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  • Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja

    Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja

    Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja | पुरे देश में नवरात्री (Navratri) की धूम है! हर तरफ माता की साधना और पूजा चल रहा है. लेकिन क्या आपको मालूम है साल में नवरात्रि का पर्व एक बार नहीं बल्कि चार बार आता है। पहला नवरात्री चैत्र के महीने में आता है, जिसे चैत्र नवरात्री कहा जाता है. इस नवरात्रि के साथ ही हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है। दूसरी नवरात्रि आश्विन माह में आती है, जिसे शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। इसके आलावा पौष और आषाढ़ के महीने में भी नवरात्रि का पर्व आता है, जिसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, और गुप्त नवरात्री को तंत्र साधना के लिए विशेष माना जाता है। लेकिन अगर बात की जाए गृहस्थ और सामान्य लोगों की उनके लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि को ही उत्तम माना गया है।

     

    चैत्र नवरात्री और शारदीय नवरात्री में क्या अंतर है?

    जहाँ चैत्र नवरात्री (Chitra Navratri) मनाने के पीछे की कहानी यह है की जब वरदान पाकर शक्तिशाली हो चुके महिषासुर का आतंक धरती पर बढ़ गया और वरदान की वजह से देवता भी उसे हरा पाने में असमर्थ हो गए। ऐसे में देवताओं ने माता को प्रसन्न कर उनसे रक्षा की विनती की। इसके बाद मातारानी ने अपने अंश से नौ रूप प्रकट किए। ये पूरा विधान चैत्र के महीने में प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर 9 दिनों तक चला, तब से इन नौ दिनों को चैत्र नवरात्रि के तौर पर मनाया जाने लगा।

     

    वहीँ शारदीय नवरात्री (Sharadiya Navratri) मनाने का कारण यह माना जाता है की देवी दुर्गा ने आश्विन के महीने में ही महिषासुर से नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसलिए इन नौ दिनों को शक्ति की आराधना के रूप में तो दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है. चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रि का भगवान् राम से भी विशेष संबंध है. चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन रामनवमी आती है। प्रभु श्रीराम का जन्म रामनवमी के दिन ही हुआ था. जबकि शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी होता है और महानवमी के अगले दिन विजयदशमी होता है। विजयदशमी के दिन ही माता दुर्गा ने महिषासुर का मर्दन किया था और भगवान् श्रीराम ने रावण का वध किया था, जिसे दशहरा के रूप में भी मनाया जाता है।

     

    नवरात्री के दौरान सात्विक जीवन, साधना, व्रत और, उत्सव आदि का महत्व है। नवरात्र के नौ दिनों को तीन भागों में बांटा गया है। पहले तीन दिन को ‘तमस’ को जीतने की साधना, अगले तीन दिन को ‘रजस’ और अंतिम तीन दिन को ‘सत्व’ को जीतने की साधना माना जाता है. अर्थात यह त्यौहार सृष्टी के त्रिगुणात्मक शक्तियों की साधना का भी त्यौहार है. नवरात्र की शुरुआत कलश स्थापना और जौ बोने की परंपरा से होती है, और नौ दिनों तक प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।

     

    पहले दिन : माता शैल्पुरी (Maa Shailputri Devi)

    प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है. इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल है और उनका वाहन वृषभ है। शैलपुत्री माता की पूजा से जीवन में स्थिरता, शक्ति और साहस प्राप्त होता है। भक्तों को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ मिलता है और जीवन के संकटों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

     

    दुसरे दिन : माता ब्रहाम्चारिणी (Maa Brahmacharini Devi)

    नवरात्री के दुसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. जिसका अर्थ है ‘तपस्विनी’ या ‘धर्म का पालन करने वाली’। इनके एक हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल होता है। ब्रह्मचारिणी देवी तपस्या और भक्ति का प्रतीक हैं। इनकी पूजा से मनुष्य के अंदर आत्मनियंत्रण, धैर्य और दृढ़ संकल्प का विकास होता है।

     

    तीसरे दिन : माता चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta Devi)

    नवरात्री के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की की पूजा की जाती है. इनके मस्तक पर एक घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, जिसके कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. ये रणचंडी के नाम से भी जानी जाती हैं और युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहती हैं. उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं। चंद्रघंटा देवी के इस रूप की पूजा करने से साहस, आत्मविश्वास और शक्ति का संचार होता है।

     

    चौथे दिन : माता कुष्मांडा (Maa Kushmanda Devi)

    नवरात्री के चौथे दिन माता कुष्मांडा की पूजा होती है. इन्हें असंख्य ब्रह्मांडों की रचना करने वाली माता मान जाता है. वह सिंह पर सवार होती हैं, और इनके आठ हाथों में कमल, अमृत कलश, धनुष-बाण, चक्र, गदा और जप माला धारण है। कूष्मांडा देवी ऊर्जा और जीवन की स्रोत मानी जाती हैं। कूष्मांडा माता की पूजा से जीवन में समृद्धि, ऊर्जा और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

     

    पांचवे दिन : माँ स्कंदमाता (Maa Skandamata Devi)

    नवरात्री के पांचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाति है. इन्हें भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेय की माता के रूप में जाता है, और यह मातृत्व का प्रतीक हैं. देवी स्कंदमाता चार भुजाओं वाली हैं और अपनी गोद में स्कंद को लिए सिंह पर विराजमान हैं। स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को उनके परिवार और संतान की रक्षा और कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

     

    छठे दिन : माता कात्यायनी (Maa Katyayani Devi)

    नवरात्री के छठे दिन माता कात्यायनी की आराधना की जाती है. इन्हें स्त्री की उस शक्ति का प्रतीक माना जाता है जो परिवार को बुराइयों से बचाती है. माता कात्यायनी के चार हाथ हैं और वह सिंह पर सवार होकर आती हैं। कात्यायनी माता की पूजा करने से भक्तों को साहस और बल मिलता है।

     

    सातवें दिन : माता कालरात्रि (Maa Kaalratri Devi)

    नवरात्री सातवें दिन माता कालरात्रि की उपासना की जाती है. माता कालरात्रि को अंधकार और भय को नष्ट करने वाली देवी माना जाता है। यह देवी का सबसे उग्र रूप है, जिसमें वह काले रंग की होती हैं, उनके चार हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं और वह गधे पर सवार रहती हैं। कालरात्रि की पूजा से सभी प्रकार के भय और बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है। यह स्वरूप शत्रुओं के नाश के लिए जाना जाता है।

     

    आठवें दिन : माता महागौरी (Maa Mahagauri Devi)

    नवरात्री के आठवें दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है. माता महागौरी का वर्ण श्वेत है, जिसके कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है। वह बैल पर सवार होती हैं और उनके चार हाथ होते हैं। महागौरी को माता का सबसे उत्कृष्ट रूप माना जाता है, जो चरित्र की पवित्रता और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है. महागौरी की पूजा से पवित्रता, शांति और करुणा का आशीर्वाद मिलता है। यह रूप जीवन में शांति और सौंदर्य का प्रतीक है।

     

    नौवें दिन : माता सिद्धिदात्री (Maa Siddhidatri Devi)

    नवरात्री के आखिरी और नौवें दिन माता के सिद्धिदात्री रूप की पूजा की जाती है. इन्हें सभी सिद्धियों की दाता माना जात है. इनके चार हाथ होते हैं। वह कमल पर विराजमान होती हैं और उनका वाहन सिंह होता है। उनका यह स्वरूप ज्ञान और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देता है। सिद्धिदात्री की आराधना से सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति होती है।

     

    मौसम और विज्ञानं का रहस्य

    नवरात्री के इन त्यौहारों के पीछे जीवन, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ा एक वैज्ञानिक पहलु भी है. जब नवरात्र मनाए जाते हैं तब का समय मौसम बदलने का भी होता है, और शरीर को नए वातावरण के अनुसार ढालने की जरूरत होती है। ऐसे में उपवास और हल्का भोजन करने से शरीर को शुद्ध रखने और शरीर के रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलती है। जीवन के उतार चढाव और नियमित तनाव, खासकर आज के तेज रफ्तार वाली आधुनिक जीवन शैली में नवरात्र का त्यौहार न सिर्फ नए उत्साह का संचार करता है, बल्कि हमें थोड़ा ठहरकर आत्मचिंतन करने का अवसर भी देता है।

     

    नवरात्री (Navratri) को बुराई पर अच्छाई की जीत, शक्ति की साधना, जीवन में नई शुरुआत, आध्यात्मिक उन्नति, और सामाजिक समरसता के उत्सव के रूप मनाया जाता है. नवरात्रि के दौरान, लोग उपवास करते हैं, पूजा करते हैं, और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह त्योहार लोगों को एकसाथ जोड़ता है और उन्हें अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है. इस दौरान भारत के हर कोने में एक अलग ही उल्लास और उत्साह देखने को मिलता है। चाहे वह व्रत-उपवास हो रामलीला का मंचन हो गरबा की धूम हो या भव्य दुर्गा पूजा, नवरात्र हर रूप में हमें अपनी परंपराओं से जोड़ता है। भारतीय संस्कृति में नवरात्र सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम है।

  • Onam | ओणम को भारत के लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। इसकी क्या धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशेषता है?

