Category: शिक्षा

  • मानचित्र की रेखाएँ एवं अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ

    मानचित्र की रेखाएँ एवं अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ

    मानचित्र की रेखाएँ –

    समलवण रेखा (Isohaline) – मानचित्र पर खिंची गई वह रेखा जो महासागर के उन स्थानों को मिलाती है, जहाँ पर समान लवणता पायी जाती है!

     

    समदाब रेखाएँ (Isobars) – समान वायु, दबाव वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ समदाब रेखाएँ कहलाती है!

     

    समगहरी रेखाएँ (Isobaths) – समान गहराई के समुद्र स्थलों को जोड़ने वाली रेखाएँ समगहरी रेखाएँ कहलाती है!

     

    समोच्च रेखाएँ (Isohypes lines) – समान ऊँचाई वाले बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखाएँ समोच्च रेखाएँ कहलाती है!

     

    समवर्षा दर्शक रेखा (Isohyetes) – समान वर्षा वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा को समवर्षा दर्शक रेखा कहते हैं!

     

    सममान रेखा (Isopleth) – वह रेखा जो मानचित्र की उन रेखाओं को मिलाती है, जहाँ किसी निश्चित तत्व का मान बराबर होता है!

     

    समधूप रेखा (Isohel) – यह रेखा जो धुप के समान अवधि वाले स्थानों को मिलाते हुए खिंची जाती है!

     

    समताप रेखा (Isotherm) – मानचित्र पर समान तापमान के स्थानों को मिलाते हुए खिंची गई रेखाएँ, समताप रेखाएँ कहलाती है!

     

    अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं –

    मैकमोहन रेखा भारत एवं चीन
    रेडक्लिफ रेखा भारत एवं पाकिस्तान
    हिंडनबर्ग रेखा जर्मनी एवं पोलैंड
    मैगीनॉट रेखा जर्मनी एवं फ्रांस
    मेनरहीम रेखा रूस एवं फ़िनलैंड
    38वीं समानान्तर रेखा उतर कोरिया एवं दक्षिण कोरिया
    49वीं समानान्तर रेखा USA एवं कनाडा
    ड्युरंड रेखा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान

    और पढ़ें : समय का निर्धारण, समय जोन, मानक समय और अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा

     

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  • माउंट एवरेस्ट से संबंधित कुछ रोचक तथ्य और जानकारी

    माउंट एवरेस्ट से संबंधित कुछ रोचक तथ्य और जानकारी

    # माउंट एवरेस्ट का नाम तत्कालीन भारत के महासर्वेक्षक सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर पड़ा जिन्होंने एवरेस्ट की अवस्थिति का पता लगाया! पहले माउंट एवरेस्ट को चोटी-15 कहा जाता था!

     

    # एवरेस्ट की स्थिति – देशांतर – 86०55’40” पूर्व एवं अक्षांश – 27०59’16” उतर!

     

    # पर्वतमाला के आस पास के विभिन्न स्थलों के औसत मापन द्वारा 1954 ई० में माउंट एवरेस्ट ऊँचाई 8848 मी आंकी गई थी!

     

    # नेशनल ज्योग्राफिकल सोसाइटी ने जीपीएस उपग्रह के उपयोग द्वारा 1999 ई० में माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई 8850 मी होने की पुष्टि की!

     

    # माउंट एवरेस्ट को तिब्बत में कोमोलंग्मा (बर्फ की देवी) तथा नेपाल में सागरमाथा (बह्मांड की माता) कहते हैं! इसे पृथ्वी का तीसरा ध्रुव भी कहते हैं!

    और पढ़ें : भारत में सबसे बड़ा, सबसे ऊँचा और सबसे लंबा

     

    # एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोरगे 1953 में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे थे!

     

    # जुंको तबई (जापान) पहली महिला हैं जो एवरेस्ट पर चढ़ी (1975 ई०)

     

    # बछेंद्री पाल पहली भारतीय महिला हैं जो 1984 में एवरेस्ट पर पहुंची!

     

    # अप्पा शेरपा (नेपाल) सर्वाधिक 21 बार एवरेस्ट पर पहुँचने में सफल हुए! अप्पा शेरपा अपने चौथे प्रयास में पहली पहुँचने में सफल हुए थे!

     

    # विश्व में सबसे कम उम्र (13 वर्ष) में एवरेस्ट पर चढ़ने का रिकॉर्ड अमेरिका के जोर्डन रोमेरो ने 22 मई 2010 को स्थापित किया!

     

    # भारत में सबसे कम उम्र (16 वर्ष) में एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने का रिकॉर्ड नोएडा के अर्जुन वाजपेयी ने 13 मई 2010 को स्थापित किया!

     

    # अमेरिका के टॉम व्हाइटेकर पहले विकलांग व्यक्ति थे (कृत्रिम टांग) जो 1996 में एवरेस्ट के शिखर पर पहुँचे!

    और पढ़ें : सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण क्या होता है और कब होता है?

     

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  • समय का निर्धारण, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा, समय जोन और मानक समय

    समय का निर्धारण, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा, समय जोन और मानक समय

    0 डिग्री से 180 डिग्री पूर्व की ओर जाने पर 12 घंटे की अवधि लगती है एवं यह ग्रीनविच समय से 12 घंटे आगे होता है! इसी प्रकार 0 डिग्री से 180 डिग्री पश्चिम की ओर जाने पर ग्रीनविच समय से 12 घंटे पीछे का समय मिलता है! यही कारण है की 180 डिग्री पूर्व एवं पश्चिम देशांतर में कुल 24 घंटे अर्थात एक दिन-रात का अंतर होता है!

     

    समय का निर्धारण :

    एक देशांतर का अंतर होने पर समय में 4 मिनट का अंतर होता है! चूँकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घुमती है, इसलिए पूर्व की ओर बढ़ने पर प्रत्येक देशांतर पर समय 4 मिनट बढ़ता जाता है, तथा पश्चिम की ओर जाने पर प्रत्येक देशांतर पर समय 4 मिनट घटता जाता है!

     

    अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा :

    180 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं! 1884 ई० में वाशिंगटन में संपन्न इंटरनेशनल मेरिडियन कांफ्रेंस में 180 वें यम्योतर को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा निर्धारित किया गया है! ऐसा इसलिए किया गया है ताकि विभिन्न देशों के मध्य यात्रियों को कुछ स्थानों पर एक दिन का अंतर होने के कारण परेशानी न हो!

     

    अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा आर्कटिक सागर, चूकी सागर, बेरिंग स्ट्रेट व प्रशांत महासागर से गुजरती है! ग्रीनविच मेरिडियन से गणना करते हुए इस रेखा के पूर्व वाले क्षेत्र एक दिन आगे होंगे या दुसरे शब्दों में इस रेखा से पश्चिम वाले क्षेत्रों से 12 घंटे आगे होंगे! अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पूर्व व पश्चिम में एक दिन का अंतर पाया जाता है! जब कोई जलयान अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार कर पश्चिम दिशा में यात्रा करता है तो एक दिन जोड़  दिया जाता है, एवं जब पूर्व दिशा में यात्रा करता है तो एक दिन घटा दिया जाता है!

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    साइबेरिया को विभाजित होने से बचाने एवं साइबेरिया को अलास्का से अलग करने के लिए 75 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर यह पूर्व की ओर मुड़ गयी है! बेरिंग सागर में यह रेखा पश्चिम की ओर मुड़ गयी है! फिजी द्वीप समूह एवं न्यूजीलैंड के विभिन्न भागों को एक साथ रखने के लिए यह रेखा दक्षिणी प्रशांत महासागर में पूर्व दिशा की ओर मुड़ गयी है! बेरिंग जलसंधि अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समानान्तर स्थित है!

     

    समय जोन एवं मानक समय :

    विश्व को 24 समय जोनों में विभाजित किया गया है! इन समय जोनों को ग्रीनविच मीन टाइम व मानक समय में एक घंटे के अन्तराल के आधार पर विभाजित किया गया है अर्थात् प्रत्येक जोन 15 डिग्री के बराबर होता है! ग्रीनविच याम्योतर 0 डिग्री देशांतर पर है जो की ग्रीनलैंड व नार्वेनियन सागर व ब्रिटेन, स्पेन, अल्जीरिया, फ्रांस, माले, बुर्किनाफासो, घाना व दक्षिण अटलांटिक समुद्र से गुजरता है! प्रत्येक देश का मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम से आधा घंटे के गुणक के अंतर पर निर्धारित किया गया है!

     

    मानक समय स्वेच्छा से चयनित यम्योतर का स्थानीय समय होता है जो एक विशिष्ट क्षेत्र या देश के लिए मानक समय निर्धारित करता है! भारत में साढ़े बेरासी डिग्री पूर्वी देशांतर जो इलाहबाद के निकट मिर्जापुर से गुजरती है, के समय को मानक समय माना जाता है! यह समय ग्रीनविच मीन टाइम से साढ़े पांच घंटा आगे रहता है! अतः जब ग्रीनविच में दोपहर के 12 बजे हो तो उस समय भारत में शाम के साढ़े पांच बजेंगे!

     

    कुछ देशों में अत्यधिक देशान्तरीय विस्तार के कारण एक से अधिक मानक समय की व्यवस्था की गई है! संयुक्त राज्य अमेरिका में सात समय जोन, रूस में ग्यारह समय जोन तथा ऑस्ट्रेलिया में तीन समय जोन की व्यवस्था की गई है!

    और पढ़ें : मानचित्र की रेखाएं एवं अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं

     

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  • सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण क्या है और कब होता है

    सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण क्या है और कब होता है

    सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) :

    जब कभी दन के समय सूर्य एवं पृथ्वी के बिच में चन्द्रमा के आ जाने से सूर्य की चमकती सतह चंद्रमा के कारण दिखाई नहीं पड़ने लगती है तो इस स्थिति को सूर्यग्रहण कहते हैं! जब सूर्य का एक भाग छिप जाता है, तो उसे आंशिक सूर्यग्रहण और जब पूरा सूर्य ही कुछ क्षणों के लिए छिप जाता है, तो उसे पूर्ण सूर्यग्रहण कहते हैं! पूर्ण सूर्यग्रहण हमेशा अमावस्या को ही होता है!

     

    चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse) :

    जब सूर्य और चन्द्रमा के बिच पृथ्वी आ जाती है, तो सूर्य की पूरी रोशनी चन्द्रमा पर नहीं पड़ती है, इसे चंद्रग्रहण कहते हैं! चंद्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा की रात्रि को ही होता है! प्रत्येक पूर्णिमा को चंद्रग्रहण नहीं होता है, क्योंकि चन्द्रमा और पृथ्वी के कक्षा पथ में 5 डिग्री का अंतर होता है, जिसके कारण चन्द्रमा कभी पृथ्वी के ऊपर से या निचे से गुजर जाता है! एक वर्ष में अधिकतम तीन बार पृथ्वी के उपच्छाया क्षेत्र से चन्द्रमा गुजरता है, तभी चंद्रग्रहण लगता है! सूर्यग्रहण के समान चंद्रग्रहण भी आंशिक या पूर्ण हो सकता है!

    और पढ़ें : माउंट एवरेस्ट से सम्बंधित रोचक तथ्य और जानकारी

     

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  • क्रिया के रूप, काल, काल के भेद, पक्ष, वृति, वाच्य और वाच्य के भेद

    क्रिया के रूप, काल, काल के भेद, पक्ष, वृति, वाच्य और वाच्य के भेद

    क्रिया ( Kriya ) के जिस रूप से उसके होने के समय का बोध होता है, उसे काल ( Kaal : Tense) कहते हैं! काल के द्वारा क्रियाओं के बीते समय, वर्तमान समय और आने वाले समय का बोध होता है; जैसे – गीता ने नृत्य किया था, गीता नृत्य कर रही है, गीता नृत्य करेगी!

     

    काल के भेद (Kinds of Tense) –

    काल के तीन भेद होते हैं! १. भूतकाल (Past Tense)  २. वर्तमान काल (Present Tense)  ३. भविष्यत् काल (Future Tense)

    १. भूतकाल – क्रिया का वह रूप जिससे उसके बीत चुके समय में होने का पता चलता है, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं! जैसे – महेश ने मकान बेचा, बस जोधपुर पहुँच गई!

    भूतकाल के भेद – (i) सामान्य भूत (Past Indefinite)  (ii) आसन्न भूत (Immediate Past)  (iii) पूर्ण भूत (Past Perfect)  (iv) अपूर्ण भूत (Past Imperfect)  (v) संदिग्ध भूत (Doubtful Past)  (vi) हेतुहेतुमद् भूत (Conditional Past)

    (i) सामान्य भूत – जिस काल से क्रिया के भूतकाल में सामान्य रूप से होने का बोध होता है, उसे सामान्य भूत की क्रिया कहते हैं! जैसे – विमान उड़ा, बिजली चमकी आदि!

