरीर में नीलमणि पर्वत तथा पीले वस्त्रों में धुप की संभावना प्रकट की गई है, अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है!

     

    (iv) अतिशयोक्ति – जहाँ किसी बात को इतना बढ़ा चढ़ाकर कहा जाए अथवा किसी को प्रशंसा इतनी बढ़ा चढ़ाकर की जाए की वह लोक सीमा के बाहर हो जाए तो वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है! जैसे – देख लो साकेत नगरी है यही, स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही!

     

    (v) अन्योक्ति – काव्य में जहाँ उपमान के वर्णन के माध्यम से उपमेय का व्यंगात्मक वर्णन किया जाए, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है! इसमें प्रस्तुत कथन की पृष्ठभूमि में अप्रस्तुत कथन होता है! जैसे – वे न इहाँ नागर बड़े जिन आदर तौ आब! फूलै अनफूलै भयो, गँवई गाँव गुलाब!!

     

    (vi) मानवीकरण – जहाँ जड़ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं तथा क्रियाओं का आरोप हो वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है! जैसे – बीती विभावरी ज़ाग री, अंबर पनघट में डुबो रही, तारा-घट ऊषा नागरी!

     

    अलंकारों में अंतर –

     

    १. उपमा और रूपक अलंकार में भेद :

    – उपमा अलंकार में दो वस्तुओं, व्यक्तियों और प्राणियों आदि में तुलना या समानता होती है! इसमें वाचक शब्द होता है!

    – रूपक अलंकार में दो वस्तुओं, व्यक्तियों और प्राणियों को एक ही कर दिया जाता है! इसमें वाचक शब्द नहीं होता! जैसे –

    – वह दीपशिखा-सी शांत भाव में लीन – उपमा!

    – दीपशिखा-यशोधरा प्रकाशमान हुई महलों में – रूपक!

     

    २. यमक और श्लेष अलंकार में भेद :

    – यमक अलंकार में एक शब्द एक से अधिक बार आता है, उसका हर बार भिन्न अर्थ होता है!

    – श्लेष अलंकार में शब्द एक ही बार आता है, उसके एक से अधिक अर्थ होते हैं! जैसे –

    कहै कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराय लीनी – यमक

    को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर – रूपक!

     

    ३. उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार में भेद :

    – उपमा अलंकार में तुलना की जाती है और समानता दर्शायी जाती है!

    – उत्प्रेक्षा अलंकार में भी समानता और तुलना होती है, परंतु इसमे संभावना प्रकट की जाती है!

    गंगा-सी पावन थी नारी – उपमा

    मानो गंगा-सी प्यारी थी नारी – उत्प्रेक्षा

    और पढ़ें (Next Topic) : हिंदी के मुहावरे और लोकोक्तियाँ

     

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  • हिंदी व्याकरण में पद व्यवस्था

    हिंदी व्याकरण में पद व्यवस्था

    शब्द और पद :

    शब्द भाषा की स्वतंत्र और अर्थवान इकाई है! शब्द और ‘पद’ में क्या अंतर है, आइए समझते है! शब्द जब स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होता है और वाक्य के बाहर होता है तब तक यह शब्द कहलाता है, किंतु जब शब्द वाक्य के अंग के रूप में प्रयुक्त होता है, तब यह पद कहलाता है! जैसे ‘लड़का’ एक शब्द है, लेकिन लड़का पुस्तक पढता है में लड़का एक पद है!

    जो शब्द अर्थ कोश से प्राप्त हो जाए वो कोशकीय शब्द होते हैं, लेकिन कुछ शब्द अर्थ कोश से प्राप्त नहीं हो पाता है, क्योंकि वो कोशीय अर्थ के साथ साथ संदर्भपरक अर्थ भी लिए होता है, जैसे – लडके, लडकों आदि!

     

    कोशीय शब्द और व्याकरणिक शब्द :

    भाषा में कोशीय शब्द से व्यक्ति, वस्तु, विचार या भाव का बोध होता है! कोशीय शब्दों का तात्पर्य अर्थवान शब्दों से है, किंतु पूर्ण अर्थ प्रकट करने के लिए उन्हें वाक्य में प्रयुक्त करना पड़ता है! कुछ कोशीय शब्द व्याकरणिक कार्य भी करते हैं; जैसे –

    (i) मैं आजकल सचिन के घर नहीं जाता!

    (ii) मुझसे आजकल खाना नहीं खाया जाता!

    पहले वाक्य में जाता कोशीय अर्थ दे रहा है, दुसरे वाक्य में जाता सिर्फ व्याकरणिक अर्थ दे रहा है!

    व्याकरणिक शब्द मुख्य अर्थ न देकर व्याकरणिक अर्थ का काम करता है! जिससे मुख्य अर्थ में विशेष अर्थ आ जाता है; जैसे –

    (i) आदिवासी जंगल में रहते हैं!

    (ii) जंगल की आग में कई महीनों तक पेड़ पौधे जलते रहते हैं!

    पहले वाक्य में रहते (रहता) कोशीय अर्थ दे रहा है, दुसरे वाक्य में रहते सिर्फ व्याकरणिक अर्थ दे रहा है!

     

    पद भेद :

    निम्नलिखित वाक्य पढ़िए –

    १. लड़का दौड़ता है!  २. छोटा लड़का दौड़ता है!  ३. छोटे लड़के पीछे पीछे दौड़ते हैं!  ४. वह दौड़ता है!  ५. वे तेज दौड़ते हैं!

    उपर्युक्त वाक्य में ‘लड़का’, ‘लड़के’ – संज्ञा पद हैं! छोटा, छोटे – विशेषण हैं! वह, वे – सर्वनाम हैं! दौड़ता है, दौड़ते हैं – क्रिया है! पीछे पीछे, तेज – अव्यय हैं!

    इस प्रकार पद के पाँच भेद हैं –

    १. संज्ञा  २. सर्वनाम  ३. विशेषण  ४. क्रिया  ५. अव्यय (अविकारी) – क्रिया-विशेषण, संबंध-बोधक, समुच्चबोधक (योजक), विस्यमयादिबोधक!

    उपर्युक्त वाक्यों में ‘लड़का’ का ‘लड़के’, दौड़ता का दौड़ते, वह का वे, छोटा का छोटे रूप बने हैं, किंतु ‘पीछे पीछे’, ‘तेज’ का रूप नहीं बदला है! अतः हम कह सकते हैं की

    १. वाक्य में प्रयुक्त होने पर जिन शब्दों का रूप बदल जाता है उन्हें विकारी पद कहते हैं; जैसे – संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया!

    २. जिन शब्दों का रूप नहीं बदलता उन्हें अविकारी (अव्यय) कहते हैं; जैसे – क्रिया-विशेषण, संबंध-बोधक, समुच्चबोधक (योजक), विस्यमयादिबोधक!

    और पढ़ें (Next Topics) : समास, समास के भेद तथा संधि और समास में अंतर

     

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  • हिंदी शब्दकोश के पर्यायवाची शब्दों की सूचि

    हिंदी शब्दकोश के पर्यायवाची शब्दों की सूचि

    जिन शब्दों के अर्थ में समानता होती है, उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं! पर्यायवाची शब्दों के अर्थों में समानता होंने पर भी प्रत्येक पर्यायवाची शब्द का विशेष अर्थ होता है, इसलिए इनका प्रयोग एक दूसरे के बदले प्रायः नहीं होता है! इनका प्रयोग वाक्य के भाव के संदर्भ के अनुसार होता है, प्रमुख पर्यायवाची शब्द निम्नलिखित हैं –

     

    तालिका – १

    शब्द
    पर्यायवाची शब्द
     अंक
    गोद, आलिंगन, संख्या, नाटक का अंक!
     अंग शरीर, गात, वाय, मूर्ति, देह, तन, कलेवर!
     अग्नि आग, अनल, पावक, दहन, वह्नि, वैश्वानर, कृशानु!
     अचल पर्वत, पहाड़, नग, गिरि, भूधर!
     अमृत सुधा, अमी, पियूष, सोम, अमिय!
     अश्व घोड़ा, घोंटक, तुरंग, बाजि, रविपुत्र, ह्य, सैंधव!
     अरण्य लाल, जंगल, कांतार, विपिन, कानन!
     अरुण लाल रंग, सूर्य, सूर्य का सारथी!
     अनुपम अतुलनीय, अद्वितीय, बेजोड़, अनोखा, अद्भुत, अतुल, अनूठा!
     अक्षर वर्ण, जल, सत्य, मोक्ष, गगन!
     अनंत अंतहीन, विष्णु, आकाश, सर्पराज, अंतरिक्ष!
     अतिथि मेहमान, पाहुना, अभ्यागत, आगंतुक!
     असुर दैत्य, राक्षस, दानव, निशाचर, रजनीचर, दनुज!
     अन्य दूसरा, और, भिन्न, अलग, पृथक्!
     अच्छा शुभ, उचित, श्रेष्ठ, उपयुक्त!
     अहंकार घमंड, अभिमान, दंभ, दर्प!
     अजेय अजित, अपराजेय, अपराजित!
     अनुचर नौकर, दास, सेवक, भृत्य, परिचायक!
    अर्थ मतलब, धन, तात्पर्य, कारण, प्रयोजन!
     आँख नेत्र, लोचन, चक्षु, नयन!
     आकाश नभ, गगन, आसमान, व्योम, शून्य, अनंत!
     आज्ञा आदेश, हुक्म, निर्देश!
     आभूषण गहना, अलंकार, भूषण, जेवर!
     आनंद प्रसन्नता, उल्लास, सुख, आमोद, हर्ष, ख़ुशी!
     आम आम्र, पिकबंधु, सहकार, अमृत!
     इंद्र देवेंद्र, सुरेश, पुरंदर, सुरेंद्र, महेंद्र, शत्रीपति, सुरपति, देवराज!
     इंद्राणी शची, इंद्रवधू, शतावरी, पुलायजा, ऐंद्री!
     इंद्रपुरी देवलोक, अमरावती, स्वर्ग, अल्कापुरी!
     इच्छा कामना, लालसा, आकांक्षा, उत्कंठा, अभिलाषा, मनोरथ!

     

    तालिका – २

    शब्द पर्यायवाची शब्द
     उम्र आयु, वयस, वय!
     उजाला रोशनी, प्रकाश, प्रभा, दीप्ती, आलोक, तेज!
     उन्नति प्रगति, विकास, उत्कर्ष, अभ्युदय, उन्नयन, वृद्धि!
     कमल शतदल, अरविंद, पारिजात, नलिन, राजीव, पंकज, सरोज, जलज, अंबुज!
     कपड़ा वस्त्र, अंबर, पट, वसन, चीर!
     कर हाथ, करना, किरण, सूंड, टैक्स!
     कल मशीन, अगला दिन, बीता दिन, आराम!
     कृषक किसान, हलवाहा, खेतिहर, कृषिजीवी!
     कृष्ण वासुदेव, माधव, केशव, गोविंद, गोपाल, मोहन, घनश्याम, मुरारि, श्याम!
     कनक सोना, धतूरा, गेहूँ, स्वर्ण!
     काल यमराज, मृत्यु, समय, युग!
     कामदेव मन्मथ, मनोज, मदन, मनसिज, रतिपति, अनंग, कंदर्प!
     कान कर्ण, श्रुति, श्रवार्नेंदरी!
     किनारा तीर, तट, कूल, कगार!
     किरण रश्मि, कर, अंशु, मरीचि, मयूरव!
     किला गढ़, दुर्ग, कोट!
     कुबेर धनपति, यक्षराज, किन्नरपति, अल्काधिपति, धनद!
     कोमल सुकुमार, मुलायम, मृदु, नरम!
     कोयल श्यामा, पिक, कोकिल, वसंतदूत!
    कौशल
    प्रवीणता, चातुर्य, कुशलता, निपुणता, दक्षता!
     खल धूर्त, कुटिल, अधम, दुष्ट, दुर्जन!
     गंगा भागीरथी, जाह्नवी, देवनदी, सुरनदी, सुरसरि, त्रिपथगा!
     गणेश लंबोदर, विनायक, गजानन, एकदंत, गणपति, गिरिजानंदन, मोदकप्रिय!
     गरुड़ पक्षिराज, खगकेतु, खगेश, हरिवाहन!
     गधा गर्दभ, खर, वैशाखनंदन!
     गाय गौ, धेनु, सुरभि, धेनु!
     गीदड़ शृगाल, सियार, जंबूक!
     गुरु शिक्षक, वृहस्पति, छंद की मात्रा, भारी, बड़ा!
     गर्मी ग्रीष्म, निदाघ, घाम, ताप!

     

    तालिका – ३

    शब्द पर्यायवाची शब्द
    घर गृह, निवास, निय, भवन, सदन, निकेतन, आवास, आलय!
    चंद्र राकेश, चाँद, चंद्रमा, हिमांशु, रजनीश, शशांक, इंदु, निशाकर!
    चाँदनी ज्योत्स्ना, चंद्रिका, कौमुदी!
    चतुर दक्ष, कुशल, प्रवीण, निपुण, योग्य, पटु!
    जल पानी, वारि, नीर, अम्बु, पय, जीवन, सलिल!
    जन्म उद्भव, उत्पत्ति, अवतरण, अविर्भाव, अवतार!
    जमुना यमुना, कालिंदी, श्यामा, रविसुता!
    जीभ जिह्वा, रसना, इला, रसा!
    झरना निर्झर, स्रोत, उत्स, सोता!
    तारा नक्षत्र, तारक, नखत!
    तलवार खडग, असि, करवाल, कृपाण!
    तालाब ताल, सरोवर, पुष्कर, तड़ाग, सर!
    तात पूज्य, मित्र, पिता, भाई, प्रिय!
    तोता सुग्गा, सुआ, शुक, कीर!
    दरिद्र निर्धन, गरीब, रंक, कंगाल, दीन!
    दांत दंत, दशन, द्विज!
    दिन दिवस, वार, दिवा, वासर!
    दुर्गा गौरी, नारायणी, कल्याणी, कालिका, चामुंडा, चंद्रिका, सिंहवाहिनी, मकराला!
    दुःख कष्ट, पीड़ा, वेदना, क्लेश, संताप!
    दूध दुग्ध, पय, क्षीर, गोरस!
    देवता सुर, देव, अमर, निर्जर, अमर्त्य!
    ध्वजा ध्वज, झंडा, पताका, निशान!
    धनुष पिनाक, धनु, कोदंड, कमान, चाप, शरासन!
    नदी सजला, सरिता, सलिला, तटिनी, तरंगिणी!
    नया नवीन, नूतन, नव, अभिनव!
    नाश तबाही, ध्वंस, विनाश!
    नाव नौका, तरिणी, किश्ती, बेड़ा, डोंगी!
    नारी औरत, महिला, स्त्री, वनिता, कामिनी, ललना, अबला!
    पंडित मनीषी, विद्वान्, बुध, सुधी, कोविद!

