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  • भारतीय संविधान के कुछ प्रमुख अनुच्छेद

    भारतीय संविधान के कुछ प्रमुख अनुच्छेद

    संविधान के कुछ प्रमुख अनुच्छेद जो आप के लिए जानना बेहद अहम् है – अनुच्छेद 1 : यह घोषणा कर्ता है की भारत ‘राज्यों का संघ’ है!

     

    अनुच्छेद 3 : संसद विधि द्वारा नए राज्य बना सकती है तथा पहले से अवस्थित राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं एवं नामों में परिवर्तन कर सकती है!

     

    अनुच्छेद 5 : संविधान के प्रारंभ होने के समय भारत में रहने वाले वे सभी व्यक्ति यहाँ के नागरिक होंगे, जिनका जन्म भारत में हुआ हो, जिनके पिता या माता पिता भारत के नागरिक हों या संविधान के प्रारंभ के समय से भारत में रह रहे हों!

     

    अनुच्छेद 53 : संघ की कार्यपालिका संबंधी शक्ति राष्ट्रपति में निहित रहेगी!

     

    अनुच्छेद 64 : उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होगा!

     

    अनुच्छेद 74 : एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसके शीर्ष पर प्रधानमंत्री रहेगा, जिसकी सहायता एवं सुझाव के आधार पर राष्ट्रपति अपने कार्य संपन्न करेगा! राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के लिए किसी सलाह के पुनर्विचार को आवश्यक समझ सकता है, पर पुनर्विचार के पश्चात दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेगा!इससे संबंधित किसी विवाद की परिक्षा न्यायालय में नहीं की जाएगी!

     

    अनुच्छेद 76 : राष्ट्रपति द्वारा महान्यायवादी की नियुक्ति की जाएगी!

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    अनुच्छेद 78 : प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा की वह देश के प्रशासनिक एवं विधायी मामलों तथा मंत्रिपरिषद के निर्णयों के संबंध में राष्ट्रपति को सूचना दे, यदि राष्ट्रपति इस प्रकार की सूचना प्राप्त करना आवश्यक समझे!

     

    अनुच्छेद 86 : इसके अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा संसद को संबोधित करने तथा संदेश भेजने के अधिकार का उल्लेख है!

     

    अनुच्छेद 108 : यदि किसी विधेयक के संबंध में दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न हो गया हो तो संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान है!

     

    अनुच्छेद 110 : धन विधेयक को इसमें परिभाषित किया जाता है!

     

    अनुच्छेद 111 : संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है! राष्ट्रपति उस विधेयक को सम्मति प्रदान कर सकता है या अस्वीकृत कर सकता है! वह संदेश के साथ या बिना संदेश के संसद को उस पर पुनर्विचार करने की लिए भेज सकता है, पर यदि दुबारा विधेयक को संसद द्वारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो वह इसे अस्वीकृत नहीं करेगा!

     

    अनुच्छेद 112 : प्रत्येक वित्तीय वर्ष हेतु राष्ट्रपति द्वारा संसद के समक्ष बजट पेश किया जाएगा!

     

    अनुच्छेद 123 : संसद के अवकाश में राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार!

     

    अनुच्छेद 124 : इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के गठन का विवरण है!

     

    अनुच्छेद 129 : सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है!

     

    अनुच्छेद 148 : नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी!

     

    अनुच्छेद 163 : राज्यपाल के कार्यों में सहायता एवं सुझाव देने के लिए राज्यों में एक मंत्रिपरिषद एवं इसके शीर्ष पर मुख्यमंत्री होगा, पर राज्यपाल के स्वविवेक संबंधी कार्यों में वह मंत्रिपरिषद के सुझाव लेने के लिए बाध्य नहीं होगा!

    अनुच्छेद 169 : राज्यों में विधान परिषदों की रचना या उनकी समाप्ति विधानसभा द्वारा बहुमत से पारित प्रस्ताव तथा संसद द्वारा इसकी स्वीकृति से संभव है!

     

    अनुच्छेद 200 : राज्यों की विधायिका द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा! वह इस पर अपनी सम्मति डे सकता है या इसे अस्वीकृत कर सकता है! वह इस विधेयक को संदेश के साथ या बिना संदेश के पुनर्विचार हेतु विधायिका को वापस कर सकता है, पर पुनर्विचार के बाद दुबारा विधेयक आ जाने पर वह इसे अस्वीकृत नहीं कर सकता! इसके अतिरिक्त वह विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भी भेज सकता है!

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    अनुच्छेद 213 : राज्य विधायिका के सत्र में नहीं रहने पर राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है!

     

    अनुच्छेद 214 : सभी राज्यों के लिए उच्च नयायालय की व्यवस्था होगी!

     

    अनुच्छेद 226 : मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्च न्यायालय को लेख जारी करने की शक्तियाँ!

     

    अनुच्छेद 233 : जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाएगी!

     

    अनुच्छेद 235 : उच्च न्यायालय का नियंत्रण अधीनस्थ न्यायालयों पर रहेगा!

     

    अनुच्छेद 239 : केन्द्रशासित प्रदेशों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा होगा! वह यदि उचित समझे तो बगल के किसी राज्य के राज्यपाल को इसके प्रशासन का दायित्व सौंप सकता है या एक प्रशासक की नियुक्ति कर सकता है!

     

    अनुच्छेद 243 : इसमें पंचायत एवं नगरपालिका के गठन, संरचना, आरक्षण, शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व से संबंधित प्रावधान दिया गया है!

     

    अनुच्छेद 245 : संसद संपूर्ण देश या इसके किसी हिस्से के लिए तथा राज्य विधानपालिका अपने राज्य या इसके किसी हिस्से के लिए कानून बना सकती है!

     

    अनुच्छेद 248 : विधि निर्माण संबंधी अवशिष्ट शक्तियाँ संसद में निहित हैं!

     

    अनुच्छेद 249 : राज्यसभा विशेष बहुमत द्वारा राज्य सूचि के किसी विषय पर लोकसभा को एक वर्ष के लिए कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है, यदि वह इसे राष्ट्रहित में आवश्यक समझे!

     

    अनुच्छेद 262 : अंतरराज्जीय नदियों या नदी घाटियों के जल के वितरण एवं नियंत्रण से संबंधित विवादों के लिए संसद विधि द्वारा निर्णय कर सकती है!

     

    अनुच्छेद 263 : केंद्र राज्य संबंधों में विवादों का समाधान करने पर परस्पर सहयोग के क्षेत्रों के विकास के उद्देश्यों से राष्ट्रपति एक अंतर \राज्जीय परिषद् की स्थापना कर सकता है!

     

    अनुच्छेद 266 : भारत की संचित निधि, जिसमें सरकार की सभी मौद्रिक आविष्टीयाँ एकत्र रहेंगी, विधि सम्मत प्रक्रिया के बिना इससे कोई भी राशि नहीं निकाली जा सकती है!

     

    अनुच्छेद 267 : संसद विधि द्वारा एक आकस्मिक निधि स्थापित कर सकती है, जिसमें अकस्मात उत्पन्न पैस्थियों के लिए राशि एकत्र की जायेगी!

     

    अनुच्छेद 275 : केंद्र द्वारा राज्यों को सहायक अनुदान दिए जाने का प्रावधान!

     

    अनुच्छेद 280 : राष्ट्रपति हर पाँचवें वर्ष एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा, जिसमें अध्यक्ष के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य होंगे तथा जो राष्ट्रपति के पास केंद्र एवं राज्यों के बिच करों के वितरण के संबंध में अनुशंसा करेगा!

     

    अनुच्छेद 300 क : राज्य किसी भी व्यक्ति को उसकी सम्पति से वंचित नहीं करेगा! पहले यह प्रावधान मूल अधिकारों के अंतर्गत था, पर संविधान के 44वें संशोधन, 1978 ई० द्वारा इसे अनुच्छेद 300 क में एक सामान्य वैधानिक अधिकार के रूप अवस्थित किया गया!

     

    अनुच्छेद 312 : राज्यसभा विशेष बहुमत द्वारा नई अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना की अनुशंसा कर सकती है!

     

    अनुच्छेद 315 : संघ एवं राज्यों के लिए एक लोक सेवा आयोग की स्थापना की जाएगी!

     

    अनुच्छेद 324 : चुनावों के पर्यवेक्षक, निर्देशन एवं नियंत्रण संबंधी शक्तियाँ चुनाव आयोग में निहित रहेंगी!

     

    अनुच्छेद 326 : लोकसभा तथा विधान सभाओं में चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा!

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    अनुच्छेद 330 : लोकसभा में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षण!

     

    अनुच्छेद 331 : आंग्ल भारतीय समुदाय के लोगों का राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा में मनोनयन संभव है, यदि वह समझे की उनका उचित प्रतिनिधित्व नहीं है!

     

    अनुच्छेद 332 : अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों का विधानसभाओं में आरक्षण का प्रावधान!

     

    अनुच्छेद 333 : आंग्ल भारतीय समुदाय के लोगों का विधानसभाओं में मनोनयन!

     

    अनुच्छेद 335 : अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं पिछड़े वर्गों के लिए विभिन्न सेवाओं में पदों पर आरक्षण का प्रावधान!