    (ii) आसन्न भूत – क्रिया के जिस रूप से यह पता चले की क्रिया अभी अभी समाप्त हुई है अर्थात् क्रिया कुछ समय पहले ही हुई है, उसे आसन्न भूत की क्रिया कहते हैं! जैसे – महिमा ने नल बंद किया है, गणेश आकार बैठा ही है आदि!

    (iii) पूर्ण भूत – क्रिया के जिस रूप से उसके भूतकाल में पूर्ण हो जाने का बोध होता है, उसे पूर्ण भूत की क्रिया कहते हैं; जैसे – मुकेश साईकिल चला चूका था, क्या तुमने खाना खाया था? आदि!

    (iv) अपूर्ण भूत – क्रिया का वह रूप जिसमें क्रिया के भूतकाल में आरंभ होकर उसके पूरा न होने का बोध होता है, उसे अपूर्ण भूत की क्रिया कहते हैं; जैसे – मनीषा कपड़ा धो रही थी, नल से पानी टपक रहा था आदि!

    (v) संदिग्ध भूत – क्रिया के जिस रूप से उसके भूतकाल में पूरा होने के बारे में संदेह बना रहता है, उसे संदिग्ध भूत की क्रिया कहा जाता है; जैसे – आदित्य स्कूटर ठीक करा लाया होगा!

    (vi) हेतुहेतुमद् भूत – क्रिया का वह रूप जिससे उसके भूतकाल में हो सकने का बोध हो परंतु क्रिया न हो सकी हो, उसे हेतुहेतुमद् भूत कहते हैं! इसमें भूतकाल की एक क्रिया किसी दूसरी क्रिया पर आधारित होती है! जैसे – मम्मी होती तो चॉकलेट ले देती!

     

    २. वर्तमान काल – क्रिया का वह रूप जिससे उसके वर्तमान समय में होने का बोध होता है, उसे वर्तमान काल कहते हैं; जैसे – अमिताभ चाय बेचता है, गणेश खेतों में हल चला रहा है!

    वर्तमान काल के भेद (Kinds of Present Tense) – (i) सामान्य वर्तमान (Present Indefinite)  (ii) संदिग्ध वर्तमान (Doubtful Present)  (iii) अपूर्ण वर्तमान (Present Continuous)

    (i) सामान्य वर्तमान – वर्तमान काल में सामान्य रूप से होने वाली क्रियाओं को सामान्य वर्तमान की क्रियाएँ कहते हैं; जैसे – पुजारी मंदिर में पूजा कराते हैं, राधिका दलेर मेहंदी के गीत सुनती है!

    (ii) संदिग्ध वर्तमान – ऐसी क्रियाएँ जिनके वर्तमान समय में होने के विषय में अनिश्चितता होती है, उन्हें संदिग्ध वर्तमान की क्रिया कहते हैं; जैसे – स्वामी गोपाल गोलोक आश्रम जाते होंगे, मदन गोपाल यमुना में स्नान करते होंगे!

    (iii) अपूर्ण वर्तमान – ऐसी क्रियाएँ जिनके वर्तमान काल में हो रहे होने का बोध होता है, उन्हें अपूर्ण वर्तमान की क्रियाएँ कहते हैं! इसमें काम जारी रहने का पता चलता है; जैसे – दर्शना सोनीपत जा रही है! नमन भोजन कर रहा है!

     

    ३. भविष्यत् काल – क्रिया का वह रूप जिसमें उसके भविष्य में होने का बोध होता है, भविष्यत् काल की क्रिया कहते हैं; जैसे – सुषमा फरीदाबाद जाएगी!

    भविष्यत् काल के भेद (Kinds of Future Tense) –  (i) सामान्य भविष्यत् (Future Indefinite)  (ii) संभाव्य भविष्यत् (Doubtful Future)  (iii) हेतुहेतुमद् भविष्यत् (Conditional Future)

    (i) सामान्य भविष्यत् – ऐसी क्रियाएँ जिनके भविष्य में सामान्य रूप से होने का बोध होता है, सामान्य भविष्य की क्रियाएँ कहलाती है; जैसे – रामलाल रामगढ़ जाएंगे!

    (ii) संभाव्य भविष्यत् – ऐसी क्रियाएँ जिनके भविष्य में होने की संभावना का बोध हो, उसे संभाव्य भविष्यत् की क्रियाएँ कहते हैं; जैसे – शायद विनोद लॉ पढ़ने दिल्ली जाए, विजय राजेन्द्र को शायद रुपया देगा!

    (iii) हेतुहेतुमद् भविष्यत् – जो क्रिया भविष्य में होने के लिए कारण पर निर्भर करती है, उसे हेतुहेतुमद् भविष्यत् की क्रियाएँ कहते हैं; जैसे – दीदी आएगी तो जन्मदिन का केक कटेगा, उमेश पहुंचेगा तो हम चलेंगे!

     

    पक्ष (Paksh : Aspect) –

    प्रत्येक कार्य-व्यापार किसी काल अवधि के बिच होता है जो प्रारंभ से अंत तक फैला होता है, इस फैली हुई काल अवधि में कार्य-व्यापार को देखना पक्ष कहलाता है! हिंदी में पक्ष के मुख्यतः चार प्रकार के माने गए हैं –

    (i) नित्यता बोधक अपूर्ण पक्ष – इसमें क्रिया सामान्य रूप से चलती रहती है और पूरी नहीं होती; जैसे – रवि डॉक्टर है, मोहन अधयापक था!

    (ii) आवृति मूलक पक्ष – इसमें क्रिया सदैव बनी रहती है; जैसे – सूर्य पूर्व से निकलता है, सचिन पढ़ता है!

    (iii) सातत्य बोधक पक्ष – इसमें उस समय का बोध होता है जब कार्य निरंतर चल रहा हो; जैसे – राकेश पढ़ रहा है, सीता गा रही है!

    (iv) पूर्णकालिक पक्ष – इसमें कार्य व्यापार पूरा या समाप्त हो चूका होता है; जैसे – सचिन दौड़ चूका है, गीता ने यह पुस्तक पढ़ी है!

     

    वृत्ति (Vritti : Mood) –

    जब क्रिया रूप वक्ता या लेखक की मनोवृत्ति या प्रयोजन की ओर संकेत कर्ता है तो उसे वृत्ति कहते हैं! वृत्ति को क्रियार्थ भी कहते हैं! इसकी क्रियाएँ प्रायः काल निरपेक्ष होती है! क्रियार्थ का तात्पर्य है – क्रिया का अर्थ (प्रयोजन)! वृत्ति के छः मुख्य भेद माने जाते हैं!

    १. आज्ञार्थ – इसमें क्रिया के द्वारा आज्ञा, प्रार्थना, उपदेश आदि प्रकट होते हैं; जैसे – सदैव सच बोलो, तुम अपने घर जाओ आदि!

    २. इच्छार्थ – इसमें वक्ता की इच्छा, कामना, आशिर्वाद, वरदान, शाप आदि का पता चलता है; जैसे – ईश्वर सबका भला करे!

    ३. संभावनार्थ – इसमें कार्य होने में संदेह या संशय बना रहता है; जैसे – आज शायद पानी बरसे!

    ४. निश्चयार्थ – इसमें कथन सूचना प्रधान होता है और इसमें सत्य असत्य की जांच की जा सकती है; जैसे – मुझे कल मुंबई जाना पड़ेगा!

    ५. संकेतार्थ – इसमें कार्य सिद्धि के लिए वक्ता कुछ शर्तों का पूरा होना आवश्यक समझता है; जैसे – यदि तुम पढ़ते तो पास हो जाते!

    ६. प्रश्नार्थ – इसमें वक्ता के मन में जिज्ञासा या शंका होती है और वह उसका निर्णय पाने के लिए कोई प्रश्न कर देता है; जैसे – अब मैं क्या करूं? क्या तुम मेरा एक काम कर दोगे?

     

    वाच्य (Vachya : Voice) –

    क्रिया के जिस रूप से उसके, कर्ता, कर्म या भाव के अनुसार होने का बोध होता है, उसे वाच्य कहते हैं! जैसे – गोविंद बेर बेचता है! रेशमा के द्वारा पापड़ बेले गए!

    वाच्य के भेद (Kinds of Voice) – (i) कर्तृवाच्य (Active Voice)  (ii) कर्मवाच्य (Passive Voice)  (iii) भाववाच्य (Impersonal Voice)

    (i) कर्तृवाच्य – जिस वाक्य की क्रिया का संबंध कर्ता से होता है, अर्थात् वाक्य में कर्ता की प्रधानता होती है, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं; जैसे – जया ब्लाउज सीती है!

    (ii) कर्मवाच्य – जिस वाक्य की क्रिया का संबंध कर्म से होता है, अर्थात् वाक्य में कर्म की प्रधानता होती है, उसे कर्मवाच्य कहते हैं! कर्मवाच्य की क्रियाओं का पुरुष, लिंग और वचन कर्म के अनुसार होता है; जैसे – हलवाई से मिठाइयाँ बनाई गई, चंद्रधर से स्कूटर ठीक किया गया! इस प्रकार के वाक्य में कर्ता के बाद ‘से’ अथवा ‘द्वारा’ का प्रयोग होता है! (क) कर्मवाच्य के कुछ वाक्यों में कर्ता का लोप भी होता है; जैसे – दीपावली नवम्बर में मनाई जाती है! (ख) असमर्थता सूचक वाक्यों में ‘से’ परसर्ग का प्रयोग होता है, ये वाक्य केवल निषेधात्मक रूप में प्रयुक्त होते हैं; जैसे – मुझसे दरवाजा नहीं खोला जाता! (ग) हिंदी में क्रिया का एक ऐसा भी रूप है जो कर्मवाच्य की तरह प्रयुक्त होता है! वह है सकर्मक क्रिया से बना इसका अकर्मक रूप, जिसे व्युत्पन्न अकर्मक कहते हैं; जैसे – दरवाजा खुल गया, गिलास टूट गया!

    (iii) भाववाच्य – जिस वाक्य की क्रिया का संबंध कर्ता और कर्म से न होकर भाव से होता है, उसे भाववाच्य कहते हैं! भाववाच्य की क्रियाएँ हमेशा पुल्लिंग, एकवचन तथा अकर्मक होती हैं! जैसे – मुनमुन से चला जाता है! बंदर से घूमा जाता है!

     

    वाच्य परिवर्तन (Change of Voice) –

    १. कर्तृवाच्य के साथ लगी विभक्ति हटा दी जाती है और उसके स्थान पर ‘से’ या ‘के द्वारा’ लगाई जाती है! कर्म के साथ लगी विभक्ति भी हटा दी जाती है!

    २. कर्तृवाच्य की मुख्य क्रिया को सामान्य भूतकाल की क्रिया में बदल जाता है और ‘जाना’ क्रिया के उचित रूप का प्रयोग किया जाता है!

    कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य – दीपिका ने खाना बनाया – दीपिका के द्वारा खाना बनाया गया!

    कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य – बंदर द्वारा बच्चे को काटा गया – बंदर ने बच्चे को काट लिया!

    कर्तृवाच्य से भाववाच्य – अध्यापिका जोर से नहीं बोलती – अध्यापिका से जोर से नहीं बोला जाता!

     

    वाच्य संबंधी कुछ महत्वपूर्ण बातें –

    • कर्मवाच्य तथा भाववाच्य में कर्ता के बाद ‘के द्वारा/द्वारा’ या ‘से’ परसर्ग का प्रयोग किया जाता है! बोलचाल की भाषा में ‘से’ का प्रयोग प्रायः निषेधात्मक वाक्यों में किया जाता है!
    • कर्मवाच्य तथा भाववाच्य के निषेधात्मक वाक्यों में जहाँ ‘कर्ता + से’ का प्रयोग होता है वहाँ एक अन्य असमर्थतासूचक अर्थ की भी अभिव्यक्ति होती है; जैसे – मुझसे चावल नहीं खाया जाता!
    • कर्तृवाच्य के सकारात्मक वाक्यों में इसी सामर्थ्य को सूचित करने के लिए क्रिया के साथ ‘सक’ का प्रयोग किया जाता है; जैसे – वे पुस्तक पढ़ सकते हैं!
    • इसी तरह असमर्थतासूचक वाक्यों में ‘सक’ का प्रयोग होता है – मैं यह नौकरी नहीं कर सकता!
    • कर्तृवाच्य के निषेधात्मक वाक्यों को कर्मवाच्य और भाववाच्य दोनों में रूपांतरित किया जा सकता है!
    • कर्मवाच्य के वाक्यों में प्रायः क्रिया में ‘+जा’ रूप लगाकर किया जाता है, ‘सोया जाता है’, ‘किया जाता है’, ‘खाया जाता है’; जैसे – हलवाई मिठाई नहीं बना रहा!
    • हिंदी में अकर्तृवाच्य के वाक्यों में प्रायः कर्ता का लोप कर दिया जाता है; जैसे – पेड़ नहीं काटा जा सकता!
    • हिंदी में क्रिया का एक ऐसा भी रूप है, जो कर्मवाच्य की तरह प्रयुक्त होता है; वह है – सकर्मक क्रिया से बना उसका अकर्मक रूप जिसे व्युत्पन्न कहते हैं; जैसे – गिलास टूट गया!
    • भाववाच्य की क्रिया सदा अन्य पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन में रहती है!

