Category: शिक्षा

  • भारत के संविधान में केंद्र राज्य संबंध का वर्णन

    भारत के संविधान में केंद्र राज्य संबंध का वर्णन

    भारत में केंद्र राज्य संबंध संघवाद की ओर उन्मुख है और संघवाद की इस प्रणाली को कनाडा के संविधान से लिया गया है! भारतीय संविधान में केंद्र तथा राज्य के मध्य विधायी, प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियों का विभाजन किया गया है, लेकिन न्यायपालिका को विभाजन की परिधि से बाहर रखा गया है! भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र एवं राज्य की शक्तियों के बंटवारे से संबंधित तीन सूचि दी गई है – (i) संघ सूचि, (ii) राज्य सूचि, (iii) समवर्ती सूचि!

     

    संघ सूचि : संघ सूचि में उन विषयों को शामिल किया गया है, जो राष्ट्रीय महत्त्व के हैं तथा जिन पर कानून बनाने का एकमात्र अधिकार केन्द्रीय विधायिका अर्थात संसद को है! इस सूचि में इस समय कुल 100 (मूलतः 97) विषय हैं! जिनमें प्रमुखतः रक्षा, विदेशी मामले, युद्ध, अंतर्राष्ट्रीय संधि, अणु शक्ति, सीमा शुल्क, जनगणना, विदेशी ऋण, डाक एवं तार, प्रसारण, टेलीफोन, विदेशी व्यापार, रेल तथा वायु एवं जल परिवहन आदि!

     

    राज्य सूचि : इसमें उन विषयों को शामिल किया गया है, जो स्थानीय महत्त्व के हैं तथा जिन पर कानून बनाने का एकमात्र अधिकार राज्य विधानमंडल को है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थियों में संसद भी कानून बना सकता है! इस सूचि में शामिल विषयों की संख्या 61 (मूलतः 66) है! जिनमें प्रमुख हैं लोक सेवा, कृषि, वन, कारागार, भू-राजस्व, लोक व्यवस्था, पुलिस, लोक स्वास्थ्य, स्थानीय शासन, क्रय, विक्रय एवं सिंचाई आदि!

     

    समवर्ती सूचि : इसमें शामिल विषयों पर संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों द्वारा कानून बनाया जाता है! और यदि दोनों कानूनों में विरोध हो तो संसद द्वारा निर्मित कानून लागु होगा! इसमें इस समय 52 विषय (मूलतः 47) है! उनमें प्रमुख हैं – राष्ट्रीय जलमार्ग, परिवार नियोजन, जनसँख्या नियंत्रण, समाचार पत्र, कारखाना, बाट तथा माप, जानवर तथा पक्षियों की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक तथा सामाजिक योजना!

     

    अवशिष्ट सूचि : जिन विषयों को संघ सूचि, राज्य सूचि और समवर्ती सूचि में नहीं शामिल किया गया है, उन पर कानून बनाने का अधिकार संसद को प्रदान किया गया है!

    और पढ़ें : राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत एवं मौलिक अधिकार

     

    राज्य सूचि के विषयों पर कानून बनाने की संसद की शक्ति : संविधान के अनुच्छेद 249 में यह प्रावधान किया गया है की यदि राज्यसभा अपने उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से यह पारित कर दे की राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर संसद राज्य सूचि के विषयों पर कानून बनाए, तो संसद को राज्य सूचि में वर्णित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है! संसद द्वारा इस प्रकार बनाए गए कानून एक वर्ष के लिए प्रवर्तनीय होता है, लेकिन राज्यसभा द्वारा पारित कर इसे बार बार कई वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकता है! राज्यों की सहमति से भी संसद राज्य सूचि पर कानून बना सकता है! राष्ट्रीय आपात एवं राष्ट्रपति शासन के समय भी संसद को राज्य सूचि पर कानून बनाने का अधिकार होता है!

     

    संघ के प्रमुख राजस्व के स्रोत हैं : निगम कर, सीमा शुल्क, निर्यात शुल्क, कृषि भूमि को छोड़कर अन्य सम्पति पर सम्पदा शुल्क, विदेशी ऋण, रेल, रिजर्व बैंक तथा शेयर बाजार!

     

    राज्य के प्रमुख राजस्व स्रोत हैं : व्यक्ति कर, कृषि, भूमि पर कर, सम्पदा शुल्क, भूमि एवं भवनों पर कर, पशुओं तथा नौकायान पर कर, विक्रय कर, वाहनों पर चुंगी!

     

    केंद्र एवं राज्यों के मध्य विवाद को सुलझाने के लिए मुख्यतः चार आयोग गठित किए गए, जो इस प्रकार हैं – प्रशासनिक सुधार आयोग, राजमन्नार आयोग, भगवान सहाय समिति एवं सरकारिया आयोग!

     

    इसके अलावे केंद्र और बिच समन्वय और समग्र विकास के लिए अंतर्राज्य परिषद्, योजना आयोग (अब नीति आयोग), राष्ट्रिय विकास परिषद् आदि की स्थापना की गई है!

     

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  • भारत की संघीय कार्यपालिका एवं उसकी संरचना

    भारत की संघीय कार्यपालिका एवं उसकी संरचना

    राष्ट्रपति : भारतीय संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है! भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है! अतः राष्ट्रपति नाम मात्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है! राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रधान होता है! राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक कहलाता है!

     

    उपराष्ट्रपति : संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा! इस प्रावधान को अमेरिका से लिया गया है! भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है! उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है, अतः इसे मतदान का अधिकार नहीं है, किंतु सभापति के रूप में निर्णायक मत देने का अधिकार उसे प्राप्त है!

     

    प्रधानमंत्री एवं मंत्रिमंडल : संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति को उसके कार्यों के संपादन व सलाह देने हेतु एक मंत्री परिषद होती है, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है! संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा! मंत्री तीन प्रकार के होते हैं : कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री, उपमंत्री! मंत्रीपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है! यदि लोकसभा किसी एक मंत्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित करे अथवा उस विभाग से संबंधित विधेयक को रद्द कर दे, तो समस्त मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना होता है!

     

    संघीय संसद : भारत की संसद राष्ट्रपति, राज्यसभा तथा लोकसभा से मिलकर बनती है! संसद के निम्न सदन को लोकसभा एवं उच्च सदन को राज्यसभा कहते हैं! राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है! वर्तमान में यह संख्या 245 है, इनमें 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं! शेष 233 सदस्य संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं! लोकसभा एवं राज्यसभा के अधिवेशन राष्ट्रपति के द्वारा ही बुलाए और स्थगित किए जाते हैं! लोकसभा की दो बैठकों में 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए!

     

    संविधान के अनुच्छेद 108 में संसद के संयुक्त अधिवेशन की व्यवस्था है! संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती है! संयुक्त अधिवेशन राष्ट्रपति के द्वारा निम्न तीन स्थितियों में बुलाया जा सकता है – (i) दुसरे सदन द्वारा विधेयक अस्वीकार कर दिया गया हो, (ii) विधेयक पर किये जानेवाले संशोधनों के बारे में दोनों सदन अंतिम रूप से असहमत हो गए हैं, (iii) दुसरे सदन को विधेयक प्राप्त होने की तारीख से उसके द्वारा विधेयक पारित किए बिना 6 मास से अधिक बीत गए हों! संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त अधिवेशन की व्यवस्था नहीं है, संविधान संशोधन विधेयक दोनों सदनों में अलग अलग पारित होना चाहिए!

    और पढ़ें : भारतीय संविधान के प्रमुख अनुसूची और भाग

     

    धन विधेयक के संबंध में लोकसभा का निर्णय अंतिम होता है! लोकसभा अध्यक्ष द्वारा धन विधेयक के रूप में प्रमाणित विधेयक की प्रकृति के प्रश्न पर न्यायालय में या किसी सदन में या राष्ट्रपति द्वारा विचार नहीं किया जाएगा! संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा स्वयं ही अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का निर्वाचन करेगी! लोकसभा में विपक्ष के नेता को कैबिनेट स्तर के मंत्री के समान समस्त सुविधा प्राप्त होती है!

     

    लोकसभा में अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, और उपाध्यक्ष की भी अनुपस्थिति में राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए वरिष्ठ सदस्यों का पैनल में से कोई व्यक्ति पीठासीन होता है! इस पैनल में आमतौर पर 6 सदस्य होते हैं! सदन के सदस्यों के प्रश्नों को स्वीकार करना, उन्हें नियमित करना व नियम के विरुद्ध घोषित करना लोकसभा अध्यक्ष के कार्यक्षेत्र में आता है! एक समय में एक व्यक्ति केवल एक ही सदन का सदस्य रह सकता है! संसद सदयों को संसद की बैठक के पूर्व या बाद के 40 दिन की अवधि के दौरान गिरफ़्तारी से मुक्ति प्रदान की गई है! गिरफ़्तारी से यह मुक्ति केवल सिविल मामलों में है! आपराधिक मामले अर्थात निवारक निरोध की विधि के अधीन गिरफ़्तारी से छुट नहीं है!

     

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  • भारत के संविधान में निर्वाचन आयोग की व्यवस्था

    भारत के संविधान में निर्वाचन आयोग की व्यवस्था

    संविधान के भाग – 15 के अनुच्छेद 324 से 329 में निर्वाचन से संबंधित उपबंध दिया गया है! निर्वाचन आयोग का गठन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्तों से किया जाता है, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है! मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो तब तक होता है! पहले चुनाव आयुक्त एक सदस्यीय आयोग था, बाद में इसे तीन सदस्यीय आयोग बना दिया गया!

     

    निर्वाचन आयोग के मुख्य कार्य :

    (i) चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन (ii) मतदाता सूचि तैयार करवाना (iii) विभिन्न राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना (iv) राजनीतिक दलों को आरक्षित चुनाव चिह्न प्रदान करना (v) चुनाव करवाना (vi) राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता तैयार करवाना

     

    निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए संवैधानिक प्रावधान :

    (i) निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था अर्थात इसका निर्माण संविधान ने किया है!

    (ii) मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है!

    (iii) मुख्य चुनाव आयुक्त महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है!

    (iv) मुख्य चुनाव आयुक्त का दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समान ही है!

    (v) नियुक्ति के पश्चात मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है!

     

    राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल करने के लिए आवश्यक शर्तें :

    (i) लोकसभा आम चुनाव अथवा राज्य विधानसभा चुनाव में किन्हीं चार अथवा अधिक राज्यों में कुछ डाले गए वैध मतों का छह प्रतिशत प्राप्त करना जरुरी होगा!

    (ii) इसके अलावे इसे किसी एक राज्य अथवा राज्यों से विधानसभा की कम से कम चार सीटें जितनी होगी!

    (iii) लोकसभा में दो प्रतिशत सीटें हों और ये कम से कम तीन विभिन्न राज्यों में हासिल की गई हों!