    Onam | ओणम को भारत के लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। इसकी क्या धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशेषता है?

    Onam | ओणम को भारत के लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। इसकी क्या धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशेषता है? भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में अपनी विशेष पहचान रखने वाला त्यौहार ओणम पूरे उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। ओणम को भारत के बड़े और लोकप्रिय त्योहारों में से एक माना जाता है। इसे मुख्य रूप से केरल में मनाया जाता है. आइए जानते हैं हम इस त्यौहार को क्यों मनाते हैं और इसकी क्या धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशेषता है?

     

    ओणम केरल का एक वार्षिक पौराणिक और फसल उत्सव है जो राजा महाबली के पृथ्वी पर वापस आने की खुशी में मनाया जाता है. यह त्योहार मलयालम कैलेंडर के चिंगम मास में मनाया जाता है, जिसे वर्ष का प्रथम मास भी माना जाता है, अर्थात यह त्योहार मलयाली नव वर्ष का प्रतीक भी है, जो 10 दिनों तक चलता है। ओणम को मनाने के पीछे कई कारण हैं. लेकिन मुख्य रूप से ओणम को भगवान वामन की जयन्ती और राजा महाबली की वापसी के स्वागत के रूप में मनाया जाता हैं.

     

    ओणम के उत्सव का प्रारंभ त्रिक्काकरा के वामन मन्दिर से प्रारम्भ होता है। ऐसा माना जाता है की राजा महाबलि सबसे पहले यहीं आते हैं. इस त्यौहार में प्रत्येक घर के आँगन में फूलों की पंखुड़ियों से सुन्दर सुन्दर रंगोलियाँ बनाई जाती हैं, जिसे पुकलम कहा जाता है। महिलाएं उन रंगोलियों के चारों ओर वृत्त बनाकर उल्लास पूर्वक नृत्य करती हैं। प्रथम दिन इस पुकलम का आकार छोटा होता है लेकिन हर दिन इसमें फूलों एक वृत्त बढ़ा दिया जाता है, जिससे दसवें दिन यह पूक्कलम काफी बड़े आकार का हो जाता है। इस पुकलम के बीच त्रिक्काकरप्पन अर्थात भगवान विष्णु के वामन अवतार, राजा बलि तथा उनके अंग-रक्षकों की प्रतिष्ठा होती है जो कच्ची मिटटी से बनायीं जाती है।

     

    पौराणिक कहानियों के अनुसार, ओणम केरल में दैत्य राजा महाबली के सुशासन की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने कभी केरल पर शासन किया था। वह अपने सुशासन और दान के लिए जाने जाते थे. महाबली को अपनी प्रजा बहुत प्रिय थी और उन्होंने अपनी प्रजा के लिए काफी अच्छे काम किये थे, जिसकी वजह से वह अपनी प्रजा में काफी लोकप्रिय थे। महाबली ने अपनी साधना से कई तरह की शक्तियां प्राप्त की थी, जिससे उनका यश दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा था।

     

    ऐसा कहा जाता हैं की महाबली इतने शक्तिशाली हो चुके थे की कोई देवता भी उन्हें नहीं हरा सकते थे. जिससे स्वर्ग के राजा इंद्र काफी विचलित थे. इंद्र की स्थिति को देखते हुए उनकी माता अदिति ने अपने पुत्र की रक्षा के लिए भगवान विष्णु की आराधना शुरू कर दी. आराधना से प्रकट होकर भगवान विष्णु ने अदिति से वादा किया की वह इंद्र की रक्षा करेंगे. तत्पश्चात भगवान विष्णु ने माता अदिति के गर्भ से वामन के रूप में जन्म लिया।

     

    दैत्य राजा महाबली स्वर्ग पर स्थायी अधिकार प्राप्त करना चाहते थे और इसके लिए वह अश्वमेध यज्ञ करा रहे थे. इसी दौरान श्रीहरि विष्णु अपने वामन रूप में वहां पहुच गए. राजा महाबली ने भगवान् वामन का सत्कार किया और उनसे कहा की वह जो भी दान मांगना चाहे वह मांग सकते हैं. भगवान ने महाबली से तीन पग भूमि मांगी, जिसे महाबली ने स्वीकार करते हुए दान का संकल्प ले लिया. लेकिन भगवान वामन ने एक कदम से पूरी पृथ्वी और दूसरे कदम से पूरा आसमान नाप दिया, और फिर तीसरा कदम रखने की लिए जगह ही नहीं बची. अतः अपना वचन पूरा करने के उद्देश्य से महाबली ने तीसरा कदम रखने के लिये भगवान के सामने अपना सिर आगे कर दिया. और भगवान वामन ने जैसे ही महाबली के सिर पर अपना कदम रखा तो भगवान के अनंत शक्तियों के कारण महाबली पाताल में चले गए।

     

    इधर जब प्रजा को महाबली के पाताल में जाने की सूचना मिली तो पूरे राज्य में हाहाकार मच गया. महाबली के जाने से प्रजा बेहद ही दुःखी गई. लेकिन महाबलि की उदारता, दानवीरता, समर्पण और उनके प्रति प्रजा के अनन्त स्नेह को देखते हुए भगवान ने महाबली को यह वरदान दिया की वह वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने आ सकेंगे. उसी दिवस के उपलक्ष्य में ओणम का त्यौहार मनाया जाता है।

     

    ओणम का त्यौहार दस दिनों तक मनाया जाता है जिसके हर दिन का एक खास महत्व है. इस दौरान 10 दिनों तक लोग अपने घरों को फूलों से सजा कर रखते हैं और विधि विधान से भगवान विष्णु और महाबली की पूजा करते हैं.

    ओणम (Onam) के पहले दिन जिसे अथम कहा जाता है, लोग सुबह के समय स्नान करने के बाद मंदिर जाकर भगवान की पूजा करते हैं और फिर नाश्ते में केला पापड़ आदि खाते हैं और पुष्पकालीन अर्थात पुकलम बनाते हैं. दूसरा दिन अर्थात चिथिरा के दिन महिलाएं पुकलम में नए फूलों का वृत्त बनाती हैं. तीसरा दिन अर्थात विसाकम के दिन ओणम के दसवें दिन के लिए खरीददारी की जाती है. चौथे दिन अर्थात विशाखम फूलों का कालीन अर्थात पुकलम बनाने की प्रतियोगिताएं होती है और दसवें दिन के लिए अचार और आलू चिप्स जैसी चीजें तैयार की जाती हैं. पांचवां दिन अर्थात अनिजाम के दिन नौका दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है. इस नौका दोड़ को केरला में वल्लमकली के नाम से जाना जाता है. छठा दिन अर्थात थिक्रेता के दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. सातवां दिन अर्थात मूलम के दिन बाजार सज जाते हैं और लोग खास पकवान और व्यंजनों का लुत्फ उठाते हैं. आठवां दिन अर्थात पूरादम के दिन लोग मिट्टी से पिरामिड के आकार की मूर्तियां बनाते हैं. नौवां दिन अर्थात उथिरादम के दिन को प्रथम ओणम कहा जाता है, और इस दिन लोग राजा महाबलि के आने का इंतजार करते हैं.