     

    अनुच्छेद 338 : राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग!

     

    अनुच्छेद 338 क : राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग!

     

    अनुच्छेद 340 : पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए आयोग की नियुक्ति!

     

    अनुच्छेद 343 : संघ की आधिकारिक भाषा देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी होगी!

     

     

    अनुच्छेद 347 : यदि किसी राज्य में पर्याप्त संख्या में लोग किसी भाषा को बोलते हों और उनकी आकांक्षा हो की उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को मान्यता दी जाए तो इसकी अनुमति राष्ट्रपति दे सकता है!

     

    अनुच्छेद 351 : यह संघ का कर्तव्य होगा की वह हिंदी भाषा का प्रसार एवं उत्थान करे ताकि वह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी अंगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम बने!

     

    अनुच्छेद 352 : राष्ट्रपति द्वारा आपात स्थिति की घोषणा, यदि वह समझता हो की भारत उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, बाह्य आक्रमण या सैन्य विद्रोह के फलस्वरूप खतरे में है!

     

    अनुच्छेद 356 : यदि किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट दी जाए की उस राज्य में संवैधानिक तंत्र असफल हो गया है तो वहाँ राष्ट्रपति शासन लागु किया जा सकता है!

     

    अनुच्छेद 360 : यदि राष्ट्रपति ये समझता है की भारत या इसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता एवं शाख खतरे में है तो वह वित्तीय आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है!

     

    अनुच्छेद 365 : यदि कोई राज्य केंद्र द्वारा भेजे गए किसी कार्यकारी निर्देश का पालन करने में असफल रहता है तो राष्ट्रपति द्वारा यह समझा जाना विधि सम्मत होगा की उस राज्य में संविधानतंत्र के अनुरूप प्रशासन चलने की स्थिति नहीं है और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागु किया जा सकता है!

     

    अनुच्छेद 368 : संसद को संविधान के किसी भी भाग का संशोधन करने का अधिकार है!

     

    अनुच्छेद 370 : इसके अंतर्गत जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति का वर्णन है (अब इसे संशोधित कर जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया गया है)

     

    अनुच्छेद 371 : कुछ राज्यों के विशेष क्षेत्रों के विकास के इए राष्ट्रपति बोर्ड स्थापित कर सकता है – महारष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, मणिपुर आदि!

     

    अनुच्छेद 394 क : राष्ट्रपति अपने अधिकार के अंतर्गत इस संविधान का हिंदी भाषा में अनुवाद कराएगा!

     

    अनुच्छेद 395 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947, भारत अधिनियम, 1953 तथा इनके अन्य पूरक अधिनियमों को, जिसमें प्रियी कौंसिल क्षेत्राधिकार अधिनियम शामिल नहीं है, यहाँ रद्द किया जाता है!

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  • भारतीय संविधान की अनुसूचियां एवं प्रमुख भाग

    भारतीय संविधान की अनुसूचियां एवं प्रमुख भाग

    भारतीय संविधान की अनुसूची में कुल 12 अनुसूचियां हैं, जो इस प्रकार हैं – प्रथम अनुसूची : इसमें भारतीय संघ के घटक राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों का उल्लेख है!

     

    द्वितीय अनुसूची : इसमें भारत राज-व्यवस्था के विभिन्न पदाधिकारियों (राष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्य सभा के सभापति एवं उपसभापति, विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, विधान परिषद के सभापति एवं उपसभापति, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक आदि) को प्राप्त होने वाले वेतन, भत्ते और पेंशन का उल्लेख किया गया है!

     

    तृतीय अनुसूची : इसमें विभिन्न पदाधिकारियों (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री, उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों) द्वारा पद-ग्रहण के समय ली जाने वाली शपथ का उल्लेख है!

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    चौथी अनुसूची : इसमें विभिन्न राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों की राज्य सभा में प्रतिनिधित्व का विवरण दिया गया है!

     

    पांचवीं अनुसूची : इसमें विभिन्न अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजाति के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उल्लेख है!

     

    छठी अनुसूची : इसमें असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रावधान है!

     

    सांतवी अनुसूची : इसमें केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों के बंटवारे के बारे में बताया गया है, इसके अन्तगर्त तीन सूचियाँ है- संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची –

    (i) संघ सूची : इस सूची में दिए गए विषय पर केंद्र सरकार कानून बनाती है! संविधान के लागू होने के समय इसमें 97 विषय थे, वर्तमान समय में इसमें 98 विषय हैं!

    (ii) राज्य सूची : इस सूची में दिए गए विषय पर राज्य सरकार कानून बनाती है! राष्ट्रीय हित से संबंधित होने पर केंद्र सरकार भी कानून बना सकती है! संविधान के लागू होने के समय इसके अन्‍तर्गत 66 विषय थे, वर्तमान समय में इसमें 62 विषय हैं!

    (iii) समवर्ती सूची : इसके अन्‍तर्गत दिए गए विषय पर केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं! परंतु कानून के विषय समान होने पर केंद्र सरकार केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है! राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून केंद्र सरकार के कानून बनाने के साथ ही समाप्त हो जाता है! संविधान के लागू होने के समय समवर्ती सूची में 47 विषय थे, वर्तमान समय में इसमें 52 विषय हैं!

     

    आठवीं अनुसूची : इसमें भारत की 22 भाषाओँ का उल्लेख किया गया है! मूल रूप से आंठवीं अनुसूची में 14 भाषाएं थीं, 1967 ई० में सिंधी को और 1992 ई० में कोंकणी, मणिपुरी तथा नेपाली को आंठवीं अनुसूची में शामिल किया गया! 2004 ई० में मैथिली, संथाली, डोगरी एवं बोडो को आंठवीं अनुसूची में शामिल किया गया!

     

    नौवीं अनुसूची : संविधान में यह अनुसूची प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 के द्वारा जोड़ी गई. इसके अंतर्गत राज्य द्वारा संपत्ति के अधिग्रहण की विधियों का उल्लेख किया गया है! इन अनुसूची में सम्मिलित विषयों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है! वर्तमान में इस अनुसूची में 284 अधिनियम हैं!

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    नोट : अब तक यह मान्यता थी कि नौवीं अनुसूची में सम्मिलित कानूनों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती. 11 जनवरी, 2007 के संविधान पीठ के एक निर्णय द्वारा यह स्थापित किया गया कि नौवीं अनुसूची में सम्मिलित किसी भी कानून को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तथा उच्चतम न्यायालय इन कानूनों की समीक्षा कर सकता है!

     

    दसवीं अनुसूची : यह संविधान में 52वें संशोधन, 1985 के द्वारा जोड़ी गई है. इसमें दल-बदल से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है!

     

    ग्यारहवीं अनुसूची : यह अनुसूची संविधान में 73वें संवैधानिक संशोधन (1993) के द्वारा जोड़ी गई है. इसमें पंचायतीराज संस्थाओं को कार्य करने के लिए 29 विषय प्रदान किए गए हैं!

     

    बारहवीं अनुसूची : यह अनुसूची 74वें संवैधानिक संशोधन (1993) के द्वारा जोड़ी गई है इसमें शहरी क्षेत्र की स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को कार्य करने के लिय 18 विषय प्रदान किए गए हैं!

     

    भारतीय संविधान के प्रमुख भाग –

     भाग -1
    संघ एवं उसका राज्य क्षेत्र
    अनुच्छेद 1 से 4
     भाग -2
    नागरिकता अनुच्छेद 5 से 11
     भाग – 3
    मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12 से 35
     भाग – 4
    नीति निर्देशक तत्व अनुच्छेद 36 से 51
     भाग – 4
    (क) मूल कर्तव्य अनुच्छेद 51 (क)
     भाग – 5
    संघ अनुच्छेद 52 से 151

     

     

     भाग – 6
     राज्य  अनुच्छेद 152 से 237
     भाग – 8
    संघ राज्य क्षेत्र अनुच्छेद 239 से 242
     भाग – 11
    संघ और राज्यों के बिच संबंध अनुच्छेद 245 से 263
     भाग – 14
    संघ एवं राज्यों के अधीन सेवाएँ अनुच्छेद 308 से 323
     भाग – 15
    निर्वाचन अनुच्छेद 324 से 329
     भाग – 17
    राजभाषा अनुच्छेद 343 से 351
    भाग – 18
    आपात उपबंध अनुच्छेद 352 से 360
    भाग – 20
    संविधान संसोधन अनुच्छेद 368

    और पढ़ें : संविधान द्वारा प्रदात मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य

     

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  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना अथवा उद्देशिका

    भारतीय संविधान की प्रस्तावना अथवा उद्देशिका

    नेहरु द्वारा प्रस्तुत उद्देश्य संकल्प में जो आदर्श प्रस्तुत किया गया, उन्हें ही संविधान की उद्देशिका में शामिल कर लिया गया! इस प्रस्तावना को सर्वप्रथम अमेरिकी संविधान में शामिल किया गया था, इसके बाद कई देशों ने इसे अपनाया है! संविधान विशेषज्ञ नानी पालकीवाला ने संविधान की प्रस्तावना को संविधान का परिचय पत्र कहा है! संविधान के 42वें संसोधन द्वारा संशोधित होने के बाद यह निम्न प्रकार है –

     

    “हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 जनवरी 1949 ई० (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं!”