     

    परिसीमन आयोग :

    संविधान में परिसीमन आयोग के संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया है! अनुच्छेद 82 में प्रत्येक जनगणना की समाप्ति पर लोकसभा एवं राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों के विभाजन एवं पुनः समायोजन का कार्य संसद द्वारा विहित अधिकारी द्वारा किये जाने का प्रावधान है! परिसीमन आयोग में देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित सभी राज्य एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के निर्वाचन आयुक्त इस आयोग के सदस्य हैं!

    और पढ़ें : भारतीय राजव्यवस्था में वरीयता अनुक्रम

     

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  • भारत के चुनाव आयोग जारी चुनाव आदर्श आचार संहिता

    भारत के चुनाव आयोग जारी चुनाव आदर्श आचार संहिता

    चुनाव निष्पक्ष, प्रभावी एवं सकारात्मक बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों के मार्गदर्शन के लिए विभिन्न कार्यक्रमों, सभाओं, भाषणों एवं खर्च के लिए चुनाव आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता जारी किया जाता है, समय समय पर इसमें जरुरत, उत्पन्न चुनौती एवं परिस्थियों के हिसाब से इसमें बदलाव भी किया जाता है, तथा इसके विरुद्ध जाने पर दलों या व्यक्तियों का खिलाफ चुनाव आयोग कार्रवाई भी कर सकता है या करता है!

     

    सामान्‍य आचरण :

    1. कोई दल या अभ्यर्थी ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं होगा जिससे भिन्न जातियों और धार्मिक या भाषायी समुदायों के बीच विद्यमान मतभेद अधिक गंभीर हो सकते हैं या परस्‍पर नफ़रत हो सकती है या तनाव पैदा हो सकता है।
    2. यदि राजनीतिक दलों की आलोचना की जाए तो यह उनकी नीतियों और कार्यक्रमों गत रिकॉर्ड और कार्य तक ही सीमित रखी जाएगी। दलों और अभ्यर्थियों को अन्य दलों के नेताओं या कार्यकर्ताओं की सार्वजनिक गतिविधियों से असंबद्ध निजी जीवन के सभी पहलुओं की आलोचना करने से बचना होगा। असत्यापित आरोपों या मिथ्या कथन के आधार पर अन्य दलों या उनके कार्यकर्ताओं की आलोचना करने से बचना होगा।
    3. मत प्राप्त करने के लिए जाति या संप्रदाय की भावनाओं के आधार पर कोई अपील नहीं की जाएगी। मस्जिदों और पूजा के अन्य स्थलों को निर्वाचन प्रचार के मंच के रूप में प्रयुक्‍त नहीं किया जाएगा।
    4. सभी दल और अभ्यर्थी ऐसी सभी गतिविधियों से ईमानदारी से परहेज करेंगे जो निर्वाचन विधि‍ के अधीन “भ्रष्ट आचरण” एवं अपराध हैं जैसे कि मतदाताओं को घूस देना मतदाताओं को डराना-धमकाना, मतदाताओं का प्रतिरूपण, मतदान केंद्रों से 100 मीटर की दूरी के अंतर्गत प्रचार करना, मतदान समाप्त होने के लिए निर्धारित समय के समाप्त होने वाले 48 घंटों की अवधि के दौरान सार्वजनिक सभाएं आयोजित करना और मतदाताओं को मतदान केन्द्रों तक ले जाने और वापस लाने के लिए परिवहन और वाहन उपलब्ध कराना।
    5. हर व्यक्ति के शांतिपूर्ण और बाधारहित घरेलू जीवन के अधिकार का सम्मान किया जाएगा, फिर चाहे राजनीतिक दल और अभ्यर्थी उनकी राजनीतिक राय या गतिविधियों से कितने भी अप्रसन्न हों। किसी भी परिस्थिति में उनकी राय अथवा गतिविधियों के खिलाफ विरोध जताने के लिए व्‍यक्तियों के घर के सामने प्रदर्शन आयोजित करने या धरना देने का सहारा नहीं लिया जाएगा
    6. कोई भी राजनैतिक दल या अभ्यर्थी अपने अनुयायियों को किसी भी व्यक्ति की अनुमति के बिना उसकी भूमि, भवन, परिसर की दीवारों इत्यादि पर झंडा लगाने, बैनर लटकाने, सूचना चिपकाने, नारा लिखने इत्यादि की अनुमति नहीं देगा।
    7. राजनैतिक दलों और अभ्यर्थियों द्वारा यह सुनिश्चित किया जाएगा कि उनके समर्थक अन्य दलों द्वारा आयोजित सभाओं और जुलूसों में बाधा खड़ी नही करेंगे या उन्‍हें भंग नहीं करेंगे। किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्ता या समर्थक अन्य राजनीतिक दल द्वारा आयोजित सार्वजनिक सभा में मौखिक या लिखित रूप में सवाल पूछकर या अपने दल के पर्चे बाँटकर बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे। किसी दल द्वारा उन स्थानों के आसपास जुलूस न निकाला जाए जहाँ अन्य दल की सभाएं आयोजित हो रही हैं। किसी दल के कार्यकर्ता अन्‍य दल के कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए पोस्टर नहीं हटाएंगे।

     

    सभाएं :

    1. दल या अभ्यर्थी स्थानीय पुलिस प्राधिकारियों को किसी भी प्रस्तावित सभा के स्थल और समय के बारे में काफी पहले से सूचित करेंगे ताकि पुलिस यातायात को नियंत्रित करने और शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक व्यवस्था कर सके।
    2. दल या अभ्यर्थी अग्रिम रूप से सुनिश्चित करेगा कि क्‍या सभा के लिए प्रस्तावित स्थल पर कोई रोक या निषेधाज्ञा लागू तो नहीं है और यदि ऐसे आदेश मौजूद हैं, तो उनका कड़ाई से पालन किया जाएगा। यदि ऐसे आदेशों से किसी रियायत की आवश्यकता हो तो अग्रिम रूप से इसके लिए आवेदन किया जाएगा और प्राप्त किया जाएगा।
    3. यदि किसी प्रस्तावित सभा के संबंध में लाउडस्पीकरों या किसी अन्य सुविधा के उपयोग के लिए अनुमति या अनुज्ञा प्राप्त करने की आवश्यकता है, तो दल या अभ्यर्थी अग्रिम रूप से संबंधित प्राधिकरण के समक्ष आवेदन करेगा और यह अनुमति या अनुज्ञा प्राप्त करेगा।
    4. सभा के आयोजक सभा में बाधा खड़ी करने वाले या अन्यथा अव्यवस्था पैदा करने का प्रयास करने वाले व्यक्तियों से निपटने के लिए ड्यूटी पर तैनात पुलिस की निरपवाद रूप से सहायता प्राप्त करेगा। स्‍वयं आयोजक ऐसे व्‍यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं करेंगे।

    और पढ़ें : भारतीय संविधान में आपात उपबंध की व्यवस्था

     

    जुलूस :

    1. जुलूस का आयोजन करने वाला दल या अभ्यर्थी जुलूस शुरू करने का स्थान और समय, अनुगमन किए जाने वाले मार्गों और जुलूस समाप्त होने का स्थान और समय पहले से ही तय करेगा। साधारण तौर पर कार्यक्रम में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
    2. आयोजक स्थानीय पुलिस प्राधिकारियों को कार्यक्रम की अग्रिम सूचना देंगे ताकि स्थानीय पुलिस प्राधिकारी आवश्यक व्यवस्था कर सकें।
    3. आयोजक यह सुनिश्चित करेंगे कि जिन इलाकों से जुलूस निकालना है, क्‍या उन इलाकों में कोई प्रतिबन्ध आदेश लागू है और प्रतिबन्ध आदेशों का पालन करेंगे यदि सक्षम प्राधिकारी द्वारा विशेष रूप से रियायत नहीं दी गई है। यातायात संबंधी किन्‍हीं विनियमों या प्रतिबंधों का भी ध्‍यानपूर्वक अनुपालन किया जाएगा।
    4. आयोजक जुलूस निकालने के लिए अग्रिम रूप से व्यवस्था करने हेतु कदम उठाएंगे ताकि यातायात में कोई रूकावट या बाधा न आए। यदि जुलूस बहुत लंबा है, तो इसे उचित लंबाई के कई हिस्सों में आयोजित किया जाएगा, ताकि सुविधाजनक अंतरालों पर, विशेष रूप से उन स्थानों पर जहाँ जुलूस को सड़क का चौराहा पार करना है, रुके हुए यातायात को कई चरणों में छोड़ा जा सके जिससे कि यातायात में भारी जाम से बचा जा सके।
    5. जुलूस को इस प्रकार से विनियमित किया जाएगा कि जहाँ तक संभव हो यह सड़क के दाहिने तरफ रहे और ड्यूटी पर तैनात पुलिस के निर्देशों और सलाहों का कड़ाई से अनुपालन किया जाएगा।
    6. यदि दो या अधिक राजनीतिक दल या अभ्यर्थी जुलूस को समान रास्तों या उसके किसी भाग से एक ही समय पर ले जाने का प्रस्ताव देते हैं तो यह सुनिश्चिम करने के लिए कि दोनों जुलूस आपस में न टकराएं या यातायात में बाधा उत्पन्न न करें, आयोजक अग्रिम रूप से संपर्क करेंगे और अपनाए जाने वाले उपायों के बारे में निर्णय लेंगे। संतोषजनक व्यवस्था पर पहुँचने के लिए स्थानीय पुलिस की सहायता ली जाएगी। इस प्रयोजनार्थ दल पुलिस से यथाशीघ्र संपर्क करेंगे।
    7. राजनीतिक दल या अभ्यर्थी, जुलूस में भाग लेने वाले लोगों के पास मौजूद ऐसी वस्तुओं जिनका अवांछनीय लोगों द्वारा विशेष रूप से उत्तेजना के पलों में दुरूपयोग किया जा सकता है, पर अधिकतम संभव सीमा तक नियंत्रण रखेंगे।
    8. किसी भी राजनीतिक दल या अभ्यर्थी द्वारा अन्य राजनीतिक दलों के सदस्‍यों या उनके नेताओं को निरूपित करने वाले पुतले ले जाने, जनता के बीच इन पुतलों को जलाने और इस तरह के अन्य प्रकार के प्रदर्शन का समर्थन नहीं किया जाएगा।

     

    मतदान दिवस पर सभी राजनीतिक दल और अभ्यर्थी :

    1. शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित मतदान और मतदाताओं को किसी भी तरह से परेशान किए बिना या कोई अड़चन पैदा किए बिना उन्हें अपने मताधिकार का उपयोग करने की पूरी स्वतंत्रता का सुनिश्‍चय करने के लिए निर्वाचन ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों के साथ सहयोग करेंगे।
    2. अपने प्राधिकृत कार्यकर्ताओं को उचित बैज और पहचान पत्र प्रदान करेंगे।
    3. इस बात पर सहमति देंगे कि उनके द्वारा मतदाताओं को प्रदान की गई पहचान पर्ची सादे (सफ़ेद) कागज पर होगी और उस पर कोई प्रतीक, अभ्यर्थी का नाम या दल का नाम नहीं होगा।
    4. मतदान के दिन और इससे अड़तालीस घंटे पहले शराब देने या बांटने से दूर रहेंगे।
    5. राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों द्वारा मतदान बूथों के पास लगाए गई शिविरों के निकट अनावश्यक भीड़ इकट्ठा नहीं होने देंगे ताकि दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों और अभ्यर्थियों के मध्य टकराव और तनाव से बचा जा सके।
    6. सुनिश्चित करेंगे कि अभ्यर्थी के शिविर साधारण होंगे। वे कोई पोस्टर, झंडा, प्रतीक या कोई अन्य प्रचार सामग्री प्रदर्शित नहीं करेंगे। कोई खाद्य सामग्री परोसी नहीं जाएगी अथवा भीड़ को शिविर में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और
    7. मतदान के दिन वाहनों के यातायात पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के अनुपालन में प्राधिकारियों का सहयोग करेंगे और उनके लिए अनुज्ञापत्र प्राप्त करेंगे जो उन वाहनों पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होने चाहिए।