     

    तालिका – ४

    शब्द पर्यायवाची शब्द
    पत्नी भार्या, वामा, वधू, बहू, अर्धांगनी. जीवनसंगिनी, सहधर्मिणी!
    पति नाथ, वल्लभ, साजन, स्वामी, भर्ता!
    पक्षी नभचर, पंखी, अंडज, खग, विहग, द्विज!
    पत्थर पाषण, प्रस्तर, अश्म, पाहन!
    पवन हवा, वायु, अनिल, समीर, बयार, मारुत!
    पत्ता पत्र, पल्लव, पात, पर्ण, दल!
    पाप दुष्कृत्य, अधर्म, पातक, अध्!
    पिता तात, पितृ, जनक, बाप!
    पुत्र सुत, बेटा, अंशज, आत्मज!
    पुत्री सुता, बेटी, अंशजा, आत्मजा!
    पुरुष आदमी, नर, मर्द, मनुज, मनुष्य!
    पुष्प फूल, कुसुम, प्रसून, सुमन!
    पेड़ तरु, वृक्ष, पादप, द्रुम, विटप, गाछ!
    प्रेम प्रीति, स्नेह, प्यार, अनुराग!
    पृथ्वी भूमि, भू, धरती, वसुधा, वसुंधरा!
    बंदर कपि, वानर, मर्कट, शाखामृग, हरि!
    बर्फ तुहिन, तुषार, हिम, नीहार!
    ब्रह्मा विधि, विधाता, प्रजापति, चतुरानन, पितामह!
    बाल केश, कुंतल, अलक, कच!
    बालक शिशु, लड़का, बच्चा, बाल!
    बादल घन, जलद, मेघ, पयोद, अंबुद, वारिद!
    ब्राह्मण विप्र, भूदेव, द्विज!
    बिजली चपला, चंचला, विद्युत्, दामिनी, तड़ित!
    बुद्धि प्रज्ञा, विवेक, मति, अक्ल, मेधा!
    भौंरा भ्रमर, अलि, मधुकर, मधुप, मिलिंद, शिलीमुख!
    मदिरा शराब, मय, मधु, मद्य, सोमरस!
    मानव मनुष्य, इंसान, मनुज, आदमी!
    मोर मयूर, सारंग, केकी, अहिपक्षी!
    महादेव शिव, शंकर, नीलकंठ, भोलेनाथ, पशुपति, हर, त्रिलोचल, नटराज!

     

    तालिका – ५

    शब्द पर्यायवाची शब्द
    माता माँ, मातृ, जननी, मैया, अंबा, जन्मदात्री, अम्मा, माई!
    मित्र दोस्त, मीत, सखा, मितवा, साथी, सहचर, संगी, यार!
    मृत्यु मरण, निधन, देहांत, काल, प्राणांत, स्वर्गवास!
    मूर्ख बुद्धू, जड़मति, भोंदू, मूढ़!
    मोक्ष सद्गति, मुक्ति, अपवर्ग, निर्वाण, कैवल्य!
    मार्ग राह, रास्ता, पथ, मग!
    मेंढक दादुर, मंडूक!
    यश प्रसिद्धि, कीर्ति, ख्याति, शोहरत!
    यमराज काल, सूर्यपुत्र, अंतक, कृतांत, कौनाश!
    युद्ध लड़ाई, समर, संग्राम, रण!
    युवती तरुणी, रमणी, प्रमदा, नवयुवती!
    योगी तपी, तपस्वी, साधु, संन्यासी, वैरागी!
    रात रात्रि, निशा, रजनी, यामिनी, विभावरी!
    राम रामचंद्र, सीतापति, दशरथनंदन, राघव, रघुनंदन!
    रावण लंकापति, लंकेश, दशानन, राक्षसराज!
    राजा नृप, महीप, भूपति, नरेश, महाराजा!
    रत्न मणि, माणिक्य, जवाहर, मरकत!
    रचना निर्माण, सृजन, कृति, बनावट, सृष्टि!
    लहर तरंग, उर्मि, हिलोर, मौज!
    लहू रक्त, शोणित, रुधिर, खून!
    लक्ष्मी श्री, रमा, कमला, पद्मा, विष्णुप्रिया!
    विष्णु नारायण, गोविंद, चतुर्भुज, हरि, शेषशायी, लक्ष्मीपति, केशव, उपेंद्र!
    वर्ष साल, सन, बरस, संवत्, अब्द!
    विद्यालय पाठशाला, स्कूल, विद्याकेंद्र, ज्ञानालय!
    विवाह शादी, ब्याह, पाणिग्रहण, परिणय!
    विष जहर, गरल, कालकूट, हलाहल!
    वसंत ऋतुराज, मधु, माधव!
    शंका संदेह, शक, संशय, सुबह!
    श्वेत सफ़ेद, शुभ्र, उज्ज्वल, धवल!

     

    तालिका – ६

    शब्द पर्यायवाची शब्द
    शत्रु दुश्मन, अरि, रिपु, वैरी, अराति!
    शिक्षा ज्ञान, उपदेश, नसीहत, सीख!
    शीशा दर्पण, आईना, काँच!
    संकेत निर्देश, इशारा, चिह्न, लक्ष्य, लक्षण!
    संकल्प प्रतिज्ञा, व्रत, प्रण, इरादा!
    संध्या शाम, सायं, सांझ, दिवान्त!
    संसार विश्व, जगत, जगती, दुनिया, जग!
    संपूर्ण पूरा, सकल, सारा, समस्त!
    सर्प साँप, नाग, भुजंग, विषधर, व्याल!
    समुद्र अंबुधि, जलधि, सागर, रत्नाकर, सिंधु, उदधि!
    सरस्वती वीणापाणी, वाणी, गिरा, शारदा, वागीश्वरी, हला, भाषा, भारती!
    सवेरा भोर, उषा, सूर्योदय, प्रातः, प्रभात!
    स्वर्ग सुरलोक, देवलोक, वैकुंठ, द्युलोक!
    सिंह केशरी, शेर, केहरि, व्याघ्र, वनराज, नाहर!
    सेना दल, फ़ौज, कटक, चमु!
    सोना स्वर्ण, कनक, कंचन, हिरण्य, हेम!
    सीता जानकी, वैदेही, मैथिली, जनकसुता, भूमिजा!
    साधु संत, संन्यासी, वीतरागी, मुनि, वैरागी!
    सुगंध खुशबू, सुरभि, सौरस, महक, सुवास!
    सूर्य दिनकर, भास्कर, आदित्य, रवि, प्रभाकर, भानु, मार्तंड!
    स्त्री नारी, ललना, कांता, कामिनी, सुंदरी, वनिता, रमणी!
    हिरण मृग, सारंग, हरिण, हिरन!
    हाथी कुंजर, गज, हस्ती, करि!
    हनुमान पवनपुत्र, केसरीनंदन, अंजनिपुत्र, मारुति, महावीर, बजरंगी, बजरंगबली!
    हाथ कर, हस्त, पाणी!
    हिमालय गिरिराज, नगपति, हिमाचल, पर्वतराज, हिमगिरी, गिरीश!
    हृदय मन, दिल, उर, अंतःस्थल, अंतःकरण!

     

    निचे कुछ ऐसे शब्द दिए जा रहे हैं जो प्रत्यक्षतः पर्यायवाची प्रतीत होते हैं, पर जिनके प्रयोग में शुक्षम अंतर है –

    अनुभव – अनुभूति, अनुरूप – अनुकूल, अपराध – पाप, अवनति – पतन, विशेषज्ञ – दक्ष, पारंगत, आदेश – आज्ञा – अनुज्ञा, अवस्था – आयु – वय, अस्त्र – शस्त्र – आयुध, आचार – व्यवहार, ओषधि – औषध, इच्छा – कामना, आनंद – सुख, पत्ता – किसलय – पल्लव, कष्ट – यंत्रणा – यातना, शोक – विषाद – व्यथा, कलंक – अपयश, कपड़ा – वस्त्र, प्रयोग – उपयोग आदि!

    और पढ़ें (Next Topic) : शब्द निर्माण (शब्द रचना) उपसर्ग और प्रत्यय

     

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  • अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

    अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

    हिंदी में अनेक शब्दों / पदबंधों या वाक्यांश के लिए एक शब्द का प्रयोग किया जाता है! इससे लेखन में संक्षिप्तता आती है तथा लेख सुगठित हो जाता है! इस प्रकार के कुछ शब्दों की सूची निचे दी जा रही है –

     

    प्रथम सूचि –

    • जो अनुकरण करने योग्य हो – अनुकरणीय
    • जिसे जाना न जा सके – अज्ञेय
    • जिसके आने की तिथि न निश्चित हो – अतिथि
    • जिसका आदि न हो – अनादि
    • जिसका संबंध आत्मा से हो – आध्यात्मिक
    • जो ईश्वर में विश्वास करता हो – आस्तिक
    • जो इंद्रियों के अनुभव से परे हो – अतींद्रिय
    • जिसकी कभी मृत्यु न हो – अमर
    • जिस पर विजय प्राप्त न की जा सके – अजेय
    • जिसे खाया न जा सके – अखाद्य
    • जिसे भेदा न जा सके – अभेद्य
    • जिसका अंत न हो – अनंत
    • जिसका दमन न हो सके – अदम्य
    • जो बात कही न जा सके – अकथनीय
    • जो अवसर के अनुसार बदल जाए – अवसरवादी
    • जिसके पास कुछ न हो – अकिंचन
    • जिसे छोड़ा न जा सके – अनिवार्य
    • जिसकी कोई उपमा न हो – अनुपम
    • जो आँखों के सामने न हो – अप्रत्यक्ष
    • जिसका पार न पाया जा सके – अपार
    • जिसे कभी बुढ़ापा न आए – अपरिचित
    • जिस पर मुकदमा चल रहा हो – अभियुक्त
    • जिस पर भरोसा न किया जा सके – अविश्वसनीय
    • जिसके आर पार देखा जा सके – पारदर्शी

     

    द्वितीय सूचि –

    • सदा आगे रहने वाला – अग्रणी
    • बात को बहुत बढ़ा चढ़ा कर कहना – अतिशयोक्ति
    • छः माह में एक बार होने वाला – अर्धवार्षिक
    • जो अवश्य घटित होने वाला हो – अवश्यंभावी
    • जो बिना ढंका हो – अनावृत
    • फिजूल खर्च करने वाला – अपव्ययी
    • जिसके समान दूसरा न हो – अद्वितीय
    • आरंभ से अंत तक – आद्योपांत
    • वह जमीन जिसमें कुछ भी पैदा न हो – ऊसर
    • जो जमीन उत्पादक हो – उर्वरा
    • ऐसी बीमारी जिसके इलाज न हो – असाध्य
    • जो बिलकुल मुफ्त हो – निःशुल्क
    • जो किसी गुट में न हो – तटस्थ
    • जो किए एहसान को मानता हो – कृतज्ञ
    • जो किए एहसान को नहीं मानता हो – कृतघ्न
    • प्रतिदिन होने वाला – दैनिक
    • भविष्य में घटित होने वाला – भावी
    • अन्य देश में निवास करने वाला – प्रवासी
    • जो इस लोक से अलग हो – अलौकिक
    • जिसे पढ़ना लिखना आता हो – साक्षर
    • जो जानने की इच्छा रखता हो – जिज्ञासु
    • जो सब कुछजानता हो – सर्वज्ञ

     

    तीसरी सूचि –

    • जिस काव्य में गद्य पद्य मिश्रित हो – चंपू
    • साहित्य से संबंध रखने वाला – साहित्यकार
    • लेखा जोखा करने वाला – लेखाकार
    • किसी विषय का ख़ास जानकार – विशेषज्ञ
    • दूर की बात सोचने वाला – दूरदर्शी
    • जो निर्णय करने वाला हो – निर्णायक
    • जिसका कोई नाथ न हो – अनाथ
    • विश्वास करने योग्य – विश्वसनीय
    • जिसकी पत्नी मर गई हो – विधुर
    • जिसका पति मर गया हो – विधवा
    • पति पत्नी का जोड़ा – दंपत्ति
    • जो बिना वेतन के काम करे – अवैतनिक
    • जिसका आचरण अच्छा हो – सदाचारी
    • जो मांस खाता हो – मांसाहारी
    • जो कम बोलता हो – मितभाषी
    • जो काम करने में विश्वास करता हो – कर्मठ
    • अपनी हत्या स्वयं करना – आत्महत्या
    • जो दूसरों से ईर्ष्या रखता हो – ईर्ष्यालु
    • जो उच्च कुल में पैदा हुआ हो – कुलीन
    • दूसरों का भला चाहने वाला – परोपकारी
    • जिनकी आयु लंबी हो – दीर्घायु
    • जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो – जितेंद्रिय
    • बहुत तेज चलने वाला – द्रुतगामी
    • पश्चिम से संबंध रखनेवाला – पाश्चात्य
    • जो नष्ट होने वाला हो – नश्वर
    • अपनी बात पर टिका रहने वाला – अडिग
    • हाथ से लिखा हुआ – हस्तलिखित
    • जो आसानी से प्राप्त हो जाए – सुलभ
    • जो शरण में आया हो – शरणागत
    • पत्नी के साथ – सपत्नीक
    • फल खाकर रहने वाला – फलाहारी

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    और पढ़ें : (Next Topic) : शब्द निर्माण, शब्द रचना, उपसर्ग और प्रत्यय

     

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  • शब्द व्यवस्था, शब्द भंडार और शब्दों का वर्गीकरण

    शब्द व्यवस्था, शब्द भंडार और शब्दों का वर्गीकरण

    शब्द (Word) :

    निश्चित अर्थ प्रकट करने वाले वर्ण समूह को शब्द कहते हैं! शब्द भाषा की स्वतंत्र और अर्थवान इकाई है! शब्द और अर्थ में नित्य संबंध माना जाता है! वास्तव में शब्द सार्थक होते हैं और वर्णों के विशिष्ट क्रम से बनते हैं! वे वस्तु, विचार या भाव को अभिव्यक्त करते हैं! मतलब १. शब्द भाषा की स्वतंत्र इकाई है २. शब्द भाषा की सार्थक इकाई है! जैसे मकल कोई शब्द नहीं लेकिन कलम है!

     

    शब्द भंडार :

    किसी भी भाषा में प्रयुक्त शब्दों के समूह को उस भाषा का शब्द भंडार कहते हैं! किसी भी भाषा के शब्द भंडार की गणना करना संभव नहीं है! भाषा का शब्द भंडार कितना ही बड़ा क्यों न हो, फिर भी वह परिवर्तित होते रहता है! संस्कृति और सभ्यता में परिवर्तन के साथ साथ शब्द भंडार भी प्रभावित होता है! पुराने शब्द अप्रचलित हो जाते हैं और नए शब्द आ जाते हैं! जैसे – किलो, लीटर, कम्प्यूटर, आकाशवाणी शब्द नए आए हैं तथा मन, सेर, छटाँक आदि शब्द लगभग लुप्त हो रहे हैं!