     

    संशोधन : संविधान की प्रस्तावना को संविधान की कुंजी कहा जाता है! संविधान के अधीन समस्त शक्तियों का केंद्रबिंदु ‘भारत के लोग’ हैं! प्रस्तावना को न्यायालय में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है! जहाँ संविधान की भाषा संदिग्ध हो, वहाँ प्रस्तावना विधिक निर्वाचन में सहायता करती है! इसमें विधायिका संसोधन कर सकती है! 1976 ई० में 42वें संसोधन के द्वारा इसमें ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘राष्ट्र की अखंडता’ शब्द जोड़ा गया!

     

    प्रस्तावना के चार घटक इस प्रकार हैं :

    1. यह इस बात की ओर इशारा करता है कि संविधान के अधिकार का स्रोत भारत के लोगों के साथ निहित है।
    2. यह इस बात की घोषणा करता है कि भारत एक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणतंत्र राष्ट्र है।
    3. यह सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता को सुरक्षित करता है तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए भाईचारे को बढ़ावा देता है।
    4. इसमें उस तारीख (26 नवंबर 1949) का उल्लेख है जिस दिन संविधान को अपनाया गया था!

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    प्रस्तावना के मूल शब्दों की व्याख्या इस प्रकार है :

    संप्रभुता (Sovereignty) : प्रस्तावना यह दावा करती है कि भारत एक संप्रभु देश है। सम्प्रुभता शब्द का अर्थ है कि भारत किसी भी विदेशी और आंतरिक शक्ति के नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त सम्प्रुभता सम्पन्न राष्ट्र है। भारत की विधायिका को संविधान द्वारा तय की गयी कुछ सीमाओं के विषय में देश में कानून बनाने का अधिकार है।

     

    समाजवादी (Socialist): समाजवादी शब्द संविधान के 1976 में हुए 42 वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। समाजवाद का अर्थ है समाजवादी की प्राप्ति लोकतांत्रिक तरीकों से होती है। भारत ने ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ को अपनाया है। लोकतांत्रिक समाजवाद एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास रखती है जहां निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र कंधे से कंधा मिलाकर सफर तय करते हैं। इसका लक्ष्य गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और अवसर की असमानता को समाप्त करना है!

     

    धर्मनिरपेक्ष (Secular): धर्मनिरपेक्ष’ शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ है कि भारत में सभी धर्मों को राज्यों से समानता, सुरक्षा और समर्थन पाने का अधिकार है। संविधान के भाग III के अनुच्छेद 25 से 28 एक मौलिक अधिकार के रूप में धर्म की स्वतंत्रता को सुनिश्चत करता है।

     

    लोकतांत्रिक (Democratic): लोकतांत्रिक शब्द का अर्थ है कि संविधान की स्थापना एक सरकार के रूप में होती है जिसे चुनाव के माध्यम से लोगों द्वारा निर्वाचित होकर अधिकार प्राप्त होते हैं। प्रस्तावना इस बात की पुष्टि करती हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसका अर्थ है कि सर्वोच्च सत्ता लोगों के हाथ में है। लोकतंत्र शब्द का प्रयोग राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र के लिए प्रस्तावना के रूप में प्रयोग किया जाता है। सरकार के जिम्मेदार प्रतिनिधि, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, एक वोट एक मूल्य, स्वतंत्र न्यायपालिका आदि भारतीय लोकतंत्र की विशेषताएं हैं।

     

    गणराज्य (Republic): एक गणतंत्र अथवा गणराज्य में, राज्य का प्रमुख प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लोगों द्वारा चुना जाता है। भारत के राष्ट्रपति को लोगों द्वारा परोक्ष रूप से चुना जाता है; जिसका अर्थ संसद औऱ राज्य विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से है। इसके अलावा, एक गणतंत्र में, राजनीतिक संप्रभुता एक राजा की बजाय लोगों के हाथों में निहित होती है।

     

    न्याय (Justice) : प्रस्तावना में न्याय शब्द को तीन अलग-अलग रूपों में समाविष्ट किया गया है- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, जिन्हें मौलिक और नीति निर्देशक सिद्धांतों के विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से हासिल किया गया है। प्रस्तावना में सामाजिक न्याय का अर्थ संविधान द्वारा बराबर सामाजिक स्थिति के आधार पर एक अधिक न्यायसंगत समाज बनाने से है। आर्थिक न्याय का अर्थ समाज के अलग-अलग सदस्यों के बीच संपति के समान वितरण से है जिससे संपति कुछ हाथों में ही केंद्रित नहीं हो सके। राजनीतिक न्याय का अर्थ सभी नागरिकों को राजनीतिक भागीदारी में बराबरी के अधिकार से है। भारतीय संविधान प्रत्येक वोट के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और समान मूल्य प्रदान करता है।

     

    स्वतंत्रता (Liberty) : स्वतंत्रता का तात्पर्य एक व्यक्ति जो मजबूरी के अभाव या गतिविधियों के वर्चस्व के कारण तानाशाही गुलामी, चाकरी, कारावास, तानाशाही आदि से मुक्त या स्वतंत्र कराना है।

     

    समानता (Equality) : समानता का अभिप्राय समाज के किसी भी वर्ग के खिलाफ विशेषाधिकार या भेदभाव को समाप्त करने से है।संविधान की प्रस्तावना देश के सभी लोगों के लिए स्थिति और अवसरों की समानता प्रदान करती है। संविधान देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता प्रदान करने का प्रयास करता है।

     

    भाईचारा (Fraternity) : भाईचारे का अर्थ बंधुत्व की भावना से है। संविधान की प्रस्तावना व्यक्ति और राष्ट्र की एकता और अखंडता की गरिमा को बनाये रखने के लिए लोगों के बीच भाईचारे को बढावा देती है।

     

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावना की व्याख्या :

    संविधान में प्रस्तावना को तब जोड़ा गया था जब बाकी संविधान पहले ही लागू हो गया था। बेरूबरी यूनियन के मामले में (1960) सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है। हालांकि, यह स्वीकार किया गया कि यदि संविधान के किसी भी अनुच्छेद में एक शब्द अस्पष्ट है या उसके एक से अधिक अर्थ होते हैं तो प्रस्तावना को एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

     

    केशवानंद भारती मामले (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले को पलट दिया और यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है और इसे संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संशोधित किया जा सकता है लेकिन इसके मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है! एक बार फिर, भारतीय जीवन बीमा निगम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है।

    और पढ़ें : भारतीय संविधान में अब तक किए गे प्रमुख संशोधन

     

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  • भारत के संबंध में विदेशी यात्रियों से मिलने वाली प्रमुख जानकारी

    भारत के संबंध में विदेशी यात्रियों से मिलने वाली प्रमुख जानकारी

    भारत पर प्राचीन समय से ही विदेशी आक्रमण होते रहे हैं। इन विदेशी आक्रमणों के कारण भारत की राजनीति और यहाँ के इतिहास में समय-समय पर काफ़ी बड़े और महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। भारत की राजनीति और इतिहास में हुए इन परिवर्तनों का अध्ययन करने में तब के विदेशी लेखकों और यात्रियों द्वारा लिखित पुस्तक काफी सहायता करता है! उन विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भारतीय इतिहास की जो जानकारी मिलती है, उसे तीन प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है- यूनानी-रोमन लेखक, चीनी लेखक और अरबी लेखक!

     

    यूनानी- रोमन लेखक :

    टेसियस : यह ईरान का राजवैद्य था! भारत के संबंध में इसका विवरण आश्चर्यजनक कहानियों से परिपूर्ण होने के कारण अविश्वसनीय माना जाता है!

     

    हेरोडोटस : इसे इतिहास का पिता कहा जाता है! इसने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत फारस संबंध का वर्णन किया है, परंतु इसका विवरण अनुश्रुतियों एवं अफवाहों पर आधारित है! सिकंदर के साथ आनेवाले लेखकों में निर्याकस, आनेसिक्रट्स और आस्टिबुलस के विवरण अधिक प्रमाणिक एवं विश्वसनीय हैं!

     

    मेगास्थनीज : यह सेल्युकस निकेटर का राजदूत था, को चंद्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में आया था! इसने अपनी पुस्तक इंडिका में मौर्य युगीन समाज एवं संस्कृति के विषय में लिखा है!

    और पढ़ें : भारत के प्रमुख राजवंश एवं क्षेत्र

     

    डाइमेकस : यह सीरियन नरेश आन्तियोकस का राजदूत था, जो बिन्दुसार के राजदरबार में आया था! इसका विवरण भी मौर्य युग से संबंधित है!

     

    डायोनिसियस : यह मिस्र नरेश टॉलमी फिलेडेल्फ का राजदूत था, जो अशोक के राजदरबार में आया था!

     

    टॉलमी : इसने दूसरी शताब्दी में भारत का भूगोल नामक पुस्तक लिखी!

     

    प्लिनी : इसने प्रथम शताब्दी में नेचुरल हिस्ट्री नामक पुस्तक लिखी! इसमें भारतीय पशुओं, पेड़ पौधों, खनिज पदार्थों आदि के बारे में विवरण मिलता है!

