Category: सामाजिक

  • जीसस, स्त्री-प्रेम से स्वयं को बचाते एक देवदूत

    जीसस, स्त्री-प्रेम से स्वयं को बचाते एक देवदूत

    जीसस जन्म से लेकर जीवन में घटित घटनाओं में कृष्ण के करीब महसूस होते हैं। कृष्ण की मनोहर छवि गायों के साथ, जीसस की मनोरम छवि लैम्ब्स के साथ। तीर लगने पर कृष्ण का शरीर छोड़ना और जीसस के सर पर काँटों का ताज।

     

    दोनों के जीवन में माँ का अस्तित्व अह्म है। यानी जहाँ वर्जिन मेरी जीसस को जन्म देकर देवदूत की माँ का स्थान पा कर पूज्यनीय हैं, वहीं कृष्ण को अपने जीवनकाल में दो माओं का संरक्षण मिला और दोनों माओं ने मातृत्व के उत्कृष्ट भाव को प्रस्तुत किया। जहाँ कृष्ण अपनी माओं से शिशुभाव में पिटते हैं, रोते हैं, रूठते हैं, शिकायतें और ज़िद करते दिखते हैं, जीसस की यह बाल-सुलभ चेष्टा कहीं सुनने, पढ़ने को नहीं मिलती। जीसस अपनी माँ से अलग या दूर दिखते हैं।

     

    किशोरावस्था में जहाँ कृष्ण राधा के साथ प्रेम में होते हैं जिसका चित्रण हर जगह मिलता है, जीसस किसी भी स्त्री के करीब नहीं है। जहाँ प्रेम, अनुराग, विरह मानव जीवन की सहज प्रक्रिया को मान शिव, राम, कृष्ण आदि देवता स्त्री को न केवल अपने समकक्ष मानते हैं बल्कि उन्हें पूजते भी दिखते हैं, जीसस के जीवन में कभी कोई स्त्री स्थान पाती नहीं दिखती है।

     

    क्या यह भेदभाव सृष्टि के आरम्भ की प्रकिया से उपजा कि रोशनी करने के बाद चाँद, तारों, आकाश, पृथ्वी बना लेने के बाद गॉड आदम की रचना करते हैं, यानी आदम का होना प्रथम भाव है और आदम के अकेलापन और उनके साथ के लिए ईव को गॉड ने बनाया। यह ईव ही थीं जिनकी ग़लती की वज़ह से उनसे स्वर्ग छूट गया और उन्हें धरती पर आना पड़ा।

     

    क्या यही कारण रहा होगा कि जीसस कभी किसी स्त्री के साथ प्रेम-संबंध में नहीं रहे। प्रेम और सद्भावना का प्रतिरूप यह देवदूत स्त्री-प्रेम से दूर क्यों रहा, या स्वयं को उससे दूर क्यों रखा? मेरी के साथ जीसस का बाल्यावस्था में न होना, दिखना, दिखाना या पढ़ा जाना भी या इसी कारण से हुआ? यह ज़ोर देकर कहा, लिखा और बताया गया कि मेरी वर्जिन थीं यानी स्त्री से प्राप्त शारीरिक सुख को पाप समझा जाता रहा।

     

    गॉड ईव की रचना एडम की रिब से करते हैं और उसे एडम को सौप देते हैं। देवी दुर्गा की रचना भी विभिन्न पुरुष शक्तियों से होती हैं, सूर्य, चंद्र, शिव, इंद्र, पवन, विष्णु सभी अपनी शक्तियों को सम्मिलित कर दुर्गा की रचना करते हैं और उनके अस्तित्व में आते ही उनकी आराधना करते हैं। दुर्गा की रचना सृष्टि और पुरुष की रक्षा हेतु होती है, उनके साथ सभी देवता भय-मिश्रित श्रद्धा-भाव रखते हैं। यह स्त्री की रचना में दिखने वाला अंतर दोनों समाजों में स्त्री के स्थान को स्पष्ट दिखा जाता है। स्त्री के होने को पाप या कमतर मानने की वज़ह शायद वह बड़ी वज़ह है जिसके कारण जीसस स्त्रियों से दूर दिखते हैं।