    और पढ़ें (Next Post) : अव्यय, क्रिया विशेषण, समुच्चयबोधक, संबंधबोधक, विस्मयादिबोधक और निपात

     

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  • क्रिया, धातु, पहचान, क्रिया के भेद और कृदंत क्रिया

    क्रिया, धातु, पहचान, क्रिया के भेद और कृदंत क्रिया

    क्रिया (Kriya : Verb) से किसी कार्य के करने या होने का या किसी प्रक्रिया की स्थिति में होने का बोध होता है! क्रिया-पदबंध की रचना दो प्रकार के अंशों से मिलकर होती है! एक अंश तो वह है जो उस क्रिया पदबंध को मुख्य अर्थ प्रदान करता है! इसे मुख्य क्रिया कहा जाता है तथा मुख्य क्रिया के अलावा जो भी अंश शेष रह जाता है, वह सब सहायक क्रिया का अंश होता है! – जैसे – गीता हँस रही है! इसमें हँस – मुख्य क्रिया है, जबकि रही है – सहायक क्रिया है! अतः कह सकते हैं की क्रिया पदबंध के जिस अंश से उसके मुख्य अर्थ का पता चलता है, वही अंश मुख्य क्रिया का अंश है, शेष जो अंश बच जाता है, वह सहायक क्रिया कहलाता है!

     

    धातु (Dhatu : Root) – यदि हम किसी क्रिया के विभिन्न रूपों को देखें – पढूंगा, पढ़ता है वगैरह, तो इसमें एक अंश समान रूप से मिलता है -‘पढ़’! इस समान रूप से मिलने वाले अंश को ‘धातु’ कहते हैं, इसे क्रिया का मूलरूप भी कहते हैं! धातु में ‘ना’ लगा देने से सामन्य रूप बनता है- जैसे – पढ़ना, दौड़ना, उठना आदि! और ‘ना’ हटा देने से धातु बन जाता है!

     

    मूल धातु की पहचान – मूल धातु आज्ञार्थक रूप में ‘तू’ के साथ प्रयुक्त होता है! जैसे – तू कहा, तू पढ़ आदि! धातु के मुख्य भेद निम्नलिखित माने जाते हैं – १. सामान्य धातु २. व्युत्पन्न धातु ३. नाम धातु ४. सम्मिश्र धातु ५. अनुकरणात्मक धातु

    १. सामन्य (मूल) धातु – वे क्रियाधातुएं जो भाषा में रूढ़ शब्द के रूप में प्रचलित हैं, मूल या रूढ़ धातु कही जाती है! मूल धातु में ‘ना’ प्रत्यय लगाकर बनाए गए रूप सामान्य धातु कहलाते हैं; जैसे – सोना, लिखना, पढ़ना आदि!

    २. व्युत्पन्न धातु – जो धातुएं किसी मूल धातु में प्रत्यय लगाकर अथवा मूल धातु को अन्य प्रकार से परिवर्तित करके बनाई जाती है; उन्हें व्युत्पन्न धातु कहते हैं; पिलाना, करवाना, दिखाना आदि!

    ३. नाम धातु – संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण शब्दों से जो क्रिया धातुएं प्रत्यय लगाकर बनती है, उन्हें नाम धातु कहते हैं! यहाँ मुख्य प्रत्यय – ‘आ’ है; जैसे – शर्म – शर्माना, चिकना – चिकनाना, अपना – अपनाना आदि!

    ४. सम्मिश्र धातु – कुछ संज्ञा, विशेषण और क्रिया-विशेषण शब्दों के बाद मुख्यतया ‘करना’ अथवा ‘होना’ के संयोग से जो धातुएं बनती हैं, उन्हें सम्मिश्र धातु कहते हैं; जैसे – काम करना, कष्ट देना, मार खाना, डिंग मारना, पसंद आना आदि!

    ५. अनुकरणात्मक धातु – जो धातुएँ किसी ध्वनि के अनुकरण पर बनाई जाती हैं, उन्हें अनुकरणात्मक धातु कहते हैं; जैसे – भनभन – भनभनाना, टनटन – टनटनाना आदि!

     

    मूल धातुएँ अकर्मक या सकर्मक होती है! मूल अकर्मक धातुओं से प्रेरणार्थक अथवा सकर्मक धातुएं व्युत्पन्न होती हैं! इसके विपरीत कभी कभी मूल सकर्मक धातु से अकर्मक धातुएं व्युत्पन्न होती है! जैसे – रोना – रुलाना, रुलवाना; खोलना – खुलवाना, खुलना आदि!

     

    क्रिया के भेद (Kriya Ke Bhed : Kinds of Verb) : कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद होते हैं – १. अकर्मक क्रिया (Intransitive Verb)  २. सकर्मक क्रिया (Transitive Verb)

    १. अकर्मक क्रिया – वाक्यों की ऐसी क्रियाएँ जिन्हें कर्म की आवश्यकता नहीं होती, अकर्मक क्रियाएँ कहलाती है! जैसे – आना, चलना, भागना, रोना आदि! इस क्रिया-पद से कार्य के होने या करने का स्वतः ही पता चल जाता है तथा इसका प्रभाव सीधे कर्ता पर पड़ता है अर्थात् वाक्यों में प्रयुक्त होने पर इन क्रियाओं का फल कर्ता पर पड़ता है! जैसे -दादी ज़ाग गई! गायिका हंसती है!

    अकर्मक क्रियाओं के भेद (Kinds of Intransitive Verb) – अकर्मक क्रिया दो प्रकार की होती है – (i) पूर्ण अकर्मक क्रिया (ii) अपूर्ण अकर्मक क्रिया

    (i) पूर्ण अकर्मक क्रिया – जो अकर्मक क्रियाएँ पूर्ण होती है अर्थात्  जिन्हें पूरकों की आवश्यकता नहीं पड़ती, उन्हें पूर्ण अकर्मक क्रिया कहते हैं! इन क्रियाओं से कर्ता की स्थिति, गति और अवस्था ज्ञात होती है! इन्हें स्थित्यर्थक/गत्यर्थक पूर्ण क्रिया भी कहते हैं! जैसे – रिंकी रो रही है, नाना जी हैं, वायुयान लन्दन जा रहा है! ये क्रियाएँ स्वयं में ही पूर्ण है! पूर्ण अकर्मक क्रियाओं में स्थानसूचक शब्द भी आते हैं जैसे – लन्दन! पूर्ण अकर्मक क्रियाओं द्वारा ‘अस्तित्व’ का बोध भी होता है! जैसे – नाना जी हैं, से नाना जी के होने का पता चलता है!

    (ii) अपूर्ण अकर्मक क्रिया – जो अकर्मक क्रियाएँ स्वयं में पूर्ण नहीं होती उन्हें अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ कहते हैं! in क्रियाओं का कर्ता से संबंध बनाने के लिए किसी न किसी संज्ञा या विशेषण शब्द की आवश्यकता पड़ती है! जैसे – मोहन डॉक्टर बनेगा, साईकिल ख़राब है, फिल्म पारिवारिक है! इसमें पूरक शब्द डॉक्टर, पारिवारिक वगैरह है! अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ प्रायः बनना, निकलना और होना प्रमुख होती है! पूरक शब्द प्रायः संज्ञा और विशेषण होते हैं!

     

    २. सकर्मक क्रिया – वाक्यों की ऐसी क्रियाएँ जिन्हें कर्म की आवश्यकता होती है, उन्हें सकर्मक क्रिया कहते हैं! सकर्मक क्रिया का फल कर्म पर पड़ता है! जैसे – मदन ने गणित पढ़ाया, सुरेश ने कंप्यूटर ख़रीदा आदि! यदि वाक्य में कर्म उपस्थित न भी हो, किंतु क्रिया को उसकी अपेक्षा हो तो वह सकर्मक क्रिया ही होगा! जैसे – नमन पढ़ता है, सौम्या खा रही है!

    सकर्मक क्रिया के भेद – सकर्मक क्रिया के तीन भेद होते हैं – (i) एककर्मक सकर्मक क्रिया  (ii) द्विकर्मक सकर्मक क्रिया  (iii) अपूर्ण सकर्मक क्रिया

    (i) एककर्मक सकर्मक क्रिया – ऐसी सकर्मक क्रियाएँ जिनका एक ही कर्म होता है, उन्हें एककर्मक क्रिया कहते हैं, जैसे – मोहिनी ने पुस्तकें खरीदीं, हम बिड़ला मंदिर देखेंगे!

    (ii) द्विकर्मक सकर्मक क्रिया – ऐसी सकर्मक क्रियाएँ जिनके दो कर्म होते हैं, उन्हें द्विकर्मक सकर्मक क्रिया कहते हैं, जैसे – रमेश ने सुरेश को गणित पढ़ाया, रेशमा ने दुकानदार से चीनी ख़रीदे आदि! द्विकर्मक क्रियाओं का एक कर्म सजीव और दूसरा निर्जीव होता है! इनमें निर्जीव कर्म प्रमुख होता है तथा सजीव गौण!

    (iii) अपूर्ण सकर्मक क्रिया – ऐसी सकर्मक क्रियाएँ जिनमें कर्म रहने पर भी अर्थ अपूर्ण लगते हैं, उन्हें अपूर्ण सकर्मक क्रिया कहते हैं! अपूर्ण सकर्मक क्रिया में कर्म से संबंधित एक पूरक शब्द की आवश्यकता रहती है! जैसे – सुकन्या दीपिका को बहन नहीं समझती! इसमें बहन पूरक शब्द है!

     

    अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं में अंतर –

    (i) अकर्मक क्रियाओं को कर्म की आवश्यकता नहीं होती! सकर्मक क्रियाओं को कर्म की आवश्यकता होती है!

    (ii) वाक्य की क्रिया के साथ ‘क्या’ लगाकर प्रश्न करें! यदि उत्तर में निर्जीव संज्ञा होती है तो वह क्रिया सकर्मक होती है!

    (iii) वाक्य की क्रिया के साथ ‘क्या’ लगाकर प्रश्न करें, यदि उत्तर में संज्ञा शब्द नहीं मिलता है तो क्रिया अकर्मक होती है! अकर्मक क्रिया में कुछ स्थितियों में प्रश्न नहीं बनता!

    (iv) कुछ क्रियाएँ सदा सकर्मक होती है और कुछ सदा अकर्मक होती है! वाक्य में कर्म रहने पर भी क्रियाएँ अकर्मक हो सकती है; जैसे – माँ पुत्री को समझाती है, पारुल दूध पीती है! इन वाक्यों की क्रियाएँ समझाना और पीना सदा सकर्मक रहती है!

    (v) वाक्यों में आने वाले संज्ञा शब्द कर्म का कार्य नहीं करते! कई बार ये शब्द स्थानवाचक क्रिया-विशेषण का रूप ले लेते हैं! इसलिए ऐसे वाक्यों की क्रियाएँ अकर्मक रहती है; जैसे – महेश भोपाल चला गया! इसमें भोपाल संज्ञा होने पर भी स्थानवाचक क्रिया विशेषण का कार्य कर रहे हैं! अतः इन वाक्यों की क्रियाएँ अकर्मक हैं!

     

    संरचना के आधार पर क्रिया के भेद – संरचना के आधार पर क्रिया के तीन भेद होते हैं – १. प्रेरणार्थक क्रिया  २. संयुक्त क्रिया  ३. समापिका – असमापिका क्रिया

    १. प्रेरणार्थक क्रिया (Causal Verb) – ऐसी क्रियाएँ जिन्हें कर्ता स्वयं नहीं करता अपितु दूसरों से कराता है या करने की प्रेरणा देता है, उन्हें प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं! जैसे – अश्विनी क्लर्क से पत्र टाइप कराता है! इसमें दो कर्ता होता है – (i) प्रेरक कर्ता – ऐसे कर्ता जो कार्य करने की प्रेरणा देते हैं, उन्हें प्रेरक कर्ता कहते हैं! (ii) प्रेरित कर्ता – ऐसे कर्ता जो प्रेरणा ग्रहण करके कार्य करते हैं, उन्हें प्रेरित कर्ता कहते हैं!