     

    पेरिलिप्स ऑफ़ द इरिथ्रयन-सी : इस पुस्तक के लेखक के बारे में जानकारी नहीं है! यह लेखक करीब 80 ई० में हिंद महासागर की यात्रा पर आया था! इसने उस समय के भारत के बंदरगाहों तथा व्यापारिक वस्तुओं के बारे में जानकारी दी गई है!

     

    चीनी लेखक :

    फाहियान : यह चीनी यात्री गुप्त नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में आया था! उसने लगभग 399 ई. में अपने कुछ मित्रों हुई-चिंग, ताओंचेंग, हुई-मिंग, हुईवेई के साथ भारत यात्रा प्रारम्भ की। फाह्यान की भारत यात्रा का उदेश्य बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजना था। इसीलिए फ़ाह्यान ने उन्हीं स्थानों के भ्रमण को महत्त्व दिया, जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थे। इसने अपने विवरण में मध्यप्रदेश के समाज एवं संस्कृति के बारे में वर्णन किया है! इसने मध्यप्रदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया है!

     

    संयुगन : यह चीनी लेखक था! यह 518 ई० में भारत आया! इसने अपने तीन वर्षो की यात्रा में बौद्ध धर्म की प्राप्तियां एकत्रित की थी!

    और पढ़ें : भारत की ऐतिहासिक लड़ाइयाँ, काल एवं सम्बंधित राज्य

     

    ह्वेनसांग : यह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था! ह्वेनसांग 629 ई० में चीन से भारतवर्ष के लिए प्रस्थान किया और लगभग एक वर्ष की यात्रा के बाद सर्वप्रथम वह भारतीय राज्य कपिशा पहुंचा! भारत में 15 वर्षों तक ठहरकर 645 ई० में चीन लौट गया! वह बिहार में नालंदा जिला स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने तथा भारत से बौद्ध ग्रंथों को एकत्र कर ले जाने के लिए आया था! इसका भ्रमण वृतांत सि-यु-की नाम से प्रसिद्द है, जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है! इसने हर्षकालीन समाज, धर्म तथा राजनीति के बारे में लिखा है! इसके अनुसार सिंधु का राजा शुद्र था! ह्वेनसांग के अध्ययन के समय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे! हूली, ह्वेनसांग का मित्र था, जिसने ह्वेनसांग की जीवनी लिखी। इस जीवनी में उसने तत्कालीन भारत पर भी प्रकाश डाला। चीनी यात्रियों में सर्वाधिक महत्व ह्वेनसांग का ही है। उसे ‘प्रिंस ऑफ़ पिलग्रिम्स’ अर्थात् ‘यात्रियों का राजकुमार’ कहा जाता है।

     

    इत्सिंग : यह भी चीनी लेखक था! यह 7वीं शताब्दी के अंत में भारत आया! इसने अपने विवरण में नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय के भारत का वर्णन किया है! इत्सिंग के अलावे अन्य चीनी यात्री ‘मत्वालिन’ ने हर्ष के पूर्व अभियान एवं ‘चाऊ-जू-कुआ’ ने चोल कालीन इतिहास पर प्रकाश डाला है।

     

    अरबी लेखक :

    अलबरूनी : यह अरबी लेखक था! यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था! अरबी में लिखी गई उसकी कृति किताब-उल-हिंद या तहकीक-ए-हिंद, आज भी इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है! यह एक विस्तृत ग्रंथ है जो धर्म और दर्शन, त्योहारों, खगोल विज्ञान, कीमिया, रीती रिवाजों तथा प्रथाओं, सामजिक जीवन, भार तौल तथा मापन विधियों, पुर्तिकला कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि विषयों के आधार पर अस्सी अध्यायों में विभाजित है! इसमें राजपूत कालीन समाज, धर्म, रीती रिवाज, राजनीति आदि पर सुन्दर प्रकाश डाला गया है!

     

    इब्न बतूता : यह भी एक अरबी लेखक था! इसके द्वारा लिखा गया उसका यात्रा वृतांत जिसे रिहला कहा जाता है, 14वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में बहुत ही प्रचुर तथा रोचक जानकारियाँ देता है! 1333 ई० में दिल्ली पहुँचने पर इसकी विद्वता से प्रभावित होकर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त किया!

     

    फ़रिश्ता : यह एक सिद्ध इतिहासकार था, जिसने फ़ारसी में इतिहास लिखा है। फ़रिश्ता का जन्म फ़ारस में ‘कैस्पियन सागर’ के तट पर ‘अस्त्राबाद’ में हुआ था। वह युवावस्था में अपने पिता के साथ अहमदाबाद आया और वहाँ 1589 ई. तक रहा। इसके बाद वह बीजापुर चला गया, जहाँ उसने सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय का संरक्षण प्राप्त किया था!

     

    सुलेमान : 9 वी. शताब्दी में भारत आने वाले अरबी यात्री सुलेमान प्रतिहार एवं पाल शासकों के तत्कालीन आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक दशा का वर्णन करता है।

     

    अलमसूदी : 915-16 ई. में भारत की यात्रा करने वाला बगदाद का यह यात्री अलमसूदी राष्ट्रकूट एवं प्रतिहार शासकों के विषय में जानकारी देता हैं।

     

    तबरी अथवा टबरी : यह एक अरब इतिहासकार और इस्लाम धर्म विद्वान् था। सम्भवत: 838-839 ई० में तबरिस्तान क्षेत्र के आमुल नामक स्थान पर उसका जन्म हुआ था। संपन्न परिवार में जन्म, कुशाग्रबुद्धि और मेघावी होने के कारण बचपन से ही वह अत्यन्त होनहार दिखाई पड़ता था। कहते हैं कि सात वर्ष की अवस्था में ही संपूर्ण क़ुरान तबरी को कंठस्थ हो गया। अपने नगर में रहकर तो तबरी ने बहुमूल्य शिक्षा पाई ही, उस समय के इस्लाम जगत के अन्य सभी प्रसिद्ध विद्याकेंद्रों में भी वह गया और अनेक प्रसिद्ध विद्वानों से विद्या ग्रहण की।

     

    अन्य लेखक :

    तारानाथ : यह एक तिब्बती लेखक था! इसने कंग्युर तथा तंग्युर नामक ग्रंथ की रचना की! इससे भारतीय इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है!

     

    मार्कोपोलो : यह 13वीं शताब्दी के अंत में पाण्ड्य देश की यात्रा पर आया था! इसका विवरण पाण्ड्य इतिहास के अध्ययन के लिए उपयोगी है!

     

    बर्नियर : बर्नियर का पूरा नाम ‘फ़्रेंसिस बर्नियर’ था। ये एक फ़्राँसीसी विद्वान डॉक्टर थे, जो सत्रहवीं सदी में फ्राँस से भारत आए थे। उस समय भारत पर मुग़लों का शासन था। बर्नियर के आगमन के समय मुग़ल बादशाह शाहजहाँ अपने जीवन के अन्तिम चरण में थे और उनके चारों पुत्र भावी बादशाह होने के मंसूबे बाँधने और उसके लिए उद्योग करने में जुटे हुए थे। बर्नियर ने मुग़ल राज्य में आठ वर्षों तक नौकरी की। उस समय के युद्ध की कई प्रधान घटनाएँ बर्नियर ने स्वयं देखी थीं।

     

    कुछ फारसी लेखक जिनसे भारतीय इतिहास के अध्ययन में काफ़ी सहायता मिलती है – इसमें महत्त्वपूर्ण हैं- फ़िरदौसी (940-1020ई.) कृत ‘शाहनामा’। रशदुद्वीन कृत ‘जमीएत-अल-तवारीख़’, अली अहमद कृत ‘चाचनामा’, मिनहाज-उल-सिराज‘कृत ‘तबकात-ए-नासिरी’, जियाउद्दीन बरनी कृत ‘तारीख़-ए-फ़िरोजशाही’ एवं अबुल फ़ज़ल कृत ‘अकबरनामा’ आदि है।

     

    प्रमुख अभिलेख जिससे प्राचीन भारत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है –

     अभिलेख शासक 
     हाथीगुम्फा अभिलेख कलिंग राज खारवेल
     जूनागढ़ अभिलेख रूद्रदामन
     नासिक अभिलेख गौतमी बलश्री
     प्रयाग स्तंभ लेख समुद्रगुप्त
     ऐहोल अभिलेख पुलकेशिन द्वितीय
     मंदसौर अभिलेख मालवा नरेश यशोवर्मन
     ग्वालियर अभिलेख प्रतिहार नरेश भोज
     भीतरी जूनागढ़ अभिलेख स्कंदगुप्त
     देवपाड़ा अभिलेख विजयसेन

    और पढ़ें : वैदिक सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, धर्म और साहित्य

     

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  • सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी एवं इसका विस्तार

    सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी एवं इसका विस्तार

    रेडियो कार्बन जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2400 ई० पू० से 1700 ई० पू० मानी गयी है! सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की! सिंधु सभ्यता को प्राकऐतिहासिक अथवा कांस्य युग में रखा जा सकता है! सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल दाश्क नदी के किनारे स्थित सूतकागेंडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल हिंडन नदी के किनारे गोदावरी नदी के तट पर आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तर प्रदेश), उत्तरी पुरास्थल चिनाब नदी के तट पर अखनूर के निकट मांदा (जम्मू कश्मीर) तथा दक्षिणी पुरास्थल दाइमाबाद (जिला अहमदनगर, महारष्ट्र) माना जाता है!