     

    दसवां दिन अर्थात थिरुवोणम, ओणम का आखिरी दिन होता है, जो सबसे खास होता है. थिरुवोणम का सबसे खास आकर्षण है ओणम साध्या, जिसमें केले के पत्ते पर भोजन परोसा जाता है, इसमें कई तरह के शाकाहारी व्यंजन होते हैं। जिसमें सांभर, अवियल, कालान, ओलन, थोरन, इंची करी, पचड़ी, मिठाई और अलग-अलग प्रकार के पायसम प्रमुख रहते हैं। इसके अलावा इस दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। जिसमें वल्लमकली अर्थात नौका दौड़, थिरुवाथिरा नृत्य, पुलिकली नृत्य, और पारंपरिक खेल ओणकलिकल खेले जाते हैं।

     

    इस दिन की मान्यता है कि राजा राजा महाबली धरती पर आते हैं, अपनी प्रजा की खुशहाली देखकर प्रसन्न होते हैं और सभी को आशीर्वाद देते हैं। इसलिए थिरुवोणम को ओणम का सबसे प्रमुख पवित्र और हर्षोल्लास से भरा दिन माना जाता है। ऐसी मान्यता हैं की जब महाबली प्रजा से मिलने आते हैं तब पूरे राज्य में हरियाली छा जाती हैं और प्रजा को सम्रद्धि प्राप्त होती है। अगर देखा जाए तो संस्कृति, इतिहास, पौराणिकता, धर्म, सुशासन, खुशहाली और समृधि को एक साथ समेटे हुए ओणम एक सम्पूर्णता से भरा हुआ त्योहार है जो सभी के घरों को खुशहाली से भर देता है।

  • Radha Ashtami | राधा रानी के अवतरण दिवस को राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है, क्यों श्रीजी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है?

    Radha Ashtami | राधा रानी के अवतरण दिवस को राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है, क्यों श्रीजी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है?

    Radha Ashtami : Radha Ashtmi | राधा रानी के अवतरण दिवस को राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है, क्यों श्रीजी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है? | सनातन संस्कृति में कृष्णप्रिया राधा रानी का अवतरण भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को माना जाता है, जिसे राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि राधा रानी को प्रसन्न करने से कान्हा जी की कृपा बहुत सहज ही प्राप्त हो जाती है। कान्हाजी को राधा रानी अतिप्रिय हैं, ऐसे में जब भक्त राधा जी को प्रसन्न करते हैं तो भगवान कृष्ण भी प्रसन्न हो जाते हैं।

     

    श्रीजी अर्थात राधाजी महाराज वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। श्री राधाजी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी अर्थात बरसाना में माना जाता है. राधा रानी का गुणगान कृष्ण वल्लभा, श्री वृन्दावनेश्वरी और कृष्णप्रिया जैसे नामों से भी किया जाता है। राधा नाम जपने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और मां लक्ष्मी की असीम कृपा बरसती है.

     

    राधा-कृष्ण का प्रेम केवल दो व्यक्ति, या दो आत्माओं के मिलन जैसा कोई साधारण प्रेम नहीं है, बल्कि परमात्मा और उनकी शक्ति के मिलन से निकली प्रेम, भक्ति और परमार्थ की वह अविरल धारा है, जो युगों-युगों से भक्तों के हृदय को निर्मल कर रही है. श्री राधा रानी को श्रीकृष्ण की शाश्वत शक्ति स्वरूपा और प्राणों की अधिष्ठात्री देवी बताया गया है. मान्यता है कि बिना राधा रानी के श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी है. ये भी माना जाता है कि जब भक्त राधा का नाम लेता है, तो भगवान श्रीकृष्ण अतिप्रसन्न हो जाते हैं और जीवन के सभी कष्ट दूर कर देते हैं. स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा था राधा मेरी आत्मा है. मैं राधा में और राधा मुझमें वास करती हैं.

     

    आपने हमेशा राधा कृष्ण का जप सुना होगा, कभी कृष्ण राधा का जप नहीं सुना होगा. तो श्रीराधा जी का नाम श्रीकृष्ण से पहले क्यों लिया जाता है? वैसे तो इसके कई कारण है जिनका जुड़ाव भारत की संस्कृति और शास्त्रों से है, लेकिन इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता भी है, जिस के अनुसार, शुकदेव जी ने तोते का रूप लेकर राधा के महल में निवास किया था और दिन-रात राधा-राधा जपते थे. एक दिन राधा रानी ने उनसे कहा कि वे अब कृष्ण-कृष्ण नाम जपा करें. जिसके बाद नगर में हर कोई कृष्ण नाम जप करने लगा. यह देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत उदास हो गए थे. उन्होंने नारद जी से कहा कि उन्हें राधा नाम सुनकर ही आनंद मिलता है. कृष्ण को ऐसा बोलते सुनकर राधा रानी की आंखें भर आईं और उन्होंने शुकदेव जी से कहा कि अब से राधा-राधा ही जपा करें. तभी से यह परंपरा बन गई और यहाँ तक कि कृष्ण से पहले भी राधा का नाम ही लिया जाने लगा.

     

    वैसे तो हमारे यहाँ भगवत प्राप्ति के लिए ज्ञान मार्ग, योग मार्ग, भक्ति मार्ग और प्रेम मार्ग जैसे अनेक मार्ग बताए गए हैं, लेकिन कहा जाता है इनमें प्रेम मार्ग जहाँ सरल, सहज, सर्वोत्तम और भगवान को अतिप्रिय है, वहीँ अन्य मार्ग साधारण जीवों के लिए बेहद कठिन है, इसलिए सामन्य गृहस्थ जन भगवत प्राप्ति के लिए ज्यादातर प्रेम मार्ग और भक्ति मार्ग पर ही चलते हैं.

     

    श्री राधायै स्वाहा षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा का विलक्षण महिमा के वर्णन में श्री राधा रानी की पूजा की अनिवार्यता बताते हुए कहा गया है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा रानी की पूजा और अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है।

     

    राधा अष्टमी के इस खास अवसर पर बरसाना के राधा रानी मंदिर समेत देशभर के किशोरी जी को समर्पित मंदिरों को बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया जाता है और राधा रानी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर विशेष चीजों का दान किया जाता है। इस दिन साधक व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से किशोरी जी प्रसन्न होती हैं। Radha Ashtami

  • Hobosexuality | होबोसेक्सुअलिटी आधुनिक जीवनशैली, नए ज़माने का रिश्ता, मॉडर्न प्यार या फिर घर के किराए की व्यवस्था?

    Hobosexuality | होबोसेक्सुअलिटी आधुनिक जीवनशैली, नए ज़माने का रिश्ता, मॉडर्न प्यार या फिर घर के किराए की व्यवस्था?

    Hobosexuality | होबोसेक्सुअलिटी आधुनिक जीवनशैली, नए ज़माने का रिश्ता, मॉडर्न प्यार या फिर घर के किराए की व्यवस्था? | होबोसेक्सुअलिटी (Hobosexuality) एक ऐसा पाश्चात्य ट्रेंड है जिसका चलन आज भारत के महानगरों में बेहद तीव्र गति से हो रहा है. मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे महानगरों में ये चलन आम हो चूका है. कुछ लोग इसे आधुनिक जीवन शैली कह रहे हैं तो कुछ लोग इसे लिव इन रिलेशनशिप भी कहते हैं. हालाँकि होबोसेक्सुअलिटी (Hobosexuality) लिव इन रिलेशनशिप से थोडा अलग है, जिसे समझाने की जरुरत है. भारत के बड़े शहरों में तेजी से बढ़ रहा ये चलन भारत की सामाजिक व्यवस्था को भी तेजी से बदल रहा है.