     

    शब्दों का वर्गीकरण (Classification of Words) :

    शब्दों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है –

    1. स्रोत या इतिहास के आधार पर  2. रचना के आधार पर  3. प्रयोग के आधार पर

    4. व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर  5. अर्थ के आधार पर

     

    स्रोत या इतिहास के आधार पर (According to Origin) :

    स्रोत शब्द के तात्पर्य यह है की हमें पता होना चाहिए कि अमुक शब्द कहाँ से आया है; जैसे – दही शब्द संस्कृत के दधि से आया है! कंप्यूटर शब्द अंग्रेजी भाषा से आया है! हिंदी भाषी समुदाय को प्राकृत – अपभ्रंश से होते हुए संस्कृत शब्द परिवर्तित रूप में मिले हैं, जिन्हें तद्भव कहते हैं! इनके अतिरिक्त जनजाति के लोग जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, उन्हें हम देशी शब्द कहते हैं! मध्यकाल में मुगलों और अंग्रेजों के शासन के कारण अनेक विदेशी शब्द भी आ गए हैं! संस्कृत के शब्द तत्सम हैं! इन सब बातों को ध्यान में रखकर हम स्रोत या इतिहास के आधार पर शब्दों को पाँच वर्गों में बाँट सकते हैं –

    १. तत्सम  २. तद्भव  ३. देशज  ४. आगत (विदेशी)  ५. संकर

     

    १. तत्सम शब्द (sanskrit words) : तत्सम शब्द का अर्थ है ‘उसके समान’ यानि संस्कृत के समान! संस्कृत के बहुत सारे शब्द संस्कृत से उसी रूप में ग्रहण कर लिए गए हैं जिस रूप में उनका प्रयोग संस्कृत में होता है, इसलिए इन्हें तत्सम शब्द कहते हैं; जैसे – पुष्प, भूमि, विद्वान, पृथ्वी, अहंकार, स्वप्न आदि!

     

    २. तद्भव शब्द (Sanskrit based words, changed in Hindi) : तद्भव का अर्थ है ‘उससे उत्पन’! संस्कृत के वे शब्द जो पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, पुरानी हिंदी से विकसित होते हुए हिंदी में परिवर्तित रूप में प्रचलित हैं, उन्हें तद्भव शब्द कहते हैं – सप्त > सात, कर्म > काम, वर्ष > बरस, मातृ > माता, दुग्ध > दूध, क्षीर > खीर, पत्र > पत्ता, मयूर > मोर आदि!

    पढ़ें : तत्सम शब्दों से विकसित तद्भव शब्दों की पूरी सूचि

     

    ३. देशी या देशज शब्द (Locally originated words) : जिन शब्दों के स्रोत अज्ञात हैं, उन्हें देशज शब्द कहते हैं! ये शब्द हिंदी की अपनी प्रकृति के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्रों, बोली आदि के प्रभाव से विकसित हुए हैं! देशज शब्दों का मूल सामन्यतः जन भाषाओँ में होता है – पगड़ी, लोटा, सेठ, झोला, खाट, झाड़ू, झंझट, थप्पड़, ठोकर, भोंपू, अटकल, भोंदू आदि!

     

    ४. आगत या विदेशी शब्द (Foreign words) : आगत का अर्थ है ‘आया हुआ’! अर्थात् वे शब्द जो दूसरी (विदेशी) भाषाओँ से आए हैं, विदेशी या आगत शब्द कहलाते हैं! हिंदी में अरबी, फ़ारसी, तुर्की, चीनी, रुसी, जापानी, मलय, डच, अंग्रेजी, पुर्तगाली, फ़्रांसिसी आदि भाषाओँ से अनेक शब्द आ गए हैं और वे हिंदी के बन गए हैं – अमीर, आदमी, टेलीविज़न, गोदाम, मित्र, चाय, कुरता, मित्र, रिक्शा, खोपरा, तुरुप आदि!

     

    ५. संकर शब्द : दो भिन्न स्रोतों से आए शब्दों के मेल से बने नए शब्दों को संकर शब्द कहते हैं! हिंदी में ऐसे अनेक शब्द हैं, जो हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी, अरबी आदि शब्दों या शब्दांशो के मेल से बने हैं – वर्ष (संस्कृत) + गाँठ (हिंदी) = वर्षगाँठ!

     

    रचना के आधार पर (According to construction) :

    रचना के आधार पर शब्द दो प्रकार के होते हैं – १. मूल शब्द  २. व्युत्पन्न शब्द

    १. मूल शब्द – जो शब्द किसी दूसरे शब्द या शब्दांश के योग से न बने हों और अपने में पूर्ण हों, उन्हें मूल शब्द कहते हैं! इन्हें रूढ़ शब्द भी कहा जाता है! इन शब्दों के सार्थक खंड नहीं हो सकते – सेना, फूल, पत्ता, कुर्सी, दिन आदि!

    २. व्युत्पन्न शब्द – दो शब्दों या शब्दांशों के योग से बने हुए शब्दों को व्युत्पन्न शब्द कहते हैं! व्युत्पन्न शब्द दो प्रकार के होते हैं –

    (i) यौगिक शब्द (Combined words) : यौगिक का अर्थ है – ‘मेल से बना हुआ’! दो शब्दों या शब्दांशो के योग से बने शब्द को यौगिक कहते हैं! जैसे – सेना + पति = सेनापति, अनु + शासन = अनुशासन, चतुर + आई = चतुराई, प्रधान + आचार्य = प्रधानाचार्य आदि!

    (ii) योगरूढ़ शब्द (Traditional combined words) : जिन यौगिक शब्दों का अर्थ किसी विशेष अर्थ को प्रकट करता है, उन्हें योगरूढ़ शब्द कहते हैं! योगरूढ़ शब्दों का परंपरा से किसी विशेष अर्थ के लिए ही प्रयोग किया जाता है – वीणापाणी शब्द वीणा + पाणी से मिलकर बना है, यहाँ इसका अर्थ हाथ में वीणा न होकर, जिसके हाथ में वीणा अर्थात् सरस्वती है! परंपरा से वीणापाणी शब्द सरस्वती के लिए प्रयुक्त होता है! – हिमालय, नीलकंठ, पीतांबर, चतुर्भुज, लंबोदर, एकदंत, दशानन, पवनपुत्र, महावीर आदि!

     

    प्रयोग के आधार पर (Basis of usage ) :

    प्रयोग की दृष्टि से शब्दों को तीन वर्गों में बाँटा गया है –

    १. सामान्य शब्द (General words) : सामान्य शब्दावली में वे शब्द होते हैं जिनका संबंध आम जन जीवन से होता है! इन शब्दों का प्रयोग भाषा समुदाय के सदस्य अपने दैनिक व्यवहार में करते हैं – हाथ, पैर, सुबह, शाम, बाजार, दाल, भात आदि!

    २. पारिभाषिक या तकनीकी शब्द (Technical words) : ऐसे शब्द जो ज्ञान विज्ञान या विभिन्न व्यवसाय क्षेत्रों में विशिष्ट अर्थों में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें तकनीकी शब्द कहते हैं; जैसे – संज्ञा, घर्षण, घनत्व, जीवमंडल, उत्पाद, अधीक्षक, कार्यकारी आदि!

    ३. अर्धतकनीकी शब्द (Semi Technical words) : इसके अंतर्गत वे शब्द आते हैं जिन्हें सामान्य व्यक्ति भी प्रयुक्त करते हैं और विशेषज्ञ भी! अंतर केवल इतना होता है कि विशेषज्ञ का अर्थ परिभाषित होता है! जबकि सामान्य व्यक्ति का अर्थ शिथिल होता है! जैसे – बल- आम आदमी के लिए बल है तो प्रशासन के लिए फ़ोर्स है!

     

    व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर (According to Grammatical) :

    व्याकरणिक दृष्टि से शब्दों को उनके प्रकार्य के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है –

    १. विकारी (Declinable) : विकारी शब्द वे होते हैं जिनमें लिंग, वचन, कारक, काल, पक्ष के कारण परिवर्तन होता है! संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया विकारी शब्द है – लड़का-लड़के, मैं-मेरा, अच्छा-अच्छी आदि!

    २. अविकारी (Indeclinable) : ऐसे शब्द जिनके मूल रूप में परिवर्तन या विकार नहीं होता, उन्हें अविकारी कहते हैं! अविकारी शब्द हैं – क्रिया विशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक और निपात! इन्हें अव्यय भी कहते हैं! जैसे – आज, यहाँ, अथवा, और, अरे, तक, आदि!

     

    अर्थ के आधार पर (According to Meaning) :

    शब्द भाषा की लघुतम इकाई है! प्रत्येक शब्द का अपना एक अर्थ होता है, जिसे मुख्यार्थ कहते हैं! अर्थ के आधार पर शब्दों के पाँच भेद होते हैं –

    १. पर्यायवाची शब्द (Synonyms) : जिन शब्दों के अर्थों में समानता होती है, उन्हें पर्यायवाची शब्द कहते हैं! पर्यायवाची शब्दों के अर्थों में समानता होने पर भी प्रत्येक पर्यायवाची शब्द का विशेष अर्थ होता है! जैसे – अंक -गोद, आलिंगन, संख्या, नाटक का अंक!

    २. विपरीतार्थक या विलोम शब्द (Antonyms) : एक दुसरे का उल्टा अर्थ देने वाले शब्दों को विलोम शब्द कहते हैं, जैसे – अंधेरा – उजाला, अमृत – विष आदि!

    ३. एकार्थी शब्द (words with one meaning) : ऐसे शब्द जिनका एक ही अर्थ होता है, उन्हें एकार्थी शब्द कहते हैं! जैसे – अटूट – न टूटने वाला! आपदा – मुसीबत! आदि!

    ४. अनेकार्थी शब्द (words with different meanings) : जो शब्द एक से अधिक अर्थ देते हैं, उन्हें अनेकार्थी शब्द कहते हैं! जैसे – अंक – चिह्न, गोद, अध्याय, संख्या! अज – ब्रह्मा, बकरा, शिव! आदि!

    ५. श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द (pairs of words, distinguished) : कुछ शब्दों के उच्चारण में लगभग समानता लगती है, वस्तुतः ये भिन्न भिन्न होते हैं! इनके अर्थों में भिन्नता होती है! ऐसे शब्द श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द कहलाते हैं, जैसे – अंस – कंधा, अंश – भाग!

    ६. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द (one word substitution) : हिंदी में अनेक शब्दों / पदबंधों या वाक्यांशों के लिए एक शब्द का प्रयोग किया जाता है, इससे लेखन में संक्षिप्तता आती है और लेख सुगठित हो जाता है! जैसे – जिसका आदि न हो – अनादि!

     

    अन्य शब्द :

    युग्म शब्द एक प्रकार का पुनरुक्त शब्द है! इसमें एक ही शब्द दो बार प्रयुक्त होता है! इसे द्विरुक्त शब्द भी कहते हैं! इसमें अर्थ में अतिशयता, भिन्नता, निरंतरता का बोध होता है! जैसे – घड़ी-घड़ी, देश-देश, बूँद-बूँद आदि!संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण आदि शब्दों से पुनरुक्त शब्द का निर्माण होता है!

    कुछ अनुकरणात्मक अथवा निरर्थक शब्दों से भी नए सार्थक शब्द बनते हैं – खटखट, गड़गड़, हिनहिनाना, दनादन आदि!

    कभी – कभी पुनरुक्त शब्द के बिच में ‘न’ ‘ही’ ‘तो’ आदि निपात अथवा कोई परसर्ग आने से नए अर्थ का बोध होता है – कोई-न-कोई, रंग-ही-रंग, घर-का-घर आदि! कुछ ऐसे शब्द हो जो ऊपर वर्णित किसी भेदों में नहीं आते उन्हें निम्नलिखित भेदों में बाँटते हैं –

    वर्णात्मक शब्द (Descriptional words) : ये वे शब्द हैं, जिनके अर्थ वर्णन या व्याख्या से ही स्पष्ट हो पाते हैं! इनको स्पष्ट करने के लिए एक पूरे उपवाक्य की आवश्यकता है – अतिथि, अजातशत्रु आदि! व्याकरण में ऐसे शब्दों के लिए अनेक शब्दों के लिए एक शब्द संज्ञा का प्रयोग किया गया! ये शब्द प्रायः तत्सम ही होते हैः!

    अवधारणात्मक शब्द (Conceptional words) : इन शब्दों को अकेले रहकर कोई स्पष्ट अर्थ नहीं होता, ये वाक्य में प्रयोग होकर ही संदर्भ के अनुसार किसी न किसी अवधारणा को व्यक्त करते हैं – ठांय-ठांय, काँव, चकचक, कानों-कान आदि! in शब्दों की व्युत्पति के संबंध में बता पाना कठिन है, शायद ये शब्द ध्वन्यात्मक अनुकृति के कारण बने हैं!

    अनुकरणात्मक शब्द – मिलती जुलती आवाजों के लिए हर भाषा में कुछ शब्द मिलते हैं – इन शब्दों की ध्वन्यात्मक संरचना को सुना जा सकता है – ठांय, धांय, ठस्स, सन्न, फटाक, खटाक आदि!

    रणन शब्द – रणन से अभिप्राय है – पशु पक्षियों की आवाजें – रंभाना, मिमियाना, दहाड़ना, चिंघाड़ना आदि!

    पुनरुक्त / द्वित्व शब्द – ये तीन प्रकार के होते हैं –

    (i) पूर्ण द्वित्व – इसमें पहला घटक सार्थक होता है दूसरा उसी की पुनरावृति होती है – काले-काले, पीले-पीले, कौन-कौन आदि!

    (ii) अपूर्ण द्वित्व – इसमें पहली इकाई सार्थक होती है, दूसरी इकाई पहली इकाई से व्युत्पन्न करके बनाई जाती है – दे-दिलाकर, पोंछ-पांछ्कर, धो-धाकर आदि!

    (iii) प्रतिध्वन्यात्मक द्वित्व – इसमें दूसरा शब्द पहले शब्द की ही प्रतिध्वनि होता है – चाय-वाय, खाना-वाना, मकान-वकान आदि!

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  • संधि किसे कहते हैं, स्वर, व्यंजन, विसर्ग संधि की परिभाषा, संधि के भेद और नियम

    संधि किसे कहते हैं, स्वर, व्यंजन, विसर्ग संधि की परिभाषा, संधि के भेद और नियम

    संधि ( Sandhi ) शब्द का अर्थ होता है – मेल या जोड़! भाषा व्यवहार में जब दो शब्द आते हैं तो पहले शब्द की अंतिम ध्वनि बाद वाले शब्द की पहली ध्वनि से मिलकर उसे प्रभावित करती है! ध्वनि परिवर्तन की इस प्रक्रिया का नाम ही संधि है!

     

    • इस प्रक्रिया में परिवर्तन कभी पहली ध्वनि में होता है तो कभी दूसरी ध्वनि में और कभी दोनों ध्वनियों में!
    • वर्णों में संधि कभी स्वरों के बिच होती है, तो कभी स्वर और व्यंजन के बिच!
    • इसी तरह कभी विसर्ग और स्वर के साथ होती है तो कभी विसर्ग और व्यंजनों के साथ!
    • यदि वर्णों का मेल तो हो परंतु उसके कारण उनमें किसी तरह का ध्वनि-परिवर्तन न हो तो उसे वर्ण-संयोग कहते हैं, संधि नहीं!

     

    निम्नलिखित वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़िए –

    शरणागत की रक्षा करो – इसमें शरण + आगत से मिलकर शरणागत बना है, दो स्वरों (अ + आ) में संधि हुई है!

    अतिथि का यथोचित सत्कार करो – इसमें यथा + उचित से मिलकर यथोचित बना है, दो स्वरों (आ + उ) में संधि हुई है!

    वह सज्जन है – इसमें सत् + जन से मिलकर सज्जन बना है, दो व्यंजनों (त् + ज) में संधि हुई है!

    उसके मन में दुर्भावना है – इसमें दु: + भावना से मिलकर बना है, इसमें विसर्ग का ‘र’ होकर भा के साथ संधि हुई है!

    इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ध्वनियों के पास पास आ जाने से उनके मिलने पर जो परिवर्तन या विकार होता है, उसे संधि कहते हैं! संधियुक्त पदों को अलग अलग करने की प्रक्रिया को संधि-विच्छेद कहते हैं; जैसे – उल्लास = उत् + लास , जगन्नाथ = जगत् + नाथ , गिरीश = गिरि + ईश!

     

    परिवर्तन शून्य समीपता : कई जगह दो ध्वनियाँ परस्पर समीप तो आती हैं किंतु उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता है! ऐसी स्थिति में वे केवल शिरोरेखा के नीचे आ जाती है; जैसे – सत् + कर्म = सत्कर्म, सम् + मान = सम्मान!

     

    संधि के भेद (Kinds of Joining) :

    1. स्वर संधि ( Swar Sandhi : Joining of Vowels):

    दो स्वरों के परस्पर मेल के कारण जब एक या दोनों स्वरों में परिवर्तन होता है तो उसे स्वर संधि कहते हैं! स्वर संधि के निम्नलिखित भेद माने जाते हैं –  1. दीर्घ संधि : अ, आ, इ, ई, उ, ऊ के साथ अ, आ, इ, ई, उ, ऊ की संधि होने पर ये बदल कर आ, ई, ऊ हो जाता है, जैसे – गत + अनुसार = गतानुसार!  2. गुण संधि : गुण संधि में अलग अलग स्वरों का मेल होता है! जैसे – देव + इंद्र = देवेंद्र!  3. वृद्धि संधि : वृद्धि संधि में अलग अलग स्वरों में मेल होता है! जैसे – मत + ऐक्य = मतैक्य आदि!  4. यण संधि : यण संधि में अलग अलग स्वरों में मेल होता है, जैसे – अति + अधिक = अत्यधिक!  4. अयादि संधि : वैसे तो ये स्वर संधि का नियमित भेद नहीं है, इसलिए इसे विशेष संधि भी कहते हैं! अयादि संधि में भिन्न भिन्न स्वरों में मेल होता है! जैसे – ने + अन = नयन, शे + अन = शयन!

     

    स्वर संधि के भेद, नियम और उदाहरण :

    दो स्वरों के परस्पर मेल के कारण जब एक या दोनों स्वरों में परिवर्तन होता है तो उसे स्वर संधि कहते हैं! स्वर संधि के निम्नलिखित भेद माने जाते हैं –

     

    1. दीर्घ संधि :

    अ, आ, इ, ई, उ, ऊ के साथ अ, आ, इ, ई, उ, ऊ की संधि होने पर ये बदल कर आ, ई, ऊ हो जाता है जैसे –

    अ + अ = आ

    गत + अनुसार = गतानुसार, मत + अंश = मतांश, सरल + अर्थ = सरलार्थ, कथन + अनुसार = कथनानुसार, मत + अनुसार = मतानुसार, परम + अर्थ = परमार्थ, धर्म + अर्थ = धर्मार्थ, युग + अंत = युगांत, दान + अर्थी = दानार्थी, पुष्प + अवली = पुष्पावली, स्व + अर्थ = स्वार्थ, अधिक + अधिक = अधिकाधिक, वेद + अंत = वेदांत, शस्त्र + अस्त्र = शस्त्रास्त्र, सत्य + अर्थी = सत्यार्थी, योग + अभ्यास = योगाभ्यास, सूर्य + अस्त = सूर्यास्त आदि!

    अ + आ = आ

    एक + आकार = एकाकार, छात्र + आदि = छात्रादि, देव + आलय = देवालय, पुस्तक + आलय = पुस्तकालय, भोजन + आलय = भोजनालय, सत्य + आग्रह = सत्याग्रह, हिम + आलय = हिमालय, वर्ण + आश्रय = वर्नाश्रय, नित्य + आनंद = नित्यानंद, धर्म + आत्मा = धर्मात्मा, शिव + आलय = शिवालय आदि!

    आ + अ = आ

    परिक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी, दिशा + अंत = दिशांत, पूजा + अर्पित = पूजार्पित, सीमा + अंत = सीमांत, विद्या + अर्थी = विद्यार्थी, शिक्षा + अर्थी = शिक्षार्थी, यथा + अर्थ = यथार्थ, सेवा + अर्थ = सेवार्थ, विद्या + अभ्यास = विद्याभ्यास, आदि!

    आ + आ = आ

    विद्या + आलय = विद्यालय, महा + आत्मा = महात्मा, दया + आनंद = दयानंद, मदिरा + आलय = मदिरालय, सेवा + आनंद = सेवानंद, कृपा + आलु = कृपालु, श्रद्धा + आलु = श्रद्धालु, महा + आशय = महाशय आदि!

    इ + इ = ई

    कवि + इंद्र = कवींद्र, हरि + इच्छा = हरीच्छा, अभि + इष्ट = अभीष्ट, अति + इव = अतीव, मुनि + इंद्र = मुनींद्र आदि!

    इ + ई = ई

    मणि + ईश = मनीश, रवि + ईश = रवीश, परि + ईक्षा = परीक्षा, कपि + ईश = कपीश गिरि + ईश = गिरीश आदि!

    ई + इ = ई

    शची + इंद्र = शचींद्र, योगी + इंद्र = योगींद्र, मही + इंद्र = महींद्र, नारी + इच्छा = नारीच्छा आदि!

    ई + ई = ई

    रजनी + ईश = रजनीश, सती + ईश = सतीश, जानकी + ईश = जानकीश, योगी + ईश्वर = योगीश्वर आदि!

    उ + उ = ऊ

    लघु + उपदेश = लघूपदेश, लघु + उत्तर = लघूत्तर, भानु + उदय = भानूदय, सु + उक्ति = सूक्ति आदि!

    उ + ऊ = ऊ

    लघु + ऊर्जा = लघूर्जा आदि!

    ऊ + उ = ऊ

    वधू + उत्पीड़न = वधूत्पीड़न, वधू + उत्सव = वधूत्सव आदि!

    ऊ + ऊ = ऊ

    भू + ऊर्जा = भूर्जा, भू + उर्ध्व = भूर्ध्व आदि!

     

    2. गुण संधि :

    गुण संधि में अलग अलग स्वरों का मेल होता है! इन स्वरों के मेल से निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं – अ और आ का इ और ई से मेल होता है तो ये ‘ए’ बन जाते हैं! अ और आ का उ और ऊ से मेल हो तो ये ‘ओ’ हो जाते हैं! अ और आ का ऋ से मेल हो तो ये ‘अर्’ हो जाते हैं! जैसे –

    अ + इ = ए

    देव + इंद्र = देवेंद्र, नर + इंद्र = नरेंद्र, सुर + इंद्र = सुरेंद्र, धर्म + इंद्र = धर्मेंद्र, विमल + इंदु = विमलेंदु, पूर्ण + इंदु = पूर्णेंदु, वीर + इंद्र = वीरेंद्र, नग + इंद्र = नागेंद्र आदि!

    अ + ई = ए

    दिन + ईश = दिनेश, सुर + ईश = सुरेश, राम + ईश्वर = रामेश्वर, राग + ईश्वर = रागेश्वर आदि!

    आ + इ = ए

    रमा + इंद्र = रमेंद्र, राजा + इंद्र = राजेन्द्र आदि!

    आ + ई = ए

    रमा + ईश = रमेश, कमला + ईश = कमलेश, सीता + ईश = सीतेश आदि!

    अ + उ = ओ

    गणेश + उत्सव = गणेशोत्सव, कुल + उत्तम = कुलोत्तम, वार्षिक + उत्सव = वार्षिकोत्सव आदि!

    अ + ऊ = ओ

    नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा, विचार + ऊर्जा = विचारोर्जा आदि!

    आ + ऊ = ओ

    गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि

    अ + ऋ = अर्

    राज + ऋषि राजर्षि, सप्त + ऋषि = सप्तर्षि आदि!

    आ + ऋ = अर्

    महा + ऋषि = महर्षि, राजा + ऋषि = राजर्षि आदि!

     

    3. वृद्धि संधि :

    वृद्धि संधि में अलग अलग स्वरों में मेल होता है! इन स्वरों के मेल से निम्नलिखित परिवर्तन आते हैं; जैसे –

    १. और का और से मेल हो तो ये हो जाते हैं!

    अ + ए = ऐ : एक + एक = एकैक, लोक + एषणा = लोकैषणा आदि!

    अ + ऐ = ऐ : मत + ऐक्य = मतैक्य, भाव + ऐश्वर्य = भावैश्वर्य आदि!

    आ + ए = ऐ : यथा + एव = यथैव, तथा + एव = तथैव आदि!

    आ + ऐ = ऐ : राजा + ऐश्वर्य = राजैश्वर्य

    २. और का और से मेल हो तो ये हो जाता है!

    अ + ओ = औ : दंत + ओष्ठ = दंतोष्ठ, परम + ओजस्वी = परमौजस्वी

    अ + औ = औ : परम + औषध = परमौषध, वन + औषध = वनौषध

    आ + ओ = औ : महा + ओज = महौज

    आ + औ = औ : महा + औषध = महौषध, महा + औदार्य = महौदार्य

     

    4. यण संधि :

    यण संधि में अलग अलग स्वरों में मेल होता है, इन स्वरों के मेल से निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं!

    १. इ और ई का भिन्न स्वर से मेल होने पर इनका रूप बदलकर य हो जाता है!

    इ + अन्य स्वर = य : अति + अधिक = अत्यधिक, यदि + अपि = यद्यपि, वि + आप्त = व्याप्त, अति + आनंद = अत्यानंद, अभि + आगत = अभ्यागत, अति + उक्ति = अत्योक्ति, वि + ऊह = व्यूह आदि!

    ई + अन्य स्वर = य : सखी + आगमन = सख्यागमन, नदी + आगम = नद्यागम आदि!

    २. उ और ऊ का भिन्न स्वर से मेल होने पर इनका रूप बदलकर व हो जाता है!

    उ + अन्य स्वर = व : सु + अस्ति = स्वस्ति, सु + अल्प = स्वल्प, मनु + अंतर = मन्वंतर आदि!

    ३. ऋ का मेल भिन्न स्वर से होता है और इनका रूप र हो जाता है!

    ऋ + अन्य स्वर = ए : मातृ + आज्ञा = मात्राज्ञा, मातृ + इच्छा = मात्रिच्छा आदि!

     

    अयादि संधि :

    वैसे तो ये स्वर संधि का नियमित भेद नहीं है, इसलिए इसे विशेष संधि भी कहते हैं! अयादि संधि में भिन्न भिन्न स्वरों में मेल होता है! इनमें मेल से निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं – ए, ऐ, ओ, औ का अन्य स्वरों से मेल होने पर इनके रूप बदल जाते हैं; जैसे –

    ए + अ = अय् – ने + अन = नयन, शे + अन = शयन

    ऐ + अ = अय – नै + अक = नायक, गै + अक = गायक

    ओ + अ = अव् – हो + अन = हवन, पो + अन = पवन

    औ + अ = आव् – पौ + अक = पावक, पौ + अन = पावन

    औ + इ = आवि – नौ + इक = नाविक

    औ + उ = आवु – भौ + उक = भावुक आदि!

     

    2. व्यंजन संधि ( Vyanjan Sandhi : Joining of Consonants with Vowels or Consonants):

    जब किसी व्यंजन का मेल किसी स्वर या व्यंजन से होता है तो उस व्यंजन में आने वाला परिवर्तन व्यंजन संधि कहलाता है! व्यंजन संधि के नियम निम्नलिखित है – १. वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन २. वर्ग के पहले वर्ण का पांचवे वर्ण में परिवर्तन ३. त् के संबंधी नियम ४. ‘छ’ संबंधी नियम ५. ‘म’ के संबंध में नियम ६. ‘न’ के संबंध में नियम ७. ‘स्’ का ‘ष’ बनना नियम! उदहारण – वाक् + दान =वाग्दान, चित् + मय = चिन्मय, स्व + छंद = स्वच्छंद आदि!

     

    व्यंजन संधि के नियम, उदाहरण और अपवाद :

    जब किसी व्यंजन का मेल किसी स्वर या व्यंजन से होता है तो उस व्यंजन में आने वाला परिवर्तन व्यंजन संधि कहलाता है!

    व्यंजन संधि के नियम निम्नलिखित है –

    १. वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन :

    वर्ग के पहले वर्ण क्, च्, ट्, त्, प् के बाद किसी वर्ग का तीसरा चौथा वर्ण ग, घ, ज, झ, ड, ढ, द, ध ब, भ, य, र, ल, व या किसी स्वर से हो तो पहला वर्ण उसी वर्ग के तीसरे वर्ण में बदल जाता है! जैसे – क्=ग्, च्=ज्, ट्=ड्, त्=द्, प्=ब्!

    क=ग : वाक् + दान = वाग्दान, दिक् + दर्शन = दिग्दर्शन आदि!

    च=ज : अच् + अंत = अजंत

    ट्=ड : षट् + आनन = षडानन

    त् = द् : जगत + अंबा = जगदंबा, उत् + धार = उद्धार

    प् = ब् : अप् + द = अब्द, अप् + ज = अब्ज

     

    २. वर्ग के पहले वर्ण का पांचवे वर्ण में परिवर्तन :

    यदि वर्ग के पहले वर्ण क, च, ट, त, प का मेल वर्ग के पाँचवे व्यंजन ड., ञ,ण, न, म के साथ होता है तो पहले वर्ण का रूपांतरण पाँचवे वर्ण में हो जाता है; जैसे – क = ड., च=ञ, ट=ण, त=न, प=म!

    चित् + मय = चिन्मय, वाक् + मय = वाड.मय, आदि!

     

    ३. त् के संबंधी नियम :

    त् के विभिन्न स्वरों और व्यंजनों के साथ मेल होने पर निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं –

    त् + च = च्च – उत् + चारण = उच्चारण

    त् + छ = च्छ – उत् + छिन्न = उछिन्न

    त् + ज = ज्ज – उत् + ज्वल = उज्ज्वल

    त् + ल = ल्ल – उत् + लास = उल्लास

    त् + श = च्छ – उत् + शिष्ठ = उच्छिष्ट

    त् + ह = द्ध – उत् + हरण = उद्धरण

    त् + ट/ड = ट्/ड् – तत् + टीका = तट्टीका, उत् + डयन = उड्डयन

     

    ४. ‘छ’ संबंधी नियम :

    यदि किसी स्वर के बाद ‘छ’ आ जाए तो ‘छ’ से पहले ‘च’ का आगम हो जाता है!

    अ + छ = च्छ – स्व + छंद = स्वच्छंद

    आ + छ = च्छ – आ + छादन = आच्छादन

    इ + छ = च्छ – परि + छेद = परिच्छेद

    उ + छ = च्छ – अनु + छेद = अनुच्छेद

    ऋ + छ = च्छ – भ्रातृ + छाया = भ्रातृच्छाया

     

    ५. ‘म’ के संबंध में नियम :

    (i) क से लेकर भ तक के किसी भी व्यंजन का मेल यदि म से होता है तो म उसी वर्ग के पाँचवे वर्ण में बदल जाता है! इसका प्रयोग अनुस्वार के रूप में किया जाता है –

    सम् + कल्प = संकल्प, सम् + चार = संचार, सम् + तोष = संतोष, सम् + पूर्ण = संपूर्ण आदि!