     

    मतदान बूथ :

    मतदाताओं के छोड़कर ऐसा कोई व्यक्ति मतदान बूथ के भीतर प्रवेश नहीं करेगा जिसके पास निर्वाचन आयोग का कोई मान्य पास नहीं है।

     

    प्रेक्षक :

    निर्वाचन आयोग प्रेक्षकों को नियुक्त करता है। यदि अभ्यर्थियों या उनके अभिकर्ताओं को निर्वाचनों के संचालन के संबंध में कोई विशेष शिकायत या समस्या है तो उसे प्रेक्षक के ध्यान में ला सकते हैं।

     

    सत्ताधारी दल :

    केंद्र या राज्य या संबंधित राज्यों का सत्ताधारी दल यह सुनिश्चित करेगा कि इस वजह से शिकायत का अवसर न दिया जाए कि उन्‍होंने अपने निर्वाचन अभियान के प्रयोजनार्थ अपनी आधिकारिक स्थिति का उपयोग किया है और विशेष रूप से:

    1. मंत्री अपने सरकारी दौरों को निर्वाचन संबंधी कार्यों के साथ नहीं जोड़ेंगे और साथ ही निर्वाचन संबंधी कार्यों के दौरान सरकारी मशीनरी या कर्मचारियों का उपयोग नहीं करेंगे।

    2. सत्ताधारी दल के हित को बढ़ावा देने के लिए सरकारी विमानों, वाहनों सहित सरकारी परिवहन, मशीनरी और कर्मचारियों का उपयोग नहीं करेंगे

    3. निर्वाचन के संबंध में निर्वाचन सभाएं आयोजित करने के लिए मैदानों इत्यादि जैसे सार्वजनिक स्थानों और हवाई उड़ानों के लिए हेलीपैड्स के उपयोग पर किसी का एकाधिकार नहीं होगा। अन्य दलों और अभ्यर्थियों को उन्हीं नियमों और शर्तों पर ऐसे स्थानों और सुविधाओं का उपयोग करने की अनुमति दी जाएगी जिन नियमों और शर्तों पर सत्ताधारी दल इनका उपयोग करता है!

    4. विश्राम गृहों, डाक बंगलों या अन्य सरकारी आवासों पर सत्ताधारी दल या उसके अभ्यर्थी का  एकाधिकार नहीं होगा और अन्य दलों और अभ्यर्थियों को निष्‍पक्ष ढंग से इन आवासों का उपयोग करने की अनुमति दी जाएगी किन्तु कोई भी दल या अभ्यर्थी इन आवासों (उसके अंतर्गत मौजूद परिसरों सहित) का उपयोग अभियान कार्यालय के रूप में या निर्वाचन प्रचार के प्रयोजनार्थ कोई सार्वजनिक सभा आयोजित करने के लिए नहीं करेगा या ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी!

    5. सार्वजनिक राजकोष की लागत पर समाचार पत्रों और अन्य मीडिया में विज्ञापन प्रकाशित करने और निर्वाचन अवधि के दौरान पक्षपातपूर्ण कवरेज के लिए राजनीतिक समाचारों की सरकारी मास मीडिया का दुरुपयोग और सत्ताधारी दल की संभावनाओं को बढ़ाने की दृष्टि से उनकी उपलब्धियों के संबंध में प्रचार करने से सावधानीपूर्वक बचेंगे!

    6. मंत्री और अन्य प्राधिकारी आयोग द्वारा निर्वाचनों की घोषणा के समय से विवेकाधीन निधियों से अनुदानों/भुगतानों की संस्वीकृति प्रदान नहीं करेंगे

     

    आयोग द्वारा निर्वाचनों की घोषणा के समय से मंत्री और अन्य प्रधिकारी :

    • किसी भी रूप में कोई वित्तीय अनुदान या इससे संबंधित प्रतिज्ञाओं की घोषणा नहीं करेंगे
    • किसी भी प्रकार की परियोजनाओं या योजनाओं का शिलान्यास इत्यादि नहीं रखेंगे (सरकारी कर्मचारियों के अलावा)
    • सड़कों के निर्माण, पेय जल की सुविधाओं के प्रावधान इत्यादि का कोई वचन नहीं देंगे
    • सरकारी सार्वजनिक उपक्रमों इत्यादि में कोई तदर्थ नियुक्ति नहीं करेंगे जिससे मतदाताओं पर सत्ताधारी दल के पक्ष में प्रभाव पड़ता हो।

    नोट : आयोग किसी निर्वाचन की तारीख घोषित करेगा जो उस तारीख से आम तौर पर अधिकतम तीन सप्ताह पहले की तारीख होगी जिस दिन इस निर्वाचन के संबंध में अधिसूचना जारी होने की संभावना है।

    7. केन्द्र या राज्य सरकार के मंत्री बतौर अभ्यर्थी या मतदाता या प्राधिकृत अभिकर्ता की हैसियत के अतिरिक्त किसी मतदान केन्द्र या मतगणना के स्थान में प्रवेश नहीं करेंगे।

     

    निर्वाचन घोषणा पत्र संबंधी दिशानिर्देश :

    2008 की एसएलपी (सी) संख्‍या 21455 (एस सुब्रमणियम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार एवं अन्य) में उच्‍चतम न्‍यायालय ने दिनांक 5 जुलाई 2013 के अपने निर्णय में निर्वाचन आयोग को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के परामर्श से निर्वाचन के घोषणा पत्र की अंतर्वस्‍तु के संबंध में दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है। निर्णय में से उन निर्देशक सिद्धांतों को नीचे उद्धृत किया गया है जो दिशानिर्देशों को तैयार करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे :

     

    हालांकि विधि स्पष्ट है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अधीन निर्वाचन के घोषणा पत्र के प्रतिज्ञाओं को भ्रष्ट आचरण नहीं समझा जा सकता है, इस वास्तविकता की उपेक्षा नहीं की जा सकती है कि किसी भी प्रकार के मुफ्त उपहारों का वितरण नि:संदेह सभी लोगों को प्रभावित करता है। यह स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचनों की जड़ों को काफी हद तक हिला कर रख देता है।

     

    निर्वाचनों में निर्वाचन लड़ने वाले दलों और अभ्यर्थियों को समान अवसर प्रदान करने का सुनिश्चय करने के लिए और यह भी देखने के लिए कि निर्वाचन प्रक्रिया में शामिल दल भ्रष्ट न हो जाए निर्वाचन आयोग पहले भी आदर्श आचार संहिता के अधीन अनुदेश जारी करता रहा है। शक्तियों का वह स्रोत जिसके अधीन आयोग ये आदेश जारी करता है वह संविधान का अनुच्छेद 324 है जो आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन आयोजित करने की जिम्‍मेदारी सौंपता है।

     

    हम इस तथ्य के प्रति सचेत रहते हैं कि आम तौर पर राजनीतिक दल निर्वाचन की तारीख की घोषणा से पहले अपना निर्वाचन घोषणा पत्र जारी कर देते हैं, उस परिदृश्य में सच तो यह है कि निर्वाचन आयोग को तारीख की घोषणा से पहले किए गए किसी कार्य को विनियमित करने का प्राधिकार नहीं होगा। तथापि इस बारे में एक अपवाद निर्मित किया जा सकता है क्योंकि निर्वाचन के घोषणा पत्र का प्रयोजन प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़ा है।

     

    माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय का उपर्युक्त निर्देश मिलने पर निर्वाचन आयोग ने इस मामले में मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्यीय राजनीतिक दलों से परामर्श के लिए उनके साथ एक बैठक आयोजित की और इस मामले में उनके परस्‍पर विरोधी दृष्टिकोणों को नोट किया गया। परामर्श के दौरान, कुछ राजनीतिक दलों ने ऐसी दिशानिर्देशों के जारी होने का समर्थन किया जबकि अन्य दलों की राय यह थी कि स्वस्थ लोकतांत्रिक शासन पद्धति में घोषणा पत्र में ऐसे प्रस्ताव और वचन देना मतदाताओं के प्रति उनका अधिकार और कर्तव्य है। यद्यपि आयोग इस दृष्टिकोण से सिद्धांतत: सहमत है कि घोषणा पत्र तैयार करना राजनीतिक दलों का अधिकार है फिर भी आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचनों के संचालन और सभी राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों को समान अवसर प्रदान करने पर कुछ प्रस्तावों और वचनों के अवांछनीय प्रभावों की उपेक्षा नहीं कर सकता है।

     

    संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को अन्य के साथ-साथ संसद और राज्य विधान मंडलों का  निर्वाचन संचालित करने का अधिदेश देता है। उच्‍चतम न्‍यायालय के उपर्युक्त निर्देश को समुचित रूप से ध्‍यान में रखते हुए और राजनीतिक दलों के साथ परामर्श करने के बाद स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचनों के हित में आयोग एतद्द्वारा निर्देश देता है कि राजनीतिक दल और अभ्यर्थी संसद या राज्य विधान मंडलों के किसी भी निर्वाचन के लिए निर्वाचन घोषणा पत्र जारी करते समय निम्नलिखित दिशानिर्देशों का पालन करेंगे – निर्वाचन घोषणा पत्र में संविधान में प्रतिष्ठापित आदर्शों और सिद्धांतों के विरूद्ध कुछ भी शामिल नहीं होगा और इसके अतिरिक्त यह आदर्श आचार संहिता के अन्य उपबंधों के साथ सुसंगत होगा।

     

    संविधान में प्रतिष्ठापित राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत राज्य को नागरिकों के कल्याण के लिए विभिन्न उपाय तैयार करने का आदेश देते हैं और इसलिए निर्वाचन घोषणा पत्र में ऐसे कल्याण के वचनों के प्रति कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। तथापि राजनीतिक दलों को ऐसे वादे करने से परहेज करना चाहिए जिससे निर्वाचन प्रक्रिया की पवित्रता दूषित हो सकती है या अपने मताधिकार का उपयोग करने में मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव पड़ सकता है।

     

    पारदर्शिता : समान अवसर और वादों की विश्वसनीयता के हित में यह आशा की जाती है कि घोषणा पत्र में वादों की तार्किकता भी प्रतिबिंबित होगी और मोटेतौर पर इसके लिए आवश्यक वित्त प्राप्त करने के तरीके और साधन विस्तृत रूप से इंगित होंगे। केवल उन वादों पर मतदाताओं का भरोसा हासिल किया जाना चाहिए जिन्हें पूरा किया जाना संभव हो।

    और पढ़ें : राज्य की कार्यपालिका, राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं व्यवस्थाएं

     

    चुनाव आचार संहिता को जनसामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से इसे चुनाव आयोग के वेबसाइट से उद्धृत किया है! उम्मीद है ये रोचक पोस्ट आपको जरुर पसंद आया होगा! पोस्ट को पढ़ें और शेयर करें (पढाएं) तथा अपने विचार, प्रतिक्रिया, शिकायत या सुझाव से नीचे दिए कमेंट बॉक्स के जरिए हमें अवश्य अवगत कराएं! आप हमसे हमसे  ट्विटर  और  फेसबुक  पर भी जुड़ सकते हैं!