     

    होबोसेक्सुअल शब्द मूल रूप से पश्चिमी इंटरनेट कल्चर से उभरा है, जिसका इस्तेमाल बोलचाल की भाषा में ऐसे इंसान के लिए किया जाता है जो खास तौर से रहने की जगह हासिल करने के लिए डेटिंग करता है या रिश्ता बनाता है. अर्थात होबोसेक्सुअलिटी एक ऐसा रिश्ता है जिसमें कोई इंसान घर और वित्तीय मदद के लिए किसी रोमांटिक रिश्ते में आता है. अगर खुले शब्दों में कहें तो इस तरह के रिश्ते प्रेम या सामाजिक न होकर विशुद्ध आर्थिक और रणनीतिक होता है.

     

    अगर हम भारत के सांस्कृतिक परिपेक्ष में इस तरह के रिश्ते को देखें तो होबोसेक्सुअलिटी जैसे शब्द अपने आप में थोडा असहज जैसा लगता है, लेकिन जो हकीकत है, उससे आँख बंद करना या इसे हल्के में लेना सही नहीं होगा. क्योंकि आज यह ट्रेंड भारत के शहरी क्षेत्र में चुपचाप और बहुत तेजी से उभर रहा है. हम भी उसी समाज का हिस्सा है जिसमें आज होबोसेक्सुअलिटी जैसा रिश्ता फल फुल रहा है.

     

    भारत की संस्कृति में पहले अरेंज मैरिज का ही चलन था, लेकिन बदलते वक्त के साथ 80-90 के दशक में प्रेम विवाह का चलन बढ़ा और जातियों के बंधन टूटने लगे. फिर पिछले दो दशक में लिव इन रिलेशन का दौर चल पड़ा. बदलते परिस्थिति, सामाजिक बंधन और क़ानूनी दबाव के चलते, नई पढ़ी की उन्मुक्त सोच के युवाओं ने, किसी भी प्रकार के बंधन में बंधने से बचते हुए, लिव इन रिलेशनशिप को अपने सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाया. वहीँ अब बदलती आर्थिक परिस्थिति और महानगरों की दमतोड़ महंगाई में अब नया ट्रेंड भारत के शहरी समाज का हिस्सा बनने लगा है जिसे होबोसेक्सुअलिटी कहते हैं.

     

    होबोसेक्सुअलिटी और लिव इन में क्या है अंतर?

    दरअसल लिव इन में जहाँ दो कपल प्रेम तो करते हैं लेकिन बिना विवाह के या बिना किसी बंधन या स्थाई कमिटमेंट के एक साथ रहना स्वीकार करते हैं, वहीँ होबोसेक्सुअलिटी का आधार प्रेम न होकर आर्थिक होता है. होबोसेक्सुअलिटी में महानगरों के बढ़ते खर्च और घरों के महंगे किराए के बोझ को कम करने के लिए कपल एकसाथ रहना स्वीकार करते हैं.

     

    होबोसेक्सुअलिटी (Hobosexuality) जैसे रिश्ते के तेजी से बढ़ने के पीछे की वजह क्या है?

    दरअसल मुंबई, बेंगलुरु या दिल्ली जैसे महानगरों में काम कर रहे पेशेवर वयस्कों के लिए शहरों में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना तक काफी मुश्किल होता है. किराया चुकाने में ही उनकी मासिक आय का आधा हिस्सा खर्च हो जाता है। अगर Deloitte द्वार की गई 2025 Gen Z and Millennial Work Survey की बात करें तो यह बताती है कि 2025 में मिलेनियल और जेन जी के 50 प्रतिशत से ज्यादा कर्मचारी बड़ी मुश्किल से महीने का खर्चा चला पा रहे हैं और उनकी सेविंग न के बराबर है. महानगरों में आवास की लागत अक्सर एक व्यक्ति की आय का 40 से 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा निगल जाती है. मुंबई जैसे शहर में एक बेडरूम फ्लैट का मासिक किराया कई हाई प्रोफाइल इलाकों में 35,000 से 50,000 तक है. ऐसे में महंगे किरायों के साथ-साथ अकेले रहने की लागत और शहरी जीवन की भावनात्मक अकेलापन, ये सब मिलकर होबोसेक्सुअलिटी जैसे एक नई तरह की रिलेशनशिप ट्रेंड को जन्म दे रहे हैं. इस बात को कहने में थोड़ी असहजता जरुर होती है लेकिन ये सच्चाई है की महानगरों में काफी लोग प्रेम की वजह से कम और रहने की जगह के लिए ज्यादा रिश्तों में आ रहे हैं. ऐसे लोग अक्सर सीरियल डेटर्स होते हैं, जिनका कोई दीर्घकालिक रिश्ते का कोई इरादा नहीं होता।

     

    अब अगर आर्थिक खर्चों के बोझ को कम करने, घर बसाने के सामाजिक दबाव, अपने संघर्ष और उपलब्धियों का दिखावा करने और दूसरों पर एहसान करने की भावना को एकसाथ जोड़ लें, तो एक ऐसा माहौल तैयार होता है, जो होबोसेक्सुअलिटी को पनपने और फलने फूलने का अनुकूल माहौल देता है. इस तरह के रिश्ते काफी सुविधाजनक और आकर्षक तो लगते हैं लेकिन दूसरी तरफ ये खतरनाक भी होते हैं, क्योंकि इसमें आप सिर्फ किराया नहीं दे रहे होते, बल्कि साथ रहने के भ्रम में भी जी रहे होते हैं. जैसे-जैसे होबोसेक्सुअलिटी के रोमांटिक पहलु सामने आते हैं, भावनात्मक दुविधाएँ भी उभरती हैं। हालाँकि सच्चा प्यार ऐसी परिस्थिति में भी पनप सकता है, लेकिन भावनात्मक भ्रम, सामाजिक विसंगति और भविष्य की दुविधा कभी-कभी असुरक्षा, आक्रोश, निर्भरता और अपराध की भावनाओं को जन्म दे सकता है।

     

    इतना ही नहीं, ऐसे रिश्तों में भावनात्मक और आर्थिक संतुलन भी बिगड़ जाता है, जिससे पावर इंबैलेंस और मानसिक परेशानी बढ़ती है. यह सिर्फ आर्थिक मजबूरी का मामला नहीं, बल्कि भावनात्मक हेरफेर और रिश्तों में शक्ति-संतुलन का भी मामला है. यह रिश्ता ऊपर से तो प्यार भरा लगता है, लेकिन अंदर से एक पार्टनर दूसरे पर ज्यादा निर्भर रहता है. लंबे समय तक ऐसे रिश्तों में रहने से एक व्यक्ति की बचत और वित्तीय स्थिरता पर भी असर पड़ता है. और जब एक पार्टनर बार-बार जिम्मेदारियां निभाता है, और दूसरा सिर्फ सुविधा लेता है, तो रिश्ते में उबाऊपन और नाराज़गी बढ़ती है. जिस पर निर्भरता होती है, वही फैसलों में हावी हो जाता है, और दूसरा पार्टनर भावनात्मक रूप से खुद को कमजोर और असहज महसूस करता है. अंततः यह रिश्ता वैचारिक भावनात्मक और आर्थिक बोझ बन जाता है, और समय के साथ टॉक्सिक भी हो जाता है।

     

    न तो हम बदलते आर्थिक और अमाजिक परिवेश को नकार सकते हैं, और न ही रिश्तों की बदलती परिभाषा को नकार सकते हैं. फिर इस नई पारिस्थि में एक स्वास्थ्य रिश्ता बने और प्रेम से चले, इसके लिए समाधान क्या है? तो इसके लिए कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखें! आप भले ही लिव इन रिलेशन में हों या होबोसेक्सुअल रिलेशन में हो, लेकिन इस बात का ध्यान रखें की पार्टनर का आर्थिक योगदान बराबर नहीं हो तो बिलकुल नगण्य भी न हो. आपके पार्टनर की दिलचस्पी आपकी प्रॉपर्टी या पैसे के बजाय आपमें हो. रिश्ते में आर्थिक पारदर्शिता रखने के साथ यह भी देखें की आपके भावनात्मक जरूरत के समय आपके पार्टनर का रवैया और उपस्थति कैसा है. रिश्ते में दोनों को भावनात्मक और व्यावहारिक योगदान देना चाहिए. आर्थिक और भावनात्मक रूप से खुद को मजबूत बनाएं, ताकि किसी पर मजबूरी में निर्भर न होना पड़े. यदि कभी भी ऐसा महसूस हो रहा है कि रिश्ता एकतरफा हो रहा है, तो या तो सीमाएं तय करें या फिर ऐसे रिश्ते को न कहना सीखें.