    प्रेरणार्थक क्रिया के भेद – (i) प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया (ii) द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया

    (i) प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया – ऐसी क्रियाएँ जिनमें कर्ता शामिल होकर दुसरे को कार्य करने की प्रेरणा देता है, उन्हें प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं, जैसे – पल्लवी पारुल को सुलाती है, मदारी भालू को नचाता है!

    (ii) द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया – ऐसी क्रियाएँ जिनमें कर्ता स्वयं सम्मिलित न होकर दूसरों को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, उन्हें द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं! ये क्रियाएँ द्विकर्मक क्रियाएँ होती हैं, जैसे – अधयापक महेश से कहानी सुनवाता है, गगन बहू से फोन करवाता है!

    और पढ़ें : क्रिया के रूप, काल, काल के भेद, पक्ष, वृति, वाच्य और वाच्य के भेद

     

    २. संयुक्त क्रिया (Compound Verb) – वाक्य में क्रिया पद के भीतर एक से अधिक क्रियाएँ भी आती है; जैसे – दिखाई दिया, बैठ गई आदि! इन क्रिया पदों को संयुक्त क्रिया कहते हैं! इनमें दिखाई, बैठ मूल क्रियाएँ हैं जो कोशीय अर्थ देती है! दिया, गई क्रियाएँ रंजक क्रियाएँ हैं, जो कोशीय अर्थ को रंजित करती हैं अर्थात् विशेष अर्थच्छाया देती है! इस प्रकार दो स्वतंत्र अर्थ देने वाली क्रियाएँ जब मुख्य क्रिया और रंजक क्रिया के रूप में एक साथ मिल जाती है तब उन्हें संयुक्त क्रिया कहते हैं!

    रंजक क्रिया – ऐसी क्रियाएँ जो प्रमुख क्रिया के प्रभाव में वृद्धि करती है, रंजक क्रिया कहलाती है! रंजक क्रिया प्रमुख क्रिया के पश्चात आती है!

    संयुक्त क्रिया के अन्य लक्षण –

    (i) कहीं कहीं संयुक्त क्रिया के दोनों पदों का क्रम तथा रूप बदलने पर अर्थ में परिवर्तन आ जाता है!

    (ii) निषेधात्मक वाक्यों में मुख्य क्रिया के साथ रंजक क्रिया नहीं लगती; जैसे – सुरेश ने काम कर लिया – सुरेश में काम नहीं किया!

    (iii) संयुक्त क्रिया में ‘सकना’ और ‘चुकना’ जैसी क्रियाएँ रंजक क्रिया के रूप में प्रयुक्त होती है! वास्तव में ये रंजक क्रियाएँ नहीं हैं और न ही इनका कोई स्वतंत्र अर्थ होता है! किंतु ये मुख्य क्रिया के साथ जुड़कर क्रिया के सामर्थ्य, पूर्णता आदि का बोध कराती है; जैसे – गणेश यह काम कर सकता है!

     

    ३. समापिका क्रिया और असमापिका क्रिया –

    समापिका क्रिया – सरल वाक्य में जो क्रिया वाक्य को समाप्त करती है और प्रायः वाक्य के अंत में रहती है, उसे समापिका क्रिया कहते हैं! जैसे – सचिन खिलाड़ी है! मैं पत्र लिखूंगा!

    असमापिका क्रिया – वाक्य में जो क्रिया विधेयगत क्रिया के स्थान पर प्रयुक्त न होकर अन्य स्थान पर प्रयुक्त होती है, उसे असमापिका क्रिया कहते हैं! इन्हें कृदंती रूप भी कहा जाता है! यह क्रिया समापिका क्रिया के लिए निर्धारित स्थान पर प्रयुक्त नहीं होती है! जैसे – प्रशांत ने घर आकार भोजन किया!

    कृदंत मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

    (i) अपूर्ण कृदंत (ii) पूर्ण कृदंत (iii) पूर्वकालिक कृदंत (iv) कृदंतीय संज्ञा (v) कृदंतीय क्रिया-विशेषण (vi) कर्तावाचक कृदंत (vii) तात्कालिक कृदंत

     

    कृदंत क्रिया (Suffix-ending Verb) – क्रिया के अंत में प्रत्यय लगाकर जो क्रियाएँ बनती है, उन्हें ‘कृदंत क्रिया’ कहते हैं; जैसे – उड़+ई=उड़ी!

    कृदंत क्रिया के भेद – (i) वर्तमान की कृदंत क्रिया  (ii) भूतकाल की कृदंत क्रिया  (iii) पूर्वकालिक कृदंत क्रिया  (iv) तात्कालिक कृदंत क्रिया

    (i) वर्तमानकालिक कृदंत क्रिया – मूल क्रिया में ता, ती, ते प्रत्यय लगाकर वर्तमानकालिक कृदंत क्रियाएँ बनाई जाती है, इन क्रियाओं द्वारा वर्तमान काल का बोध होता है! जैसे – उग+ता=उगता!

    (ii) भूतकालिक कृदंत क्रिया – मूल क्रिया में आ, ई, ईं, ए प्रत्यय लगाकर भूतकालिक कृदंत क्रियाएँ बनाई जाती है! इन क्रियाओं द्वारा वर्तमान काल का बोध होता है! इन क्रियाओं को पूर्ण कृदंत भी कहा जाता है! जैसे – ज़ाग+ए=जागे!

    (iii) पूर्वकालिक कृदंत क्रिया – मूल क्रिया में कर प्रत्यय लगाकर पूर्वकालिक कृदंत क्रिया बनाते हैं, यह मुख्य क्रिया से पहले आती है! जैसे – सुषमा पढ़कर परिक्षा देने गई!

    (iv) तात्कालिक कृदंत क्रिया – मूल क्रिया में ते प्रत्यय लगाकर तात्कालिक कृदंत क्रिया की रचना की जाती है! इस क्रिया के तुरंत बाद ही शब्द का प्रयोग किया जाता है! जैसे – पतंग उड़ाते ही कट गई!

     

    भावसूचक क्रिया – जिन क्रियाओं के द्वारा कार्य की संभावना, संदेह, संकेत, आज्ञा और निश्चय का बोध होता है, उन्हें भावसूचक क्रिया कहते हैं! इन्हें वृत्ति, अर्थ और रीती भी कहते हैं! भावसूचक क्रिया के प्रमुख भेद –

    (i) निश्चय सूचक – क्रिया के जिस रूप से कार्य के निश्चय का बोध होता है, उसे निश्चय सूचक कहते हैं, जैसे – गीता भाई के साथ गोरखपुर गई!

    (ii) संभावना सूचक – क्रिया के जिस रूप से कार्य के होने की संभावना का बोध होता है, उसे संभावना सूचक कहते हैं, जैसे – आज शायद उत्तर पुस्तिकाएँ मिलें!

    (iii) संदेह सूचक – क्रिया के जिस रूप से कार्य के होने के संबंध में संदेह हो, उसे संदेह सूचक कहते हैं, जैसे – दादी घर पहुँच चूकी होगी!

    (iv) संकेत सूचक – जिन क्रियाओं के कार्य कारण संबंध होता है, उन्हें संकेत सूचक कहते हैं; जैसे – रीमा झगड़ा करेगी तो पछताएगी!

    (v) आज्ञा सूचक – जिन क्रियाओं से आज्ञा, स्वीकृति, चेतावनी, इच्छा, अनुरोध और उपदेश आदि का बोध होता है, उसे आज्ञा सूचक कहते हैं; जैसे – फाइल रखकर चले जाओ, कृपया हमारे पास आइए!

     

    क्रिया के कुछ अन्य भेद –

    (i) नामिक क्रिया/ नामधातु क्रिया – नामिक क्रियाओं में आने वाली धातुएं नामधातु कही जाती है! संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण शब्दों में प्रत्यय लगाकर जो क्रियाएँ बनती हैं, उन्हें नामिक या नाधातु क्रिया कहा जाता है; जैसे शरम से शरमाना, फिल्म से फिल्माना आदि!

    (ii) सहायक क्रियाएँ (Auxiliary Verb) – वाक्य में मुख्य क्रिया को छोड़कर क्रिया का जो भी अंश शेष रह जाता है, वह सहायक क्रिया का होता है; जैसे – चोर भाग गया!

    (iii) पूर्वकालिक क्रिया – मुख्य क्रिया से पूर्व होने वाली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है! इसमें कर का प्रयोग होता है; जैसे – मैं नहाकर पढूंगा!

    (iv) संयोजी क्रियाएँ – ये क्रियाएँ मुख्य क्रिया के पक्ष, वृत्ति तथा वाच्य की सूचना प्रदान करती है; जैसे – अब वह पढ़ने लगा है, सोहन बहुत रो रहा है, किताब पढ़ी जा रही है!

    और पढ़ें (Next Post) : अव्यय, क्रिया विशेषण, समुच्चयबोधक, संबंधबोधक, विस्मयादिबोधक और निपात

     

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  • विशेषण किसे कहते हैं, विशेषण के भेद और विशेषणों की तुलना

    विशेषण किसे कहते हैं, विशेषण के भेद और विशेषणों की तुलना

    संज्ञा और सर्वनाम की विशेषता बताने वाले पद को विशेषण ( Visheshan ) कहते हैं! विशेषण पद जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है, उसे ‘विशेष्य’ कहते हैं! विशेषण विशेष्य से पहले भी आ सकता है और बाद में भी! विशेष्य से पूर्व आने वाले विशेषण उद्देश्य विशेषण कहलाते हैं! तथा विशेष्य के बाद में आने वाले विशेषण विधेय विशेषण कहलाते हैं! जैसे – चतुर बालक काम कर लेते हैं (उद्देश्य विशेषण), यह बालक चतुर है (विधेय विशेषण)!

     

    प्रविशेषण ( Pravisheshan ) – जो शब्द विशेषण शब्दों की विशेषता प्रकट करते हैं, उन्हें प्रविशेषण कहते हैं! सामान्यतः प्रचलित प्रविशेषण हैं – बहुत, सबसे, अधिक, अत्यधिक, अत्यंत, बड़ा, खूब, बिलकुल, थोड़ा, कम, ठीक, पूर्ण, लगभग आदि!

     

    विशेषण के भेद (Kinds of Adjectives) – विशेषण चार प्रकार के होते हैं!

    1. गुणवाचक विशेषण (Qualitative Adjective)
    2. संख्यावाचक विशेषण (Numeral Adjective)
    3. परिणामवाचक विशेषण (Quantitative Adjective)
    4. सार्वनामिक विशेषण (Demonstrative Adjective)

     

    १. गुणवाचक विशेषण – ऐसे विशेषण शब्द जिनके द्वारा संज्ञा और सर्वनाम शब्दों के गुण, दोष, रंग, रूप, आकार और स्थान आदि का बोध होता है, उन्हें गुणवाचक विशेषण कहते हैं! जैसे – वह अच्छा लड़का है! गुणवाचक विशेषणों द्वारा संज्ञा और सर्वनाम शब्दों के दशा, दिशा, काल, स्वाद, रंग, स्थान, गुण, दोष, अवस्था, आकार, स्पर्श, गंध जैसे विशेषताओं का बोध होता है!

     

    २. संख्यावाचक विशेषण – ऐसे विशेषण शब्द जिनसे संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की संख्या की विशेषता का बोध होता है, उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं! जैसे – रमेश दसवीं कक्षा में पढ़ता है! संख्यावाचक विशेषण के दो भेद होते हैं –

    (i) निश्चित संख्यावाचक विशेषण – जो विशेषण, संज्ञा सर्वनाम शब्दों की संख्या संबंधी निश्चित विशेषता का बोध कराती है, उन्हें निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते है! – कोहली ने सौ रन बनाए! इससे संज्ञा सर्वनाम की गणना, क्रम, आवृति, समूह, समुच्चय, प्रत्येक आदि विशेषताओं का बोध होता है!

    (ii) अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण – जो विशेषण संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की संख्या संबंधी विशेषता का निश्चित बोध नहीं कराते, उन्हें अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं! जैसे – कोई, कुछ, अनेक, लाखों आदि!

     

    ३. परिमाणवाचक विशेषण – ऐसे विशेषण शब्द जिनसे संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की नाप तौल संबंधी विशेषता का बोध होता है, उन्हें परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं! जैसे – मोहन ने तीन किलो चीकू ख़रीदे! परिमाणवाचक विशेषण के दो भेद होते हैं –

    (i) निश्चित परिमाणवाचक विशेषण – जो विशेषण संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की परिमाण संबंधी निश्चित विशेषता का बोध कराते हैं उन्हें निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं! जैसे – एक किलो दूध, तीन मीटर कपड़ा!