  • भारतीय संविधान में न्यायपालिका की व्यवस्था एवं अधिकार

    भारतीय संविधान में न्यायपालिका की व्यवस्था एवं अधिकार

    सर्वोच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय : भारत की न्यायिक व्यवस्था इकहरी और एकीकृत है, जिसके सर्वोच्च शिखर पर भारत का उच्चतम न्यायालय है! उच्चतम न्यायालय की स्थापना, गठन, अधिकारिता, शक्तियों के विनियमन से संबंधित विधि निर्माण की शक्ति भारतीय संसद को प्राप्त है! उच्चतम न्यायालय का गठन संबंधी प्रावधान (अनुच्छेद 124) में दिया गया है! उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा 30 अन्य न्यायाधीश होते हैं! (शुरुआत में कुल 8 न्यायाधीश होते थे)! न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा होती है! न्यायाधीश बनने की न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं है, लेकिन इनके अवकाश ग्रहण करने की आयु सीमा 65 वर्ष है! उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को संसद के प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से पारित समावेदन के आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा हटाये जा सकते हैं!

     

    उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश के लिए योग्यताएं :

    1. वह भारत का नागरिक हो
    2. वह किसी भी उच्च न्यायालय अथवा दो या दो से अधिक न्यायालयों में लगातार कम से कम 5 वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चूका हो! या किसी उच्च न्यायालयों या न्यायालयों में लगातार 10 वर्षों तक अधिवक्ता रह चूका हो! या राष्ट्रपति की दृष्टि में कानून का उच्च कोटि का ज्ञाता हो!

     

    उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अवकाश प्राप्त करने के बाद भारत में किसी भी न्यायालय या किसी भी अधिकारी के सामने वकालत नहीं कर सकते हैं! उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को पद एवं गोपनीयता की शपथ राष्ट्रपति दिलवाता है! मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति लेकर दिल्ली के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय की बैठकें बुला सकता है!

    और पढ़ें : भारत के संविधान में अब तक किए गए प्रमुख संशोधन

     

    उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार :

    1 प्रारंभिक क्षेत्राधिकार : (i) भारत संघ तथा एक या एक से अधिक राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों में!  (ii) भारत संघ तथा कोई एक राज्य या अनेक राज्यों और एक या एक से अधिक राज्यों के बिच विवादों में!  (iii) दो या दो से अधिक राज्यों के बिच ऐसे विवाद में, जिसमें उनके वैधानिक अधिकारों का प्रश्न निहित है! प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय उसी विवाद को निर्णय के लिए स्वीकार करेगा, जिसमें किसी तथ्य या विधि का प्रश्न शामिल है!

     

    2 अपीलीय क्षेत्राधिकार : देश का सबसे बड़ा अपीलीय न्यायालय उच्चतम न्यायालय है! इसे भारत के सभी उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है! इसके अंतर्गत तीन प्रकार के प्रकरण आते हैं – (i) संविधानिक  (ii) दीवानी  (iii) फौजदारी

     

    3 परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार : राष्ट्रपति को यह अधिकार है की वह सार्वजनिक महत्व के विवादों पर उच्चतम न्यायालय का परामर्श मांग सकता है (अनुच्छेद 143)! न्यायालय के परामर्श को स्वीकार या अस्वीकार करना राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है!

     

    4 पुनर्विचार संबंधी क्षेत्राधिकार : संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है की वह स्वयं द्वारा दिए गए आदेश या निर्णय पर पुनर्विचार कर सके तथा यदि उचित समझे तो उसमें आवश्यक परिवर्तन कर सकता है!

     

    5 अभिलेख न्यायालय : संविधान का अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का स्थान प्रदान करता है! इसका आशय यह है की इस न्यायालय का निर्णय सब जगह साक्षी के रूप में स्वीकार किया जाएगा और इसकी प्रमाणिकता के विषय में प्रश्न नहीं किया जाएगा!

     

    6 मौलिक अधिकारों का रक्षक : भारत का उच्चतम न्यायालय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक है! अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को विशेष रूप से उतरदायी ठहराता है की वह मौलिक अधिकारों को लागु कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई करे! न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छ लेख और उत्प्रेषण के लेख जारी कर सकता है! उच्चतम न्यायालय में संविधान के निर्वचन (Interpretation) से संबंधित मामले की सुनवाई के लिए न्यायधीशों की संख्या कम से कम पांच होनी चाहिए [अनुच्छेद 145(3)]

     

    उच्च न्यायालय :

    संविधान के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा (अनुच्छेद 214), लेकिन संसद विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों और किसी किसी संघ राज्य क्षेत्र के लिए एक ही उच्च न्यायालय स्थापित कर सकता है (अनुच्छेद 231)! प्रत्येक उच्च न्यायालय का गठन एक मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से मिलाकर किया जाता है! गुवाहाटी उच्च न्यायालय में सबसे कम और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सबसे अधिक न्यायाधीशों की संख्या है!

     

    उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए योग्यताएं :

    1. भारत का नागरिक हो
    2. कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चूका हो अथवा किसी उच्च न्यायालय में एक से अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार दस वर्षों तक अधिवक्ता रहा हो!

     

    उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उस राज्य का राज्यपाल शपथ दिलाता है! उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का अवकाश ग्रहण करने की अधिकतम आयु सीमा 65 वर्ष है! उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उसी प्रकार से हटाया जा सकता है जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों को हटाया जाता है! जिस व्यक्ति ने उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो वो उस न्यायालय में वकालत नहीं कर सकता, लेकिन वो दुसरे उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में वकालत कर सकता है! उच्च न्यायालय भी एक अभिलेख न्यायालय होता है! भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश का स्थानांतरण किसी दुसरे उच्च न्यायालय में कर सकता है!

     

    उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र :

    1 प्रारंभिक क्षेत्राधिकार : प्रत्येक उच्च न्यायालय को नौकाधिकरण, इच्छा पत्र, तलाक, विवाह, कम्पनी कानून, न्यायालय की अवमानना तथा कुछ राजस्व संबंधी प्रकरणों, नागरिकों के मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन (अनुच्छेद 226) के लिए आवश्यक निर्देश विशेषकर बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, उत्प्रेषण तथा अधिकार पृच्छ लेख जारी करने के अधिकार प्राप्त हैं!

    2 अपीलीय क्षेत्राधिकार : फौजदारी मामलों में अगर सत्र न्यायाधीश ने मृत्युदंड दिया हो तो उच्च न्यायालय में उसके विरुद्ध अपील हो सकती है! दीवानी मामलों में उच्च न्यायालय में उन सभी मामलों की अपील हो सकती है, जो पांच लाख रूपये या उससे अधिक सम्पति से सम्बद्ध हो! उच्च न्यायालय पेटेंट और डीजाइन, उत्तराधिकार, भूमि प्राप्ति, दिवालियापन और संरक्षकता आदि मामलों में भी अपील सुनता है!

    3 उच्च न्यायालय में मुकदमों का हस्तांतरण : यदि किसी उच्च न्यायालय को ऐसा लगे की जो अभियोग अधीनस्थ न्यायालय में विचाराधीन है, वह विधि के किसी सारगर्भित प्रश्न से सम्बद्ध है तो वह उसे अपने यहाँ हस्तांतरित कर या तो उसका निपटारा स्वयं ही कर देता है या विधि से संबद्ध प्रश्न को निपटाकर अधीनस्थ न्यायालय को निर्णय के लिए वापस भेज देता है!

    4 प्रशासकीय अधिकार : उच्च न्यायालयों को अपने अधीनस्थ न्यायालयों में नियुक्ति, पदावनति, पदोन्नति तथा छुट्टियों के संबंध में नियम बनाने का अधिकार है!

     

    उच्च न्यायालय राज्य में अपील का सर्वोच्च न्यायालय नहीं है! राज्य सूचि से सम्बद्ध विषयों में भी उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील हो सकती है!

    और पढ़ें : संविधान द्वारा प्रदत मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य

     

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  • भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

    भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

    भारत के संविधान के निर्माण में अनेक देशों के संविधान से सहायता ली गई है, जिसमें अलग अलग प्रावधानों और व्यवस्थाओं को अलग अलग अलग देशों के संविधान से उद्धृत किया गया है या उनकी सहायता ली गई है, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारतीय शासन अधिनियम 1935 का है! भारत के संविधान के निर्माण में निम्न देशों के संविधान से सहायता ली गई है –

     

    संयुक्त राज्य अमेरिका – मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं विधि आपात जैसी प्रावधानों को अमेरिका के संविधान से लिया गया है!

     

    ब्रिटेन – संसदात्मक शासन प्रणाली, एकल नागरिकता, विधि निर्माण प्रक्रिया!

     

    आयरलैंड – नीति निर्देशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज सेवा इत्यादि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन!

     

    ऑस्ट्रेलिया – प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूचि का प्रावधान, केंद्र एवं राज्य के बिच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन, संसदीय विशेषाधिकार!

     

    जर्मनी – आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियाँ!

     

    कनाडा – संघात्मक विशेषताएँ, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास, राज्यपाल की नियुक्ति विषयक प्रक्रिया, संघ एवं राज्य के बिच शक्ति विभाजन!

     

    दक्षिण अप्रीका – संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान!

     

    रूस – मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान!

     

    जापान – विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया!

     

    भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव ‘भारतीय अधिनियम 1935’ का है! भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से लगभग 250 अनुच्छेद ऐसे हैं जो 1935 ई० के अधिनियम से या तो शब्दशः ले लिए गए हैं या फिर उनमें बहुत थोड़ा परिवर्तन के साथ लिया गया है!

    और पढ़ें : भारत के संसद की वित्तीय एवं अन्य समितियां

     

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  • संविधान द्वारा प्रदत मौलिक अधिकार एवं मौलिक कर्तव्य

    संविधान द्वारा प्रदत मौलिक अधिकार एवं मौलिक कर्तव्य

    मौलिक अधिकार को अमेरिका के संविधान से लिया गया है! इसका वर्णन संविधान के भाग – 3 (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) में किया गया है! संविधान के भाग – 3 को भारत का अधिकार पत्र कहा जाता है! मौलिक अधिकारों में संसोधन हो सकता है! राष्ट्रिय आपात के दौरान (अनुच्छेद 352) जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है!