     

    होबोसेक्सुअलिटी के टॉपिक पर चर्चा करने के पीछे हमारा उद्देश्य इसकी निंदा करना या महानगरों में आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे लोगों को शैतान बताना नहीं है. हमारा उद्देश्य बदलते सामजिक परिवेश में भी एक सामजिक संतुलन और स्वस्थ रिश्ते बनाए रखना और संभावित डिप्रेशन से लोगों को आगाह करना है. ताकि रिश्तों के बदलते सामजिक स्वरुप को अपनाने पर भी वो सजग और खुशहाल रहें. रिश्ते सिर्फ सुविधा पर नहीं, बल्कि बल्कि सम्मान, प्रेम, समानता, जागरूकता और भविष्य की संभावना पर भी आधारित हो. अगर आप शहरी जीवन में डेटिंग कर रहे हैं, तो रिश्ते में योगदान और संतुलन को लेकर शुरुआत से स्पष्ट रहें। क्योंकि प्यार का मकसद केवल साथ रहना नहीं, बल्कि साथ निभाना है। प्यार का मतलब आश्रय देना हो सकता है, लेकिन उसे एकतरफा जिम्मेदारी में बदलना, किसी के लिए भी सेहतमंद नहीं है.

  • Health Outcomes : स्वास्थ्य परिणामों पर सामाजिक निर्धारकों का प्रभाव

    Health Outcomes : स्वास्थ्य परिणामों पर सामाजिक निर्धारकों का प्रभाव

    Social Determinants on Health Outcomes Food : स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक (एसडीओएच) वे स्थितियां हैं जिनमें लोग पैदा होते हैं, बढ़ते हैं, रहते हैं, काम करते हैं और उम्र बढ़ती है जो उनके स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित करते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि एसडीओएच का जीवन प्रत्याशा, रुग्णता और मृत्यु दर सहित स्वास्थ्य परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इस पेपर का उद्देश्य स्वास्थ्य परिणामों पर स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों के प्रभाव का पता लगाना है, जिसमें इन परिणामों में योगदान देने वाले विभिन्न कारक भी शामिल हैं।

     

    एसडीओएच वे स्थितियां हैं जिनमें लोग पैदा होते हैं, बढ़ते हैं, रहते हैं, काम करते हैं और उम्र बढ़ती है जो उनके स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित करती है। इन निर्धारकों में शिक्षा, आय, रोजगार, आवास, सामाजिक समर्थन और स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच जैसे कारक शामिल हैं। एसडीओएच आर्थिक और सामाजिक नीतियों से आकार लेते हैं, जो बदले में राजनीतिक और ऐतिहासिक कारकों से प्रभावित होते हैं। इसलिए, एसडीओएच न केवल व्यक्तिगत पसंद का परिणाम है बल्कि व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ का भी परिणाम है।

     

    स्वास्थ्य परिणामों पर स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों का प्रभाव:

    1. आय और शिक्षा:

    आय और शिक्षा स्वास्थ्य के दो महत्वपूर्ण सामाजिक निर्धारक हैं। उच्च आय और शिक्षा स्तर वाले लोगों का स्वास्थ्य परिणाम कम आय और शिक्षा स्तर वाले लोगों की तुलना में बेहतर होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उच्च आय और शिक्षा स्तर स्वास्थ्य देखभाल, स्वस्थ व्यवहार और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों तक बेहतर पहुंच से जुड़े हैं। इसके विपरीत, कम आय और शिक्षा का स्तर उच्च तनाव स्तर, खराब कामकाजी परिस्थितियों और स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित पहुंच से जुड़ा है।

     

    2. रोजगार:

    रोजगार स्वास्थ्य का एक और महत्वपूर्ण सामाजिक निर्धारक है। जिन लोगों के पास स्थिर रोजगार है उनका स्वास्थ्य परिणाम उन लोगों की तुलना में बेहतर होता है जो बेरोजगार या अल्प-रोज़गार हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि रोजगार व्यक्तियों को वित्तीय स्थिरता, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच और उद्देश्य की भावना प्रदान करता है। इसके विपरीत, बेरोजगारी और अल्परोजगार उच्च तनाव स्तर, खराब कामकाजी परिस्थितियों और स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित पहुंच से जुड़े हैं।

     

    3. आवास:

    आवास स्वास्थ्य का एक और महत्वपूर्ण सामाजिक निर्धारक है। जो लोग सुरक्षित और स्थिर आवास में रहते हैं उनका स्वास्थ्य परिणाम असुरक्षित और अस्थिर आवास में रहने वाले लोगों की तुलना में बेहतर होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुरक्षित और स्थिर आवास व्यक्तियों को सुरक्षा की भावना, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच और एक स्वस्थ वातावरण प्रदान करता है। इसके विपरीत, असुरक्षित और अस्थिर आवास उच्च तनाव स्तर, खराब रहने की स्थिति और स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित पहुंच से जुड़ा है।

     

    4. सामाजिक समर्थन:

    सामाजिक समर्थन स्वास्थ्य का एक और महत्वपूर्ण सामाजिक निर्धारक है। जिन लोगों के पास मजबूत सामाजिक समर्थन नेटवर्क है, उनके स्वास्थ्य परिणाम उन लोगों की तुलना में बेहतर होते हैं जो सामाजिक रूप से अलग-थलग हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सामाजिक समर्थन व्यक्तियों को भावनात्मक समर्थन, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच और अपनेपन की भावना प्रदान करता है। इसके विपरीत, सामाजिक अलगाव उच्च तनाव स्तर, खराब मानसिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित पहुंच से जुड़ा है।

     

    5. स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच:

    स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक निर्धारक है। जिन लोगों के पास स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच है, उनके स्वास्थ्य परिणाम उन लोगों की तुलना में बेहतर होते हैं जिनके पास स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच व्यक्तियों को निवारक देखभाल, बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और बीमारियों का इलाज प्रदान करती है। इसके विपरीत, स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित पहुंच उच्च रुग्णता और मृत्यु दर से जुड़ी है।

     

    निष्कर्ष :

    स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों का स्वास्थ्य परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। आय, शिक्षा, रोजगार, आवास, सामाजिक समर्थन और स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच सभी महत्वपूर्ण कारक हैं जो स्वास्थ्य परिणामों में योगदान करते हैं। इसलिए, स्वास्थ्य परिणामों में सुधार और स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने के लिए स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करना आवश्यक है। नीति निर्माताओं को ऐसी नीतियों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा दें, गरीबी को खत्म करें और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच प्रदान करें। ऐसा करके, हम स्वास्थ्य परिणामों में सुधार कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सभी को स्वस्थ जीवन जीने का समान अवसर मिले।

  • भारत में विवादास्पद एंट्री के बाद सीमा हैदर ने भारतीय नागरिकता मांगी

    भारत में विवादास्पद एंट्री के बाद सीमा हैदर ने भारतीय नागरिकता मांगी

    सीमा हैदर, एक पाकिस्तानी नागरिक, जो ग्रेटर नोएडा के निवासी सचिन मीना से मिलने और उससे शादी करने के लिए अपने चार बच्चों के साथ नेपाल के रास्ते अवैध रूप से भारत में दाखिल हुई थी, उसकी मुलाकात पबजी चैटरूम में हुई थी, उसने अब भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है। अपने बच्चों और पति के साथ भारत में रहने की अनुमति मांगते हुए, सीमा हैदर ने भारतीय नागरिकता के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक याचिका लिखी है, जबकि उत्तर प्रदेश पुलिस और आतंकवाद विरोधी दस्ते ने देश में उनके अवैध प्रवेश की जांच जारी रखी है। उसे पाकिस्तान भेजे जाने की मांग उठ रही है।

     