    (ii) अनिश्चित परिणामवाचक विशेषण – जो विशेषण संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की परिभाषा संबंधी विशेषता का निश्चित बोध नहीं कराते उन्हें अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं; जैसे – थोड़ी सी चीनी, ज्यादा नमक आदि!

     

    ४. सार्वनामिक विशेषण – ऐसे सर्वनाम जो संज्ञा शब्दों के पहले आकर विशेषण का कार्य करते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं! जैसे – मेरी अध्यापिका, यह दुकान, कौन आदमी आदि!

    सार्वनामिक विशेषण के ये रूप हो सकते हैं – (i) निश्चयवाचक/ संकेतवाचक सार्वनामिक विशेषण – उस किताब, यह कलम आदि! (ii) अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण – कोई सज्जन, कुछ चीज आदि! (iii) प्रश्नवाचक सार्वनामिक विशेषण – कौन आदमी, कौन सी किताब आदि! (iv) संबंधवाचक सार्वनामिक विशेषण – जो-वो, वह-जिसने आदि!

     

    निश्चयवाचक सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण में अंतर –

    इन दोनों में शुक्षम अंतर है! निश्चयवाचक सर्वनाम किसी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, घटना आदि की निश्चितता का बोध कराता है, जबकि सार्वनामिक विशेषण से व्यक्ति, वस्तु, प्राणी आदि की विशेषता प्रकट होती है!

     

    विशेषण ( Visheshan ) की रूप रचना –

    विशेषण की रूप रचना संज्ञा की रूप रचना से प्रयाप्त मिलती है! दोनों में रूपावली वर्ग निर्धारण लिंग और शब्द के ध्वन्यात्मक स्वरुप पर होता है, तथा रूपावली वचन तथा विभक्ति के अनुसार चलता है! जैसे – अच्छा – अच्छी – अच्छे आदि!

     

    विशेषणों की तुलना (Degree of Comparison) –

    तुलना करने की दृष्टि से विशेषणों की तीन अवस्थाएँ होती हैं –

    (i) मुलावस्था (Positive Degree) – मुलावस्था में विशेषणों का सामान्य प्रयोग होता है! इस स्थिति में विशेषण तुलना नहीं करते; जैसे – रश्मि ने सुन्दर चित्र बनाए!

    (ii) उत्तरावस्था (Comparative Degree) – उत्तरावस्था में दो वस्तुओं, प्राणियों आदि के गुण दोषों की तुलना की जाती है! इसमें एक संज्ञा शब्द को दुसरे संज्ञा शब्द से श्रेष्ठ ये हिन दिखाया जाता है! इसके लिए से, से कम, से अधिक, की अपेक्षा, से कहीं और से बढ़कर आदि शब्द प्रयोग में लाए जाते हैं! जैसे – सिमरन बहन से डरपोक है!

    (iii) उत्तमावस्था (Superlative Degree) – उत्तमावस्था में अनेक वस्तुओं और प्राणियों आदि में तुलना की जाती है! इसमें किसी एक को सबने श्रेष्ठ या सबसे कम दर्शाया जाता है! उत्तमावस्था में सर्वश्रेष्ठ, सबमें, सबसे बढ़कर, सर्वाधिक, सभी से आदि शब्द प्रयुक्त होते हैं! जैसे – इनमें रमेश सर्वश्रेष्ठ कवि हैं!

    तुलनात्मक अवस्थाओं के रूप – संस्कृत और हिंदी के साथ ‘तर’ और ‘तम’ प्रत्यय लगाकर तुलनात्मक विशेषण शब्द बनाए जाते हैं; जैसे – मधुर – मधुरतर – मधुरतम, न्यून – न्यूनतर – न्यूनतम आदि!

     

    विशेषण शब्दों की रचना – मूल विशेषण शब्द बहुत कम हैं! विशेषणों की रचना अन्य शब्दों से हुई है! संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया और अव्यय शब्दों के साथ उपसर्ग और प्रत्यय लगाकर विशेषण शब्द बनाए जाते हैं! जैसे – पुलक – पुलकित, पल्लव – पल्लवित, कल्पना – काल्पनिक, चिंता – चिंतित, सुगंध – सुगंधित, आत्मा – आत्मिक आदि! विशेषण शब्द लिंग,  वचन  और  कारक की दृष्टि से बदल जाते हैं! जैसे – काला – काली – काले आदि!

    और पढ़ें (Next Topics) : क्रिया, धातु, पहचान, क्रिया के भेद और कृदंत क्रिया

     

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  • सर्वनाम किसे कहते हैं, सर्वनाम के भेद और सर्वनामों का रूप परिवर्तन

    सर्वनाम किसे कहते हैं, सर्वनाम के भेद और सर्वनामों का रूप परिवर्तन

    ‘सर्वनाम’ का शाब्दिक अर्थ है – सब का नाम! अर्थात् जो शब्द सबके नाम के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सर्वनाम कहते हैं! सर्वनाम का प्रयोग करके हम एक ही संज्ञा शब्द को बार बार प्रयोग करने से बचते हैं! ऐसे शब्द जो संज्ञा शब्दों के स्थान पर प्रयोग में लाए जाते हैं, सर्वनाम कहलाते हैं! सर्वनाम शब्दों का प्रयोग संज्ञा शब्दों के पुनरावृत्ति से बचने के लिए किया जाता है! अनुच्छेद में बार बार एक ही संज्ञा शब्द का प्रयोग करने से भाषा का सौंदर्य नष्ट होता है!

     

    सर्वनाम के भेद (Kinds of Pronouns) – सर्वनाम के छह भेद होते हैं!

    1. पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal Pronoun)
    2. निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative Pronoun)
    3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite Pronoun)
    4. प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun)
    5. निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun)
    6. संबंधवाचक सर्वनाम (Relative Pronoun)

     

    १. पुरुषवाचक सर्वनाम – पुरुषवाचक सर्वनाम व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं! इनका प्रयोग तीन रूपों में होता है!

    (क) उत्तम पुरुष (First Person) – ऐसे सर्वनाम जिनका प्रयोग वक्ता या लेखक स्वयं के लिए करता है, उन्हें उत्तम पुरुष कहते हैं! इन वाक्यों में ‘मैं, हम, मेरा, हमारा, मैंने, हमें, हमने’ ला प्रयोग होता है! जैसे – मैं खाना खाऊंगा! हमें प्रथम पुरस्कार मिला!

    (ख) मध्यम पुरुष (Second Person) -ऐसे सर्वनाम जिनका प्रयोग सुननेवाले और पढ़नेवाले के लिए होता है, उन्हें मध्यम पुरुष कहते हैं! तु, तुम, तुमने, तुम्हें, तेरा, तुम्हारा, तुमको और तुझसे श्रोता या पाठक के लिए प्रयोग किया जाता है!

    (ग) अन्य पुरुष (Third Person) – ऐसे सर्वनाम जिनका प्रयोग वक्ता और श्रोता किसी अन्य के लिए करते हैं, उन्हें अन्य पुरुष कहते हैं! वह, वे, उसे, उसके, उन्हें, उन्होंने, उनको और उसमें का प्रयोग अन्य पुरुष के लिए किया जाता है!

     

    २. निश्चयवाचक सर्वनाम – जिन सर्वनाम से दूरवर्ती अथवा समीपवर्ती व्यक्तियों, प्राणियों, वस्तुओं और घटनाओं का निश्चित बोध होता है, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं; जैसे – सब्जियां उसमें पड़ी है! इन वाक्यों में वह, वे, उसमें, उससे, यह और वह का प्रयोग किया जाता है!

     

    ३. अनिश्चयवाचक सर्वनाम – जिस सर्वनाम से किसी निश्चित व्यक्ति, प्राणी या वस्तु का बोध नहीं होता है, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं! इन वाक्यों में ‘कोई, कुछ, किसी’ आदि का प्रयोग होता है! जैसे दूध में कुछ पड़ गया!

     

    ४. प्रश्नवाचक सर्वनाम – ऐसे सर्वनाम जिनसे किसी प्राणी, वस्तु, व्यक्ति और कार्य आदि के विषय में प्रश्न का बोध होता है, उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं! इन वाक्यों में ‘कौन, किसने, क्या, किसे, किससे, किनको, किससे’ आदि प्रश्नवाचक सर्वनाम का प्रयोग होता है! जैसे – चाचा ने किसे बुलाया?

     

    ५. निजवाचक सर्वनाम – जो सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम के अपनेपन का बोध कराता है, वह निजवाचक सर्वनाम कहलाता है! इन वाक्यों में ‘स्वयं, आप, स्वतः और खुद आदि जैसे शब्द सर्वनाम के तौर पर प्रयुक्त होते हैं! जैसे – मैं स्वयं कर लूँगा!

     

    ६. संबंधवाचक सर्वनाम – दो उपवाक्यों का आपस में संबंध स्थापित करने वाले सर्वनाम शब्दों को संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं! इन वाक्यों में जैसा-वैसा, जो-वह, जिसने-उसने, वह-जो, जिसको-वह आदि संबंधबोधक सर्वनाम प्रयुक्त किए जाते हैं; जैसे – जैसा कहा था वैसा ही किया!

     

    सर्वनाम और विशेषण में अंतर – निश्चयवाचक सर्वनाम (यह, वह), अनिश्चयवाचक सर्वनाम (कोई, कुछ) तथा प्रश्नवाचक (कौन, क्या) आदि सर्वनाम सार्वनामिक विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त हो सकते हैं! अतः दोनों में अंतर समझना आवश्यक है! कौन रो रहा है? – सर्वनाम है जबकि, कौन लड़का रो रहा है? – विशेषण! सर्वनाम का अपना कोई लिंग नियम नहीं है, वाक्य में संज्ञा के लिए जिस लिंग का प्रयोग होता है, उसके लिए प्रयुक्त सर्वनाम के लिए भी उसी लिंग का प्रयोग होता है!

     

    सर्वनाम शब्दों की रूप संरचना – पुरुषवाचक सर्वनाम में परसर्ग लगने पर अधिकतर सर्वनामों में परिवर्तन हो जाता है; जैसे – उसने, इन्होनें, मुझको, तुझको, मैंने, तुमने, हमने, आपने आदि! सर्वनामों का रूप अलग अलग कारकों के वचन के कारण बदल जाते हैं! जैसे – मैं, मुझे, मुझसे, मुझको, मेरा, मुझमें, हम, हमें, हमसे, हमको, हमसे आदि!

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  • संज्ञा किसे कहते हैं, संज्ञा के भेद, संज्ञा के विकार, वचन, कारक और लिंग

    संज्ञा किसे कहते हैं, संज्ञा के भेद, संज्ञा के विकार, वचन, कारक और लिंग

    संज्ञा ( Sangya ) वे शब्द हैं, जो किसी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, स्थान, विचार या भाव आदि का बोध कराते हैं! जैसे – राकेश, गंगा, गाय, सेब गरीबी आदि! निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर संज्ञा पदों को पहचाना जा सकता है –

    १. कुछ संज्ञा पद प्राणिवाचक होते हैं और कुछ अप्राणिवाचक! प्राणिवाचक हैं – बच्चा, भैंस, चिड़िया, राकेश आदि! अप्राणिवाचक हैं – किताब, मकान, रेलगाड़ी, पर्वत आदि!

    २. कुछ संज्ञा शब्दों की गिनती की जा सकती है और कुछ की गिनती नहीं की जा सकती; जैसे – आदमी, पुस्तक आदि की गणना की जा सकती है, इसलिए ये गणनीय संज्ञाएँ हैं! दूध, हवा, प्रेम की गणना नहीं की जा सकती, इसलिए ये अगणनीय संज्ञाएँ हैं!

    ३. संज्ञा पद के बाद परसर्ग (ने, को, से, के लिए, में, पर आदि) आ सकते हैं; जैसे – राम ने, मोहन को, लकड़ी के लिए, ऊंचाई पर!

    ४. संज्ञा ( Sangya ) पद से पूर्व विशेषण का प्रयोग हो सकता है; जैसे – छोटी कुर्सी, काला घोड़ा, अच्छा लड़का आदि! परसर्ग या विशेषण न होने पर भी संज्ञा पद किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भाव के नाम के कारण पहचाना जा सकता है; जैसे – मोहन जाता है!

     

    संज्ञा के कार्य (Functions of Noun) – वाक्य में संज्ञा पद कर्ता, कर्म, पूरक, करण, अपादान, अधिकरण आदि कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाता है; जैसे – चित्रिशा खेल रही है! वह पुस्तक पढ़ रहा है! रमेश विद्यार्थी है, आदि!