  • पढ़ें और नागरिकता कानून पर फ़ैल रहे अफवाह और भ्रम को दूर करें

    पढ़ें और नागरिकता कानून पर फ़ैल रहे अफवाह और भ्रम को दूर करें

    नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। कोई समर्थन में प्रदर्शन कर रहा है तो कोई विरोध में प्रदर्शन और आगजनी कर रहा है। लेकिन इन प्रदर्शन करने वाली भीड़ में अधिकतर लोग ऐसे हैं जो या तो इस कानून के बारे कुछ जानते ही नहीं, बस इसलिए प्रदर्शन कर रहे हैं की उनके नेता ने कहा है; तो कुछ ऐसे हैं जो भ्रमजाल में फंसे हैं या फेक जानकारी, विडियो या मैसेज के जरिए फंसाए गए हैं।

     

    इसलिए अब ये जरुरी हो जाता है की CAA को लेकर जितने भी भ्रम या अफवाह लोगों के मन में है या फैलाए गए हैं, उनको दूर किया जाए। अगर कानून में कोई कमी दिखती है तो उसे तो सरकार ही दूर कर सकती है, लेकिन जिस भ्रम और अफवाह की वजह से हिंसा और आगजनी हो रहा है, उसे दूर करने का प्रयास हम सब को करना चाहिए। यहाँ सरकार के बयान और भास्कर में गृह मंत्रालय के इंटरव्यू के आधार पर छपे इंटरव्यू के आधार पर लोगों के बिच फ़ैल रहे अफवाह पर कुछ जानकारी साफ़ करने का प्रयास किया जा रहा है, खुद भी पढ़ें और लोगों को भी पढाएं(शेयर करें)।

     

    नागरिकता संसोधन कानून (CAA) है क्या?

    सीएए के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण आए उन हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म (वहाँ के अल्पसंख्यक) के लोगों को नागरिकता दी जाएगी, जिनके लिए वहाँ अपने धर्म और बहू बेटियों के इज्जत को बचाए रखना मुश्किल हो गया था। जो 31 दिसंबर 2014 से पहले आ गए हैं, उन्हें नागरिकता मिलेगी।

     

    क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश से जो भी आएगा सबको भारत की नागरिकता मिलेगी?

    नहीं, ये एक्ट के तहत सिर्फ उनको ही नागरिकता मिलेगा, जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आ चुके हैं और अभी भारत में ही रह रहे हैं! ये एक्ट आने वालों को नागरिकता नहीं दे रहा है, उन्हें सिर्फ पहले के कानून से अलग सिर्फ पाँच साल की रियायत मिलेगी। जो 2014 के पहले ही आ चुके हैं और भारत में ही रह रहे हैं, ये एक्ट सिर्फ उनके लिए है!

     

    इसका विरोध क्यों हो रहा है?

    विपक्षी पार्टियों और इनके फैलाए अफवाह में आए मुस्लिमों का कहना है कि सीएए में मुस्लिम शरणार्थियों को न जोड़ना भेदभाव है। ये आर्टिकल 15 का उल्लंघन है। लेकिन वो इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है की पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देश में मुस्लिम कम से कम धर्म के आधार पर प्रताड़ित नहीं हो सकता और ये कानून धार्मिक रूप से प्रताड़ित लोगों के लिए है। साथ ही मुस्लिम इसेे एनआरसी से जोड़कर देख रहे हैं। भय है कि एनआरसी हुई तो गैर-मुस्लिमों को नागरिकता मिलेगी, और इन्हें परेशानी होगी।

     

    जबकि हकीकत इसके उलट है, अगर NRC हुई तो सबको अपनी पहचान बताना होगा, चाहे वो किसी धर्म या जाति का व्यक्ति हो। CAB एकदम अलग है NRC से। CAB सिर्फ तीन देशों से आए प्रताड़ित अल्पसंख्यको को नागरिकता मिल रहा है, उसका भारत के नागरिक से कोई लेना देना नहीं है। और जब कभी NRC आएगा तो उसमें जो भी भारतीय नागरिक होगा, उसे अपनी पहचान बतानी होगी, उसका धर्म, जाति या संप्रदाय से कोई लेना देना नहीं होगा। ठीक वैसे ही जैसे गुलाब जामुन में न गुलाब होता है, न जामुन, वैसे ही CAB और NRC दोनों अलग अलग विषय है।

     

    क्या असम की तर्ज पर ही पूरे देश में NRC होगा?