     

    सिन्धु घाटी सभ्यता का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक था। यह इन्दुस या इन्डस नदी (indus river) के किनारे बसने वाली सभ्यता थी और अपनी भौगौलिक उच्चारण की भिन्नताओं की वजहों से इस इन्डस को सिन्धु कहने लगे, आगे चल कर इसी से यहां के रहने वाले लोगो के लिये हिन्दू उच्चारण का जन्म हुआ। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से इस सभ्यता के प्रमाण मिले हैं! अतः विद्वानों ने इसे सिन्धु घाटी की सभ्यता का नाम दिया, क्योंकि यह क्षेत्र सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में आते हैं, पर बाद में रोपड़, लोथल, कालीबंगा, वनमाली, रंगापुर आदि क्षेत्रों में भी इस सभ्यता के अवशेष मिले जो सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र से बाहर थे। अतः कई इतिहासकारों ने इस सभ्यता का प्रमुख केन्द्र हड़प्पा होने के कारण इस सभ्यता को “हड़प्पा सभ्यता” नाम देना अधिक उचित मानते समझा!

     

    सिंधु सभ्यता या सैंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी! सैंधव सभ्यता से प्राप्त परिपक्व अवस्था वाले स्थलों में केवल 6 को ही बड़े नगर की संज्ञा दी गयी है, ये हैं – मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलावीरा, राखीगढ़ी एवं कालीबंगन! स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए हैं! लोथल एवं सुतकोतदा सिंधु सभ्यता के बंदरगाह थे! दिसम्बर २०१४ में भिरड़ाणा को सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर (7000 ई० पू० से अधिक पुराना) माना गया है। ब्रिटिश काल में हुई खुदाइयों के आधार पर पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं।

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    जुते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है! मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार संभवतः सैंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है! मोहनजोदड़ो से प्राप्त वृहत स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जिसके मध्य स्थित स्नानकुंड 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा एवं 2.43 मीटर गहरा है! अग्निकुंड लोथल एवं कालीबंगन से प्राप्त हुआ है! मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता (पशुपति नाथ) की मूर्ति मिली है! उनके चारो ओर हाथी, गैंडा, चीता एवं भैंसा विराजमान है! मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक कांस्य की मूर्ति मिली है! हड़प्पा की मोहरों पर सबसे अधिक एक श्रृंगी पशु का अंकन मिलता है! मनके बनाने के कारखाने लोथल एवं चुहन्दड़ो में मिले हैं!

     

    सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है! यह लिपि दायीं से बाई ओर लिखी जाती थी! जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दायीं से बाईं ओर और दूसरी पंक्ति बाईं से दायीं ओर लिखी जाती थी! सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रिड पद्धति अपनाई! घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे! केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे! सिंधु सभ्यता में मुख्य फसल थी गेहूँ और जौ! सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे! रंगपुर एवं लोथल से चावल के दाने मिले हैं, जिनसे धान की खेती होने के प्रमाण मिलता है! चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल से ही प्राप्त हुए हैं!

     

    सुरकोतदा, कालीबंगन एवं लोथल से सैंधवकालीन घोड़े के अस्थि पंजर मिले हैं! तौल की इकाई संभवतः 16 के अनुपात में थी! सैंधव सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों एवं चार पहियों वाली बैलगाड़ी या भैंसागाड़ी का उपयोग करते थे! मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का प्रयोग सिंधु घाटी सभ्यता के लिए ही किया गया है! संभवतः हड़प्पा संस्कृति का शासन वर्णिक वर्ग के हाथों में था! पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वां राजधानी कहा है!

     

    सिंधु घाटी के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा करते थे! वृक्ष पूजा एवं शिव पूजा के प्रचलन के साक्ष्य भी सिंधु घाटी सभ्यता से मिलते हैं! स्वस्तिक चिह्न संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है! इस चिह्न से सूर्योपासना का अनुमान लगाया जाता है! सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं! सिंधु घाटी सभ्यता में मातृदेवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी! पशुओं में कूबड़ वाला सांड इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पूजनीय था! स्त्री मृन्मूर्तियाँ (मिटटी की मूर्तियाँ) अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है की सैंधव समाज मातृसतात्मक था!

     

    सैंधव सभ्यता के लोग सूती एवं ऊनि वस्त्रों का उपयोग करते थे! मनोरंजन के लिए मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़, पासा खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे! सिंधु घाटी सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन किए हुए लाल मिटटी के बर्तन बनाते थे! सिंधु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे! कालीबंगन एक मात्र हड़प्पाकालीन स्थल था, जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था! यहाँ से पूर्व हड़प्पा स्तरों के खेत जोते जाने के और अग्निपूजा की प्रथा के प्रमाण मिले हैं! मोहनजोदड़ो में शवों को जलाने की प्रथा विद्यमान थी! लोथल एवं कालीबंगा से युग्म समाधियाँ मिली है! आग में पकी हुई मिटटी को टेराकोटा कहा जाता था! इस सभ्यता के बाद जो सभ्यता विकास में आई वो सभ्यता थी वैदिक सभ्यता जिसमें भारतीय धर्मग्रंथ एवं दर्शन का विकास हुआ!

     

    सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल, नदी एवं उत्खननकर्ता :

     स्थल नदी  उत्खननकर्ता वर्ष स्थिति 
     हड़प्पा रावी दयाराम साहनी एवं माधोस्वरूप वत्स 1921 पाकिस्तान का मोंटगोमरी
     मोहनजोदड़ो सिंधु राखालदास बनर्जी 1922 पाकिस्तान के सिंध प्रांत का लरकाना
     चन्हुदड़ो सिंधु गोपाल मजुमदार 1931 पाकिस्तान के सिंध प्रांत
     कालीबंगन घग्घर बी बी लाल एवं बी के थापर 1953 राजस्थान का हनुमानगढ़
     कोटदिजी सिंधु फजल अहमद 1953 सिंध प्रांत का खैरपुर
     रंगपुर मादर रंगनाथ राव 1953 – 1954 गुजरात का काठियावाड़
     रोपड़ सतलज यज्ञदत्त शर्मा 1953 – 1956 पंजाब का रोपड़
     लोथल भोगवा रंगनाथ राव 1955 – 1962 गुजरात का अहमदाबाद
     आलमगीरपुर हिंडन यज्ञदत्त शर्मा 1958 उत्तर प्रदेश का मेरठ
     सुतकांगेडोर दाश्क ऑरेज स्टाइल, जॉर्ज डेल्स 1927 – 1962 पाकिस्तान के मकरान
     बनमाली रंगोई रविंद्र सिंह बिष्ट 1974 हरियाणा का हिसार
     धौलावीरा रविंद्र सिंह बिष्ट 1990 – 1991 गुजरात का कच्छ

    और पढ़ें : भारत की आजादी के महान शहीद

     

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  • वैदिक सभ्यता, साहित्य, दर्शन और धर्म से जुड़ी जानकारी

    वैदिक सभ्यता, साहित्य, दर्शन और धर्म से जुड़ी जानकारी

    सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के पश्चात भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ उसे ही आर्य (Aryan) अथवा वैदिक सभ्यता (Vedic Civilization) के नाम से जाना जाता है। इस काल की जानकारी हमे मुख्यत: वेदों से प्राप्त होती है, जिसमे ऋग्वेद सर्वप्राचीन होने के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वैदिक काल का विभाजन दो भागों में किया जाता है – ऋग्वैदिक काल (1500 से 1000 ई० पू०) और उत्तर वैदिककाल (1000 से 600 ई० पू०)! वैदिक सभ्यता आर्यों द्वारा निर्मित वैदिक सभ्यता थी! आर्यों द्वारा विकसित सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी! आर्यों की भाषा संस्कृत थी!

     

    इस काल की तिथि निर्धारण जितनी विवादास्पद रही है उतनी ही इस काल के लोगों के बारे में सटीक जानकारी। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस समय तक केवल इसी ग्रंथ (ऋग्वेद) की रचना हुई थी। मैक्स मूलर के अनुसार आर्य का मूल निवास मध्य एशिया है। मैक्स मूलर ने जब अटकलबाजी करते हुए इसे 1200 ईसा पूर्व से आरंभ होता बताया था तब उसके समकालीन विद्वान डब्ल्यू. डी. ह्विटनी ने इसकी आलोचना की थी। उसके बाद मैक्स मूलर ने स्वीकार किया था कि “पृथ्वी पर कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो निश्चित रूप से बता सके कि वैदिक मंत्रों की रचना 1000 ईसा पूर्व में, 1500 ई० पू० में, 2000 ई० पू० में या 3000 ई० पू० में हुई!