    (ii) म का मेल यदि म से होता है तो म = म्म अर्थात द्वित्व हो जाता है –

    सम् + मोहन = सम्मोहन, सम् + मति = सम्मति आदि!

    (iii) म का मेल य, र, ल, व, श, ष, स, ह से होने पर म = अनुस्वार हो जाता है –

    सम् + युक्त = संयुक्त, सम् + यम = संयम, सम् + रचना = संरचना

     

    ६. ‘न’ के संबंध में नियम :

    (i) जब ऋ, र, ष का ‘न’ से मेल होता है तो न = ण हो जाता है –

    ऋ + न = ऋण, मर + न = मरण, भर + न = भरण, चर + न = चरण, भूष + न = भूषण आदि!

    (ii) ऋ, र, ष का न से मेल हो परंतु बिच में चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, श और स आ जाएँ तो ‘न’ नहीं बदलता –

    दर्शन, दुर्जन, अर्जुन, अर्चना, पर्यटन आदि!

     

    ७. ‘स्’ का ‘ष’ बनना नियम :

    जब ‘स’ से पहले अ, आ से भिन्न कोई अन्य स्वर होता है तो स् = ष हो जाता है!

    अभि + सेक = अभिषेक, नि + सेध = निषेध, सु + सुप्ति = सुषुप्ति आदि!

    अपवाद : अनु + स्वार = अनुस्वार, अनु + सरण = अनुसरण, वि + स्मरण = विस्मरण!

     

    3. विसर्ग संधि ( Visarga Sandhi Joining of Visarga with a Vowel and a Consonant) :

    विसर्ग का मेल किसी स्वर या व्यंजन के साथ होने पर विसर्ग में होने वाला परिवर्तन विसर्ग संधि कहलाता है! विसर्ग संधि के नियम – १. विसर्ग का ओ होना २. विसर्ग का र होना ३. विसर्ग का श होना ४. विसर्ग का स होना ५. विसर्ग का ष होना ६. विसर्ग का न होना (विसर्ग का लोप हो जाना) ७. विसर्ग का रहना! जैसे – मनः + अनुकूल = मनोनुकूल, निः + अर्थक = निरर्थक, निः + चल = निश्चल आदि!

     

    विसर्ग संधि के नियम और उदाहरण :

    विसर्ग का मेल किसी स्वर या व्यंजन के साथ होने पर विसर्ग में होने वाला परिवर्तन विसर्ग संधि कहलाता है!

    विसर्ग संधि के नियम :

    १. विसर्ग का ओ होना :

    यदि विसर्ग से पहले हो और विसर्ग का मेल अथवा कोई सघोष व्यंजन (वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवा वर्ण) – अ, ग, घ, ड., ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म और य, र, ल, व, ह तो विसर्ग (:) = ओ के रूप में बदल जाता है –

    मनः + अनुकूल = मनोनुकूल, तमः + गुण = तमोगुण, मनः + ज = मनोज, पयः + धर = पयोधर, यशः + दा = यशोदा आदि!

     

    २. विसर्ग का ‘र’ होना :

    यदि विसर्ग से पहले अ और आ से भिन्न स्वर हो और विसर्ग का मेल किसी स्वर के साथ या किसी वर्ग के तीसरे, चौथे, पांचवें वर्ण के साथ या य, र, ल, व, ह के साथ हो तो विसर्ग = र के रूप में बदल जाता है!

    निः + अर्थक = निरर्थक, निः + उत्साह = निरुत्साह, अंतः + गत = अंतर्गत, निः + आशा = निराशा, निः + गुण = निर्गुण, निः + लिप्त = निर्लिप्त, निः + जन = निर्जन, निः + बल = निर्बल आदि!

     

    ३. विसर्ग का श होना :

    यदि विसर्ग से पहले स्वर हो और विसर्ग का मेल च, छ, श से हो तो विसर्ग = श् हो जाता है!

    निः + चल = निश्चल, दुः + मन = दुश्मन, निः + चेष्ट = निश्चेष्ट, दुः + चरित्र = दुश्चरित्र आदि!

     

    ४. विसर्ग का स होना :

    जब विसर्ग का मेल त्, थ् और स् से होता है तो विसर्ग = स् में बदल जाता है!

    निः + तेज = निस्तेज, दुः + तर = दुस्तर, मरुः + थल = मरुस्थल, निः + संतान = निस्संतान आदि!

     

    ५. विसर्ग का ष होना :

    जब विसर्ग से पहले इ, उ हो और विसर्ग का मेल क, ख, ट, ठ, प, फ से हो तो विसर्ग = ष् में बदल जाता है!

    निः + कपट = निष्कपट, दुः + फल = दुष्फल, धनुः + टंकार = धनुष्टंकार, आविः + कार = अविष्कार आदि!

     

    ६. विसर्ग का न होना (विसर्ग का लोप हो जाना) :

    (i) यदि विसर्ग का में र् से हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है! इसके साथ ही विसर्ग से पहले लगा स्वर दीर्घ हो जाता है –

    निः + रव = नीरव, निः + रज = नीरज, निः + रोग = नीरोग आदि!

    (ii) यदि विसर्ग से पहले अ, या, आ हो और विसर्ग का मेल किसी अन्य स्वर से होता है तो विसर्ग का लोप हो जाता है!

    अतः + एव = अतएव, ततः + एव = ततएव आदि!

     

    ७. विसर्ग का रहना :

    यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और विसर्ग का मेल ‘क’ ‘ख’ ‘प’ ‘फ’ से हो तो विसर्ग बना रहता है!

    अंतः + करण = अंतःकरण, पयः + पान = पयःपान, प्रातः + काल = प्रातःकाल आदि!

     

    हिंदी की अपनी संधियाँ :

    उपर्युक्त संधि नियम संस्कृत शब्दों पर लागू होते हैं! हिंदी में जब दो भिन्न शब्द एक साथ आते हैं तो वे संधि के नियम के अनुसार जुड़कर एक ही शब्द के रूप में अथवा समस्त पद के रूप में प्रयुक्त होते हैं; जैसे – राम + अभिलाषा – रामाभिलाषा न होकर राम-अभिलाषा ही रहता है! हिंदी के अपने शब्दों के मेल के लिए कुछ नियम विकसित हो गए हैं; जैसे –

     

    • ह्रस्वीकरण : सामासिक शब्दों में पूर्वपद के दीर्घस्वर प्रायः ह्रस्व हो जाते हैं; जैसे – आम + चूर = आमचूर, हाथ + कड़ी = हथकड़ी!
    • अल्पप्राणीकरण : संधि करने पर पहले शब्द की अंतिम ध्वनि परिवर्तित होकर अल्पप्राण बन जाती है; जैसे – ताख पर = ताक पर!
    • महाप्राणीकरण : पहले शब्द की अंतिम ध्वनि अल्पप्राण हो और उसका मेल ‘ह’ से हो तो यह महाप्राण हो जाती है; जैसे – सब + ही = सभी, कब + ही = कभी, आदि!
    • ध्वनि लुप्त होना : संधि करते समय कुछ स्थितियों में एक ध्वनि लुप्त हो जाती है; जैसे – वहाँ + ही = वहीँ, यहाँ + ही = यहीं!
    • ध्वनि आना : संधि करते समय कुछ स्थितियों में ‘य’ आ जाता है; जैसे – पुत्री + ओं = पुत्रियों, नदी + ओं = नदियों आदि!
    • दीर्घ स्वर का ह्रस्व बनना : संधि करने पर समास से पहले पद का दीर्घ स्वर ह्रस्व हो जाता है; जैसे – रात + जगा = रतजगा, फूल + वारी = फुलवारी आदि!
    • अंतिम स्वर ह्रस्व होना : संधि करने पर पहले शब्द का अंतिम दीर्घ स्वर ह्रस्व हो जाता है; जैसे – बड़ा + पन = बड़प्पन, लड़का + पन = लड़कपन आदि!
    • स्वर में परिवर्तन होना : संधि करते समय कई बार सामासिक पदों के स्वर बदल जाते हैं; जैसे – छोटा + पन = छुटपन, पानी + घाट = पनघट आदि!
    • सादृश्यीकरण : कई संधि स्थलों पर दो भिन्न ध्वनियाँ एक समान हो जाती है; जैसे – पोत् + दार = पोद्दार!

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  • वर्तनी व्यवस्था, वर्तनी, लेखन, उच्चारण संबंधी अशुद्धियाँ और वर्तनी का मानक रूप

    वर्तनी व्यवस्था, वर्तनी, लेखन, उच्चारण संबंधी अशुद्धियाँ और वर्तनी का मानक रूप

    शब्द में प्रयुक्त वर्णों की क्रमिकता को वर्तनी (Spellings) कहते हैं! भाषा के दो रूप होते हैं – उच्चरित रूप और लिखित रूप! उच्चरित रूप भाषा का मूल रूप है, जबकि लिखित रूप गौण एवं आश्रित तो है, लेकिन लिखित रूप में दिया गया संदेश समय सीमा तोड़कर अगली पीढ़ी तक सुरक्षित बना रहता है! यह लिखित रूप स्थायी और व्यापक बना रहे, इसके लिए जरुरी है कि लेखन व्यवस्था ठीक ठाक बनी रहे! वर्तनी के प्रयोग की शुद्धता केवल शब्द स्तर पर ही नहीं, अपितु वाक्य, अनुच्छेद स्तर पर भी आवश्यक है! इसलिए वर्तनी व्यवस्था को तीनों स्तर पर समझना जरूरी है!

     

    1. वर्ण स्तर पर (On the basis of alphabates) :

    भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण होते हैं! वर्णों को उनके अभीष्ट अर्थ के अनुसार एक क्रम में लिखा जाता है! वर्णों के विन्यास से शब्द बनते हैं! प्रत्येक वर्ण के लिए प्रतिक चिह्न निर्धारित हैं! इन प्रतिक चिह्नों के माध्यम से भाषा लिखी जाती है! भाषा को लिखने का ढंग लिपि कहलाता है! लिपि के चिह्नों को सार्थक क्रम और विन्यास से लिखना वर्तनी कहलाता है! जैसे – भाआ का कोई अर्थ नहीं है, लेकिन आभा का है!

    वर्तनी में वर्ण स्तर पर स्वर – व्यंजन, मात्राओं और संयुक्त व्यंजन की चर्चा अपेक्षित है! मात्रा संयोजन और संयुक्त व्यंजन बनाने की दृष्टि से सभी वर्णों को चार कोटियों में बाँटा गया है!

    • खड़ी पाई वाले वर्ण : ये वे वर्ण हैं जिनके अंत में खड़ी पाई होती है! जैसे – ख, ग, घ, च, झ, त, थ, ध, व, प, म, स आदि! इन वर्णों में मात्रा का संयोजन किसी अन्य व्यंजन के साथ करना हो तो खड़ी पाई को हटा दिया जाता है और उसके साथ परवर्ती वर्ण को जोड़ दिया जाता है! जैसे – ग्वाला, ख्याल, शब्द प्यास आदि!
    • मध्य में खड़ी पाई वाले वर्ण : इन वर्णों के मध्य में खड़ी पाई होती है, जैसे – क, फ! इन वर्णों पर मात्रा खड़ी पाई पर लगाई जाती है और इन वर्णों को मिलाकर लिखते समय खड़ी पाई के बाद आने वाले अंश के झुकाव को हटाकर उसे परवर्ती वर्ण के साथ जोड़ दिया जाता है! जैसे – पक्का, रफ़्तार, फ्लू!
    • छोटी खड़ी पाई वाले वर्ण : कुछ वर्णों में खड़ी पाई बहुत छोटी होती है और उसके निचे कुछ गोलाकार रूप होता है! जैसे – ट, ठ, ड, ढ, ढ़, ह! जब इन वर्णों का परवर्ती व्यंजन के साथ संयोजन करना होता है! तो इन व्यंजनों  के निचे हलंत का चिह्न लगा दिया जाता है! जैसे – गड्ढा!
    • विशिष्ट वर्ण : ‘र’ मात्रा और संयुक्ताक्षर बनाने में ‘र’ की विशिष्ट स्थिति है! ‘र’ में उ और ऊ की मात्रा वर्ण के बिच में लगती है, जैसे – रुपया, रूप! ‘र’ के साथ व्यंजन के संयोजन की दो स्थितियां हो सकती है! १. स्वर रहित ‘र’ + व्यंजन २. स्वर सहित ‘र’ + व्यंजन, जैसे – कर्म, अर्थ! इसे रेफ कहते हैं! यदि व्यंजन में कोई मात्रा लगी हो तो रेफ मात्रा के ऊपर लगता है, जैसे – वर्मा! जब ‘र’ के साथ कोई स्वर रहित व्यंजन संयुक्त होता है तब ‘र’ चार प्रकार से लिखा जाता है! १. पूरी पाई वाले सभी स्वर रहित व्यंजन जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होते हैं तब र को (,) के रूप में लिखते हैं; जैसे – क्रम, ब्रज! २. स्वर रहित ‘द’ और ‘ह’ जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होते हैं तब ‘र’ (,) के रूप में लिखे जाते हैं; जैसे – द्रव, ह्रास! ३. स्वर रहित ‘ट’ और ‘ड’ जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होते हैं तब ‘र’ (^) के रूप में लिखे जाते हैं; जैसे – ट्रक, राष्ट्र, ड्रामा! ४. स्वर रहित ‘श’ जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होता है तब ‘श्र’ के रूप में लिखे जाते हैं; जैसे आश्रय! इसी प्रकार ऋ की मात्रा भी श्रृ बन जाती है; जैसे श्रृंगार!

     

    2. शब्द स्तर पर (On the basis of words) :

    वर्णों के मेल से शब्द बनते हैं! शब्द की सीमा का निर्धारण उसकी शिरोरेखा से होता है! सामासिक पदों के बिच में योजक चिह्न का प्रयोग होता है! जैसे – माता – पिता!