    वैसे तो अभी कुछ भी तय नहीं है, बस सब अफवाह है की क्या होगा, क्या नहीं होगा। लेकिन फिर भी इसकी संभावना कम ही है की जब पूरे देश में NRC लागु होगा तो वो असम की तर्ज पर लागू हो, क्योंकि असम की परिस्थितियां, बाध्यता, हालात और मकसद बिलकुल अलग थी। और जब पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा उसका मकसद बिलकुल अलग है। असम में NRC असम एकॉर्ड की बाध्यता और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार था। जबकि जब भी पूरे देश में NRC लागू होगा तो उसका मकसद सिर्फ भारत के सभी नागरिकों को सूचि तैयार करना और उन्हें नागरिकता का पहचान देना है, जो दुनियां के लगभग हर देश में है।

     

    क्या एनआरसी होगी, और होगी तो संभावित वैध डॉक्यूमेंट की लिस्ट क्या होगी?

    NRC होने की स्थिति में कागजों को लेकर भी विपक्षी पार्टियों की काफी भ्रम फैलाया गया है, जो हिंसा का एक प्रमुख कारण बना है। लेकिन हकीकत ये है की अभी सरकार ने न तो इस पर अभी चर्चा की है और न ही इसका फ्रेमवर्क बनाया है। अभी तो इसकी तारीख भी तय नहीं है। कैबिनेट में चर्चा तक नहीं हुई है, न ही कोई ड्राफ्ट तैयार हुआ है, बस गृहमंत्री ने अभी मौखिक ऐलान किया है कि 2024 के आम चुनाव से पहले देशभर में एनआरसी की जाएगी। जो की अभी सिर्फ एक घोषणा है। मतलब जो बच्चा अभी पैदा भी नहीं हुआ, विपक्षी पार्टियाँ उसके रंग, रूप, नाक, नक्शा बताकर लोगों में अफवाह फैला रहा है। इसलिए ये कह सकते हैं की अभी ये तय नहीं है की कौन से कागज इसमें लगेगा।

     

    क्या CAA और NRC से मुस्लिम बाहर हो जाएंगे?

    नहीं, इससे भारतीय नागरिक प्रभावित नहीं होंगे। उन्हें संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकार हासिल होंगे। सीएए सहित कोई भी कानून इन अधिकारों को नहीं छीन सकता। सीएए से मुस्लिम भी प्रभावित नहीं होंगे। सीएए का उद्देश्य सिर्फ उन अल्पसंख्यकों की रक्षा करना है जो तीन पड़ोसी देशों में धार्मिक कारणों से सताए गए हैं और भारत में आकर शरण ले चुके हैं। किसी भी देश या धर्म का अन्य नागरिक भी पहले की तरह ही भारत के नागरिकता कानून 1955 की धारा 6 के तहत आवेदन कर सकता है। मौजूदा संशोधन उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करता है।

     

    सीएए से पहले जैसे अन्य देशों के नागरिकों को नागरिकता मिलती थी, क्या वो मिलती रहेगी?

    इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। ये लोग नागरिकता कानून 1955 की धारा 6 के तहत आवेदन कर सकते हैं। इन तीन और अन्य देशों के मुसलमान नागरिकता के लिए हमेशा आवेदन कर सकते हैं। पिछले छह साल में 2830 पाकिस्तानी नागरिकों, 912 अफगानी, 172 बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी गई है। भारत और बांग्लादेश के बीच 2014 में सीमा समझौता हुआ था जिसमें 50 से अधिक इलाके शामिल किए गए थे जिसके बाद 14864 बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई, जिसमें काफी संख्या में मुसलमान थे।

     

    सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए पीड़ित शरणार्थियों को ही नागरिकता क्यों?