     

    मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संसोधन (1978 ई०) के द्वारा ‘संपत्ति का अधिकार’ (अनुच्छेद 31 एवं 19 क) को मौलिक अधिकार की सूचि से हटाकर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 (a) के अंतर्गत क़ानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है!

     

    मौलिक अधिकार –

    1. समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
    2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
    3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
    4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
    5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
    6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

     

    1  समता या समानता का अधिकार –

    अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समता

    अनुच्छेद 15 : धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध

    अनुच्छेद 16 : लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता

    अनुच्छेद 17 : अस्पृश्यता का अंत (दंडनीय अपराध)

    अनुच्छेद 18 : उपाधियों का अंत (सेना या विधि संबंधी सम्मान के अलावा)

    और पढ़ें : भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

     

    2 स्वतंत्रता का अधिकार –

    अनुच्छेद 19 : मूल संविधान में सात तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था, अब सिर्फ छह हैं –

    (i) 19 (a) बोलने के स्वतंत्रता (प्रेस की स्वतंत्रता इसी में वर्णित है)

    (ii) 19 (b) शांतिपूर्वक बिना हथियार के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता

    (iii) 19 (c) संघ बनाने की स्वतंत्रता

    (iv) 19 (d) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता

    (v) 19 (e) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता

    (vi) 19 (f) संपत्ति का अधिकार (अब हटा दिया गया है)

    (vii) 19 (g) कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 20 : अपराधों के लिए दोष-सिद्धि के संबंध में संरक्षण

    अनुच्छेद 21 : प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

    अनुच्छेद 21 (क) 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा

    अनुच्छेद 22 : कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध संरक्षण –

    (i) हिरासत में लेने का कारण बताना होगा

    (ii) 24 घंटे के अंदर दंडाधिकारी के समक्ष पेश करना होगा

    (iii) उसे अपने पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार होगा

    (iv) निवारक निरोध

     

    3 शोषण के विरुद्ध अधिकार –

    अनुच्छेद 23 : मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध

    अनुच्छेद 24 : बालकों के नियोजन नियोजन का प्रतिषेध (14 वर्ष से कम)

     

    4 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार –

    अनुच्छेद 25 : अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 26 : धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 27 : आय को धार्मिक या सामाजिक कार्य को समर्पित करने पर कर से स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 28 : राज्य विधि से पूर्णतः पोषित शिक्षा संसथान में धार्मिक शिक्षा निषेध

     

    5 संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार –

    अनुच्छेद 29 : अल्पसंख्यक वर्गों के हितों को संरक्षण

    अनुच्छेद 30 : शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार

     

    6 संवैधानिक उपचारों का अधिकार –

    अनुच्छेद 32 : मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्रवाइयों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है, इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को पांच तरह के रिट निकालने की शक्ति प्रदान की गयी है –

    (i) बंदी प्रत्यक्षीकरण

    (ii) परमादेश

    (iii) प्रतिषेध लेख

    (iv) उत्प्रेषण

    (v) अधिकार पृच्छा लेख

     

    मौलिक कर्तव्य –

    सरदार स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा पर संविधान के 42वें संशोधन (1976 ई०) के द्वारा मौलिक कर्तव्य को संविधान में जोड़ा गया! इसे रूस के संविधान से लिया गया है! इसे भाग 4 (क) में अनुच्छेद 51 (क) के तहत रखा गया है! मौलिक कर्तव्य की संख्या 11 है, जो इस प्रकार है –

    1. प्रत्येक नागरिक का ये कर्तव्य होगा की वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे!
    2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करनेवाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखे और उनका पालन करे!
    3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे!
    4. देश की रक्षा करे!
    5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे!
    6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिक्षण करे!
    7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे!
    8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे!
    9. सार्वजनिक सम्पति को सुरक्षित रखे!
    10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे!
    11. माता पिता या संरक्षक द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना (86 वें संशोधन)!

     

    पढ़ें : मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक सिद्धांत में अंतर

     

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  • राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत तथा मौलिक अधिकार में अंतर

    राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत तथा मौलिक अधिकार में अंतर

    राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत का वर्णन संविधान के भाग – 4 (अनुच्छेद 36 – 51) में किया गया है! इसकी प्रेरणा आयरलैंड के संविधान से मिली है! इसे न्यायालय द्वारा लागु नहीं किया जा सकता यानि इसे वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है! राज्य के नीति निर्धारक सिद्धांत इस प्रकार हैं –

     

    अनुच्छेद 38 : राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा, जिससे नागरिक को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा!

    अनुच्छेद 39 (क) : समान न्याय और निशुल्क विधिक सहायता, समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था इसी में है!

    अनुच्छेद 39 (ख) : सार्वजनिक धन का स्वामित्व एवं नियंत्रण इस प्रकार करना ताकि सार्वजनिक हित का सर्वोत्तम साधन हो सके!

    और पढ़ें : भारतीय संविधान में अब तक किए गए प्रमुख संशोधन

     

    अनुच्छेद 39 (ग) : धन का समान वितरण!

    अनुच्छेद 40 : ग्राम पंचायतों का संगठन

    अनुच्छेद 41 : कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार!

    अनुच्छेद 42 : काम की न्यायसंगत और मनावेचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध!

     

    अनुच्छेद 43 : कर्मकारों के लिए निर्वाचन मजदूरी एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन!

    अनुच्छेद 44 : नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता

    अनुच्छेद 46 : अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि

    अनुच्छेद 47 : पोषाहार स्तर, जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य को सुधार करने का राज्य का कर्तव्य!

     

    अनुच्छेद 48 : कृषि एवं पशुपालन का संगठन

    अनुच्छेद 48 (क) : पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन एवं जीवों की रक्षा

    अनुच्छेद 49 : राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण

    अनुच्छेद 50 : कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का पृथक्करण

     

    अनुच्छेद 51 : अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि

    इसके अलावे अनुच्छेद 350 (क) – प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देना और अनुच्छेद 351 – हिंदी को प्रोत्साहन देना भी राज्य के लिए नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में कार्य करता है!

     

    मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक सिद्धांत में अंतर –

     नीति निर्देशक सिद्धांत
    मौलिक अधिकार
     यह आयरलैंड के संविधान से लिया गया है
    यह सं० रा० अमेरिका के संविधान से लिया गया है
     इसका वर्णन संविधान के भाग – 4 में किया गया है
    इसका वर्णन संविधान के भाग – 3 में किया गया है
     इसे लागु कराने के लिए न्यायालय नहीं जाया जा सकता
    इसे लागु कराने के लिए न्यायालय की शरण ले सकते हैं
     यह समाज की भलाई के लिए है
    यह व्यक्ति के अधिकार के लिए है
     इसके पीछे राजनीतिक मान्यता है
    इसके पीछे क़ानूनी मान्यता है
     यह सरकार के अधिकारों को बढ़ाता है
    यह सरकार के महत्त्व को घटाता है
     यह राज्य सरकार के द्वारा लागु करने के बाद ही नागरिक को प्राप्त होता है
    यह अधिकार नागरिकों को स्वतः प्राप्त हो जाता है

     

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  • भारतीय संविधान में आपात उपबंध की व्यवस्था तथा प्रकार

    भारतीय संविधान में आपात उपबंध की व्यवस्था तथा प्रकार

    भारतीय संविधान में तीन प्रकार के आपात काल की व्यवस्था की गई है – (i) राष्ट्रीय आपात – अनुच्छेद 352, (ii) राष्ट्रपति शासन – अनुच्छेद 356, (iii) वित्तीय आपात – अनुच्छेद 360

     

    राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) : इसकी घोषणा निम्नलिखित में से किसी भी आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है! (i) युद्ध, (ii) बाह्य आक्रमण, (iii) सशस्त्र विद्रोह! राष्ट्रीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति मंत्रिमंडल के लिखित सिफारिश पर करता है! राष्ट्रीय आपात की घोषणा को न्यायालय में प्रश्नगत किया जा सकता है! 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 के अधीन उद्घोषणा संपूर्ण भारत में या उसके किसी भाग में की जा सकती है!

     

    राष्ट्रीय आपात के समय राज्य सरकार निलंबित नहीं की जा सकती है, अपितु वह संघ की कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती है! राष्ट्रपति द्वारा की गई आपात की घोषणा एक माह तक प्रवर्तन में रहती है और यदि इस दौरान संसद के दो तिहाई बहुमत से अनुमोदित करवा लिया जाता है, तो वह छह माह तक प्रवर्तन में रहती है! संसद इसे पुनः एक बार में छह माह तक बढ़ा सकती है! यदि आपात की उद्घोषणा तब की जाती है, जब लोकसभा का विघटन हो गया हो या लोकसभा का विघटन एक मास के अंतर्गत आपात उद्घोषणा का अनुमोदन किए बिना हो जाता है, तो आपात उद्घोषणा लोकसभा की प्रथम बैठक की तारीख से 30 दिन के अंदर अनुमोदित होना चाहिए, अन्यथा 30 दिन के बाद यह प्रवर्तन नहीं रहेगी! और पढ़ें : भारत के संसद की वित्तीय तथा कुछ अन्य समितियाँ

     

    यदि लोकसभा साधारण बहुमत से आपात उद्घोषणा को वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर देती है तो राष्ट्रपति को उद्घोषणा वापस लेनी पड़ती है! आपात उद्घोषणा पर विचार करने के लिए लोकसभा का विशेष अधिवेशन तब आहूत किया जा सकता है, जब लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 1/10 सदस्यों द्वारा लिखित सूचना लोकसभा अध्यक्ष को, जब सत्र नहीं चल रहा हो, दी जाती है! लोकसभा अध्यक्ष या राष्ट्रपति सूचना प्राप्ति के 14 दिनों के अंदर लोकसभा का विशेष अधिवेशन आहूत करते हैं!

     

    आपातकाल की उद्घोषणा के प्रभाव :

    जब कभी संविधान के अनुच्छेद 352 का अंतर्गत आपातकाल की उद्घोषणा होती है, तो इसके ये प्रभाव होते हैं –

    (i) राज्य की कार्यपालिका शक्ति संघीय कार्यपालिका के अधीन हो जाती है!

    (ii) संसद की विधायी शक्ति राज्य सूचि से सम्बद्ध विषयों तक विस्तृत हो जाती है! अर्थात संसद को राज्य सूचि में वर्णित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है! अतः केंद्र तथा राज्यों के मध्य विधायी शक्तियों के सामान्य वितरण का निलंबन हो जाता है, यद्यपि राज्य विधायिका निलंबित नहीं होती है! संसद द्वारा आपातकाल में राज्य के विषयों पर बनाए गए कानून आपातकाल की समाप्ति के बाद छह माह तक प्रभावी रहते हैं!

    (iii) जब राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा लागु हो तब राष्ट्रपति केंद्र तथा राज्यों के मध्य करों के संवैधानिक वितरण को संशोधित कर सकता है! इसका तात्पर्य यह है की राष्ट्रपति केंद्र से राज्यों को दिए जाने वाले धन को कम अथवा समाप्त कर सकता है! ऐसे संशोधन उस वित्त वर्ष की सम्पति तक जारी रहते हैं, जिसमे आपातकाल समाप्त होता है!