    • जब किसी शब्द में श, ष, स में से तीन या दो का प्रयोग एक साथ हो तो वे वर्णमाला के क्रम से (श, ष, स) ही आते हैं, जैसे – शीर्षासन, शेष, शासन!
    • स्वर रहित पंचमाक्षर जब अपने वर्ग के व्यंजन के पहले आता है, तब उसे अनुस्वार के रूप में लिखा जाता है! जैसे – पंकज, पंखा, कंघा!
    • जब कोई पंचमाक्षर दुसरे पंचमाक्षर के साथ संयुक्त होता है तब पंचमाक्षर ही लिखा जाता है, वहां अनुस्वार का प्रयोग नहीं होगा! जैसे – अन्न, सम्मान, अक्षुण्ण!
    • यदि य, ह, व के पहले स्वर रहित पंचमाक्षर हो तो वहां पंचमाक्षर ही रहता है, अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता है; जैसे – पुण्य, अन्य, साम्य!
    • जब अंतस्थ और ऊष्म के पहले ‘सम्’ उपसर्ग लगता है तब वहाँ म् के स्थान पर अनुस्वार ही लगता है; जैसे – सम् +यम = संयम!
    • अनुनासिक और अनुस्वार के अंतर को भी ध्यान में रखना चाहिए! जैसे – हँसना, आँख! यदि किसी व्यंजन पर स्वर की मात्रा शिरोरेखा के ऊपर हो तो अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग होता है; जैसे – सिंचाई, गोंद!
    • कुछ अवर्गीय व्यंजनों के साथ अनुस्वार का ही प्रयोग होता है; जैसे – अंश, कंस, वंश!
    • जिस शब्द के अंत में ‘ई’ या उसकी मात्रा ‘ी’ हो तो उसका बहुवचन बनाते समय ‘ई’ का ‘इ’ हो जाएगा; जैसे- मिठाई – मिठाइयाँ, नदी – नदियाँ!
    • जिस शब्द के अंत में ‘ऊ’ की मात्रा हो तो उसका बहुवचन बनाते समय ‘ऊ’ का ‘उ’ हो जाएगा; जैसे – लड्डू – लड्डुओं!
    • कुछ शब्दों के दो रूप प्रचलित हैं, किंतु इनके मानक रूपों का प्रयोग करना चाहिए; जैसे – गये का मानक रूप है गए, नयी – नई, गयी – गई, हुयी – हुई, वस्तुयें – वस्तुएँ!
    • संस्कृत से आए जिन शब्दों के अंतिम वर्ण पर हलंत का चिह्न लगता है, वे प्रायः हलंत के बिना लिखे जाने लगे है; जैसे – श्रीमान, भगवान! किंतु कुछ शब्दों में हलंत का प्रचलन अब भी है; जैसे – सम्यक्!

     

    3. वाक्य स्तर पर (On the basis of Sentences) :

    वाक्य स्तर पर वर्तनी संबंधी अशुद्धियों से बचने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

    • लिखते समय शब्दों के बिच की दूरी का ध्यान न रखने से कभी – कभी वाक्य का अर्थ ही बदल जाता है, जैसे – १. जल सा लग रहा है! २. जलसा लग रहा है!
    • वाक्य लेखन में समुचित विराम चिह्नों का प्रयोग करना चाहिए! जब तक वक्ता के आशय के अनुसार विराम चिह्न का प्रयोग नहीं किया जाता तब तक अर्थ स्पष्ट नहीं होता!

     

    हिंदी वर्तनी के मानक रूप (Standard form of Spellings) :

    हिंदी वर्तनी की एकरूपता के लिए उसका मानक रूप सुनिश्चित करना नितांत आवश्यक है! हिंदी लिखते समय मानक वर्तनी का ही प्रयोग करना चाहिए! हिंदी निदेशालय द्वारा इस दिशा में दिए गए कुछ प्रमुख निर्देश निम्नलिखित हैं :

    1. संयुक्त वर्ण (Combined Alphabets) : १. खड़ी पाई वाले व्यंजन – खड़ी पाई वाले व्यंजनों का संयुक्त रूप पाई हटाकर बनाना चाहिए; जैसे – कुत्ता, छज्जा, लग्न! २. ‘क’ और ‘फ’ के संयुक्ताक्षरों को निम्न रूपों में बनाया जाए – संयुक्त, विभक्त, दफ्तर, रफ्तार! ३. ड., छ, ट, ड, द, और ह के संयुक्ताक्षरों का हल् चिह्न लगाकर बनाया जाए; जैसे – लड्डू, विद्या, गड्ढा! ४. हल् चिह्न लगे वर्ण से बनने वाले संयुक्ताक्षर के साथ ‘इ’ का प्रयोग निम्न रूप में होगा; जैसे – द्वितीय!

    2. विभक्ति चिह्न (Case ending Symbol) : १. हिंदी के विभक्ति चिह्नों को संज्ञा शब्दों में प्रतिपादकों से अलग लिखा जाए; जैसे – ऋचा ने, ऋचा को, ऋचा से, ऋचा के लिए, ऋचा का, ऋचा में! २. सर्वनाम शब्दों में विभक्ति चिह्न प्रतिपादकों के साथ लगाकर लिखने चाहिए; जैसे – उसने, उसको, उससे आदि! ३. यदि सर्वनाम के साथ दो विभक्ति चिह्न हो तो पहले विभक्ति चिह्न को प्रतिपादक के साथ मिलाकर तथा दुसरे को अलग लिखना चाहिए; जैसे – उसके लिए, उनमें से आदि! ४. सर्वनाम और विभक्ति के बीच ही, तक आदि आएं तो उन्हें विभक्ति से अलग लिखना चाहिए; जैसे – आप ही के लिए, मुझ तक को, आप ही ने आदि!

    3. क्रियापद (A Verb) : संयुक्त क्रियाओं में सभी सम्मिलित क्रियाएँ अलग अलग लिखनी चाहिए; जैसे – उछला करती थी, आया करती थी, सुनाते चले जा रहे थे, खिलाए जा रहे थे आदि!

    4. हाइफ़न (Hyphen) : १. द्वंद्व समास के दोनों पदों के मध्य हाइफ़न लगाना चाहिए; जैसे – माता-पिता, गुरु-शिष्य, सीता-राम, दाल-चावल, आदान-प्रदान आदि! २. सा और जैसा आदि से पहले हाइफ़न लगाना चाहिए; जैसे – कमल-सी, राम-जैसा, तुम-सा, सूर्य-सा, चंद्र-जैसी आदि!

    5. अव्यय (An Indiclinable) : १. ‘तक’ और ‘साथ’ आदि अव्यय सदा अलग लिखने चाहिए; जैसे – आपके साथ, उस तक, वहाँ तक, सबके साथ आदि! २. सम्मान प्रकट करने के लिए श्री और जी को अलग रूप में लिखना चाहिए; जैसे – श्री बालकृष्ण, पिता जी, श्रीमती कृष्णा जी, गुरु जी आदि! ३. समस्त पदों में प्रति, मात्र, यथा आदि अव्यय अलग नहीं लिखे जाने चाहिए; जैसे – प्रतिपल, प्रतिदिन, यथाशक्ति, मानवमात्र आदि!

    6. श्रुतिमूलक ‘य’ और ‘व’ का प्रयोग : १. जहाँ श्रुतिमूलक य और व का प्रयोग विकल्प से होता है, वहाँ न किया जाए; जैसे – किए- किये, नई- नयी, हुआ-हुवा आदि! २. जहाँ ‘य’ श्रुतिमूलक व्याकरणिक परिवर्तन न होकर शब्द का मूल हो वहाँ उसे मूल रूप में ही लिखना चाहिए; जैसे – स्थायी, अव्ययी, दायित्व आदि! इन्हें स्थाई, अव्यई नहीं लिखना चाहिए!

    7. अनुस्वार (Nasal) : १.यदि पंचम वर्ण के बाद उसी के वर्ग का कोई वर्ण आता है तो पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग करना चाहिए; जैसे – गंगा, कंघा, चंचल, ठंड, संध्या आदि! २. यदि पाँचवें वर्ण के बाद किसी अन्य वर्ग का वर्ण है तो पाँचवाँ वर्ण नहीं बदलेगा; जैसे – सन्मार्ग, अन्य, चिन्मय आदि! ३. यदि पाँचवें वर्ण के बाद के बाद वही वर्ण दुबारा आए तो पाँचवाँ वर्ण नहीं बदलेगा; जैसे – सम्मलेन, अन्न, प्रसन्न आदि!

    8. अनुनासिका चंद्रबिंदु (Semi Nasal) : चंद्रबिंदु का जहाँ आवश्यक हो प्रयोग अवश्य करना चाहिए! ऐसा न करने से अर्थ बदल सकता है; जैसे – हंस (एक पक्षी), हँस (हँसी) आदि!

    9. विदेशी ध्वनियाँ (Foreign words) : १. हिंदी में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी के मूल शब्दों का प्रयोग होता है! वस्तुतः ये हिंदी के अंग बन चुके हैं! इनका शुद्ध उच्चारण करने के लिए इन्हें उसी रूप में लिखना चाहिए; जैसे – ग़ज़ल, फ़ारसी, फ़ेल आदि! हिंदी में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी की पाँच ध्वनियाँ क़, ख़, ग़, ज़, फ़ मुख्य रूप से आई हैं! इनमें क़, ख़, ग़ तो लगभग हिंदी में मिल चुकी हैं! ज़ और फ़ ध्वनियाँ प्रचलन में हैं! अतः जहाँ आवश्यक हो इनका प्रयोग नुक्ता लगा कर ही करना चाहिए! इन्हें न लगाने से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं; जैसे – राज, राज़, फ़न, फन आदि! २. अंग्रेजी के अनेक शब्दों में अर्धवृत ओ का प्रयोग किया जाता है, ऐसे शब्दों के लिए ऑ लगाना चाहिए; जैसे – टॉफी, डॉक्टर, आदि!

    10. शब्दों के दो रूप मान्य : ये दोनों रूप शुद्ध है – बरफ-बर्फ, फुरसत-फुर्सत, दोबारा-दुबारा, परदा-पर्दा, आखिर-आखीर, भरती-भर्ती, गरमी-गर्मी, दुकान-दूकान, वापिस-वापस, सरदी-सर्दी, बरतन-बर्तन, बिल्कुल-बिलकुल आदि!

    11. हल् चिह्न : हिंदी में संस्कृत के मूल शब्द उसी रूप में अर्थात् तत्सम रूप में प्रयुक्त होते हैं! इनमें हल् चिहन लगता है! कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके साथ हल् चिह्न लुप्त हो चुका है; जैसे – महान, भगवान आदि!

    12. स्वन-परिवर्तन : संस्कृत मूल के तत्सम शब्दों को हिंदी में उसी वर्तनी में लिखना चाहिए, इनमें परिवर्तन न किए जाएँ! जैसे – ब्रह्मा, ब्राह्मण, चिह्न, उऋण, ऋषि आदि को इसी रूप में लिखना चाहिए, न की ब्रम्हा, ब्राम्हण, चिन्ह आदि के रूप में!

    13. विसर्ग का प्रयोग : संस्कृत के जिन शब्दों में विसर्ग का प्रयोग होता है यदि उनका हिंदी में प्रयोग किया जाए तो विसर्ग अवश्य लगाना चाहिए; जैसे – प्रातःकाल, अतः आदि!

    14. ऐ, औ का प्रयोग : हिंदी में ऐ और औ ध्वनियों का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है; जैसे – १. ऐ – है, गैस, कैथल, गवैया, मैया आदि! २. नौकर, चौकीदार, कौआ आदि! in दोनों प्रकार की ध्वनियों में ऐ और औ का ही प्रयोग करना चाहिए! गवय्या, मय्या आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए!

    15. पूर्वकालिक प्रत्यय : पूर्वकालिक प्रत्यय में ‘कर’ क्रिया के साथ मिलाकर लिखा जाए; जैसे – पढ़कर, खाकर, नहाकर, रोकर, सोकर, खा-पीकर आदि!

    16. अनुच्छेदों के विभाजन में वर्णों और अंकों का प्रयोग : अनुच्छेदों के विभाजन और उपविभाजन में क्रम लिखते समय अंग्रेज के A, B, C और a, b, c के लिए क, ख, ग या अ, ब, स या अ, आ, इ का प्रयोग किया जाता है! अंकों 1, 2, 3 के साथ-साथ आवश्यकतानुसार (i), (ii), (iii) आदि का प्रयोग भी मान्य है!

     

    हिंदी शब्दों के उच्चारण संबंधी अशुद्धियाँ और उनका निराकरण :

    शुद्ध भाषा बोलने और लिखने में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व है! अतः शुद्ध उच्चारण पर अधिक बल देने की आवश्यकता है! कई बार अपनी बोली के प्रभाव के कारण या शब्दों के स्वरुप का ठीक ठीक ज्ञान न होने के कारण उच्चारण में अशुद्धियाँ हो जाती है! निचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं जिनके उच्चारण में प्रायः अशुद्धियाँ होती है! इनके शुद्ध रूप भी दिए जा रहे हैं :

     

    अशुद्ध – शुद्ध : आधीन – अधीन, हस्ताक्षेप – हस्तक्षेप, अहार – आहार, परलौकिक – पारलौकिक, बुद्धी – बुद्धि, व्यक्ती – व्यक्ति, नदीयाँ – नदियाँ, पितंबर – पीतांबर, दिक्षा – दीक्षा, आशिर्वाद – आशीर्वाद, चहिए – चाहिए, अनधिकार – अनाधिकार, मुनी – मुनि, परिवारिक – पारिवारिक, अतिथी – अतिथि, हानी – हानि, निरिक्षण – निरीक्षण, अत्याधिक – अत्यधिक, नराज – नाराज, कवी – कवि, शक्ती – शक्ति, दिवाली – दीवाली, बिमारी – बीमारी, शुन्य – शून्य, साधू – साधु, पशू – पशु, शिशू – शिशु, दयालू – दयालु, टिप्पनी – टिप्पणी, रनभूमि – रणभूमि, विशिष्ठ – विशिष्ट, मख्खी – मक्खी, बस्तु – वस्तु, बनस्पति – वनस्पति, साखा – शाखा, पुज्य – पूज्य, मख्खन – मक्खन, जिव्हा – जिह्वा, बन – वन, श्रेष्ट – श्रेष्ठ, घनिष्ट – घनिष्ठ, विशिष्ठ – विशिष्ट, अभिष्ठ – अभीष्ट, प्रशाद – प्रसाद, शारांश – सारांश, नमश्कार – नमस्कार, दिछा – दिक्षा, लक्छन – लक्षण, नछत्र – नक्षत्र, विस्वास – विश्वास, स्मिरती – स्मृति, रिषी – ऋषि, ग्रहस्थ – गृहस्थ, ग्रहित – गृहीत, ह्रदय – हृदय, दूंगा – दूँगा, गूंगा – गूँगा, लठ्ठा – लट्ठा, कछा – कक्षा, गड़ना – गणना, श्रंगार – श्रृंगार, रितु – ऋतू, किरपा – कृपा, आंख – आँख, कांच – काँच, प्रसंसा – प्रशंसा, अमावश्या – अमावस्या, रास्ट्र – राष्ट्र, छमा – क्षमा, विपछ – विपक्ष

     

    स्वरों के प्रयोग संबंधी अशुद्धियाँ :

    अशुद्ध – शुद्ध : अवाज़ – आवाज़, कालीदास – कालिदास, अलोकिक – अलौकिक, पत्नि – पत्नी, अन्ताक्षरी – अंत्याक्षरी, कवियत्री – कवयित्री, अनुकुल – अनुकूल, बल्की – बल्कि, क्रिपा – कृपा, सप्ताहिक – साप्ताहिक, गृहणी – गृहिणी, पड़ौस – पड़ोस, इसकूल – स्कूल, परिक्षा – परीक्षा, श्रीमति – श्रीमती, नयी – नई, कवीता – कविता, व्यवसायिक – व्यावसायिक, तिथी – तिथि, बहिन – बहन, मुक्ती – मुक्ति, रूचि – रुची, सुर्य – सूर्य, वधु – वधू, प्रमाणिक – प्रामाणिक, सुचना – सूचना, मुहल्ला – मोहल्ला, जूआ – जुआ, स्थिती – स्थिति, गिता – गीता, मीत्र – मित्र, प्रचार्य – प्राचार्य, उर्जा – ऊर्जा, क्योंकी – क्योंकि, इतिहासिक – ऐतिहासिक, क्रांती – क्रांति, पत्रीका – पत्रिका, जुता – जूता, लोकोक्ती – लोकोक्ति, स्वामि – स्वामी, निरजा – नीरजा, स्थाई – स्थायी, मनायी – मनाई, प्रीती – प्रीति