    क्योंकि ऐसा माना जाता है की ये भारत के हिस्से रहे हैं, और बंटवारे के समय भी ये गाँधी जी का पाकिस्तान (पाकिस्तान तथा अब के बांग्लादेश) में चले गए अल्पसंख्यकों से ये वादा था की वो जब भी भारत आना चाहें तो आ सकता हैं। क्योंकि ये वो लोग हैं जो न तो अपनी स्वेच्छा से पाकिस्तानी बने थे, और न ही पाकिस्तान के बंटवारे को सपोर्ट किया था, बल्कि बंटवारे के कारण उधर फंस गए, जहाँ अब उन्हें अपने धर्म, परिवार को बचाना लगभग असंभव हो गया था। ऐसे अगर वो अब भारत आते हैं तो हम पर अपने राष्ट्रपिता के वादे और बंटवारे की शर्तों को पूरा करने की नैतिक जिम्मेवारी है।

     

    असम में एनआरसी की लिस्ट से बाहर हुए हिंदुओं को क्या सीएए के द्वारा नागरिकता मिलेगी?

    बिलकुल। अगर ये आवेदन करते हैं तो इनको नागरिकता मिल सकती है। लेकिन अभी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। एनआरसी में बाहर हुए किसी को भी बाहर नहीं किया जा रहा है, अभी सभी लोगों के पास ट्रिब्यूनल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाने का विकल्प खुला है, चाहे वो किसी धर्म के हों, और सरकार इसके लिए उन्हें क़ानूनी सहायता भी उपलब्ध करवा रही है। अगर सभी जगह से उन्हें लाभ नहीं मिलता है तो नए कानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

     

    सीएए से कुल 31 हजार के करीब लोगों को ही फायदा मिलने की बात कही जा रही है। क्या ये सही है?

    अभी कोई सत्यापित आंकड़े नहीं हैं, कुल कितने लोगों को इसका फायदा मिलेगा। लेकिन नागरिकता के लिए जितने आवेदन आए हैं उसके आधार पर यह संख्या 31,313 है। पहले ये प्रावधान नहीं था, इसलिए लोग आवेदन नहीं कर रहे थे, इसलिए इस आंकड़े के बढ़ने की संभावना है। राज्यसभा में बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने इस सवाल के जवाब में कहा था कि इस बिल के बाद लाखों लोगों को फायदा होगा। एनआरसी में असम में छूटे हुए लोग भी अब इसके लिए आवेदन करेंगे।

     

    31 दिसंबर 2014 के बाद आए शरणार्थियों का क्या होगा। वो कैसे नागरिकता ले पाएंगे?

    31 दिसंबर 2014 के बाद आए अल्पसंख्यकों को इस कानून से कोई फायदा की संभावना कम ही है, लेकिन वो इस कानून के पहले के कानून की धारा 6 के तहत नागरिकता के लिए पात्र होंगे। उन्हें कम से कम पांच साल तक भारत में रहना होगा, यह प्रावधान पहले 11 साल था। मतलब उनको इस एक्ट से सिर्फ पांच साल का फायदा पहुंचेगा। 31 दिसंबर 2014 की तारीख इसलिए तय की गई है कि कानून बनते वक्त तक आए हुए सभी शरणार्थी इसके लिए पात्र हो जाएं। पांच साल की नेचुरलाइजेशन की समय सीमा पूरी कर लें।

     

    शरणार्थी कैसे साबित करेंगे कि वे धार्मिक रूप से प्रताड़ित हैं?