    एटीएस की पूछताछ के दौरान सीमा हैदर के पास से दो वीडियो कैसेट, चार मोबाइल फोन, पांच “अधिकृत” पाकिस्तानी पासपोर्ट, अधूरे नाम और पते वाला एक “अप्रयुक्त पासपोर्ट” और एक पहचान पत्र जैसी चीजें मिलीं। जबकि उसके पाकिस्तान जासूस होने की अटकलें हैं, विशेष डीजीपी ने कहा कि दो देशों से जुड़े मामले में इतनी जल्दी और पर्याप्त सबूत उपलब्ध होने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।

     

    कथित तौर पर भारतीय संस्कृति और परंपराओं से गहराई से प्रभावित हैदर की राष्ट्रपति मुर्मू से की गई याचिका में दया का अनुरोध भी शामिल है। सीमा हैदर और उसके भारतीय साथी सचिन मीना से उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते ने सोमवार और मंगलवार को पूछताछ की। उन्हें पहले 4 जुलाई को ग्रेटर नोएडा में स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार किया था, लेकिन 7 जुलाई को उन्हें जमानत दे दी गई थी।

     

    दंपति शुरुआत में 2020 में ऑनलाइन गेम PUBG के माध्यम से जुड़े और 15 दिनों की गेमिंग के बाद व्हाट्सएप नंबरों का आदान-प्रदान किया। वे इस साल मार्च में पहली बार नेपाल के काठमांडू में व्यक्तिगत रूप से मिले, जहां वे 10 से 17 मार्च तक एक साथ रहे। बाद में सीमा ने 10 मई को 15 दिन के पर्यटक वीजा पर नेपाल से पाकिस्तान की यात्रा की, फिर 12 मई को रूपनदेही-खुनवा सीमावर्ती जिले सिद्धार्थनगर से भारत में फिर से प्रवेश किया। लखनऊ और आगरा के रास्ते रबूपुरा कट, गौतम बुद्ध नगर पहुंचने के बाद, सीमा सचिन से जुड़ गई, जिसने पहले से ही रबूपुरा में एक कमरा किराए पर ले लिया था, जहां वे एक साथ रहने लगे।

  • Gig Economy : गिग अर्थव्यवस्था का उदय और पारंपरिक रोजगार पर इसका प्रभाव

    Gig Economy : गिग अर्थव्यवस्था का उदय और पारंपरिक रोजगार पर इसका प्रभाव

    गिग इकोनॉमी (Gig Economy) एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल बढ़ती प्रवृत्ति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जिसमें लोग पारंपरिक कर्मचारियों के बजाय फ्रीलांसरों या स्वतंत्र ठेकेदारों के रूप में काम करते हैं। यह प्रवृत्ति कई कारकों से प्रेरित है, जिनमें प्रौद्योगिकी का उदय, श्रम बाजार में बदलाव और कार्यस्थल में अधिक लचीलेपन और स्वायत्तता की इच्छा शामिल है।

     

    गिग इकॉनमी का एक प्रमुख लाभ यह है कि यह लोगों को अपनी शर्तों पर काम करने की अनुमति देता है। फ्रीलांसरों और स्वतंत्र ठेकेदारों के पास अपना स्वयं का शेड्यूल निर्धारित करने, जिन परियोजनाओं पर वे काम करते हैं उन्हें चुनने और दुनिया में कहीं से भी काम करने की क्षमता होती है। लचीलेपन का यह स्तर उन लोगों के लिए विशेष रूप से आकर्षक हो सकता है जिनके पास पारिवारिक या अन्य प्रतिबद्धताएं हैं जो पारंपरिक 9 से 5 की नौकरी करना मुश्किल बनाती हैं।

     

    हालाँकि, गिग इकॉनमी के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं। फ्रीलांसरों और स्वतंत्र ठेकेदारों में अक्सर नौकरी की सुरक्षा और पारंपरिक रोजगार से मिलने वाले लाभों का अभाव होता है। उन्हें लगातार काम ढूंढने में भी संघर्ष करना पड़ सकता है, जिससे गुजारा करना मुश्किल हो सकता है।

     

    इन चुनौतियों के बावजूद, गिग अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। इंटुइट की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2021 तक स्वतंत्र ठेकेदारों के रूप में काम करने वाले लोगों की संख्या 9.2 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। यह लोगों के काम करने के तरीके में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, और इसका श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव है।

     

    जैसे-जैसे गिग इकॉनमी बढ़ती जा रही है, संभावना है कि हम अधिक से अधिक लोगों को फ्रीलांसर और स्वतंत्र ठेकेदारों के रूप में काम करते देखेंगे। इस प्रवृत्ति में श्रमिकों के लिए नए अवसर पैदा करने की क्षमता है, लेकिन इसके लिए नियोक्ताओं को व्यवसाय करने के नए तरीके को अपनाने की भी आवश्यकता होगी।

     

    गिग इकॉनमी की चुनौतियों में से एक यह है कि श्रमिकों के लिए करियर बनाना या दीर्घकालिक वित्तीय योजना स्थापित करना मुश्किल हो सकता है। फ्रीलांसरों और स्वतंत्र ठेकेदारों को लगातार काम खोजने या पारंपरिक कर्मचारियों के समान दरें प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। इससे सेवानिवृत्ति के लिए बचत करना या अन्य दीर्घकालिक वित्तीय लक्ष्यों के लिए योजना बनाना मुश्किल हो सकता है।

     

    गिग इकॉनमी के साथ एक और मुद्दा यह है कि श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा, भुगतान अवकाश और सेवानिवृत्ति बचत योजनाओं जैसे लाभों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। लाभों की यह कमी फ्रीलांसरों और स्वतंत्र ठेकेदारों के लिए लंबे समय तक स्वस्थ और वित्तीय रूप से सुरक्षित रहना मुश्किल बना सकती है।

     

    इन चुनौतियों के बावजूद, आने वाले वर्षों में गिग अर्थव्यवस्था के बढ़ने की संभावना है। जैसे-जैसे अधिक से अधिक लोग अपने काम में अधिक लचीलापन और स्वायत्तता चाहते हैं, स्वतंत्र ठेकेदारों और फ्रीलांसरों की मांग बढ़ने की संभावना है। इस प्रवृत्ति के लिए श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों को व्यवसाय करने के नए तरीके को अपनाने की आवश्यकता होगी, लेकिन इसमें उन लोगों के लिए नए अवसर पैदा करने की भी क्षमता है जो अपने काम और अपने जीवन पर अधिक नियंत्रण की तलाश में हैं।

     

    निष्कर्षतः, गिग अर्थव्यवस्था का उदय आधुनिक श्रम बाजार में सबसे महत्वपूर्ण रुझानों में से एक है। हालाँकि यह प्रवृत्ति श्रमिकों के लिए अधिक लचीलेपन और स्वायत्तता सहित कई लाभ प्रदान करती है, लेकिन यह कई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करती है। फ्रीलांसरों और स्वतंत्र ठेकेदारों को लगातार काम खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है, और उन्हें पारंपरिक रोजगार के साथ मिलने वाली नौकरी की सुरक्षा और लाभों की कमी हो सकती है। इन चुनौतियों के बावजूद, आने वाले वर्षों में गिग अर्थव्यवस्था के बढ़ने की संभावना है, और इसके लिए श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों को व्यवसाय करने के नए तरीके को अपनाने की आवश्यकता होगी। अंततः, गिग इकॉनमी में उन लोगों के लिए नए अवसर पैदा करने की क्षमता है जो अपने काम और अपने जीवन पर अधिक नियंत्रण की तलाश में हैं।

  • वरीना हुसैन जुड़ी उत्तराखंड फारेस्ट डिपार्टमेंट के साथ शिप्रा नदी को साफ़ करने के अभियान से

    वरीना हुसैन जुड़ी उत्तराखंड फारेस्ट डिपार्टमेंट के साथ शिप्रा नदी को साफ़ करने के अभियान से

    विश्व पर्यावरण दिवस, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए लोगो को जागरूक करने का उद्देश्य देता है। इस साल, पर्यावरण दिवस पर उत्तराखंड में स्थित शिप्रा नदी ( Shipra River ) को साफ करने के लिए बॉलीवुड अभिनेत्री वरीना हुसैन ( Warina Hussain ) ने एक उत्साही प्रकृति संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका को अपनाया और इस कारण में शामिल हो गईं।