     

    ऐसा माना जाता है कि आर्यों का एक समूह भारत के अतिरिक्त ईरान और यूरोप की तरफ़ भी गया था। ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता की सूक्तियां ऋग्वेद से मिलती जुलती हैं। अगर इस भाषिक समरूपता को देखें तो ऋग्वेद का रचनाकाल 1000 ईसा पूर्व आता है। लेकिन बोगाज-कोई में पाए गए 1400 ईसा पूर्व के अभिलेख में हिंदू देवताओं इंद्र, मित्रावरुण, नासत्य इत्यादि को देखते हुए इसका काल और पीछे माना जा सकता है। बाल गंगाधर तिलक ने ज्योतिषीय गणना करके इसका काल 6000 ई.पू. माना था। हरमौन जैकोबी ने जहाँ इसे 4500 ईसापूर्व से 2500 ईसापूर्व के बीच आंका था वहीं सुप्रसिद्ध संस्कृत विद्वान विंटरनित्ज़ ने इसे 3000 ईसापूर्व का बताया था।

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    आर्यों के प्रशासनिक इकाई पांच भागों में बंटा हुआ था – कुल, ग्राम, विश, जन, राष्ट्र! ग्राम के मुखिया ग्रामिणी एवं विश का प्रधान विशपति कहलाते थे! जन के सेवक को राजन कहा जाता था! राज्याधिकारियों में पुरोहित एवं सेनानी प्रमुख थे! सूत, रथकार तथा कम्मादी नामक अधिकारी रत्नी कहे जाते थे! इनकी संख्या राजा सहित करीब 12 हुआ करती थी! पुरप – दुर्गपति, स्पश – जनता की गतिविधियों को देखने वाले गुप्तचर होते थे! वाजपति – गोचर भूमि का अधिकारी होता था! उग्र – अपराधियों को पकड़ने का कार्य करता था! सभा एवं समिति राजा को सलाह देने वाली संस्था थी! सभा श्रेष्ठ एवं संभ्रांत लोगों की संस्था थी जबकि समिति सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व करती थी! इसके अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था!

     

    युद्ध में काबिले का नेतृत्व राजा करता था! युद्ध के लीए गविष्टि शब्द का प्रयोग किया जाता था, जिसका अर्थ है गायों की खोज! दसराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद के 7वें मंडल में है, यह युद्ध परुषणी (रावी) नदी के तट पर सुदास एवं दस जनों के बिच लड़ा गया जिसमें सुदास विजयी रहा! ऋग्वैदिक समाज चार वर्णों में विभाजित था, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र! यह विभाजन व्यवसाय पर आधारित था! ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुषसूक्त में चतुर्थवर्णों का उल्लेख मिलता है! इसमें कहा गया है की ब्राह्मण परम पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जांघों से एवं शुद्र उनके पैरों से उत्पन्न हुए हैं!

     

    आर्यों का समाज पितृप्रधान था! समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल थी, जिसका मुखिया पिता होता था, जिसे कुलप कहा जाता था! स्त्रियाँ इस काल में अपनी पति के साथ यज्ञ कार्य में भाग लेती थी! बाल विवाह एवं पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था! विधवा विवाह होता था, विधवा अपने पति के छोटे भाई (देवर) से विवाह कर सकती थी! स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण करती थी! ऋग्वेद में लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, आपला एवं विश्वास जैसी विदुषी स्त्रियों का वर्णन है! जीवन भर अविवाहित रहनेवाली स्त्रियों को अमाजू कहा जाता था! ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की ही पूजा की जाती थी, कर्मकांडों की ज्यादा प्रमुखता नहीं थी!

     

    आर्यों का मुख्य पेय पदार्थ सोमरस था, यह वनस्पति से बनाया जाता था! आर्य मुख्यतः तीन प्रकार के वस्त्रों का उपयोग करते थे – वास, अधिवास, उष्णीय! अंदर पहनने वाले कपड़े को नीवि कहा जाता था! आर्यों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे – संगीत, रथदौड़, घुडदौड़, द्युतक्रीड़ा! आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन एवं कृषि था! गाय को अघ्न्या – न मारे जाने योग्य पशु की श्रेणी में रखा गया था! गाय की हत्या करने वाले या उसे घायल करने वाले के लिए वेदों में मृत्युदंड अथवा देश निकाले की व्यवस्था की गई थी! आर्यों का प्रिय पशु घोड़ा एवं सर्वाधिक प्रिय देवता इंद्र थे! ऐसे माना जाता है की भारतीय धर्मग्रंथ, दर्शन एवं वैदिक साहित्य जिनमें वेद, वेदांग, दर्शन, सूत्र, उपनिषद, महापुराण वगैरह की रचना इसी काल में हुए!

     

    आर्यों द्वारा खोजी गई धातु लोहा थी! जिसे श्याम अयस कहा जाता था! ताम्बे को लोहित अयस कहा जाता था! व्यापार हेतु दूर दूर तक जानेवाला व्यक्ति को पणी कहते थे! लेनदेन में वस्तु विनियम की प्रणाली प्रचलित थी! ऋण देकर ब्याज लेने वाला व्यक्ति को वेनकॉट (सूदखोर) कहा जाता था! मनुष्य एवं देवता के बिच मध्यम की भूमिका निभानेवाले देवता के रूप में अग्नि की पूजा की जाती थी! ऋग्वेद में उल्लिखित सभी नदियों में सरस्वती सबसे महत्वपूर्ण तथा पवित्र मानी जाती थी! ऋग्वेद में गंगा का एकबार और यमुना का तीन बार उल्लेख हुआ है! इसमें सिंधु नदी का उल्लेख सर्वाधिक बार हुआ है!

     

    उत्तरवैदिक काल में राजा के राज्याभिषेक के समय राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था! उत्तरवैदिक काल में वर्ण व्यवसाय की बजाय जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगे थे! उत्तरवैदिक काल में हल को सिरा और हल रेखा को सीता कहा जाता था! उत्तरवैदिक काल में निष्क और शतमान मुद्रा की इकाइयाँ थी, लेकिन इस काल में किसी खास भार, आकृति और मूल्य के सिक्कों के चलन का कोई प्रमाण नहीं मिलता! सांख्य दर्शन भारत के सभी दर्शनों में सबसे प्राचीन है! इसके अनुसार मूल तत्व पच्चीस हैं, जिनमें प्रकृति पहला तत्व है! ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डकोपनिषद से लिया गया है! इसी उपनिषद में यज्ञ की तुलना टूटी नाव से की गई है! गायत्री मंत्र सावित्री नामक देवता को संबोधित है, जिसका संबंध ऋग्वेद से है! उत्तरवैदिक काल में कौशाम्बी नगर प्रथम बार पक्की ईटों का प्रयोग किया गया था! महाकाव्य दो हैं – रामायण और महाभारत! महाभारत का पुराना नाम जयसंहिता है! यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है! गोत्र नामक संस्था का जन्म उत्तरवैदिक काल में हुआ!

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  • गौतम बुद्ध, बौद्ध धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

    गौतम बुद्ध, बौद्ध धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

    बौद्ध धर्म की स्थापना महात्मा गौतम बुद्ध ने किया था! इन्हें एशिया का ज्योति पुंज कहा जाता है! गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई० पू० में कपिलवस्तु के लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था! इनके पिता शुद्धोधन शक्य गण के मुखिया थे! इनकी माता मायादेवी की मृत्यु इनके जन्म के सातवें दिन ही हो गई थी! इनका लालन पालन इनकी सौतेली माँ प्रजापति गौतमी ने किया था! इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था!

     

    गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हो गया था! जिससे उन्हें एक राहुल नाम का पुत्र प्राप्त हुआ! सिद्धार्थ जब कपिलवस्तु की सैर पर निकले तो उन्होंने चार दृश्यों को देखा – बूढ़ा व्यक्ति, बीमार व्यक्ति, शव और संयासी! इन सब दृश्यों को देखकर सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग किया, जिसे बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा गया है!

     

    गृह त्याग करने के बाद सिद्धार्थ ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ली, इस तरह आलारकलाम सिद्धार्थ के पहले गुरु हुए! आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रूद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की! फिर उरुवेला में सिद्धार्थ को कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा एवं अस्सागी नामक पांच साधक मिले! जिसके बाद उन्होंने बिना अन्न जल ग्रहण किये लगभग 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे, पीपल वृक्ष के निचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ!

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    गौतम बुद्ध के ज्ञान प्राप्त करने के संबंध में एक स्थानीय मान्यता ये भी है की 6 वर्ष के कठिन तपस्या और शरीर जर्जर होने के बावजूद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई, तब संत सुजाता ने उन्हें खीर खिलाकर ज्ञान दिक्षा भी प्रदान की, जिसके बाद सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ और वो कुछ समय के लिए समाधि की अवस्था में चले गए! समाधि से लौटने के बाद उन्होंने ज्ञान का प्रचार प्रसार आरंभ किया! ज्ञान प्राप्त होने के बाद वो बुद्ध कहलाए, और जगह आज बोध गया के नाम से प्रसिद्द हुआ!

     

    बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया! बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा पालि में दिए! बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, वैशाली, कौशाम्बी तथा और भी कई राज्यों में दिए! बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कोशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिए! इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे – बिम्बिसार, प्रसेनजित तथा उदियन! बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ई० पू० में कुशीनगर में कुंडा द्वारा अर्पित भोजन करने के उपरांत हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है! मल्लों ने अत्यंत सम्मानपूर्वक बुद्ध की अंत्येष्टि संस्कार किया! एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भाग में बांटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया! बुद्ध के जन्म एवं मृत्यु की तिथि को चीनी परंपरा के कैंटोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है!