    यह अधिनियम की धारा 6 या धारा 6 बी के तहत किए गए आवेदन में घोषणा के रुप में दिया जा सकता है और इसके लिए धार्मिक उत्पीड़न के लिए किसी विशिष्ट दस्तावेजी सबूत की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ कानून की अनुसूची-3 के तहत दिए गए मानदंडों को पूरा करना है।

     

    क्या उन्हें भी नागरिकता मिलेगी जिन पर तीनों देश में कोई आपराधिक केस दर्ज है?

    कानून में यह व्यवस्था की गई है कि नागरिकों के विस्थापन या देश में अवैध निवास को लेकर उन पर पहले कोई कानूनी कार्रवाई चल रही है तो उनकी स्थायी नागरिकता के लिए उनकी पात्रता प्रभावित न हो। लेकिन संबंधित देश जहां से विस्थापित हुए हैं, वहां कोई गंभीर मुकदमे हैं तो उसको लेकर जांच की प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है। लेकिन कानून अभी इसको लेकर स्पष्ट नहीं है। नियम के साथ कई उपनियम बनेंगे। अगर किसी व्यक्ति पर गंभीर मुकदमा है तो भारत का उस देश के साथ हुए समझौते के मुताबिक आगे की कार्रवाई होगी। अगर अनुसूची-3 के मानदंडों के तहत कोई व्यक्ति झूठी घोषणा देता है तो बाद में नागरिकता रद्द भी की जा सकती है।

     

    पूर्वोत्तर के राज्यों में अभी सीएए किन-किन स्थानों पर लागू नहीं होगा?

    यह संशोधन असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले ऐसे लोगों पर लागू नहीं होगा जो संविधान की छठी अनुसूची में शामिल हैं। बंगाल पूर्वी सीमा कानून 1873 के तहत अधिसूचित इनर लाइन के तहत आता है, जिसका प्रावधान उनकी मूल और स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण के लिए किया गया है। हालांकि इन क्षेत्रों में रहने वाले ऐसे लोग देश के अन्य क्षेत्रों से एक आवेदन कर सकते हैं, जहां यह संशोधन लागू है और उस स्थान से सिर्फ नागरिकता से जुड़े अधिकार हासिल कर सकते हैं।

     

    असम के एनआरसी से देश में लागू होने वाला एनआरसी किस तरह से अलग होगा?

    अभी न तो इस बारे में सरकार ने कोई फ्रेमवर्क नहीं बनाया है और न ही इस पर कोई चर्चा हुई अब तक, ड्राफ्ट तक नहीं बना है इसका, कब होगा ये भी तय नहीं है। लेकिन जब भी देश भर में एनआरसी की घोषणा होगी तो असम में हुई परेशानियों से सबक लेते हुए ऐसे नए नियम और निर्देश जरुर बनाए जाएंगे जिससे भारत में जन्म लेने वाले किसी भी मूल नागरिक को कोई परेशानी न हो।

     

    एनआरसी और सीएए में जो लोग शामिल नहीं हो पाएंगे, क्या उन्हें डिटेंशन कैंपों में रखा जाएगा?

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामलीला मैदान के भाषण में ये साफ़ कर चुके हैं की ये एकदम भ्रम और सफ़ेद झूठ है, न किसी को डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा, और न कोई डिटेंशन सेंटर भारत में है! ऊपर से अभी NRC का आना भी तय नहीं है। लेकिन ऐसी संभावना जताई जा रही है की ऐसे लोगों का कार्ड रद्द करने से पहले उन्हें सुनवाई का पूरा अधिकार मिलेगा। प्रक्रिया चलने तक उन्हें किसी अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा। ऐसे में पड़ोसी देशों से बात की जाएगी और अगर पड़ोसी देश अपने नागरिकों को वापस लेने को तैयार हो जाता है तो उसे सपुर्द कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं होता है तो ऐसे लोगों को वर्क परमिट दिया जा सकता है। ऐसे में उन्हें भारतीय नागरिकता कानून की धारा 6 के तहत मिलने वाले अधिकार ही मिलेंगे। (सभी सवालों के जवाब गृह मंत्रालय के अधिकारियों और संसद में दिए गए बयानों के आधार पर हैं)

     

    CAA लाने की जरुरत क्यों पड़ी?