     

    पर्यावरण संरक्षण को लेकर हमेशा से जुनूनी रहने वाली अभिनेत्री वरीना हुसैन ने प्रकृति के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हुए अपना एक पूरा दिन पर्यावरण के संरक्षण में भितया| इस दौरान अभिनेत्री ने पर्यावरण की रक्षा के लिए लगातार अपनी प्रतिभा दिखाई है।

     

    वरीना हुसैन विश्व पर्यावरण दिवस पर उन गतिविधियों में अपना योगदान दिया जो प्रकृति संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालती हैं। वह उत्तराखंड वन विभाग के साथ शिप्रा नदी सफाई अभियान का हिस्सा बनीं, सिपरा नदी में हुई पूजा से अपने सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर करते हुए अभिनेत्री ने कैप्शन दिया, “विश्व पर्यावरण दिवस के सम्मान में धरती माता को नमस्कार, उत्तराखंड वन विभाग शिप्रा नदी को साफ करने के लिए एक अविश्वसनीय कदम उठा रहा है। आपके प्रयास सराहनीय हैं, दिल से शुक्रिया

     

    पर्यावरण की रक्षा के लिए वरीना की जागरूकता लोगो  पर्यावरण संरक्षण  को लेकर जागरूक होने का सन्देश देते है।अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में, उन्होंने हमेशा पर्यावरण के अनुकूल अपने कर्तव्य   के बारे में बात की है, जैसे रीसाइक्लिंग, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना और पुन : प्रयोज्य  होने वाले वस्तुओं और  विकल्पों को बढ़ावा देना। हाल ही में एक इंटरव्यू  में वरीना ने कहा” मैं अपना खाली समय प्रकृति को समर्पित करती हूं क्योंकि पर्यावरण की रक्षा करना सिर्फ एक बार की घटना नहीं है, बल्कि जीवन का एक तरीका है।

     

    शिप्रा नदी में विश्व पर्यावरण दिवस मनाकर, वरीना ने दूसरे लोगों को भी  प्रकृति से जुड़ने और इसके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करने का लक्ष्य रखा। जैसा कि दुनिया पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है, यह देखना खुशी की बात है कि वरीना हुसैन जैसी हस्तियां बदलाव की वकालत करने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग कर रही हैं।

  • देवत्व व् असुरत्व के द्वंद में प्रकृति, अपने पुरुषोत्तम के अवतरण की पृष्ठभूमि रच रही है

    देवत्व व् असुरत्व के द्वंद में प्रकृति, अपने पुरुषोत्तम के अवतरण की पृष्ठभूमि रच रही है

    देवत्व व असुरत्व के इस द्वंद, वैमनस्य व अंतर्विरोध के बीच प्रकृति, अपने अधिष्ठान पुरुषोत्तम के प्रतिष्ठित अवतरण की पृष्ठभूमि रच रही है। बहुत दिनों बाद संभवतः पहली बार अयोध्यावासियों को ही नहीं वरन् समस्त भूलोकवासियों को अपनी बिछड़ी संस्कृति और समस्त जनमानस में सन्निहित प्राण – लोकरंजन सहृदय राम के स्वागत का सुअवसर मिला है।

     

    अयोध्या सरयू तट से सुदूर अपने देश की पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण की सीमाएं आक्रांताओं के बर्बर आक्रमणों को झेलने का संताप एवं विघटन के भयानक क्रूर घातों को एक समय के लिए छुपा दी है, आज अपने राम को पाकर आकंठ प्रसन्नता में डूब रही है। प्रसन्नता की विशाल व्यापकता में शंख, चक्र, गदा, पद्मपाणि, कौस्तुभकंठ, श्रीवत्सल, वनमाली, पीतांबर परिधान, रत्नमुकुटी, सर्वाभरणभूषित अपने आराध्य भगवान राम को निहार रही है। अपनी अंतश्चेतना में सचेष्ट भावमग्न बनी हुई है। सप्तसिंधु एवं हिमशिखर अचानक ध्यान में निमग्न हो गए हैं। सम्पूर्ण जनमानस अपने सम्मुख अचिंत्य ज्योति का आत्मसात् एवं अचिंत्य शक्ति का आलिंगन कर रहा है।

     

    वर्षों से अपने राम के लिए प्रतिक्षारत महान देशवासी आज यही सोच रहे हैं – अतीत का सिरमौर, जगद्गुरू एवं चक्रवर्ती के अनगिनत पदों से अलंकृत अपना राष्ट्र आज इतना दयनीय क्यों हो गया है? दासता के भयानक बेड़ियों को तोड़कर भी आज अपने राम की स्वतंत्रता की दिव्य एवं भव्य अनुभूति से वंचित क्यों है? निश्चित रूप से सहस्त्रों अनुत्तरित प्रश्न हैं।

     

    अपने असंख्य वीरपुत्रों को खोकर भी भारतमाता सहमी नहीं है, अपने विराट स्वरुप के लिए उद्यत हो चलीं हैं। भारतमाता ने अपने पुत्रों को ऐसा जगाया था कि वर्षों से क्रुरता का जिहादी स्तम्भ ढांचा ६ दिसम्बर १९९२ को धूल-धूसरित हो गया। सभी कारसेवकों ने मिलकर इस महान पुण्य प्रकल्प को साकार किया था, भयावह माथे के कलंक को मिटाया था, यह भारतभूमि के अस्तित्व के लिए अतिआवश्यक था। नवनीत सुकुमार से लेकर वृद्ध, समस्त विप्र एवं सन्त समाज ने अपने असंख्य प्राणों की आहुति देकर भी राम को कहां छोड़ा है?

     

    ९ नवम्बर २०१९ निर्णय की घड़ी नजदीक हो चली थी। भारतभूमि अपने राम के लिए सचेष्ट एवं सजग थी। आकाश स्वच्छ, निरभ्र था। वायु न अति शीतल न ही अति उष्ण। प्रकृति संतुलन में थी। आम्र वृक्षों में मंजरी के बीच छिपी कोकिल जब-तब सुरीली तान छेड़ देती थी। सारे पक्षी विविध स्वरों से अपने राम के लिए मधुर स्वरों का उच्चार कर रहे थे। इन्हें सुनकर ऐसा लग रहा था, जैसे कि सम्पूर्ण प्रकृति अपने सभी वृक्ष-वनस्पतियों, नदी-सरोवरों, पर्वत-झरनों एवं जीव-जंतुओं के परिकर के साथ मंगल गीत गाने में लगी है। सर्वत्र दिव्य नाद निनादित हो रहा था। सुखद् समीरण अपने मंद प्रवाह में सर्वत्र सुगंध प्रसारित कर रहा था।

     

    सरयू तट पर बसी अयोध्या नगरी में प्रकृति की पावनता, पुण्यता, शुचिता, शुभता, सुषमा, सुरभि और सौंदर्य कुछ विशेष ही बढ़ गये थे। इस दिवस देवशक्तियों में पुलक, उत्साह व साहस अपने आप बढ़ गये। सभी संत समाज यही बारंबार कह रहा था – हे मेरे राम ! प्रकृति की अंतश्चेतना में दिव्य सभ्यता का परिवर्तन पनप रहा है, अब प्रकट होने को है । मुझे मेरे राम से कोई विलग नहीं कर सकता। रक्तपात के अतिरेक से बिलखती अयोध्या अपने राम को पाकर अब धन्य हो चली है।

     

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  • भाई भाई को लूटे, सर्वत्र विघटन के पांव, बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

    भाई भाई को लूटे, सर्वत्र विघटन के पांव, बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    खोद रहे नित रेत माफिया नदिया की सब रेती

    चर डाले हरियाली सारी धरती की सब खेती

    आम-पीपल-नीम-बरगद काट ले गए, लग रहे बबूल पर दांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    समरसता अब खो चुकी धर्म खतरे में घट रहा

    स्वदेशी घुट रही घर में समाज देश भी बंट रहा

    भाई भाई को लूटे, सर्वत्र विघटन के पांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    होली और दशहरा में लोग हिल-मिल सब डोले