    (iv) राष्ट्रिय आपातकाल की स्थिति में लोकसभा का कार्याकाल इसके सामान्य कार्यकाल से आगे संसद द्वारा विधि बनाकर एक समय में एक वर्ष के लिए (कितने भी समय तक) बढ़ाया जा सकता है! किंतु यह विस्तार आपातकाल की समाप्ति के बाद छह माह से जयादा नहीं हो सकता है! उदहारण के लिए पांचवी लोकसभा (1971 – 1977) का कार्यकाल दो बार एक समय में एक वर्ष के लिए बढ़ाया गया था!

    (v) अनुच्छेद 358 एवं अनुच्छेद 359 राष्ट्रिय आपातकाल में मूल अधिकार पर प्रभाव का वर्णन करते हैं! अनुच्छेद 358, अनुच्छेद 19 द्वारा दिए गए मूल अधिकारों के निलंबन से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद अन्य मूल अधिकारों (अनुच्छेद 20 एवं अनुच्छेद 21) से संबंधित है!

    अनुच्छेद 358 के अनुसार जब राष्ट्रिय आपात की घोषणा होती है तब अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत 6 मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं! दुसरे शब्दों में, राज्य अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत 6 मूल अधिकारों को कम करने अथवा हटाने के लिए कानून बना सकता है अथवा कोई कार्यकारी निर्णय ले सकता है, ऐसे किसी कानून अथवा कार्य को चुनौती नहीं दी जा सकती! जब आपातकाल समाप्त हो जाता है, अनुच्छेद 19 स्वतः पुनर्जीवित हो जाता है!

    1978 के 44 वें संशोधन अधिनियम ने अनुच्छेद 358 की संभावना पर दो प्रकार से प्रतिबन्ध लगा दिया है! पहला अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत छह मूल अधिकारों को युद्ध अथवा बाह्य आक्रमण के आधार पर घोषित आपातकाल में ही निलंबित किया जा सकता है न की सशस्त्र विद्रोह के आधार पर! दुसरे, केवल उन विधियों को जो आपातकाल से संबंधित हैं, चुनौती नहीं दी जा सकती है तथा ऐसे विधियों के अंतर्गत दिए गए कार्यकारी निर्णयों को भी चुनौती नहीं दी जा सकती! और पढ़ें : भारत की संघीय कार्यपालिका एवं उसकी संरचना

     

    अन्य मूल अधिकार का निलंबन : अनुच्छेद 359 राष्ट्रपति को आपातकाल में मूल अधिकारों को लागु करने के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित करने के लिए अधिकृत करता है! अतः 359 के अंतर्गत मूल अधिकार नहीं अपितु उसका लागु होना निलंबित होता है! यह निलंबन उन्हीं मूल अधिकारों से संबंधित होता जो राष्ट्रपति के आदेश में वर्णित होता है! जब राष्ट्रपति का आदेश प्रभावी रहता है तो राज्य उस मूल अधिकार को रोकने व हटाने के लिए कोई भी विधि बना सकता है या कार्यकारी कदम उठा सकता है! ऐसी किसी भी विधि या कार्य को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है की यह संबंधित मूल अधिकार से साम्य नहीं रखता! इस विधि के प्रभाव में किये गए विधायी व कार्यकारी कार्यों को आदेश समाप्ति के उपरांत चुनौती नहीं दी जा सकती है!

     

    44वां संविधान संसोधन अधिनियम 1978, अनुच्छेद 359 के क्षेत्र में दो प्रतिबन्ध लगाता है! प्रथम, राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 तथा 21 के अंतर्गत दिए गए अधिकारों को लागु करने के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित नहीं कर सकता है! यानि अनुच्छेद 20 एवं 21 आपातकाल में भी प्रभावी रहता है! द्वितीय केवल उन्हीं विधियों को चुनौती से संरक्षण प्राप्त है जो आपातकाल से संबंधित है, उन विषयों व कार्यों को नहीं जो इनके तहत बनाये गए हैं!

     

    अनुच्छेद 358 और 359 में अंतर :

    1. अनुच्छेद 358 केवल अनुच्छेद 19 के अंतर्गत मूल अधिकारों से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 359 उन सभी मूल अधिकारों से संबंधित है, जिनका राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निलंबन हो जाता है!
    2. अनुच्छेद 358 स्वतः ही आपातकाल की घोषणा होने पर अनुच्छेद 19 के अंतर्गत के मूल अधिकारों का निलंबन कर देता है! दूसरी ओर, अनुच्छेद 359 मूल अधिकारों का निलंबन स्वतः नहीं करता! यह राष्ट्रपति को शक्ति देता है की वह मूल अधिकारों के निलंबन को लागू करें!
    3. अनुच्छेद 358 केवल बाह्य आपातकाल में लागु होता है न की आतंरिक आपातकाल के समय! दूसरी ओर अनुच्छेद 359 बाह्य तथा आतंरिक दोनों आपातकाल में लागु होता है!
    4. अनुच्छेद 358, अनुच्छेद 19 को आपातकाल की संपूर्ण अवधि के लिए निलंबित कर देता है, जबकि अनुच्छेद 359 मूल अधिकारों के निलंबन को राष्ट्रपति द्वारा उल्लेख की गयी अवधि के लिए लागू करता है! यह अवधि संपूर्ण आपातकालीन अवधि या अल्पावधि हो सकती है!
    5. अनुच्छेद 358, अनुच्छेद 19 को पूर्ण रूप से निलंबित कर देता है, जबकि अनुच्छेद 359, अनुच्छेद 20 एवं 21 के निलंबन को लागु नहीं करता है!
    6. अनुच्छेद 358 संपूर्ण देश में तथा अनुच्छेद 359 संपूर्ण देश अथवा किसी भाग विशेष में लागु हो सकता है!
    7. अनुच्छेद 358 राज्य को अनुच्छेद 19 के अंतर्गत मूल अधिकारों से साम्य नहीं रखने वाले नियम बनाने का अधिकार देता है जबकि अनुच्छेद 359 केवल उन्हीं मूल अधिकारों के संबंध में ऐसे कार्य करने का अधिकार देता है, जिन्हें राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निलंबित किया गया है!

     

    अनुच्छेद 352 के अधीन बाह्य आक्रमण के आधार पर आपात की प्रथम घोषणा चीनी आक्रमण के समय 26 अक्टूबर 1962 ई० को की गयी थी! यह उद्घोषणा 10 जनवरी 1968 ई० को वापस ले ली गई थी! दूसरी बार आपात की उद्घोषणा 3 दिसम्बर 1971 ई० को पाकिस्तान से युद्ध के समय की गयी! तीसरी बार राष्ट्रीय आपात की घोषणा 26 जून 1975 ई० को आतंरिक गड़बड़ी की आशंका के आधार पर जारी की गयी थी, दूसरी तथा तीसरी उद्घोषणा को मार्च 1977 ई० में वापस ली गई!

     

    राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) :

    अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति किसी राज्य में यह समाधान हो जाने पर की राज्य में सांविधानिक तंत्र विफल हो गया है अथवा राज्य संघ की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ रहता है, तो आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है! राज्य में आपात की घोषणा के बाद संघ न्यायिक कार्य छोड़कर राज्य के प्रशासन के कार्य अपने हाथ में ले लेता है! राज्य में आपात उद्घोषणा की अवधि दो मास होती है, इससे अधिक की अवधि के लिए संसद से अनुमति लेनी होती है, तब यह छह मास की होती है! अधिकतम तीन वर्ष तक यह एक राज्य के प्रवर्तन में रह सकती है! इससे अधिक के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता है! सर्वप्रथम 1951 ई० में पंजाब राज्य में अनुच्छेद 356 का प्रयोग किया गया!

     

    वितीय आपात (अनुच्छेद 360) :

    अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की उद्घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब उसे विश्वास हो जाए की ऐसी स्थिति विद्यमान है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है! वित्तीय आपात की घोषणा को दो महीनों के अंदर संसद के दोनों सदनों के सम्मुख रखना तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है! वित्तीय आपात की घोषणा उस समय की जाती है, जब लोकसभा विघटित हो, तो दो महीने की भीतर राज्यसभा की स्वीकृति मिलने के उपरांत वह आगे भी लागु रहेगी! किंतु नवनिर्वाचित लोकसभा द्वारा उसकी प्रथम बैठक के आरंभ से 30 दिन के भीतर ऐसी घोषणा की स्वीकृति आवश्यक है! इसकी अधिकतम समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है! यानि एक बार यदि इसे संसद के दोनों सदनों की मंजूरी प्राप्त हो जाए तो वित्तीय आपात अनिश्चित काल के लिए तब तक प्रभावी रहेगा जब तक इसे वापस न लिया जाए! राष्ट्रपति वित्तीय आपात की घोषणा को किसी समय वापस ले सकता है! और पढ़ें : भारत के संसदीय कार्यप्रणाली से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली

     

    वित्तीय आपात का प्रभाव :

    1. उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और संघ तथा राज्य सरकारों के अधिकारीयों के वेतन में कमी की जा सकती है!
    2. राष्ट्रपति आर्थिक दृष्टि से किसी भी राज्य सरकार को निर्देश दे सकता है!
    3. राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है की वह राज्य सरकारों को यह निर्देश दे की राज्य के समस्त वित्त विधेयक उसकी स्वीकृति से विधानसभा में प्रस्तुत किए जाएं!
    4. राष्ट्रपति केंद्र तथा राज्यों में धन संबंधी विभाजन के प्रावधानों में आवश्यक संशोधन कर सकते हैं!

     

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  • संविधान में संशोधन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी

    संविधान में संशोधन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी

    संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संसोधन की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है! इसमें संसोधन की तीन विधियों को अपनाया गया है –

     

    1  साधारण विधि द्वारा संसोधन : संसद के साधारण बहुमत द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून बन जाता है! इसके अंतर्गत राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति मिलने पर निम्न संशोधन किये जा सकते हैं –

    (i) नए राज्यों का निर्माण  (ii) राज्य क्षेत्र, सीमा और नाम में परिवर्तन  (iii) संविधान की नागरिकता संबंधी अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों की प्रशासन तथा केंद्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों की प्रशासन संबंधी व्यवस्थाएँ

     

    2  विशेष बहुमत द्वारा संशोधन : यदि संसद के प्रत्येक सदन द्वारा कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 मतों से विधेयक पारित हो जाए तो राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही वह संशोधन संविधान का अंग बन जाता है! न्यायपालिका तथा राज्यों के अधिकारों तथा शक्तियों जैसी कुछ विशिष्ट बातों को छोड़कर संविधान की अन्य सभी व्यवस्थाओं में इसी प्रक्रिया के द्वारा संशोधन किया जाता है!