     

    संज्ञा के भेद (Sangya Ke bhed : Kinds of Noun) –

    मुख्य रूप से संज्ञा के तीन भेद माने जाते हैं –

    १. व्यक्तिवाचक संज्ञा  २. जातिवाचक संज्ञा  ३. भाववाचक संज्ञा

    लेकिन बाद में संज्ञा के दो और भेद भी माने जाने लगे – ४. द्रव्यवाचक संज्ञा  ५. समुदायवाचक संज्ञा

     

    व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun) – जिस संज्ञा पद से किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु के नाम का बोध हो, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं! जैसे – रवि, कामधेनु, गंगा, हिमालय, भारत आदि!

    जातिवाचक संज्ञा (Common Noun) – जिस संज्ञा पद से किसी जाति या वर्ग के सभी प्राणियों, वस्तुओं या स्थानों का बोध हो, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं; जैसे – आदमी, गाय, शहर, मेज, नदी, पहाड़ आदि!

    भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) – जिन संज्ञा शब्द से प्राणियों, मनुष्यों और वस्तुओं के गुण, दोष, स्वभाव, अवस्था, स्थिति, कार्य, भाव और दशा आदि का ज्ञान होता है, उन्हें भाववाचक संज्ञा कहते हैं; जैसे – मानवता, राष्ट्रीयता, बचपन, चोरी, ममता, सहायता, मुस्कान आदि!

    द्रव्यवाचक संज्ञा (Material Noun) -किसी पदार्थ या द्रव्य का बोध कराने वाले शब्दों को द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं; जैसे – सोना, चाँदी, लकड़ी, चावल, अन्न, तेल आदि!

    समुदायवाचक/समूहवाचक संज्ञा (Collective Noun) – बहुत से शब्द किसी एक व्यक्ति के वाचक न होकर समूह के वाचक होते हैं! इनमें उनके समूह का ज्ञान होता है! जैसे – सेना, पुलिस, कक्षा, परिवार, सभा आदि! ये शब्द सजातीय प्राणियों/वस्तुओं के समूह को एक इकाई के रूप में प्रकट करते हैं, अतः ये एकवचन होते हैं!

     

    संज्ञा के भेदों का परिवर्तन – व्यक्तिवाचक, जातिवाचक और भाववाचक संज्ञाएँ कई बार एक दुसरे के स्थान पर प्रयुक्त हो जाती है! जैसे – देश को हानि जयचंदों से होती है! जयचंद व्यक्तिवाचक संज्ञा है, लेकिन यहाँ जातिवाचक के रूप में इस्तेमाल किया गया है! लौहपुरुष के दृढ संकल्प ने भारत को एकरूपता प्रदान की, आदि!

     

    संज्ञा के विकार (Sangya Ke Vikar : Declension of Noun) –

    संज्ञा एक विकारी पद है! इसका प्रयोग करते समय इसके रूपों में लिंग, वचन और कारक के कारण विकार या परिवर्तन आ जाता है!

     

    लिंग किसे कहते हैं, लिंग की पहचान और लिंग परिवर्तन के नियम :

    लिंग ( Ling : Gender ) – लिंग का अर्थ है -‘चिह्न’! हिंदी में लिंग का व्याकरणिक महत्व है, क्योंकि इसके कारण शब्द का रूप बदलता है; जैसे -लड़का दौड़ता है! लड़की दौड़ती है! इस प्रकार लिंग संज्ञा का वह लक्षण है जो संज्ञा के पुरुषवाची या स्त्रीवाची होने का बोध कराता है! हिंदी में लिंग ( Ling ) के दो भेद हैं – (i) पुल्लिंग  (ii) स्त्रीलिंग

    जीव जगत में लिंग का भेद प्राकृतिक है, किंतु भाषा में इसे व्याकरण की दृष्टि से देखना अपेक्षित है! प्राणिवाचक संज्ञा शब्दों में लिंग की पहचान उसके नर या मादा होने के कारण सरलता से हो जाती है, किंतु अप्राणिवाचक संज्ञा शब्दों में लिंग की पहचान उसके साथ लगने वाली क्रिया और विशेषण पद से ही हो सकती है! जैसे –

    आदमी भोजन कर रहा है (प्राकृतिक लिंग भेद)

    औरत खाना बना रही है (प्राकृतिक लिंग भेद)

    कूलर चल रहा है (क्रिया से पहचान)

    बिजली जल रही है (क्रिया से पहचान)

    यह बड़ा कमरा है (विशेषण से पहचान)

    (i) पुल्लिंग (Masculine Gender) – ऐसे शब्द जिनसे पुरुष जाति का बोध होता है, उन्हें पुल्लिंग कहते हैं! जैसे – केला, दुकानदार, स्कूटर, बस्ता, अधयापक, वायुयान, टेलीविजन, लड़का आदि!

    (ii) स्त्रीलिंग (Feminine Gender) – वे शब्द जिनसे स्त्री जाती का बोध होता है, उन्हें स्त्रीलिंग कहते हैं; जैसे – पुस्तक, साड़ी, कमीज, दीवार, गली, पतंग, बंदूक, फुलवारी आदि!

     

    लिंग की पहचान ( Ling Ki Pahchan : Identification of Gender ) –

    प्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंग की पहचान – प्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंग की पहचान उनकी शारीरिक संरचना से हो जाती है! जैसे – लड़का, युवक, वृद्ध, शेर, चीता, घोड़ा, गधा, सांड, बंदर – इनकी शारीरिक संरचना से इनके पुल्लिंग होने का पता चलता है! चिड़िया, गधी, गाय, स्त्री, लड़की, बूढी, बंदरिया, हथिनी – इनकी शारीरिक संरचना से इनके स्त्रीलिंग होने का पता चलता है!

    सदा पुल्लिंग रहने वाले शब्द – कौआ, गीदड़, उल्लू, बगुला, जिराफ, गैंडा, मच्छर, लंगूर, खरगोश आदि!

    सदा स्त्रीलिंग रहने वाले शब्द – कोयल, गिलहरी, भेड़, चमगादड़, मक्खी, मैना, मछली आदि!

    पदनाम सदैव पुलिंग में होते हैं, चाहे उन पदों पर बैठा व्यक्ति पुरुष हो या स्त्री!

    ये शब्द उभयलिंगी हो गए हैं, इनके लिंग क्रिया द्वारा ही निर्धारित होते हैं – राजदूत, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, कुलपति, राष्ट्रपति, इंजिनियर, प्रोड्यूसर, फोटोग्राफर, रिपोर्टर, डॉक्टर, प्रोफेसर, सचिव, सभापति आदि!

    नर या मादा लगाकर लिंग का निर्धारण – कुछ संज्ञा शब्दों में लिंग में भेद करने के लिए उनसे पहले नर या मादा शब्द लगा देते हैं! जैसे – नर मछली, नर कोयल, नर गिलहरी, मादा उल्लू, मादा बगुला आदि!

     

    अप्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंग की पहचान – अप्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंग के विषय में निश्चित नियम नहीं है! इनका प्रयोग परंपरा से जिस लिंग के अनुसार होता चला आ रहा है, वही मान्य है! अप्राणिवाचक संज्ञा शब्दों के परंपरानुसार कुछ नियम प्रचलित है!

     

    सदा पुल्लिंग ( Pulling ) रहने वाले शब्द –

    1. दिनों के नाम – सोमवार, मंगलवार, बुधवार आदि!
    2. महीनों के नाम – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आदि!
    3. समयसूचक नाम – पहर, पल, क्षण, सेकंड, मिनट, घंटा, दिन, महिना, वर्ष आदि!
    4. फलों के नाम – केला, संतरा, आम, तरबूज, जामुन आदि (लीची, खजूर -स्त्रीलिंग)
    5. तरल पदार्थों के नाम – पानी, तेल, पेट्रोल, दूध आदि (लस्सी, ठंडाई – स्त्रीलिंग)
    6. रत्न और धातुओं के नाम – मूंगा, पुखराज, मोगध, हीरा, लोहा, पीतल आदि (चाँदी-स्त्रीलिंग)
    7. अनाजों के नाम – चावल, गेहूँ, बाजरा, मक्का, चना आदि!
    8. वृक्षों के नाम – अशोक, आम, जामुन, बेर, अमरुद आदि (इमली – स्त्रीलिंग)
    9. देशों के नाम – वियतनाम, मलेशिया, ईरान, नेपाल, मॉरिशस आदि!
    10. पर्वतों के नाम – अरावली, हिमालय, आल्प्स, शिवालिक, हिमालय विंध्य आदि!
    11. समुदों के नाम – हिंद महासागर, अरब सागर, प्रशांत महासागर आदि!
    12. ग्रहों के नाम – मंगल, राहु, बुध, शनि आदि (पृथ्वी – स्त्रीलिंग)
    13. जल के स्थानों के नाम – तालाब, कुआँ, नलकूप, झरना, समुद्र आदि! (नदी, नहर, झील – स्त्रीलिंग)
    14. स्थानों के नाम – मोहल्ला, टोला, गाँव, बाजार, शहर, प्रांत, राज्य, देश आदि! (गली – स्त्रीलिंग)
    15. वर्ण – इ, ई, ऋ, ए, ऐ के अतिरिक्त शेष सभी वर्ण पुल्लिंग!
    16. शरीर के अंगों के नाम – सिर, माथा, नाक, कान, गाल, मुंह, दांत, कंधा आदि!
    17. जिन अप्राणिवाचक संज्ञाओं के अंत में पन, वाला, त्व, त्र, आय, आस, आप, ऐरा, आ, आवा और दान आते हैं; जैसे – चायवाला, नटखटपन, अमरत्व, नेत्र, अध्याय लुटेरा आदि!
    18. अंत में ‘अ’ आने वाले शब्द प्रायः पुल्लिंग होते हैं; जैसे – नयन, पवन, कमल, फूल, भाषण, बचपन आदि!

     

    सदा स्त्रीलिंग ( Striling ) रहने वाले शब्द :

    1. बोलियों के नाम – अंगिका, राजस्थानी, मंडियाली, भोजपुरी, मगही आदि!
    2. भाषाओँ के नाम – हिंदी, संस्कृत, मराठी, पंजाबी, नेपाली, फ्रेंच, अंग्रेजी, फारसी आदि!
    3. लिपियों के नाम – देवनागरी, गुरुमुखी, अरबी, रोमन आदि!
    4. झीलों के नाम – नैनी, डल, मानसरोवर आदि!
    5. नदियों के नाम – सतलुज, रावी, ब्यास, यमुना, गंगा, गोदावरी आदि (ब्रह्मपुत्र – पुल्लिंग)
    6. आहारों के नाम – खिचड़ी, रोटी, चपाती, दाल, कढ़ी, कचौड़ी, इडली आदि!
    7. किराने की वस्तुएँ – चीनी, इलायची, अरहर, मूँग, सौंफ, मिर्च आदि!
    8. शरीर के अंगों के नाम – आँख, नाक, थोड़ी, गर्दन, छाती, जाँघ, बाँह, उँगलियाँ टाँग आदि!
    9. बर्तनों के नाम – थाली, कटोरी, चम्मच, प्लेट, कढ़ाई आदि!
    10. महीनों के नाम – जनवरी, फरवरी, मई, जुलाई!
    11. आभूषणों के नाम – माला, अँगूठी, चूड़ी, कंठी, बाली आदि!
    12. अंत में आहट, आवट, आई, आस, ता आने वाली भाववाचक संज्ञाएँ – घबराहट, बुलाहट, गरमाहट, मिलावट, पढाई, कमाई, मिठास, प्यास, ममता, प्रभुता आदि!
    13. अंत में ‘आ, इ, इमा, उ, ति, नि आने वाले संस्कृत शब्द – लज्जा, दया, कृपा, बुद्धि, गति, कालिमा, तनु, रेणु आदि!
    14. अंत में ‘अ, ई, ऊ, ख, त आने वाली संज्ञाएँ; जैसे – बात, रात, लात, चमक, जीवन, खेल, चीख, भीख, ईख, राख, झाड़ू, लू, बाल आदि!