    सारे झगड़े वैर भुला, प्रिय मधुर सरसमय बोले

    दुर्लभ वह चौपाल हो गई और वह दुर्लभतम् भाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    रामायण की कथा खो गई, खो गई बूढ़ी मां की अमर कहानी

    खो गये वीर शिवा पेशवा महाराणा, वीरांगना झांसी की रानी

    दुर्लभ वह संस्कार हो गए, मिट रहे नित सभ्यता के नांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    बिलख रही धरती सारी सिसक रही जननी प्यारी

    सिमट रही दुख की भारी, तडप रही पग पग हारी

    खग-विहग, जलचर दुखिया आहत सब प्राणी, कहां एक भाव से ठांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    सुख रहे नदी सरोवर लूट रहे वन उपवन

    लूट रहा पर्वत धरा-व्योम, लूट रहा हर क्षण यौवन

    स्वार्थ में परमारथ लूटे मिल रहे नित नए घाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    हा-हा कार मचा निशिदिन क्रूरता का प्रतिरूप खड़ा

    दगाबाज चहुं ओर लुटेरे हिंसा-पशुता का रूप अड़ा

    नित द्रौपदी पर लगते कौरव पांडव के दांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    वन उपवन अब कहां हंसते वृक्ष लता गुल्म नहीं खिलते

    सहस्त्रों गाय कटने पर भी वह शौर्य हुंकार नहीं दिखते

    कंपित कत्ल की धार खड़ी अवध्या, हाय! लेकर दैन्य भाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    आकाश चांदनी विलसे, मलयाचल चोटी शिर से

    कर रही विलाप वसुधा आक्रांत, करुण पुकार आहत स्वर से

    जलते छप्पर-छाजन आज, नहीं शांति सुस्थिरता की छांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    वर्षों से शीतल सुरभित समीर व्यथित

    मुरझा रहे सुमन खिले बहु रीत

    हर सांझ सबेरे अनाचार, डूब रही सत्य की नाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    उम्मीद है ये आलोक पाण्डेय जी की ये कविता आपको जरुर पसंद आया होगा! पढ़ें और अपने मित्रों को भी पढाएं (शेयर करें) तथा अपने विचार, प्रतिक्रिया, शिकायत या सुझाव से नीचे दिए कमेंट बॉक्स के जरिए हमें अवश्य अवगत कराएं! आप गंगा न्यूज़ के साथ  ट्विटर  और  फेसबुक  पर भी जुड़ सकते हैं!

  • स्वामी विवेकानंद जी के ये अनमोल विचार युवाओं को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे

    स्वामी विवेकानंद जी के ये अनमोल विचार युवाओं को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे

    स्वामी विवेकानंद जी एक आध्यात्मिक गुरु तथा समाज सुधारक थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाईकोर्ट में एक नामी वकील थे और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। विवेकानंद को धर्म और उसके आधुनिक स्वरूप को जानने की काफी उत्सुकता थी और ये उत्सुकता उनकी मां भुवनेश्वरी देवी पूरी किया करती थी। उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी ने उन्हें स्वामी विवेकानंद नाम दिया था।

     

    स्वामी विवेकानंद जी को आध्यात्म के प्रति गहरी रुचि थी और इसकी जिज्ञासा शांत करने के लिए वो आध्यात्मिक बैठकों में हिस्सा लिया करते थे। अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मलेन में उन्होंने भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें उन्होंने भारत के हिंदू धर्म और आध्यात्म को लेकर ऐसा ओजस्वी भाषण दिया जिसकी वाहवाही पूरे विश्व में हुई। स्वामी विवेकानंद के इसी भाषण को सुनकर पश्चिमी सभ्यता के लोग भारतीय धर्म और संस्कृति की तरफ आकर्षित हुए।

     

    स्वामी विवेकानंद जी ने हिंदू धर्म, अध्यात्म और वेदांत दर्शन का प्रसार पुरे विश्व में किया। उन्होंने समाज के सेवा कार्य के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। उनके विचार देश और समाज के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उन्होंने देश और समाज को नई और विकासशील दिशा की ओर अग्रसर करने में अहम योगदान दिया था। हिंदू धर्म औऱ आध्यात्म की आधुनिक और प्रेरणादायी व्याख्या करने में स्वामी विवेकानंद का अहम योगदान है।

     

    कल देशभर में स्वामी विवेकानंद जी की 157वीं जयंती मनाई जा रही है। स्वामी विवेकानंद युवाओं के प्रेरणास्त्रोत थे और इसलिए उनकी जयंती देश में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी मनाई जाती है। स्वामी विवेकानंद के विचार बहुत प्रेरणादायक हैं, खासकर युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद के विचार काफी मायने रखते हैं क्योंकि बहुत सारे युवा स्वामीजी को अपना आदर्श मानते हैं और इनके विचारों को अपनाकर अपना ही नहीं समाज का भी विकास करने में कामयाब हो रहे हैं। आइए हम उनके ऐसे ही कुछ विचारों को जानते हैं –
    # उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये।

    # पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।

    # अपने इरादों को मजबूत रखो, लोग जो कहते हैं उन्हें कहने दो, एक दिन वही लोग तुम्हारा गुणगान करेंगे

    # खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप हैं।

    # हम जितना ज्यादा बाहर जाए और दूसरों का भला करें, हमारा हृदय उतना ही शुद्ध होगा और परमात्मा उसमें वास करेंगे।

    # जो किस्मत पर भरोसा करते हैं वो कायर हैं, जो अपनी किस्मत खुद बनाते हैं वो मजबूत हैं।

    # आपको अंदर से बाहर की ओर विकसित होना है। कोई तुम्हें पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी आत्मा के अतिरिक्त कोई और गुरु नहीं है।

    # सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।

    # बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप हैं।

    # ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हमही हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार हैं।

    # विश्व एक विशाल व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।

    # दिल और दिमाग के टकराव में दिल की सुनो।

    # शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु हैं। विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु हैं। प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु हैं।

    # किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये – आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।

    # एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।

    # जब तक जीना, तब तक सीखना – अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं।

    # जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

    # जो अग्नि हमें गर्मी देती है, हमें नष्ट भी कर सकती है, यह अग्नि का दोष नहीं हैं।

    # चिंतन करो, चिंता नहीं, नए विचारों को जन्म दो।

    # हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का धयान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।

    # जैसा तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल ही बन जाओगे।

    # कुछ मत पूछो, बदले में कुछ मत मांगो। जो देना है वो दो, वो तुम तक वापस आएगा, पर उसके बारे में अभी मत सोचो।

    # जो कुछ भी तुमको कमजोर बनाता है – शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्याग दो।

    # तुम फ़ुटबाल के जरिये स्वर्ग के ज्यादा निकट होगे बजाये गीता का अध्ययन करने के।

    # वेदान्त कोई पाप नहीं जानता, वो केवल त्रुटी जानता हैं। और वेदान्त कहता है कि सबसे बड़ी त्रुटी यह कहना है कि तुम कमजोर हो, तुम पापी हो, एक तुच्छ प्राणी हो, और तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं है और तुम ये-वो नहीं कर सकते।

    # किसी की निंदा ना करें। अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये।

    # यही दुनिया है; यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को बंद कर दो, वे तुरन्त तुम्हें बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वारा ठगे जाते हैं।

    # सच्ची सफलता और आनंद का सबसे बड़ा रहस्य यह है- वह पुरुष या स्त्री जो बदले में कुछ नहीं मांगता। पूर्ण रूप से निःस्वार्थ व्यक्ति, सबसे सफल हैं।

    # एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सफल होने का तरीका हैं।

    # क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खड़ा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

    # जब लोग तुम्हे गाली दें तो तुम उन्हें आशीर्वाद दो। सोचो, तुम्हारे झूठे दंभ को बाहर निकालकर वो तुम्हारी कितनी मदद कर रहे हैं।

    # हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।

    # जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो; वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही हैं।

    # यदि स्वयं में विश्वास करना और अधिक विस्तार से पढ़ाया और अभ्यास कराया गया होता, तो मुझे यकीन है कि बुराइयों और दुःख का एक बहुत बड़ा हिस्सा गायब हो गया होता।

     

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