     

    3  संसद के विशेष बहुमत एवं राज्य विधानमंडलों की स्वीकृति से संशोधन : संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन के लिए विधेयक को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत तथा राज्यों के कुल विधान मंडलों में से आधे द्वारा स्वीकृति आवश्यक है! इसके द्वारा किये जाने वाले संशोधन के प्रमुख विषय हैं! – (i) राष्ट्रपति का निर्वाचन (अनुच्छेद 54),  (ii) राष्ट्रपति निर्वाचन की कार्य पद्धति (अनुच्छेद 55),  (iii) संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार,  (iv) राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार,  (v) केन्द्रशासित क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय,  (vi) संघीय न्यायपालिका,  (vii) राज्यों के उच्च न्यायालय,  (viii) संघ एवं राज्यों में विधायी संबंध,  (ix) सातवीं अनुसूची का कोई विषय,  (x) संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व,  (xi) संविधान संशोधन की प्रक्रिया से संबंधित उपबंध!

     

    पढ़ें : भारत के संविधान में अब तक हुए प्रमुख संसोधनों को

     

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  • भारतीय संविधान में अब तक किए गए प्रमुख संशोधन

    भारतीय संविधान में अब तक किए गए प्रमुख संशोधन

    भारत के संविधान में अब तक हुए प्रमुख संशोधन कुछ इस प्रकार हैं – पहला संशोधन (1951 ई०) : इसके माध्यम से स्वतंत्रता, समानता एवं संपत्ति से संबंधित अधिकारों को लागू किये जाने संबंधी कुछ व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास किया गया! भाषण एवं अभिव्यक्ति के मूल अधिकारों पर इसमें उचित प्रतिबंध की व्यवस्था की गई! साथ ही इस संसोधन द्वारा संविधान में नौंवीं अनुसूची जोड़ा गया, जिसमें उल्लिखित कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्तियों के अंतर्गत परिक्षा नहीं की जा सकती है!

     

    दूसरा संशोधन (1952 ई०) : इसके अंतर्गत 1951 ई० की जनगणना के आधार पर लोकसभा में प्रतिनिधित्व को पुनर्व्यवस्थित किया गया!

     

    तीसरा संशोधन (1954 ई०) : इसके अंतर्गत सातवीं अनुसूची को समवर्ती सूचि की तैंतिसवी प्रविष्टि के स्थान पर खाद्यान्न, पशुओं के लिए चारा, कच्चा कपास, जूट आदि को रखा गया, जिसके उत्पादन एवं आपूर्ति को लोकहित में समझने पर सरकार उस पर नियंत्रण लगा सकती है!

    और पढ़ें : भारतीय संविधान की प्रमुख अनुसूचियां और भाग

     

    चौथा संसोधन (1955 ई०) : इसके अंतर्गत व्यक्तिगत संपत्ति को लोकहित में राज्य द्वारा हस्तगत किये जाने की स्थिति में, न्यायालय इसकी क्षतिपूर्ति के संबंध में परिक्षा नहीं कर सकती!

     

    छठा संशोधन (1956 ई०) : इस संसोधन द्वारा सातवीं अनुसूची के संघ सूचि में परिवर्तन कर अंतरराज्जीय बिक्री कर के अंतर्गत कुछ वस्तुओं पर केंद्र को कर लगाने का अधिकार दिया गया!

     

    सातवाँ संशोधन (1956 ई०) : इस संशोधन द्वारा भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया, जिसमें पहले के तीन श्रेणियों में राज्यों के वर्गीकरण को समाप्त करते हुए राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में उन्हें विभाजित किया गया! साथ ही, इनके अनुरूप केंद्र एवं राज्य की विधान पालिकाओं में सीटों को पुनर्व्यवस्थित किया गया!

     

    आठवां संशोधन (1959 ई०) : इसके अंतर्गत केंद्र एवं राज्यों के निम्न सदनों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं आंग्ल भारतीय समुदायों के आरक्षण संबंधी प्रावधानों को दस वर्षों के लिए अर्थात 1970 ई० तक बढ़ा दिया गया!

     

    नौवां संशोधन (1960 ई०) : इसके द्वारा संविधान की प्रथम अनुसूची में परिवर्तन करके भारत एवं पाकिस्तान के बिच 1958 की संधि शर्तों के अनुसार बेरुबारी, खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया गया!

    और पढ़ें : भारतीय संविधान में न्यायपालिका की व्यवस्था एवं अधिकार

     

    दसवां संशोधन (1961 ई०) : इसके अंतर्गत भूतपूर्व पुर्तगाली अंतःक्षेत्रों दादर नगर हवेली को भारत में शामिल कर उन्हें केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया!

     

    ग्यारहवां संशोधन (1961 ई०) : इसके अंतर्गत उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रावधानों में परिवर्तन कर, इस संदर्भ में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को बुलाया गया! साथ ही यह भी निर्धारित किया गया की निर्वाचकमंडल में पद की रिक्तता के आधार पर राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती!

     

    बारहवां संशोधन (1962 ई०) : इसके अंतर्गत संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन कर गोवा, दमण एवं दीव को भारत में केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में शामिल कर लिया गया!

     

    तेरहवाँ संशोधन (1962 ई०) : इसके अंतर्गत नागालैंड के संबंध में विशेष प्रावधान अपनाकर उसे एक राज्य का दर्जा दे दिया गया!

     

    चौदहवां संशोधन (1963 ई०) : इसके द्वारा केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में पुडुचेरी को भारत में शामिल कर लिया गया! साथ ही, इसके द्वारा हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन एवं दीव तथा पुडुचेरी केन्द्रशासित प्रदेशों में विधानपालिका एवं मंत्रिपरिषद की स्थापना की गई!

     

    पंद्रहवां संशोधन (1963 ई०) : इसके अंतर्गत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवामुक्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई तथा अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की उच्च न्यायालय में नियुक्ति से संबंधित प्रावधान बनाये गए!

     

    सोलहवां संशोधन (1963 ई०) : इसके द्वारा देश की संप्रभुता एवं अखंडता के हित में मूल अधिकारों पर कुछ प्रतिबन्ध लगाने के प्रावधान रखे गए हैं! साथ ही तीसरी अनुसूची में भी परिवर्तन कर शपथ ग्रहण के अंतर्गत ‘मैं भारत की स्वतंत्रता एवं अखंडता को बनाए रखूँगा’ जोड़ा गया!

     

    सत्रहवां संशोधन (1964 ई०) : इसमें संपत्ति के अधिकारों में और भी संशोधन करते हुए कुछ अन्य भूमि सुधार प्रावधानों को नौंवीं अनुसूची में रखा गया, जिनकी वैधता की परिक्षा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती थी!

     

    अठारहवां संशोधन (1966 ई०) : इसके अंतर्गत पंजाब का भाषायी आधार पर पुनर्गठन करते हुए पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब एवं हिंदी भाषी क्षेत्र को हरियाणा के रूप में गठित किया गया! पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को दे दिए गए तथा चंडीगढ़ को केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया!

     

    उन्नीसवां संशोधन (1966 ई०) : इसके अंतर्गत चुनाव आयोग के अधिकारों में परिवर्तन किया गया एवं उच्च न्यायालयों को चुनाव याचिकाएं सुनने का अधिकार दिया गया!

    और पढ़ें : भारतीय संसदीय कार्यप्रणाली के प्रमुख शब्दावली

     

    बीसवां संसोधन (1966 ई०) : इसके अंतर्गत अनियमितता के आधार पर नियुक्त कुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति को वैधता प्रदान की गई!

     

    इक्कीसवां संशोधन (1967 ई०) : इसके द्वारा सिंधी भाषा की संविधान की आठवीं अनुसूची के अंतर्गत पंद्रहवीं भाषा के रूप में शामिल किया गया!

     

    बाईसवाँ संशोधन (1969 ई०) : इसके द्वारा असम से अलग करके एक नया राज्य मेघालय बनाया गया!

     

    तेइसवां संशोधन (1969 ई०) : इसके अंतर्गत विधान पालिकाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण एवं आंग्ल भारतीय समुदाय के लोगों का मनोनयन और दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया!

     

    चौबीसवां संशोधन (1971 ई०) : इस संशोधन के अंतर्गत संसद की इस शक्ति को स्पष्ट किया गया की वह संविधान के किसी भी भाग को, जिसमें भाग तीन के अंतर्गत आने वाले मूल अधिकार भी हैं, संशोधित कर सकती है! साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया की संशोधन संबंधी विधेयक जब दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति के समक्ष जाएगा तो इसपर राष्ट्रपति द्वारा सम्मति दिया जाना बाध्यकारी होगा!

     

    छब्बीसवां संशोधन (1971 ई०) : इसके अंतर्गत भूतपूर्व देशी राज्यों के शासकों की विशेष उपाधियों एवं उनके प्रीवि-पर्स को समाप्त कर दिया गया!

     

    सत्ताईसवाँ संशोधन (1971 ई०) : इसके अंतर्गत मिजोरम एवं अरुणाचल प्रदेश को केन्द्रशासित प्रदेशों के रूप में स्थापित किया गया!

     

    उनतीसवाँ सशोधन (1972 ई०) : इसके अंतर्गत केरल भू-सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 तथा केरल भू-सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 को संविधान की नौंवीं अनुसूची में रख दिया गया, जिससे इसकी संवैधानिक वैधता को न्यायालय में चुनौती न दी जा सके!

     

    इकतीसवाँ संशोधन (1973 ई०) : इसके द्वारा लोकसभा के सदस्यों की संख्या 525 से 545 कर दी गई तथा केन्द्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व 25 से घटाकर 20 कर दिया गया!

     

    बत्तीसवाँ संशोधन (1974 ई०) : इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों पारित बीस भू सुधार अधिनियमों को नौंवीं अनुसूची में प्रवेश देते हुए उन्हें न्यायालय द्वारा संवैधानिक वैधता के परिक्षण से मुक्त किया गया!

     

    पैंतीसवाँ संशोधन (1974 ई०) : इसके अंतर्गत सिक्किम का संरक्षित राज्यों का दर्जा समाप्त कर उसे सम्बद्ध राज्य के रूप में भारत में प्रवेश दिया गया!

    और पढ़ें : भारत के चुनाव आयोग द्वारा जारी आचार संहिता

     

    छत्तीसवाँ संशोधन (1975 ई०) : इसके अंतर्गत सिक्किम को भारत का बाईसवाँ राज्य बनाया गया!

     

    सैंतीसवाँ संशोधन (1975 ई०) : इसके तहत आपात स्थिति की घोषणा और राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासनिक प्रधानों द्वारा अध्यादेश जारी किये जाने को अविवादित बनाते हुए न्यायिक पुनर्विचार से उन्हें मुक्त रखा गया!

     

    उनतालीसवाँ संशोधन (1975 ई०) : इसके द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं लोकसभाध्यक्ष के निर्वाचन संबंधी विवादों को न्यायिक परिक्षण से मुक्त कर दिया गया!

     

    इकतालीसवाँ संशोधन (1976 ई०) : इसके द्वारा राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्यों की सेवा मुक्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई, पर संघ लोकसेवा आयोग के सदस्यों की सेवा निवृति की अधिकतम आयु 65 वर्ष रहने दी गई!