     

    लिंग परिवर्तन – प्रायः पुल्लिंग शब्दों के साथ प्रत्यय लगाने से स्त्रीलिंग शब्द बन जाते हैं! कुछ शब्द सदा स्त्रीलिंग या पुल्लिंग ही रहते हैं, इनके आगे नर या मादा लगाकर उनके पुल्लिंग या स्त्रीलिंग बना लिए जाते हैं! पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के नियम –

    1. पुल्लिंग शब्दों के अंत में आए ‘अ’ और ‘आ’ के स्थान पर ‘ई’ लगाकर – कबूतर – कबूतरी, ब्राह्मण-ब्राह्मणी, गधा-गधी!
    2. अंत में आए ‘अ’ और ‘आ’ के स्थान पर ‘इया’ लगाकर – चूहा – चुहिया, खाट – खटिया!
    3. पुल्लिंग शब्दों के अंत में आए ‘अ’ और ‘आ’ के स्थान पर ‘ई’ लगाकर – मोह्याल – मोहयालिन, लुहार – लुहारिन!
    4. अंत में आए ‘अ’ ‘आ’ और ‘ई’ के स्थान पर ‘इन लगाकर – लाला – ललाइन, चौबे – चौबाइन आदि!
    5. अंत में ‘नी’ लगाकर – जाट – जाटनी, मोर – मोरनी, भाट – भाटनी आदि!
    6. अंत में ‘आ’ लगाकर – अध्यक्ष – अध्यक्षा, अनुज – अनुजा आदि!
    7. अंत में आनी लगाकर – चौधरी – चौधरानी, मेहतर – मेहतरानी आदि!
    8. अंत में आए ‘अक’ के स्थान पर ‘इका’ लगाकर – लेखक – लेखिका, पाठक – पाठिका आदि!
    9. अंत में आए ‘मान’ और ‘वान’ के स्थान पर ‘मती’ और ‘वती’ लगाकर – सत्यवान – सत्यवती, श्रीमान – श्रीमति!
    10. अंत में आए ‘अ’ और ‘ई’ के स्थान पर ‘इनी’ और ‘इणी’ लगाकर – यशस्वी – यशस्विनी, सर्प – सर्पिणी!
    11. अंत में आए ‘ता’ के स्थान पर ‘त्र’ लगाकर – दाता – दात्री, विधाता – विधात्री आदि!
    12. सदा पुल्लिंग रहने वाले शब्दों से पहले ‘मादा’ लगाकर – खरगोश – मादा खरगोश, उल्लू – मादा उल्लू!
    13. सदा स्त्रीलिंग रहने वाले शब्दों से पहले ‘नर’ लगाकर – लोमड़ी – नर लोमड़ी, मक्खी – नर मक्खी!
    14. भिन्न रूप वाले पुल्लिंग-स्त्रीलिंग शब्द लगाकर – राजा – रानी, पति – पत्नी, साधु – साध्वी, सम्राट – सम्राज्ञी, विद्वान् – विदुषी, बादशाह – बेगम, विधुर – विधवा, विलाव – बिल्ली आदि!

     

    वचन क्या है, वचन के भेद और वचन परिवर्तन :

    वचन ( Vachan ) संज्ञा पदों का वह लक्षण है जो एक या अधिक का बोध कराता है; जैसे – घोड़ा – घोड़े, पुस्तक – पुस्तकें आदि! इन वाक्यों को ध्यान से देखें – १. लड़का जाता है!   २. लड़के जाते हैं! इसमें लड़का एक होने का बोध कराता है, जबकि लड़के का प्रयोग बहुवचन में हुआ है!

     

    वचन के भेद (Vachan Ke Prakar : Kinds of Number) – वचन के दो भेद होते हैं – १. एकवचन (Singular)  २. बहुवचन (Plural)

    १. एकवचन – ऐसे शब्द जिनसे एक संख्या का बोध होता है, उन्हें एकवचन कहते हैं; जैसे – पेड़, सड़क, दीवार, गमला आदि!

    २. बहुवचन – ऐसे शब्द जिनसे एक से अधिक संख्याओं का बोध होता है, उन्हें बहुवचन कहते हैं; जैसे – चिड़ियाँ, साइकिलें, मोहल्ले, बच्चे आदि!

     

    वचन ( Vachan ) की पहचान – वचन को दो तरह से पहचाना जाता है; (i) संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण द्वारा  (ii) क्रिया द्वारा

    (i) संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण द्वारा वचन की पहचान – वाक्य में संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण का प्रयोग जिस वचन में होता है, उससे वचन की पहचान होती है, जैसे – युवतियाँ झुला झूलती है! थोड़े बच्चे शोर मचा रहे हैं!

    (ii) क्रिया द्वारा वचन की पहचान – कुछ वाक्यों में वचन की पहचान क्रिया द्वारा होता है, ऐसा तब होता है जब वचन की पहचान संज्ञा आदि से नहीं हो पाती; जैसे – अधयापक पढ़ा रहा है! अधयापक पढ़ा रहे हैं!

     

    सदा एकवचन रहने वाले शब्द – कुछ संज्ञा शब्द सदा एकवचन रहते हैं! इनका प्रयोग सदा एकवचन के रूप में होते हैं; जैसे – भीड़, जनता, आकाश, सोना, दूध, घी, मक्खन, पानी, वर्षा आदि!

     

    सदा वहुवचन रहने वाले शब्द – कुछ संज्ञा शब्द सदा बहुवचन रहते है! इनका प्रयोग सदा बहुवचन के रूप में होता है; जैसे – होश, प्राण, आंसू, हस्ताक्षर, दर्शन, बाल, लोग आदि!

     

    एकवचन शब्दों का बहुवचन के रूप में प्रयोग – कई बार एकवचन शब्दों का प्रयोग बहुवचन के रूप में किया जाता है!

    आदर सम्मान प्रकट करने के लिए एक व्यक्ति के लिए भी बहुवचन का प्रयोग होता है; जैसे – स्वामी कृपाशंकर समय पर पहुँच गए!

    अभिमान प्रकट करने के लिए बहुवचन का प्रयोग किया जाता है; जैसे – हमारी तो बात तो ही कुछ और है! इसमें मेरी की जगह पर हमारी का प्रयोग हुआ है अभिमान प्रकट करने के लिए!

     

    वचन परिवर्तन (Change of Numbers) –

    1. स्त्रीलिंग शब्दों के अंत में आए ‘अ’ का ‘एँ’ होना – राह -रहें, बोतल – बोतलें, बाँह – बाँहें आदि!
    2. स्त्रीलिंग शब्दों के अंत में आए ‘आ’ के साथ ‘एँ’ जोड़कर – लता – लताएँ, गाथा – गाथाएँ, बाला – बालाएँ आदि!
    3. पुल्लिंग शब्दों के अंत में आए ‘आ’ के स्थान पर ‘ए’ लगाकर – बच्चा – बच्चे, पपीता – पपीते, लड़का – लड़के आदि!
    4. स्त्रीलिंग शब्दों के अंत में आए ‘इ’ , ‘ई’ के स्थान पर ‘इयाँ’ लगाकर – चपाती – चपातियाँ, नारी – नारियाँ आदि!
    5. स्त्रीलिंग शब्दों के अंत में आए ‘या’ के स्थान पर ‘याँ’ लगाकर – बुढ़िया – बुढ़ियाँ, लुटिया – लुटियाँ आदि!
    6. संज्ञा शब्दों के अंत में आए ‘अ’ के स्थान पर ‘ओं’ लगाकर – गिटार – गिटारों, अख़बार – अख़बारों आदि!
    7. संज्ञा शब्दों के अंत में आए ‘आ’ के साथ ‘ओं’ लगाकर – कविता – कविताओं, माता – माताओं आदि!
    8. संज्ञा शब्दों के अंत में आए ‘ऊ’ को ‘उ’ में बदलकर और ‘ओं’ लगाकर – पढ़ाकू – पढ़ाकुओ, लड्डू – लड्डुओं आदि!

     

    कारक किसे कहते हैं, कारक के भेद और संज्ञा का रूपांतरण :

    किसी वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम पदों का उस वाक्य की क्रिया से जो संबंध होता है, उसे कारक ( Karak ) कहते हैं! संज्ञाओं का क्रिया से संबंध बताने के लिए कुछ चिह्नों; जैसे – ने, को, से, के लिए, में आदि का प्रयोग हुआ है, इन्हें परसर्ग (कारक-चिह्न) या विभक्ति चिह्न भी कहा जाता है!

     

    कभी कभी कुछ वाक्यों में कुछ शब्दों के साथ परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है; जैसे – मनोज दूध पीता है! इसमें मनोज और दूध के बाद किसी परसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है! ऐसे वाक्यों में शब्द क्रम या अर्थ के आधार पर क्रिया से संज्ञा का संबंध स्पष्ट होता है!

     

    कारक के भेद (Karak Ke Prakar : Kinds of Case) – कारक के छः भेद माने जाते हैं –

    1. कर्ता  – क्रिया को करने वाला! विभक्ति चिह्न – ने, शून्य!
    2. कर्म – जिस पर क्रिया का प्रभाव या फल पड़े! विभक्ति चिह्न – को!
    3. करण – जिस साधन से क्रिया हो! विभक्ति चिह्न – से, द्वारा!
    4. संप्रदान – जिसके लिए क्रिया की जाए! विभक्ति चिह्न – को, के लिए!
    5. अपादान – जिससे अलग होने या निकलने का बोध हो! विभक्ति चिह्न – से (अलग होना)!
    6. अधिकरण – क्रिया के स्थान, समय आदि का आधार! विभक्ति चिह्न – में, पर!

    लेकिन कारक के दो अन्य भेद भी माने जाते हैं, किंतु इन पर विवाद है, क्योंकि इनका प्रत्यक्ष संबंध क्रिया से नहीं होता!

    7. संबंध – क्रिया से भिन्न किसी अन्य पद से संबंध सूचित करने वाला! विभक्ति चिह्न – का, के, की!

    8. संबोधन – जिस संज्ञा को पुकारा जाए! विभक्ति चिह्न – हे, अरे आदि!

     

    १. कर्ता कारक (Nominative Case) – जो क्रिया करता है उसे कर्ता कारक कहते है! कर्ता संज्ञा या सर्वनाम होते हैं! इसकी विभक्ति ‘ने’ है! जब क्रिया अकर्मक होती है तो उसके साथ विभक्ति चिह्न नहीं लगता! ‘ने’ विभक्ति चिह्न सकर्मक क्रिया के भूतकाल में लगता है! जैसे – मोहन ने गुब्बारे ख़रीदे! रश्मि ने खाना खाया! कर्मवाच्य और भाववाच्य में कर्ता के साथ ‘से’ विभक्ति चिह्न लगता है – रमेश से पत्र नहीं लिखा जाता!

     

    २. कर्मकारक (Objective Case) – वाक्य में जब क्रिया का फल कर्ता पर न पड़कर किसी अन्य संज्ञा या सर्वनाम पर पड़ता है, उसे कर्मकारक कहते हैं! इसका विभक्ति चिह्न ‘को’ होता है! यह विभक्ति चिह्न क्रियाओं के साथ ही लगता है! ‘को’ का प्रमुखतः प्रयोग प्राणिवाचक संज्ञाओं के साथ किया जाता है! जैसे – किरण ने सिमरन को पहुँचाया! कई बार अप्राणिवाचक कर्म के साथ ‘को’ विभक्ति चिन्ह आता है; जैसे – दरवाजे को बंद कर दो! यदि किसी वाक्य में दो कर्म आए तो ‘को विभक्ति चिह्न का प्रयोग गौण कर्म के साथ होता है; जैसे – रमेश ने सुरेश को थप्पड़ मारा!

     

    ३. करण कारक (Instrumental Case) – संज्ञा या सर्वनाम के जो रूप क्रिया होने के साधन या माध्यम होते हैं उन्हें करण कारक कहते हैं! इसकी विभक्ति चिह्न ‘ से, के द्वारा, द्वारा’ होता है; जैसे – कार पेट्रोल से चलती है!

     

    ४. संप्रदान कारक (Dative Case) – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी को देने या किसी के लिए कुछ कार्य करने का पता चलता है, उसे संप्रदान कारक कहते हैं! इसकी विभक्ति चिह्न ‘को, के लिए’ होता है! संप्रदान का शाब्दिक अर्थ देना होता है! जैसे – अधयापक ने गिरिजा को सत्तर अंक दिए!

     

    ५. अपादान कारक (Ablative Case) – संज्ञा के जिस रूप से अलग होने का बोध होता है, उसे अपादान कारक कहते हैं! इसकी विभक्ति चिह्न ‘से’ है! अपादान कारक से अलग होने, तुलना करने, निकलने, डरने, लज्जित होने और दूरी होने का बोध होता है! जैसे – पत्ता पेड़ से गिर पड़ा! गणेश आगरा से आ गया!

     

    ६. संबंध कारक (Genetative Case) – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से इनमें संबंध प्रकट होता है, उसे संबंध कारक कहते हैं! इसके विभक्ति चिह्न ‘का, की, के, रा, ऋ, रे’ आदि होते हैं! जैसे – यह पुस्तक तुम्हारी है! सुषमा सोमी की मौसी है!