    राजस्थान के जोधपुर में ही अकेले 21 हजार धार्मिक उत्पीड़न के शिकार होकर भारत आए शरणार्थी रहते हैं। कोई मजदूरी, कोई कबाड़ी तो कोई पत्थरों की खानों में कामकर परिवार का पालन-पाेषण कर रहा है। अधिकांश झुग्गियों में रहते हैं। हाल ही में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री ने सांसद कोटे से इनके विकास के लिए दस लाख रुपए देने की घोषणा की है। यहां इन्हें भी प्रधानमंत्री आवास योजना में जोड़ने और नौकरी दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। दिल्ली के मजनूं टीला इलाके में करीब 700 पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी परिवार रह रहे हैं। यहां भी इनकी स्थिति बेहद खराब है। सड़क किनारे छोटी-छोटी दुकाने खोलकर गुजारा कर रहे हैं। लोगों को अंधेरे में रहना पड़ रहा है। इनके करीब 100 बच्चे पास के एमसीडी स्कूल में पढ़ते हैं। गुजरात में शरणार्थियों के 750-800 परिवार हैं। इनमें अधिकांश मजदूरी करके अपना गुजारा कर रहे हैं। ये कच्छ से अहमदाबाद तक रोजगार के लिए फैले हुए हैं। नागरिकता नहीं होने से सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। इन्हें भी एक आम इंसान के जैसा जीवन देने के मानवीय पहल के तहत इस कानून को लाया गया है।

     

    इस आर्टिकल का मकसद है, लोगों के बिच में फैले अफवाह और भ्रम की स्थिति को दूर कर शांति बनाए रखने में सरकार और समाज की मदद की जा सके। साथ ही समाज में अफवाहों की वजह से पनप रहे नफरत की राजनीति को भी दूर किया जा सके। अगर आपके पास भी कोई उपयोगी आर्टिकल या पोस्ट है तो आप उसे हमारे वेबसाइट पर रजिस्टर करके प्रकाशित कर सकते हैं। आप हमसे ट्विटर और फेसबुक पर जुड़कर भी हमें सपोर्ट कर सकते हैं।

  • नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित, पढ़ें संसद में क्या कहा अमित शाह ने

    नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित, पढ़ें संसद में क्या कहा अमित शाह ने

    नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित हो गया। विधेयक के पक्ष में 311 तो इसके विपक्ष में 80 मत पड़े। गृह मंत्री अमित शाह ने आज विधेयक पेश किया। भारी हंगामे के बीच उन्होंने इसे सदन में रखा जिसका विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस ने जोरदार विरोध किया। बिल को सदन में पेश किए जाने पर वोटिंग पर भी हुई जिसके बाद इस पर चर्चा शुरू हुई थी।

     

    प्रधानमंत्री मोदी ने जताया हर्ष : लोकसभा में बिल पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर खुशी जाहिर की। उन्होंने ट्वीट किया, एक अच्छी और व्यापक बहस के बाद नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 विधेयक पारित हो गया। मैं विभिन्न सांसदों और दलों को धन्यवाद कहता हूं जिन्होंने विधेयक का समर्थन किया। यह विधेयक भारत के सदियों पुराने लोकाचार और मानवीय मूल्यों में विश्वास के अनुरूप है।

     

    एक अन्य ट्वीट में प्रधानमंत्री मोदी ने गृहमंत्री अमित शाह को धन्यवाद दिया। उन्होंने लिखा, ‘विधेयक के सभी पहलुओं को स्पष्ट तौर पर समझाने के लिए मैं विशेष तौर पर गृहमंत्री अमित शाह को धन्यवाद देता हूं। उन्होंने लोकसभा में चर्चा के दौरान सांसदों द्वारा उठाए गए विभिन्न बिंदुओं पर विस्तृत जवाब भी दिया।’

     