     

    अनुस्वार और अनुनासिका की अशुद्धियाँ :

    अशुद्ध – शुद्ध : आँबा – अंबा, फांसना – फाँसना, सांस – साँस, आंगन – आँगन, गूंगा – गूँगा, चीटीं – चींटी, जहापनांह – जहाँपनाह, आंधी – आँधी, गँगा – गंगा, सांझ – साँझ, कांच – काँच, हंसना – हँसना, ढंक – ढँक, मुंह – मुँह, कँघी कंघी, गूंज – गूँज, गंवार – गँवार, चंवर – चँवर, चांद – चाँद, डांवाडोल – डाँवाडोल, डंसना – डँसना, दोंनो – दोनों, अंगूठी – अँगूठी, आंख – आँख, बांह – बाँह, उंगली – उँगली

     

    हिंदी लेखन में व्यंजनों का अशुद्ध प्रयोग :

    व्यंजनों के प्रयोग में अशुद्धियाँ और उनके शुद्ध रूप! शुद्ध और अशुद्ध शब्दों के साथ –

    अशुद्ध – शुद्ध : आगानुसार – आज्ञानुसार, अंधाधुन्द – अंधाधुंध, अपव्य – अपव्यय, आहावन – आह्वान, असविकृत – अस्वीकृत, आरोगय आरोग्य, इर्श्या – ईर्ष्या, उलंघन – उल्लंघन, गल्त – गलत, योधा – योद्धा, तंबाखू – तंबाकू, व्यंगय – व्यंग्य, शुध – शुद्ध, कछुवा – कछुआ, गदार – गद्दार, तिरष्कृत – तिरस्कृत, दृष्य – दृश्य, श्लेश – श्लेष, विर्धमी – विधर्मी, सन्मान – सम्मान, स्थाई – स्थायी, हाश्य – हास्य, उज्जवल – उज्ज्वल, उशर – ऊसर, ख्वाइश – ख्वाहिश, गुजिया – गुझिया, जगतनाथ – जगन्नाथ, नियारा – न्यारा, सताईस – सत्ताईस, हिरदय – हृदय, शमशान – श्मशान, वकतव्य – वक्तव्य, बुधू – बुद्धू, ब्रम्हा – ब्रह्मा, शगुन – शकुन, प्रौड़ – प्रौढ़

     

    लेखन के अभाव के कारण तथा अमानक वर्तनी प्रयोग संबंधी अशुद्धियाँ :

    अशुद्ध – शुद्ध : युधिष्ठर – युधिष्ठिर, रावन – रावण, मिशर – मिश्र, कबज – कब्ज, लछमन – लक्ष्मण, उदेश्य – उद्देश्य, कृतघन – कृतघ्न, परजा – प्रजा, अधयापक – अध्यापक, व्यंग – व्यंग्य, रितु – ऋतु, विदवान – विद्वान, साम – शाम, सासन – शासन, त्यौहार – त्योहार, सायम – सायं, तपस्वनी – तपिस्वनी, केस – केश, दोकान – दुकान, ठाकुराइन – ठकुराइन, लराई – लड़ाई, मुहल्ला – मोहल्ला, दिये – दिए, फवारा – फव्वारा

     

    लेखन और वर्तनी की अज्ञानता के कारण अशुद्धियाँ :

    अशुद्ध – शुद्ध : ब्रम्हा – ब्रह्मा, चिन्ह – चिह्न, आवहान – आह्वान, बछ्छा – बच्छा, खट्ठा – खट्टा, उज्जवल – उज्ज्वल, आल्हाद – आह्लाद, धब्भा – धब्बा, जयोतसना – ज्योत्स्ना, दूख – दुख, अतैव – अतएव, निसार – निस्सार, निकपट – निष्कपट, बराह्मण – ब्राह्मण, आर्शीवाद – आशिर्वाद, तीवर – तीव्र, पराप्त – प्राप्त, उपरोक्त – उपर्युक्त, धरम – धर्म, निरणय – निर्णय, उर्त्तीण – उत्तीर्ण, समुदर – समुद्र, निरोग – नीरोग, निचेतन – निश्चेतन, पुनह – पुनः, मरुथल – मरुस्थल

     

    एक से सौ तक संख्यावाचक शब्दों के मानक रूप :

    एक (one) – १ , दो (two) – २ , तीन (three) – ३ , चार (four) – ४ , पाँच (five) – ५ , छह (six) – ६ , सात (seven) – ७ , आठ (eight) – ८ , नौ (nine) – ९ , दस (ten) – १०

    ग्यारह (eleven) – ११ , बारह (twelve) – १२ , तेरह (thirteen) – १३ , चौदह (fourteen) – १४ , पंद्रह (fifteen) – १५ , सोलह (sixteen) – १६ , सत्रह (seventeen) – १७ , अठारह (eighteen) – १८

    उन्नीस (nineteen) – १९ , बीस (twenty) – २० , इक्कीस (twenty one) – २१ , बाईस (twenty two) – २२ , तेईस (twenty three) – २३ , चौबीस (twenty four) – २४ , पच्चीस (twenty five) – २५

    छब्बीस (twenty six) – २६ , सत्ताईस (twenty seven) – २७ , अट्ठाईस (twenty eight) – २८ , उनतीस (twenty nine) – २९ , तीस (thirty) – ३० , इकतीस (thirty one) – ३१ , बत्तीस (thirty two) – ३२

    तैंतीस (thirty three) – ३३ , चौंतीस (thirty four) – ३४ , पैंतीस (thirty five) – ३५ , छत्तीस (thirty six) – ३६ , सैंतीस (thirty seven) – ३७ , अड़तीस (thirty eight) – ३८ , उनतालीस (thirty nine) – ३९

    चालीस (forty) – ४० , इकतालीस (forty one) – ४१ , बयालीस (forty two) – ४२ , तैंतालीस (forty three) – ४३ , चवालीस (forty four) – ४४ , पैंतालिस (forty five) – ४५

    छियालीस (forty six) – ४६ , सैंतालिस (forty seven) – ४७ , अड़तालीस (forty eight) – ४८ , उनचास (forty nine) – ४९ , पचास (fifty) – ५० , इक्यावन (fifty one) – ५१

    बावन (fifty two) – ५२ , तिरपन (fifty three) – ५३ , चौवन (fifty four) – ५४ , पचपन (fifty five) – ५५ , छप्पन (fifty six) – ५६ , सतावन (fifty seven) – ५७ , अठावन (fifty eight) – ५८

    उनसठ (fifty nine) – ५९ , साठ (sixty) – ६० , इकसठ (sixty one) – ६१ , बासठ (sixty two) – ६२ , तिरसठ (sixty three) – ६३ , चौंसठ (sixty four) – ६४ , पैंसठ (sixty five) – ६५ , छियासठ (sixty six) – ६६

    सड़सठ (sixty seven) – ६७ , अड़सठ (sixty eight) – ६८ , उनहत्तर (sixty nine) – ६९ , सत्तर (seventy) – ७० , इकहत्तर (seventy one) – ७१ , बहत्तर (seventy two) – ७२ , तिहत्तर (seventy three) – ७३

    चौहत्तर (seventy four) – ७४, पचहतर (seventy five) – ७५ , छिहत्तर (seventy six) – ७६ , सतहत्तर (sevety seven) – ७७ , अठहत्तर (seventy eight) – ७८ , उनासी (seventy nine) – ७९, अस्सी (eighty) – ८०

    इक्यासी (eighty one) – ८१ , बयासी (eighty two) – ८२ , तिरासी (eighty three) – ८३ , चौरासी (eighty four) – ८४, पचासी (eighty five) – ८५ , छियासी (eighty six) – ८६ , सतासी (eighty seven) – ८७

    अठासी (eighty eight) – ८८ , नवासी (eighty nine) – ८९ , नब्बे (ninety) – ९० , इक्यानवे (ninety one) – ९१ , बानवे (ninety two) – ९२ , तिरानवे (ninety three) – ९३ , चौरानवे (ninety four) – ९४

    पचानवे (ninety five) – ९५ , छियानवे (ninety six) – ९६ , सतानवे (ninety seven) – ९७ , अठानवे (ninety eight) – ९८ , निन्यानवे (ninety nine) – ९९ , सौ (hundred) – १००

     

    Next Topic : संधि, परिभाषा, संधि के भेद, संधि के नियम

     

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  • अक्षर, विभाजन, बलाघात, अनुतान, संगम और वर्ण विच्छेद

    अक्षर, विभाजन, बलाघात, अनुतान, संगम और वर्ण विच्छेद

    अक्षर ( Akshar : Alphabate ) : अक्षर उस छोटी से छोटी इकाई को कहते हैं, जिसका उच्चारण एक झटके में किया जाता है! पाया, नहा, चलो, आ, चढ़ आदि अक्षर हैं! ये शब्द तो हैं परंतु इनका उच्चारण एक साथ एक झटके में किया जाता है, इसलिए ये अक्षर हैं!

     

    हिंदी के अक्षर (Alphabates of Hindi) :

    हिंदी के प्रमुखतः निम्नलिखित अक्षर हैं –

    1. स्वर : ओ, आ-ओ
    2. स्वर-व्यंजन : इस्
    3. व्यंजन-स्वर : प (प्+आ)
    4. व्यंजन-स्वर-वयंजन : फट्
    5. व्यंजन-व्यंजन-स्वर : क्या
    6. व्यंजन-व्यंजन-व्यंजन-स्वर : स्त्री
    7. व्यंजन-व्यंजन-स्वर-व्यंजन : प्यास्
    8. स्वर-व्यंजन-व्यंजन : अंत्
    9. स्वर-व्यंजन-व्यंजन-व्यंजन : अस्त्र्
    10. व्यंजन-स्वर-व्यंजन-व्यंजन : संत्
    11. व्यंजन-स्वर-व्यंजन-व्यंजन-व्यंजन : वस्त्र्
    12. व्यंजन-व्यंजन-स्वर-व्यंजन-व्यंजन : प्राप्त्

     

    अक्षर विभाजन (Division of Alphabates) :

    अक्षर कई प्रकार के होते हैं! हिंदी में एक अक्षरी और अनेक अक्षरी शब्द होते हैं!

    • एकाक्षरी : आ, जा, खा, गा, ला, या, ना, पा, छा!
    • दो अक्षरी : गाया, काया, छाया, खाया, माया!
    • तीन अक्षरी : कीजिए, दीजिए, चलिए, चढ़िए, मारना!
    • चार अक्षरी : नौकरानी, कवयित्री, अधिकारी!
    • पाँच अक्षरी : विलासिताएँ, संभावनाएँ, अध्यापकों!

    हिंदी के लेखन और उच्चारण में अंतर होता है! हिंदी के अक्षरों के अंत में आने वाले ‘अ’ का उच्चारण नहीं होता है! इसका प्रयोग केवल लिखने में होता है! जैसे लेखक – लेख्+क् का उच्चारण होता है, ख्अ क्अ का उच्चारण नहीं होता है! और पढ़ें : वर्तनी व्यवस्था, वर्तनी की अशुद्धियाँ और वर्तनी का मानक रूप

     

    बलाघात ( Balaghat : Accent ) :

    बलाघात से तात्पर्य है किसी अक्षर या शब्द पर बल देना! किसी शब्द का उच्चारण करते समय अक्षर विशेष पर बल दिया जाता है! वाक्य का उच्चारण करते समय किसी शब्द पर बल दिया जाता है, यही बलाघात है!

    • शब्द बलाघात : इसमें किसी शब्द का उच्चारण करते समय अक्षर पर बलाघात किया जाता है! यह बलाघात भिन्न भिन्न प्रकार से होता है! एकाक्षरी शब्दों पर बलाघात, जैसे – वह, नल, आज, नर, तन आदि!
    • वाक्य बलाघात : किसी वाक्य का उच्चारण करते समय जिस शब्द पर बलाघात होता है, उस शब्द का विशेष अर्थ हो जाता है! जैसे – अध्यापिका ने महादेवी वर्मा को कविता पढाई! इसमें अलग अलग शब्दों पर बलाघात करने से वाक्य के अलग अलग मतलब निकलते हैं!

     

    अनुतान ( Anutaan : Intonation ) :

    किसी शब्द अथवा वाक्य का उच्चारण करते समय उसमें सुर के उतार चढ़ाव को अनुतान कहते हैं! अनुतान से तात्पर्य है शब्दों या वाक्यों को उनके भावों के अनुसार बोलना! जैसे – पंडित जसराज आ गएl, पंडित जसराज आ गए?, पंडित जसराज आ गए! तीनों वाक्यों में समान शब्द हैं परंतु तीनों भिन्न भिन्न प्रकार के वाक्य हैं! इनका उच्चारण भिन्न भिन्न रूपों में होगा! अनुतान के कारण इन वाक्यों के अर्थों में परिवर्तन आ गया! विराम चिह्नों के प्रयोग से शब्दों और वाक्यों में अनुतान होता है!

     

    संगम ( Sangam : Confluence ) :

    दो शब्दों के मध्य दिए जाने वाले विराम को संगम कहते हैं! इसका महत्व उच्चारण और लेखन दोनों की दृष्टियों से महत्वपूर्ण होता है! जिस प्रकार भाषा के मौलिक रूप में शब्दों के अर्थों को स्पष्ट करने के लिए यथासंभव विराम देना आवश्यक होता है! उसी प्रकार भाषा के लिखित रूप में भी शब्दों के मध्य विराम देना आवश्यक होता है! जैसे – पूजाघर में घंटियाँ बजने लगी! पूजा घर चली गई! पूजाघर – पूजा घर का भिन्न भिन्न अर्थ है!

     

    वर्ण विच्छेद (Disection of Alphabate ) :

    जब किसी शब्द में प्रयुक्त वर्णों को अलग अलग किया जाता है तो उसे वर्ण विच्छेद कहते हैं! जैसे कमल – क्+अ+म्+अ+ल्+अ! वर्तनी की अशुद्धियों से बचने के लिए वर्ण विन्यास का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है!

     

    ‘र’ के विभिन्न रूप :

    • ‘र’ में ‘उ’ और ‘ऊ’ की मात्रा वर्ण के बिच में लगाई जाती है! – रुपया, रूप!
    • यदि ‘र’ (स्वर रहित) पहले हो और बाद में कोई अन्य स्वर सहित व्यंजन हो तो ‘र’ उस व्यंजन के ऊपर चला जाता है! इसे ‘रेफ’ कहते हैं, जैसे – कर्म!
    • यदि व्यंजन में कोई मात्रा हो तो यह रेफ मात्रा के ऊपर लगता है, जैसे – वर्मा, सर्वोदय!
    • पूरे पाई वाले (अंत और मध्य पाई वाले) सभी स्वर रहित व्यंजन जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होते हैं तब ‘र’ को (,) रूप में लिखते हैं! जैसे – क्रम, सम्राट, ब्रज!
    • स्वर रहित ‘द’ और ‘ह’ जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होते हैं तब ‘र’ को (,) के रूप में लिखते हैं! जैसे – ह्रास!
    • स्वर रहित ‘ट’ और ‘ड’ जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होते हैं तब ‘र’ को (^) के रूप में लिखा जाता है! जैसे – ट्रक, ड्रम!
    • स्वर रहित ‘श’ जब स्वर सहित ‘र’ के साथ संयुक्त होता है तब इसे ‘श्र’ के रूप में लिखा जाता है! जैसे – श्राप!
    • इसी प्रकार ‘ऋ’ की मात्रा भी ‘श’ के साथ जुड़कर ‘शृ’ का रूप ले लेती है!