     

    ७. अधिकरण कारक (Locative Case) – संज्ञा और सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के समय, स्थान, आधार आदि का बोध होता है, उसे अधिकरण कारक कहते हैं! इसके विभक्ति चिह्न ‘में, पर’ हैं! जैसे – आकाश में जहाज उड़ रहा है! दीवार पर कैलेंडर लटका है!

     

    ८. संबोधन कारक (Vocative Case) – जिस संज्ञा और सर्वनाम का प्रयोग संबोधन के रूप में किया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते हैं! इसमें संज्ञा और सर्वनाम से पहले ‘अरे, अरी, रे, हे’ आदि शब्द लगाते हैं! इनके आगे विस्मादिबोधक चिह्न ( ! ) का प्रयोग किया जाता है! जैसे – हे राम! जरा सी लड़की ने नाम में दम कर दिया!

     

    कर्मकारक और संप्रदान कारक में अंतर – कर्म कारक में क्रिया का फल कर्म पर पड़ता है! संप्रदान कारक में कर्ता देने का काम करता है!  दोनों कारकों में ‘को’ विभक्ति के कारण भूल होने की संभावना रहती है! कर्मकारक में देने का काम नहीं होता! कर्मकारक में किसी के लिए कार्य नहीं किया जाता, संप्रदान कारक में किया जाता है!

     

    करण कारक और अपादान कारक में अंतर – करण द्वारा कर्ता के कार्य करने के माध्यम का बोध होता है! अपादान कारक द्वारा ऐसा नहीं होता है! करण कारक से अलग होने या तुलना का बोध नहीं होता, अपादान कारक से होता है!

     

    संज्ञा का रूपांतरण (रूप रचना) (Transformation of Noun) – संज्ञा शब्दों का रूपांतरण लिंग, वचन और कारक की दृष्टि से होता है! जैसे – लड़का पढ़ रहा है! लड़के पढ़ रहे हैं! लड़की तेज दौड़ी! लड़कियाँ तेज दौड़ीं! आदि!

     

    और पढ़ें (Next Topics) : सर्वनाम, सर्वनाम के भेद और सर्वनामों का रूप परिवर्तन

     

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  • समास किसे कहते हैं, समास के भेद तथा संधि और समास में अंतर

    समास किसे कहते हैं, समास के भेद तथा संधि और समास में अंतर

    समास ( Samas ) शब्द का अर्थ है – पास रखना, छोटा करना! भाषा के प्रयोग में सामासिक शब्दों के प्रयोग से संक्षिप्तता और शैली कृष्टता एवं सटीकता आती है! उदहारण के लिए ‘राजा का महल’ कहने के स्थान पर राजमहल कहना अधिक अधिक उपयुक्त होगा! इससे स्पष्ट है की दो से अधिक शब्दों के मिलने पर ही सामासिक शब्दों का निर्माण होता है! इस प्रक्रिया में दो पदों के बिच वाले कुछ व्याकरणिक शब्दों का लोप करने से दोनों पद पास पास आ जाते हैं!

     

    समास ( Samaas ) वह शब्द-रचना है जिसमें अर्थ की दृष्टि से परस्पर स्वतंत्र संबंध रखने वाले दो या दो से अधिक शब्द किसी स्वतंत्र शब्द की रचना करते हैं! उदहारण – माता + पिता = माता-पिता! सामासिक शब्द में प्रायः दो पद होते हैं! पहले पद होते हैं! पहले पद को पूर्वपद तथा दुसरे पद को उत्तरपद कहते हैं! समान प्रक्रिया से बने पद को ‘समस्तपद’ कहते हैं! समस्पद के दोनों पदों को अलग अलग करने की प्रक्रिया को समास-विग्रह कहते हैं! विग्रह करते समय लुप्त व्याकरणिक शब्द पुनः दिखाई देने लगते हैं; जैसे – गंगा का जल – गंगाजल! इसमें गंगाजल – समस्तपद, गंगा पूर्व पद, जल – उत्तर पद और गंगा का जल – समास-विग्रह!

     

    समास के लिए कम से कम दो पद चाहिए! समास होने पर दोनों या अधिक पद मिलकर एक संक्षिप्त रूप धारण कर लेते हैं! समास-प्रक्रिया में बिच की विभक्तियों का लोप हो जाता है! समास होने पर जहाँ संधि संभव होती है, वहाँ नियमों के अनुसार संधि भी हो जाती है! हिंदी में समास-प्रक्रिया के अंतर्गत तीन प्रकार से शब्दों की रचना हो सकती है –

    (i) तत्सम + तत्सम शब्दों के समास से; जैसे – राष्ट्र + पिता = राष्ट्रपिता

    (ii) तद्भव + तद्भव शब्दों के समास से; जैसे – घोड़ा + सवार = घुड़सवार

    (iii) विदेशी + विदेशी शब्दों के समास से; जैसे – हवाई + जहाज = हवाईजहाज

    दो भिन्न भाषाओँ से आए शब्दों के मेल से बने समस्त पद ‘संकर’ होते हैं –

    विदेशी + तत्सम = जिलाधीश,  तत्सम + विदेशी = योजना कमीशन

    विदेशी + तद्भव = पॉकेटमार,  तद्भव + विदेशी = डाकखाना

     

    समास के भेद ( Samaas Ke bhed : Kinds of Compounds ) –

    १. अव्ययीभाव समास  २. तत्पुरुष समास  ३. कर्मधारय समास  ४. द्विगु समास  ५. बहुव्रीहि समास  ६. द्वंद्व समास

     

    १. अव्ययीभाव समास (Adverbial Compound) – प्रत्येक समास में दो पद होते हैं! जिस समास का पहला पद प्रधान तथा अव्यय होता है और समस्त पद भी अव्यय (क्रिया विशेषण) का कार्य करता है! उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं! अव्ययीभाव समास लिंग, वचन, कारक, पुरुष आदि की दृष्टि से परिवर्तित नहीं होता! पुनरुक्त शब्दों में समानता होने पर भी अव्ययीभाव समास होता है! जैसे – साफ-साफ, यथारूप!

     

    २. तत्पुरुष समास (Determinative Compound) – तत्पुरुष समास में उत्तरपद प्रधान होता है और पूर्वपद गौण होता है! तत्पुरुष समास की रचना समस्त पदों के बिच में आने वाले परसर्गों का लोप हो जाता है! जैसे – पूजाघर! तत्पुरुष समास की रचना प्रायः दो प्रकार से होती है –

    (i) संज्ञा + संज्ञा : इसमें दोनों पद संज्ञा होते हैं; जैसे – दिवारघड़ी आदि!

    (ii) संज्ञा + क्रिया : इसमें पहला पद संज्ञा और दूसरा पद क्रिया होता है; जैसे – भुखमरा!

     

    तत्पुरुष समास में कारक की विभक्तियाँ लुप्त हो जाती हैं! कारक की दृष्टि से तत्पुरुष समास छः प्रकार के होते हैं –

    1. कर्म तत्पुरुष – इसमें को-विभक्ति का लोप हो जाता है; यश को प्राप्त – यशप्राप्त!

    2. करण तत्पुरुष – इसमें ‘से, के द्वारा’- विभक्ति का लोप हो जाता है; मन से चाहा – मनचाहा!

    3. संप्रदान तत्पुरुष – इसमें ‘को, के लिए’-विभक्ति का लोप हो जाता है; देश के लिए प्रेम – देशप्रेम!

    4. अपादान तत्पुरुष – इसमें ‘से’-विभक्ति का लोप हो जाता है; प्रदुषण से रहित – प्रदुषणरहित!

    5. संबंध तत्पुरुष – इसमें ‘का, के, की’-विभक्ति का लोप हो जाता है; भारत का इंदु – भारतेंदु!

    6. अधिकरण तत्पुरुष – इसमें ‘में, पर’-विभक्ति का लोप हो जाता है; जल में मग्न – जलमग्न!

    7. एक अन्य भेद – नञ तत्पुरुष – जिस समास का पहला पद नकारात्मक या अभावात्मक होता है, उसे नञ तत्पुरुष समास कहते हैं! जैसे – न देखा – अनदेखा!

     

    ३. कर्मधारय समास ( Appositional Compound ) – कर्मधारय समास में दो स्थितियाँ होती हैं –

    (i) पूर्वपद विशेषण तथा उत्तरपद विशेष्य होता है; जैसे – नीलकमल!

    (ii) पूर्वपद और उत्तरपद में उपमेय-उपमान का संबंध होता है; जैसे – कमलनयन!

     

    ४. द्विगी समास (Numeral Compound) – जिस समास का पूर्वपद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है! अर्थ की दृष्टि से यह समास प्रायः समूहवाची होता है; जैसे – सात सौ का समूह – सतसई!

     

    ५. द्वंद्व समास (Compulative Compound) – जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं, उसे द्वद्व समास कहते हैं! द्वंद्व समास में दोनों पदों को जोड़ने वाले समुच्चयबोध अव्यय का लोप हो जाता है! जैसे – गुरु और शिष्य – गुरु-शिष्य!

     

    ६. बहुव्रीहि समास (Attributive Compound) – जिस समास के दोनों पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं, उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं! बहुब्रीहि समास के दोनों पद गौण होते हैं! इसमें अन्य पद ही प्रधान होता है! जैसे – शूल है पाणि में जिसके – शूलपाणि अर्थात् शिव!

     

    कर्मधारय और बहुब्रीहि समास में अंतर –

    कर्मधारय समास के दोनों पद विशेषण – विशेष्य या उपमेय-उपमान होते हैं! बहुब्रीहि समास में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं!

     

    बहुव्रीहि और द्विगु समास में अंतर –

    द्विगु समास में पहला पद संख्यासूचक होता है! यह पद दूसरे पद की संख्या सूचित करता है! कुछ बहुव्रीहि समासों में पहला पद संख्यासूचक तो होता है परंतु यह संख्या की सूचना नहीं देता! यह पद दूसरे पद से मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करता है!

     

    समास ( Samaas ) और संधि (Sandhi ) में अंतर –

    संधि दो वर्णों में होती है! संधि में पहले की अंतिम ध्वनि और दुसरे शब्द की पहली ध्वनि में मेल होता है! इस मेल के कारण इन ध्वनियों का रूप बदल जाता है! जैसे – विद्या + आलय = विद्यालय! संधि में दोनों शब्दों के मूल अर्थों में अंतर नहीं आता! समास में दो या दो से अधिक शब्दों में मेल होता है! इस मेल से बने नए शब्द के दोनों पदों के अर्थ बदल जाते हैं! कई स्थानों पर इनके अर्थ नहीं बदलते! समास को तोडना को ‘समास-विग्रह’ कहलाता है! संधि को तोडना ‘संधि-विच्छेद’ कहलाता है!

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  • शब्द निर्माण, शब्द रचना, उपसर्ग और प्रत्यय

    शब्द निर्माण, शब्द रचना, उपसर्ग और प्रत्यय

    प्रत्येक भाषा में नए नए शब्द बनाए जाने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है! इसे ‘शब्द निर्माण’ प्रक्रिया कहते हैं! मूल शब्दों में कुछ शब्दांश या शब्द जोड़कर नए शब्दों का निर्माण किया जाता है! यह शब्द निर्माण तीन प्रकार से होता है  –

    १.  उपसर्ग द्वारा    २. प्रत्यय द्वारा    ३. समास द्वारा

     

    १. उपसर्ग ( Prefix ) – ये वे लघुतम शब्दांश जो शब्दों के प्रारंभ में लगकर नए शब्दों का निर्माण करते हैं; जैसे – अ + धर्म = अधर्म! हिंदी में तीन प्रकार के उपसर्ग हैं – (i) तत्सम (संस्कृत के) उपसर्ग  (ii) तद्भव (हिंदी के) उपसर्ग  (iii) आगत (विदेशी) उपसर्ग

     

    २. प्रत्यय ( Suffix ) – नए शब्दों की रचना में प्रत्यय अहम् भूमिका निभाते हैं! ये किसी शब्द के ‘पीछे’ लगते हैं! ऐसे शब्दांश जो किसी शब्द के अंत में लगकर उसके अर्थ को नया रूप देते हैं प्रत्यय कहलाते हैं; जैसे – दूधवाला, गरमाहट आदि! हिंदी भाषा में प्रत्यय के दो भेद होते हैं –

    (i) कृत प्रत्यय – क्रिया के मूल रूप के पीछे लगकर संज्ञा और विशेषण शब्दों की रचना करने वाले प्रत्यय को कृत प्रत्यय कहते हैं! कृत प्रत्यय से बने शब्दों को कृदंत कहते हैं; जैसे – पढ़ + आकू = पढ़ाकू आदि!

    (ii) तद्धित प्रत्यय – संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि शब्दों के पीछे लगकर जो प्रत्यय शब्द बनाते हैं, उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं! जैसे – देव + त्व = देवत्व आदि!

     

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