    तरुण गोगोई ने कहा की यह विधेयक असम के लिए खतरनाक : वहीं, असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता तरुण गोगोई ने इसे असम के लिए खतरनाक बताया है। उन्होंने कहा, ‘यह असम के लिए खतरनाक है, हम बांग्लादेश के पास हैं। यह नॉर्थ-ईस्ट की संस्कृति, विरासत और आबादी के ढांचे को बुरी तरह प्रभावित करेगा।’

     

    पढ़ें अमित शाह ने बिल पर सदन में क्या कहा : इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने सरकार का पक्ष सदन के सामने रखा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दयानिधि मारन को जवाब देते हुए कहा कि हमें सभी की चिंता है। उन्होंने फिर से दोहराया कि पीओके भी हमारा है और उसके नागरिक भी हमारे हैं। किसी भी धर्म के लिए कोई नफरत की भावना नहीं है। मोदी सरकार का एकमात्र धर्म संविधान है।

     

    अमित शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, कांग्रेस इतनी सेक्यूलर पार्टी है कि उसने केरल में मुस्लिम लीग और महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन कर रखा है। नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर गृह मंत्री ने कहा, पूरा अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम इनर लाइन परमिट (आईएलपी) से सुरक्षित हैं, उनके लिए चिंता की कोई बात नहीं है। दीमापुर के एक हिस्से को छोड़कर पूरा नागालैंड भी इनर लाइन परमिट से सुरक्षित हैं, उन्हें भी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।

     

    उन्होंने ने आगे कहा की हम रोहिंग्या शरणार्थियों को कभी भी भारत का नागरिक स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, रोहिंग्या बांग्लादेश से होकर आते हैं। रोहिंग्याओं को कभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा, मैं अभी इसे स्पष्ट कर देता हूं। हमें मुसलमानों से नफरत नहीं, इस देश के किसी भी मुसलमान का इस बिल से कोई भी वास्ता नहीं। भारत के नागरिक मुसलमानों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। पाक अधिकृत कश्मीर हमारा है, वहां के लोग भी हमारे हैं। यहां तक कि आज भी हमने उनके लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 24 सीटें आरक्षित रखी हैं।

     

    जो शरणार्थी है, वो प्रताड़ित होकर हमारी शरण में आया है। वह घुसपैठिया नहीं है।  मैं आपको बताना चाहता हूं कि भारत में क्या हो रहा है। उन्होंने कहा कि भारत में 1951 में 84 फीसदी हिंदू थे लेकिन 2011 में 79 फीसदी हिंदू थे। इसी तरह 1951 में मुस्लिम 9.8 और आज 14.23 प्रतिशत हैं। हम आगे भी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि पड़ोस के देशों में प्रताड़ना होगी तो भारत मूक दर्शक नहीं बनेगा। उन्हें बचाना पड़ेगा और सम्मान देना होगा।

     

    देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ। इसी वजह से मुझे यह बिल लाना पड़ेगा। जिस हिस्से में मुस्लिम भाई ज्यादा रहते थे, उसे पाकिस्तान बनाया। बचा हुआ हिस्सा भारतीय संघ बना। आगे चलकर पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान अलग हुआ और बांग्लादेश बना। मगर बीच एक विभीषिका आई, जिसमें मारना-काटना हुआ। जिन्होंने विभाजन को झेला, वही इस दर्द को बता सकते हैं।

     

    गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सारे लोग बोले हमने धैर्य से सुना। हमें ठीक लगे या न लगे, लेकिन हमने सभी को सुना। मेरा निवेदन है कि अब मुझे बोलने का मौका मिले। उन्होंने कहा कि 48 सदस्यों ने पक्ष और विपक्ष के चर्चा में हिस्सा लिया। यह बिल लाखों करोड़ों शरणार्थियों को यातना से मुक्ति दिलाने का काम करने जा रहा है। नेहरू लियाकत समझौते में बात हुई कि दोनों देश अपने—अपने शरणार्थियों का ख्याल रखेंगे। मगर 1950 में हुए इस समझौते का पालन नहीं हुआ।