     

    बौद्ध धर्म के बारे में अधिकतर जानकारियां हमें विशद ज्ञान त्रिपिटक (विनयपिटक, सूत्रपिटक, अभिदग्भपिटक) से प्राप्त होता है! तीनों पिटकों की भाषा पालि है! बौद्ध धर्म मूलतः अनीश्वरवादी है, इसमें आत्मा की भी परिकल्पना नहीं है! लेकिन इसमें पुनर्जन्म की मान्यता है! तृष्णा के क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है! विश्व दुखों से भरा है का सिद्धांत बुद्ध ने उपनिषद से लिया है! बौद्धसंघ में शामिल होने के लिए न्यूनतम आयु 15 वर्ष थी! बौद्ध संघ में प्रविष्टि होने को उपसम्पदा कहा जाता था! बौद्धधर्म के त्रिरत्न हैं – बुद्ध, धम्म एवं संघ! बुद्ध के अनुयायी दो भागो में विभाजित थे –

    1. भिक्षुक – बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन्होंने संन्यास ग्रहण किया, उन्हें भिक्षुक कहा गया!
    2. उपासक : गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को उपासक कहा गया!

     

    बौद्ध सभाएं :

     सभा स्थान
    अध्यक्ष
    शासनकाल
     प्रथम बौद्ध संगीति
    राजगृह महाकश्यप अजातशत्रु
     द्वितीय बौद्ध संगीति
    वैशाली सबाकामी कालाशोक
     तृतीय बौद्ध संगीति
    पाटलिपुत्र मोग्गालिपुत्त तिस्स अशोक
     चतुर्थ बौद्ध संगीति
    कुण्डलवन वसुमित्र/अश्वघोष कनिष्क

     

    चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों हीनयान एवं महायान में विभाजित हो गया! धार्मिक जुलुस का प्रारंभ सबसे पहले बौद्ध धर्म के द्वारा ही आरंभ किया गया! बौद्धों का सबसे प्रमुख त्योहार वैशाख पूर्णिमा है, जिसे गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं! इसका महत्व इसलिए है की इसी दिन बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति एवं महापरिनिर्वाण हुआ था!

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    बुद्ध ने सांसारिक दुखों के संबंध में चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया – दुःख, दुःख समुदाय, दुःख निरोध एवं दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा! इन सांसारिक दुखों से मुक्ति हेतु बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही, ये साधन हैं – सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति एवं सम्यक समाधि! बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरांत मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त हो जाता है!

     

    निर्वाण बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है दीपक का बुझ जाना अर्थात जीवन मरण चक्र से मुक्त हो जाना! बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति को सरल बनाने के लिए निम्न दस शिलों पर दिया – अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (सम्पति न रखना), मद्य सेवन न करना, असमय भोजन न करना, सुखप्रद विस्तर पर न सोना, धन संचय न करना, स्त्रियों से दूर रहना, नृत्य गान आदि से दूर रहना शामिल है! गृहस्थों के लिए प्रथम पांच शील तथा भिक्षुओं के लिए दसों शील मानना अनिवार्य था!

     

    बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया! जातक कथाएँ प्रदर्शित करती है की बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है और पशुओं के रूप में भी! बोधिसत्व के रूप में पुनर्जन्मों की दीर्घ श्रृंखला के अंतर्गत बुद्ध ने शक्य मुनि के रूप में अपना अंतिम जन्म प्राप्त किया किंतु इसके उपरांत मैत्रेय तथा अन्य अनाम बुद्ध अभी अवतरित होने शेष हैं! बोधिसत्व जब दस बलों या भूमियों (मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती, धम्म-मेघा) को प्राप्त कर लेते हैं तब ” गौतम बुद्ध ” कहलाते हैं, बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है। तिब्बत, भूटान एवं पड़ोसी देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार पद्मसंभव (गुरु रिनपाँच) ने किया! इनका संबंध बौद्ध धर्म के बज्रयान शाखा से था!

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  • भारत के प्रमुख राजवंश, संस्थापक तथा उनके क्षेत्र या राजधानी

    भारत के प्रमुख राजवंश, संस्थापक तथा उनके क्षेत्र या राजधानी

     राजवंश संस्थापक
    राजधानी
     हर्यक वंश
    बिम्बिसार राजगृह
     शिशुनाग वंश
    शिशुनाग वैशाली
     नंद वंश
    महापद्मनंद पाटलिपुत्र
     मौर्य वंश
    चंद्रगुप्त पाटलिपुत्र
     कणव वंश
    वासुदेव पाटलिपुत्र
     सातवाहन सिमुक प्रतिष्ठान

     

     गुप्त वंश
    श्रीगुप्त
    पाटलिपुत्र
     हूण वंश
    तोरमाण स्यालकोट
     सेन वंश
    सामंत सेन लखनौती
     परमार वंश
    उपेन्द्र धारा नगरी
     गहड़वाल वंश
    चंद्रदेव कन्नौज
     गुर्जर प्रतिहार
    नागभट्ट प्रथम कन्नौज
     राष्ट्रकूट दन्तिदुर्ग मान्यखेट

     

     कुषाण वंश
    कुजल कडफिसेस
    पुरुषपुर
     वर्धन वंश
    पुष्यभूति थानेश्वर/कन्नौज
     चंदेल वंश
    नन्नुक खजुराहो/महोवा
     पल्लव वंश
    सिंह वर्मन चतुर्थ कांचीपुरम
     शुंग वंश
    पुष्यमित्र शुंग पाटलिपुत्र
     चालुक्य (बादामी)
    जयसिंह प्रथम वातापी
     चालुक्य (बेंगी)
    विष्णुवर्धन बेंगी

     

     चालुक्य (कल्याणी)
    तैलप – II
    मान्यखेट/कल्याण
     गुलाम वंश
    कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली
     खिलजी वंश
    जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली
     तुगलक वंश
    गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली
     कुतुबशाही वंश
    कुली कुतुबशाह गोलकुंडा
     आदिलशाही वंश
    आदिलशाह बीजापुर
     सैय्यद वंश
    खिज्र खां दिल्ली

     

     लोदी वंश
    बहलोल लोदी
    दिल्ली
     चोल वंश
    विजयालय तंजौर
     पांड्य वंश
    नेडीयोन मदुरै
     यादव वंश
    भिल्लभ -V देवगिरी
     होयसाल वंश
    विष्णुवर्धन द्वार समुद्र
     कलचुरि वंश
    कोकल्ल त्रिपुरी
     सालुव वंश
    नरसिंह विजयनगर

     

     तुलुव वंश
    वीर नरसिंह
    विजयनगर
     सोलंकी वंश
    मूलराज अन्हिलवाड़
     शर्की वंश
    मलिक सरवर जौनपुर
     भोंसले वंश
    शिवाजी रायगढ़
     पाल वंश
    गोपाल मुंगेर
     चौहान वंश
    वासुदेव अजमेर
     लोहार वंश
    संग्राम राज

     

     निजामशाही मलिक अहमद
    अहमदनगर
     इमादशाही फ़तेहउल्ला इमादशाह बरार
     संगम वंश
    हरिहर एवं बुक्का विजयनगर
     बहमनी वंश
    हसन गंगु गुलबर्गा
     आरवीडू वंश
    तिरुमल पेनुकोंड
     बरिदशाही अमीर अली बरिद बीदर
     मुग़ल वंश
    बाबर दिल्ली/आगरा
    उत्पल वंश अवंती वर्मन कश्मीर
    कार्कोट वंश दुर्लभ वर्धन कश्मीर

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  • भारत की ऐतिहासिक लड़ाइयाँ, काल एवं संबंधित राज्य व्यवस्था

    भारत की ऐतिहासिक लड़ाइयाँ, काल एवं संबंधित राज्य व्यवस्था

     प्रमुख युद्ध
    वर्ष
    किसके बिच युद्ध हुआ
     तराइन का प्रथम युद्ध
    1191 ई० पृथ्वीराज चौहान एवं मुहम्मद गोरी
     तराइन का द्वितीय युद्ध
    1192 ई० पृथ्वीराज चौहान एवं मुहम्मद गोरी
     चन्दावर का युद्ध
    1194 ई० मुहम्मद गोरी एवं जयचंद
     पानीपत की पहली लड़ाई
    1526 ई० बाबर एवं इब्राहीम लोदी

     

     खानवा का युद्ध
    1527 ई०
    बाबर एवं राणा सांगा
     चंदेरी का युद्ध
    1528 ई० बाबर एवं मेदनीराय
     घाघरा का युद्ध
    1529 ई० बाबर एवं अफगान
     चौसा का युद्ध
    1539 ई० शेरशाह सूरी एवं हुमायूँ
     कन्नौज का युद्ध
    1540 ई० शेरशाह सूरी एवं हुमायूँ

     

     पानीपत की दूसरी लड़ाई
    1556 ई०
    अकबर एवं हेमू
     तालीकोट का युद्ध
    1565 ई० दक्कन के सल्तनतों एवं विजयनगर साम्राज्य के बिच
     हल्दीघाटी का युद्ध
    1576 ई० अकबर एवं महाराणा प्रताप
     पलासी का युद्ध
    1757 ई० अंग्रेज एवं सिराजुद्दौला
     वाडिवास का युद्ध
    1760 ई० फ्रांसीसियों की पराजय