     

    बयालीसवां संशोधन (1976 ई०) : इसके द्वारा संविधान में व्यापक परिवर्तन लाए गए, जिनमें से मुख्य निम्नलिखित थे – (क) संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं एकता और अखंडता आदि शब्द जोड़े गए!

    (ख) सभी नीति निर्देशक सिद्धांतों को मूल अधिकारों पर सर्वोच्चता सुनिश्चित की गई!

    (ग) इसके अंतर्गत संविधान में दस मौलिक कर्तव्यों को अनुच्छेद 51 (क), के अंतर्गत जोड़ा गया!

    (घ) इसके द्वारा संविधान को न्यायिक परिक्षण से मुक्त रखा गया!

    (ड.) सभी विधानसभाओं एवं लोकसभा की सीटों की संख्या को इस शताब्दी के अंत तक को स्थिर कर दिया गया!

    (च) लोकसभा एवं विधानसभाओं की अवधि को पांच वर्ष से छह वर्ष के लिए कर दिया गया!

    (छ) इसके द्वारा यह निर्धारित किया गया की किसी भी केन्द्रीय कानून की वैधता पर सुप्रीम न्यायालय एवं राज्य के कानून की वैधता का उच्च न्यायालय ही परिक्षण करेगा! साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया की किसी भी संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर पाँच से अधिक न्यायधीशों की बेंच द्वारा दो तिहाई बहुमत से निर्णय दिया जाना चाहिए और यदि न्यायाधीशों की संख्या पाँच तक हो तो निर्णय सर्वसम्मति से होना चाहिए!

    (ज) इसके द्वारा वन संपदा, शिक्षा, जनसँख्या नियंत्रण आदि विषयों को राज्य सूचि से समवर्ती सूचि के अंतर्गत तक कर दिया गया!

    (झ) इसके अंतर्गत निर्धारित किया गया की राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार कार्य करेगा!

    (ट) इसने संसद को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून बनाने के अधिकार दिए एवं सर्वोच्चता स्थापित की!

     

    चौवालिसवाँ संशोधन (1978 ई०) : इसके अंतर्गत राष्ट्रीय आपात स्थिति लागू करने के लिए ‘आंतरिक अशांति’ के स्थान पर सैन्य विद्रोह का आधार रखा गया एवं आपात स्थिति संबंधी अधिकार को मौलिक अधिकारों के भाग से हटाकर विधिक अधिकारों की श्रेणी में रख दिया गया! लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं की अवधि 6 वर्ष से घटाकर पुनः 5 वर्ष कर दी गई! उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद को हल करने की अधिकारिता प्रदान की गई!

     

    पचासवाँ संशोधन (1984 ई०) : इसके द्वारा अनुच्छेद 33 में संशोधन कर सैन्य सेवाओं की पूरक सेवाओं में कार्य करने वालों के लिए आवश्यक सूचना एकत्रित करने, देश की संपत्ति की रक्षा करने और कानून तथा व्यवस्था से संबंधित दायित्व भी दिए गए! साथ ही इन सेवाओं द्वारा उचित कर्तव्य पालन हेतु संसद को कानून बनाने के अधिकार भी दिए गए!

     

    बावनवाँ संशोधन (1985 ई०) : इस संशोधन के द्वारा राजनीतिक दल बदल पर अंकुश लगाने का लक्ष्य रखा गया! इसके अंतर्गत संसद या विधान मंडलों के उन सदस्यों को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा, जो उस दल को छोड़ते हैं जिसके चुनाव चिह्न पर उन्होंने चुनाव लड़ा था, पर यदि किसी दल की संसदीय पार्टी के एक तिहाई सदस्य अलग दल बनाना चाहे तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होगी! दल बदल विरोधी इन प्रावधानों को संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत रखा गया!

     

    तिरपनवाँ संशोधन (1986 ई०) : इसके अंतर्गत अनुच्छेद 371 में खंड ‘जी’ जोड़कर मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया!

     

    चौवनवाँ संशोधन (1986 ई०) : इसके द्वारा संविधान की दूसरी अनुसूची के भाग ‘डी’ में संशोधन कर न्यायधीशों के वेतन में वृद्धि का अधिकार संसद को दिया गया!

     

    पचपनवाँ संशोधन (1986 ई०) : इसके अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश को राज्य बनाया गया!

     

    छप्पनवाँ संसोधन (1987 ई०) : इसके अंतर्गत गोवा को एक राज्य का दर्जा दिया गया तथा दमन और दीव को केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में ही रहने दिया गया!

     

    सत्तावनवाँ संशोधन (1987 ई०) : इसके अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के संबंध में मेघालय, मिजोरम, नागालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा सीटों का परिसीमन इस शताब्दी के अंत तक के लिए किया गया!

     

    अठ्ठावनवाँ संशोधन (1987 ई०) : इसके द्वारा राष्ट्रपति को संविधान का प्रमाणिक हिंदी संस्करण प्रकाशित करने के लिए अधिकृत किया गया!

     

    साठवाँ संशोधन (1988 ई०) : इसके अंतर्गत व्यवसाय कर की सीमा को 250 रूपये से  बढ़ाकर 2500 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष कर दिया गया!

     

    इकसठवाँ संशोधन (1989 ई०) : इसके द्वारा मतदान के लिए आयु सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 लाने का प्रस्ताव था!

     

    पैंसठवाँ संशोधन (1990 ई०) : इसके द्वारा अनुच्छेद 338 में संशोधन करके अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन की व्यवस्था की गई!

     

    उनहतरवाँ संशोधन (1991 ई०) : दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनाया गया तथा दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र के लिए विधानसभा और मंत्री परिषद् का उपबंध किया गया!

     

    सत्तरवाँ संशोधन (1992 ई०) : दिल्ली और पुडुचेरी संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं के सदस्यों को राष्ट्रपति के लिए निर्वाचक मंडल में सम्मिलित किया गया!

     

    इकहत्तरवाँ संशोधन (1992 ई०) : आठवीं अनुसूची में कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को सम्मिलित किया गया!

     

    तिहत्तरवाँ संशोधन (1992 – 1993 ई०) : इसके अंतर्गत संविधान में ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई! इसके पंचायतीराज संबंधी प्रावधानों को सम्मिलित किया गया! इस संशोधन के द्वारा संविधान में भाग – 9 जोड़ा गया! इसमें अनुच्छेद 243 और अनु 243 क से 243 ण तक अनुच्छेद है!

     

    चौहत्तरवाँ संशोधन (1993 ई०) : इसके अंतर्गत संविधान में बारहवीं अनुसूची शामिल की गयी, जिसमें नगरपालिका, नगर निगम और नगर परिषदों से संबंधित प्रावधान किये गए हैं! इस संशोधन के द्वारा संविधान में भाग – 9 क जोड़ा गया!

     

    छिहत्तरवाँ संशोधन (1994 ई०) : इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान की नौंवी अनुसूची में संशोधन किया ग्या है और तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 69 प्रतिशत आरक्षण उपबंध को नौंवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया है!

     

    अठहत्तरवाँ संशोधन (1995 ई०) : इसके द्वारा नौंवीं अनुसूची में विभिन्न राज्यों द्वारा पारित 27 भूमि सुधार विधियों को समाविष्ट किया गया है! इस प्रकार नौंवीं अनुसूची में सम्मिलित अधिनियमों की कुल संख्या 284 हो गयी है!

     

    उन्नासीवाँ संशोधन (1999 ई०) : अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि 25 जनवरी 2010 ई० तक के लिए बढ़ा दी गई है! इस संशोधन के माध्यम से व्यवस्था की गई की अब राज्यों को प्रत्यक्ष करों से प्राप्त कुल राशि का 29% हिस्सा मिलेगा!

     

    बेरासीवाँ संशोधन (2000 ई०) : इस संशोधन के द्वारा राज्यों को सरकारी नौकरियों में आरक्षित स्थानों की भर्ती हेतु प्रोन्नति के मामलों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम प्राप्तांकों में छुट प्रदान की गई है!

     

    चौरासीवाँ संशोधन (2000 ई०) : इस संशोधन अधिनियम द्वारा लोकसभा तथा विधानसभाओं की सीटों की संख्या में वर्ष 2026 तक कोई परिवर्तन न करने का प्रावधान किया जाता है!

     

    पचासीवाँ संशोधन (2001 ई०) : सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति के अभ्यार्थियों के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था!

     

    छियासीवाँ संशोधन (2002 ई०) : इस संशोधन अधिनियम द्वारा देश के 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य निशुल्क शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने संबंधी प्रावधान किया गया है, इसे अनुच्छेद 21 (क) के अंतर्गत संविधान में जोड़ा गया है! इस अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 45 तथा 51 (क) में संशोधन किये जाने का प्रावधान है!

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    सतासीवाँ संशोधन (2003 ई०) : परिसीमन में जनसँख्या का आधार 1991 की जनगणना के स्थान पर 2001 कर दी गई!

     

    अठासीवाँ संशोधन (2003 ई०) : सेवाओं पर कर का प्रावधान!

     

    नब्बेवाँ संशोधन (2003 ई०) : असम विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों और गैर जनजातियों का प्रतिनिधित्व बरकार रखते हुए बोडोलैंड, टेरिटोरियल काउंसिल क्षेत्र, गैर जनजाति के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा!

     

    इक्यानवेवाँ संशोधन (2003 ई०) : दल बदल व्यवस्था में संशोधन, केवल संपूर्ण दल के विलय को मान्यता, केंद्र तथा राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्य संख्या क्रमशः लोकसभा तथा विधानसभा की सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत होगा ( जहाँ सदन की संख्या 40-40 है वहाँ अधिकतम 12 होगी)!

     

    बेरनावेवाँ संशोधन (2003 ई०) : संविधान की आठवीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथिलि और संथाली भाषाओँ का समवेश!

     

    तिरानवेवाँ संशोधन (2006 ई०) : शिक्षा संस्थाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के नागरिकों के दाखिले के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 15 की धारा 4 के प्रावधानों के तहत की गई है!

     

    चौरानवेवाँ संशोधन (2006 ई०) : इस संशोधन द्वारा बिहार राज्य को एक जनजाति कल्याण मंत्री नियुक्त करने के उतरदायित्व से मुक्त कर दिया गया तथा इस प्रावधान को झारखंड व छत्तीसगढ़ में लागु करने की व्यवस्था की गई! मध्य प्रदेश एवं उड़ीसा में यह व्यवस्था पहले से ही लागु है!

     

    पंचानवेवाँ संशोधन (2009 ई०) : इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 334 में संशोधन कर लोकसभा में अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण एवं आंग्ल भारतियों को मनोनीत करने संबंधी प्रावधान को 2020 तक बढ़ा दिया गया है!

     

    एक सौ चौबीसवाँ संशोधन (2019 ई०) : सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को 10% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया!

     

    एक सौ छबीसवाँ संशोधन (2019 ई०) : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण 10 साल के लिए बढ़ाने का प्रावधान है! वहीं इसमें संसद में एंग्लो इंडियन कोटा खत्म करने का प्रावधान है!

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