     

    बिंदु ( _._ ) :

    हिंदी में बिंदु (अनुस्वार) का प्रयोग बढ़ रहा है! अनुस्वार का चिह्न बिंदु होता है!

    • जिस स्वर का उच्चारण करते समय हवा केवल नाक से निकलती है और उच्चारण कुछ जोर से किया जाता है तथा लिखते समय ऊपर केवल बिंदु लगाया जाता है, उसे अनुस्वार कहते हैं! जैसे – कंठ, कंघा, बंदर!
    • यदि किसी व्यंजन पर स्वर की मात्रा शिरोरेखा के ऊपर हो तो अनुनासिका के स्थान पर बिंदु का प्रयोग होता है! जैसे – सिंचाई, कहीं, गोंद! (लेकिन ये बिंदु अनुनासिकता का सूचक है, अनुस्वार का नहीं)
    • कुछ अवर्गीय व्यंजनों के साथ अनुस्वार का ही प्रयोग होता है, जैसे – वंश, हंस, अंश!
    • स्वर रहित पंचमाक्षर (ड., ञ, ण, न, म) जब अपने वर्ग के व्यंजन के पहले आता है, तब उसे अनुस्वार के रूप में लिखा जाता है! जैसे – पंकज, चंचल, मंजन, घंटी पंत, चंपक!
    • मानक वर्तनी के नियमानुसार व्यंजनों के साथ नासिक्य वर्ण के संयुक्त होने पर अनुस्वार का ही प्रयोग करना चाहिए! यद्यपि दोनों शुद्ध है, पर एकरूपता लाने के लिए ऐसा किया गया है! जैसे, दण्ड – दंड, कम्पन – कंपन!
    • अनुस्वार जिस स्पर्श व्यंजन से पहले आता है, उसी के अंतिम नासिक्य वर्ण के रूप में उच्चरित होता है, जैसे – गंगा, पंकज, घंटा, दंत!
    • अंतस्थ (य, र, ल, व) और ऊष्म (श, ष, स, ह) व्यंजनों के पहले आने पर अनुस्वार का उच्चारण पंचम वर्ण में से किसी एक वर्ण की भांति हो सकता है, किंतु कोई निश्चित नियम लागू नहीं होता, जैसे – संशय, संरचना!
    • बिंदु और चंद्रबिंदु के अंतर को समझना आवश्यक है अन्यथा भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जैसे – हंस = हँस!

     

    अर्धचन्द्राकार :

    हिंदी में कुछ अंग्रेजी ध्वनियाँ स्थान पा चुकी है! ‘ऑ’ अंग्रेजी की स्वर ध्वनि है! इसका प्रयोग अंग्रेजी के शब्दों में होता है! यह ध्वनि आ और ओ के मध्य की ध्वनि है! जैसे – डॉक्टर, कॉटेज, ऑफिस, फुटबॉल!

     

    नुक्ता ( Nukta ) :

    अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी भाषा से आए कुछ आगत शब्दों के शुद्ध उच्चारण के लिए उनमें नुक्ता लगाया जाता है!

    • अंग्रेजी में ‘ज’ और ‘फ़’ की ध्वनियाँ हिंदी के ‘ज’ और ‘फ’ से भिन्न है!
    • उर्दू की ‘क़’, ‘ख़’, ‘ग़’ ‘.ज’और ‘फ़’ ध्वनियाँ हिंदी की ध्वनियों से भिन्न है!
    • हिंदी में ‘ज’ और ‘फ़’ के दोनों रूप स्वीकृत हैं, इनके उच्चारण भी विशिष्ट हैं, अतः आगत शब्दों में यथास्थान नुक्ते का प्रयोग करना चाहिए! जैसे – राज़, जुल्फ़, रफ़ू!
    • नुक्ते के लगाने और न लगाने से शब्द में अंतर आ जाता है, जैसे – राज(shasn), राज़(रहस्य), फन(सांप का फन), फ़न(कौशल)!

     

    और पढ़ें (Next Post) : हिंदी शब्दों के उच्चारण संबंधी अशुद्धियाँ और उनका निराकरण

     

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  • वर्ण किसे कहते हैं, वर्णमाला, वर्णों के भेद और वर्ण व्यवस्था क्या है?

    वर्ण किसे कहते हैं, वर्णमाला, वर्णों के भेद और वर्ण व्यवस्था क्या है?

    वर्ण क्या है? ( Varna : What is Alphabets) :

    भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण ( Varn ) है! भाषा विज्ञान में भाषा को ऐसी बौद्धिक क्षमता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो ध्वनि प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है! भाषा के इन्हीं पारंपरिक ध्वनि प्रतीकों को वर्ण कहते हैं! वर्ण ध्वनियों के उच्चरित और लिखित दोनों रूपों के प्रतिक हैं और ये ही भाषा की लघुतम इकाई हैं! हिंदी के वर्णों को अक्षर भी कहा जाता है! हिंदी के वर्ण देवनागरी लिपि में लिखे जाते हैं!

     

    वर्णमाला (Alphabets) :

    वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं! हिंदी भाषा के लेखन में जो चिह्न (वर्ण) प्रयुक्त होते हैं, उनके समूह को वर्णमाला कहते हैं! हिंदी वर्णमाला में पहले स्वर वर्णों और बाद में व्यंजन वर्णों की व्यवस्था है! हिंदी के वर्णों को अक्षर भी कहा जाता है क्योंकि उनका स्वतंत्र उच्चारण हो सकता है! स्वर अपने प्रकृति से ही अक्षर होते हैं, लेकिन हिंदी के व्यंजन वर्णों में भी ‘अ’ वर्ण रहता है! कई बार स्वर रहित व्यंजन का प्रयोग होता है! स्वर रहित वयंजन लिखने के लिए उसके निचे हलंत (,) का चिह्न लगाना पड़ता है! देवनागरी अंक : ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९

     

    वर्णों के भेद (Kinds of Alphabets) :

    उच्चारण की दृष्टि से हिंदी वर्णमाला के वर्णों को दो भागों में बाँटा जाता है – १. स्वर, २. व्यंजन

    स्वर (Vowels) : जिन ध्वनियों के उच्चारण के समय हवा मुंह से बिना अवरोध के निकलती है, उन्हें स्वर कहते हैं! स्वरों का उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता से होता है! अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, ऑ, अं, अः! जिनकी मात्रा क्रमशः अ कोई मात्रा नहीं, ा , ि , ी , ु , ू , ृ , े , ै , ो , ौ , ं , ः है! यद्यपि वर्णमाला में अं और अः को स्वरों के साथ लिखा जाता है पर वास्तव में अं अनुस्वार है और अः विसर्ग है! ये उच्चारण की दृष्टि से व्यंजन ही है, स्वर के बाद ही इनका प्रयोग होता है! विसर्ग का प्रयोग हिंदी में प्रचलित संस्कृत शब्दों में ही होता है! अनुस्वार जिस स्पर्श व्यंजन से पहले आता है, उसी व्यंजन वर्ग के अंतिम नासिक्य वर्ण के रूप में उच्चरित होता है! ऋ का प्रयोग संस्कृत के शब्दों में होता है! ऑ का प्रयोग अंग्रेजी के शब्दों के साथ होता है! और पढ़ें : वर्तनी व्यवस्था, वर्तनी की अशुद्धियाँ और वर्तनी के मानक रूप

     

    स्वरों के भेद (Kinds of Vowels) : हिंदी में स्वरों के मूलतः दो भेद हैं – १. निरनुनासिक, २. अनुनासिक! अनुनासिक स्वर के लिए निरनुनासिक के ऊपर चंद्रबिंदु का प्रयोग होता है! परन्तु यदि शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा लगी हो तो चंद्रबिंदु के स्थान पर केवल बिंदु का प्रयोग होता है! जैसे – निरनुनासिक उ – अनुनासिक ऊँ

    उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर स्वरों को दो भागों में बाँटा जाता है – १. ह्रस्व स्वर २. दीर्घ स्वर

    ह्रस्व स्वर (Short Vowels) : जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं, जैसे – अ, इ, उ, ऋ

    दीर्घ स्वर (Long Vowels) : जिस स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व की तुलना में अधिक समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं, जैसे – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ

    अयोगवाह (After Sound) : अनुस्वार और विसर्ग दोनों ध्वनियाँ न स्वर हैं न व्यंजन! in दोनों के साथ योग नहीं है, अतः ये अयोगवाह कहलाती है! जैसे – अं, अः

    अनुस्वार (Nasal) : जिस स्वर का उचारण करते समय हवा केवल नाक से निकलती है और उच्चारण कुछ जोर से किया जाता है तथा लिखते समय ऊपर केवल बिंदु लगाया जाता है, उसे अनुस्वार कहते हैं! जैसे – बंदर, कंधा!

     

    व्यंजन (Consonants) : जिन वर्णों के उच्चारण में वायु रूकावट या घर्षण के साथ मुँह से बाहर आती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं! व्यंजन का उच्चारण सदा स्वर की सहायता से होता है! हिंदी में कुल 37 व्यंजन हैं, इनमें दो आगत व्यंजन ज़ और फ़ भी शामिल है! कवर्ग – क, ख, ग, घ, ड.! चवर्ग : च, छ, ज, झ, ञ! टवर्ग : ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़! तवर्ग : त, थ, द, ध, न! पवर्ग : प, फ, ब, भ, म! अंतस्थ : य, र, ल, व! उष्म : श, ष, स, ह! संयुक्त व्यंजन : क्ष, त्र, ज्ञ, श्र! आगत वर्ण : ऑ, ज़, फ़! इन्हें निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित गया है – १. स्पर्श व्यंजन(27)   २. अंतस्थ व्यंजन(4)    ३. ऊष्म व्यंजन(4)    ४. आगत वर्ण(2-3)   ५. संयुक्त व्यंजन(4)!

    1. स्पर्श व्यंजन : इनका उच्चारण जीभ द्वारा कंठ, तालु, मूर्धा, दांत, ओष्ठ स्थानों के स्पर्श से होता है! उच्चारण स्थानों के अनुसार इनके वर्ग इस प्रकार है – कवर्ग कंठ, चवर्ग तालु, टवर्ग मूर्धा, तवर्ग दांत, पवर्ग ओष्ठ के स्पर्श से बोला जाता है! ड., ञ, ण, न, म व्यंजन वर्णों का उच्चारण नासिका के साथ क्रमशः कंठ, तालु, मूर्धा, ओष्ठ के स्पर्श से होता है इसलिए इन्हें नासिक्य व्यंजन भी कहते हैं! ड़ और ढ़ के उच्चारण में जीभ पहले ऊपर उठकर मूर्धा के स्पर्श करती है और फिर निचे गिरती है, इसलिए इसे उत्क्षिप्त व्यंजन कहते हैं! ये वर्ण शब्द के आरंभ में नहीं आते, लेकिन शब्द के मध्य और अंत में इनका इस्तेमाल होता है!
    2. अंतस्थ व्यंजन (Semi Vowels) : अंतस्थ क अर्थ होता है स्वर और व्यंजन के बिच में! इनका उच्चारण जीभ, तालु, दांत और होठों के निकट आने से होता है, किंतु श्वास में रूकावट कम होती है! जैसे – य, र, ल, व! इन वर्णों में य और व अर्द्ध स्वर हैं!
    3. ऊष्म व्यंजन (Sibilants) : इनका उच्चारण रगड़ या घर्षण से उत्पन्न वायु से होता है, जैसे – श, ष, स, ह! श के उच्चारण में जीभ तालु को और स के उच्चारण में दांतों की जड़ को छूती है! ष को मूर्धन्य वर्ण कहा जाता है, किंतु इसका उच्चारण अब प्रायः श की भांति ही होता है! यह संस्कृत से आए शब्दों के लेखन में प्रयुक्त होता है, जैसे – दोष, विषम, पुरुष!
    4. आगत वर्ण (Foreign Alphabets) : अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी भाषाओँ से आए कुछ शब्दों के शुद्ध उच्चारण के लिए हिंदी में फ़, ज़, ऑ का प्रयोग होता है!
    5. संयुक्त वर्ण (Combined Consonants) : ये दो व्यंजन वर्णों के संयोग से बनते हैं, ये स्वतंत्र व्यंजन नहीं हैं! जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, श्र!

     

    व्यंजनों का वर्गीकरण (Classification of Consonants) :

    1. स्वरतंत्री के कंपन के आधार पर : बोलते समय वायु प्रवाह से कंठ में स्थित स्वरतंत्री में कंपन होता है! स्वरतंत्री में जब कंपन होता है, तो सघोष ध्वनियाँ उत्पन्न होती है और कंपन नहीं होता है तो अघोष ध्वनियाँ उत्पन्न होती है! सघोष ध्वनियाँ – ग, घ, ड., ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म, ज़, ड़, ढ़, य, र, ल, व, ह! अघोष ध्वनियाँ – क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, फ़, श, ष, स!
    2. श्वास की मात्रा के आधार पर : उच्चारण के समय श्वास की मात्रा के आधार पर व्यंजनों के दो भेद किए जाते हैं – अल्पप्राण, महाप्राण! अल्पप्राण व्यंजन के उच्चारण में मुख से निकलने वाली वायु की मात्रा कम होती है, जैसे – क, ग, ड., च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म, ड़, य, र, ल, व! महाप्राण व्यंजन के उच्चारण में मुख से निकलने वाली श्वास की मात्रा अधिक होती है, जैसे – ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, ढ़, श, ष, स, ह!
    3. उच्चारण अवयवों द्वारा श्वास के अवरोध के आधार पर : जब हम व्यंजनों का उच्चारण करते हैं तो उच्चारण अवयव मुख में किसी स्थान विशेष का स्पर्श करते हैं! ऐसे व्यंजनों को स्पर्श व्यंजन कहते हैं, जैसे – क, ख, ग, घ, ड., च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म! जिन व्यंजनों का उच्चारण करते हुए वायु स्थान विशेष पर घर्षण करते हुए निकलती है तो इन व्यंजनों को संघर्षी व्यंजन कहा जाता है, जैसे – य, र, ल, व, ज़, फ़, ड़, ढ़!

     

    व्यंजन गुच्छ (Bunch of Consonant) : व्यंजन गुच्छों में दो या दो से अधिक व्यंजनों का संयोग होता है! जैसे – पक्का, मक्खन, कष्ट, स्वास्थ्य! अक्षर, आज्ञा, साक्षात, ज्ञान, क्षत्रिय जैसे शब्दों में संयुक्त वर्णों का स्वतंत्र प्रयोग हुआ है! जबकि प्रसन्न, स्वच्छंद, मुट्ठी जैसे शब्दों में दो व्यंजनों का गुच्छ का प्रयोग हुआ है! प्रथम अल्पप्राण और द्वितीय महाप्राण व्यंजन का संयुक्त रूप का भी प्रयोग होता है, जैसे – आच्छादन, स्वच्छंद, जत्था!

     

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