     

     पानीपत की तीसरी लड़ाई
    1761 ई०
    अहमद शाह अब्दाली एवं मराठा
     बक्सर का युद्ध
    1764 ई० अंग्रेज एवं मीरकासिम
     रूहेला का युद्ध
    1774 ई० हाफिज रहमत खान एवं नवाब शुजाउद्दौला
     खुर्दा का युद्ध
    1795 ई० निजाम एवं मराठों के बिच
     प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
    1857 ई० भारतीय आंदोलनकारी एवं अंग्रेजों के बिच

     

    भारत चीन युद्ध 1962 ई०  भारत एवं चीन के बिच
    प्रथम भारत पाक युद्ध 1965 ई० भारत एवं पाकिस्तान के बिच
    द्वितीय भारत पाक युद्ध 1971 ई० भारत एवं पाकिस्तान
    कारगिल युद्ध 1999 ई० भारत एवं पाकिस्तान

    और पढ़ें : सिंधु घाटी सभ्यता और इसका विस्तार

     

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  • भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित पत्र, पत्रिकाएँ एवं पुस्तकें

    भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित पत्र, पत्रिकाएँ एवं पुस्तकें

     पत्र, पत्रिकाएँ एवं पुस्तकें
     लेखन/संपादक
     अभ्युदय, लीडर, हिंदुस्तान
    मदनमोहन मालवीय
     इंडियन मिरर, वाम वोधिनी
    केशवचंद्र सेन
     इंडिपेंडेंट मोतीलाल नेहरु
     काल परांजपे

     

     कामरेड, हमदर्द
    मुहम्मद अली
     केसरी, द मराठा, गीता रहस्य
    बाल गंगाधर तिलक
     कर्मयोगी, युगांतर, वन्देमातरम, लाइफ डिवाइन, सावित्री
    अरविंद घोष
     नेशन गोपाल कृष्ण गोखले
     बंगाली, ए नेशन इन मेकिंग
    सुरेंद्र नाथ बनर्जी

     

     भवानी मंदिर
    बरिन्द्र कुमार घोष
     यंग इंडिया, हरिजन, नवजीवन, हिंद स्वराज, माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रूथ
    महात्मा गाँधी
     संवाद कौमुदी
    राजाराम मोहन राय
     सोमप्रकाश ईश्वरचंद्र विद्यासागर
     अमृतबाजार पत्रिका
    शिशिर कुमार घोष

     

     कॉमन विल, न्यू इंडिया
    एनी बेसेंट
     फ्री हिंदुस्तान
    तारकनाथ दास
     द रिवोल्यूशनरी
    शचीन्द्रनाथ सान्याल
     पावर्टी एंड अन ब्रिटिश रुल इन इंडिया, रस्ट गुफ्तुर
    दादाभाई नैरोजी
     इंडिया डिवाइडेड
    राजेन्द्र प्रसाद

     

     अनहैपी इंडिया
    लाला लाजपत राय
     इंडिया विन्स फ्रीडम, गुबारे खातिर, अल हिलाल
    अबुल कलाम आजाद
     डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया, ग्लिम्पसेज ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री, मेरी कहानी
    जवाहरलाल नेहरु
     हिंट्स फॉर सेल्फ कल्चर
    लाला हरदयाल
     इंडियन अनरेस्ट
    सर वैलेंटाइन शिरौल

     

     इंडिया फॉर इंडियंस
    चितरंजन दास
     वॉर ऑफ़ इंडियन इंडिपेंडेंस
    वीर सावरकर
     होम एंड द वर्ल्ड, गीतांजलि
    रविन्द्रनाथ ठाकुर
     नील दर्पण
    दीनबंधु मित्र
     सोजे वतन, कर्मभूमि, शतरंज के खिलाड़ी
    प्रेमचंद

     

     बांगे दरा, तराने हिंद
    मुहम्मद इक़बाल
     भारत भारती
    मैथलीशरण गुप्त
     भारत दुर्दशा
    भारतेंदु हरिश्चंद
     कांग्रेस का इतिहास
    पट्टाभि सीतारमय्या
     सत्यार्थ प्रकाश
    दयानंद सरस्वती
    इंडियन स्ट्रगल सुभाष चंद्र बोस
    आनंदमठ, देवी चौधुरानी बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय

    और पढ़ें : भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से सम्बंधित महत्वपूर्ण संगठन

     

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  • भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित महत्वपूर्ण आंदोलन एवं घटनाएँ

    भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित महत्वपूर्ण आंदोलन एवं घटनाएँ

     आंदोलन एवं घटनाएँ
    वर्ष
    संबंधित विषय एवं व्यक्ति
     भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
    1885 ए ओ ह्युम (बम्बई)
     बंग भंग आंदोलन
    1905 बंगाल विभाजन के खिलाफ
     मुस्लिम लीग की स्थापना
    1906 आगा खां एवं सलीम उल्ला खां
     कांग्रेस का विभाजन
    1907 नरम दल एवं गरम दल में विभाजित
     होमरूल आंदोलन
    1916 तिलक एवं एनी बेसेंट
     लखनऊ पैक्ट
    1916 कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बिच समझौता

     

     मांटेग्यु घोषणा
    1917
    लार्ड मांटेग्यु की घोषणा
     रौलेट एक्ट
    1919 काला कानून
     जलियांवाला बाग़ हत्याकांड
    1919 जेनरल डायर
     खिलाफत आंदोलन
    1919 शौकत अली, मोहम्मद अली
     इंटर कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित
    1920 जालियांवाला बाग़ से संबंधित
     असहयोग आंदोलन आरंभ
    1920 महात्मा गाँधी
     चौरी चौरा कांड
    1922 इस घटना से असहयोग आंदोलन वापस

     

     स्वराज पार्टी की स्थापना
    1923
    मोतीलाल नेहरु एवं चितरंजन दास
     हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
    1924 शचींद्र सान्याल
     साइमन कमीशन की नियुक्ति
    1927 साइमन की अध्यक्षता में कमेटी का गठन
     साइमन कमिशन का भारत आगमन
    1928 लाला लाजपत राय के नेतृत्व में विरोध एवं लाठीचार्ज
     नेहरु रिपोर्ट
    1928 मोतीलाल नेहरु अध्यक्ष
     वारदोली आंदोलन
    1928 सरदार बल्लभ भाई के नेतृत्व में गुजरात में किसान आंदोलन
     लाहौर षड्यंत्र केस
    1929 भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा ब्रिटिश असेम्बली में बम फेंकना

    और पढ़ें : अंग्रेजी शासन के विरुद्ध महत्वपूर्ण विद्रोह एवं क्रांति

     

     कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
    1929
    पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव
     स्वाधीनता दिवस की घोषणा
    1930 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा
     नमक सत्याग्रह
    1930 गाँधी जी का डांडी जाकर नमक बनाना
     सविनय अवज्ञा आंदोलन
    1930 सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत
     प्रथम गोलमेज सम्मलेन
    1930 प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड की अध्यक्षता में
     गांधी इरविन समझौता
    1931 गाँधी जी और इरविन के बिच समझौता और सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित
     द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
    1931 गांधीजी ने सम्मेलन में भाग लिया

     

     कम्युनल अवार्ड
    1932
    मैकडोनाल्ड द्वारा पृथक प्रतिनिधित्व प्रदान करना
     पूना पैक्ट
    1932 गांधीजी और अम्बेडकर के बिच एक समझौता
     तृतीय गोलमेज सम्मेलन
    1932 इसमें कांग्रेस ने भाग नहीं लिया
     कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन
    1934 जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी, एस एम जोशी
     फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन
    1939 सुभाष चंद्र बोस
     मुक्ति दिवस
    1939 मुस्लिम लीग के द्वारा कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र पर मनाया गया
     पाकिस्तान की मांग
    1940 मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में

     

     अगस्त प्रस्ताव
    1940
    वायसराय लिनलिथगो
     क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव
    1942 स्टीफर्ड क्रिप्स
     भारत छोडो प्रस्ताव
    1942 महात्मा गाँधी
     शिमला सम्मलेन
    1945 सभी राजनैतिक दलों का सम्मेलन
     नौसेना का विद्रोह
    1946 मुंबई INS तलवार के सैनिकों द्वारा
     प्रधानमंत्री एटली की घोषणा
    1946 भारत को स्वतंत्र करने का आश्वासन
     कैबिनेट मिशन का आगमन
    1946 ब्रिटिश मंत्रिमंडल के तीन सदस्यों का भारत आगमन

     

     प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस
    1946
    मुस्लिम लीग द्वारा
     अंतरिम सरकार की स्थापना
    1946 नेहरु प्रधानमंत्री बने
     माउंटबेटन योजना
    3 जून 1947 वायसराय माउंटबेटन ने भारत विभाजन की योजना रखी
     स्वतंत्रता प्राप्ति
    15 अगस्त 1947 भारत स्वतंत्रता अधिनियम द्वारा
     भारतीय गणतंत्र की स्थापना
    26 जनवरी 1950 डॉ राजेन्द्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति बने

    और पढ़ें : भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से सम्बंधित महत्वपूर्ण संगठन

     

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