     

    शिवसेना सांसद को नहीं मिला मौका : सदन में बहस के दौरान शिव सेना सांसद अरविंद सावंत को बोलने का मौका नहीं मिला। स्पीकर की भूमिका निभा रहीं मीनाक्षी लेखी ने उनका नाम बुलाया, लेकिन उन्होंने सुना नहीं। इसके बाद उन्होंने सांसद भृतहरि महताब का नाम पुकारा। इसके बाद अरविंद सावंत अपनी सीट से खड़े हुए और कहा कि उन्हें सुनाई नहीं दिया था। मगर मीनाक्षी लेखी ने फिर से मौका नहीं दिया।

     

    सांसद लॉकेट चटर्जी ने विधेयक को जल्द से जल्द पारित कराने की मांग की : हुगली से भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने विधेयक को जल्द से जल्द पारित कराने की मांग की। विधेयक के माध्यम से उन्होंने विपक्ष और कांग्रेस पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंदुओं का नहीं बल्कि रोहिंग्या मुसलमानों का स्वागत किया जाता है। लॉकेट चटर्जी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में 70 लाख से ज्यादा घुसपैठिए हैं। राज्य में इन्हीं की वजह से अपराध बढ़ रहा है। वे अपराध करते हैं और बॉर्डर के बाहर भाग जाते हैं। मालदा में हुए दुष्कर्म का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस मामले में घुसपैठिया शामिल है।

     

    ओवैसी ने सदन में फाड़ा नागरिकता संशोधन बिल : एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपना विरोध जताते हुए इस बिल को फाड़ दिया। उन्होंने कहा, ‘संविधान की प्रस्तावना भगवान या खुदा के नाम से नहीं है। आप मुस्लिम लोगों को नागरिकता मत दीजिए। मैं गृह मंत्री से बस यह जानना चाहता हूं कि मुसलमानों से इतनी नफरत क्यों है?’ ओवैसी ने कहा कि विधेयक को हमें एनआरसी के नजरिए से देखना चाहिए। जो हिंदू छूट गए, उनके लिए विधेयक लाया गया। यह मुसलमानों को राज्य विहीन करने की साजिश है। उन्होंने कहा कि देश एक और बंटवारे की तरफ जा रहा है। यह विधेयक हिटलर के कानून से भी ज्यादा बदतर है।

     

    एनसीपी की सुप्रिया सुले ने कहा : हमारे लोकतंत्र का पूरा चरित्र ही समानता पर आधारित है। मैं गृह मंत्री से सहमत नहीं हूं। ये सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो जाएगा। मैं उनसे गुजारिश करती हूं कि वह इस बिल को वापस ले लें।

     

    बीजद के प्रसन्ना आचार्य ने कहा : हम इस बिल का समर्थन करेंगे। लेकिन हमारी मांग है कि इसमें श्रीलंका को भी शामिल करना चाहिए क्योंकि अतीत में वहां अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हुआ है। साथ ही सरकार को इस धारणा को भी खत्म करना चाहिए कि ये बिल मुस्लिमों के खिलाफ है।

     

    जेडीयू के राजीव रंजन सिंह ने कहा : हम इस बिल का समर्थन करेंगे। इस बिल को बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अगर पाकिस्तान में प्रताड़ना के शिकार अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जाती है तो ये सही कदम है।

     

    तेलंगाना राष्ट्र समिति के सांसद नमा नागेश्वर राव ने कहा : धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सोच के तहत हम इस बिल का विरोध करते हैं। हम संविधान के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं।

     

    टीएमसी ने कहा की भाजपा की सोच विभाजनकारी : लोकसभा में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा- अगर स्वामी विवेकानंद भारत के विचार के खिलाफ पेश हो रहे इस बिल को देखते तो स्तंभित रह जाते। भाजपा का भारत का आइडिया विभाजन का है। महात्मा गांधी के शब्दों को नजरअंदाज करना और सरदार पटेल की सलाह को न मानना दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

     

    मनीष तिवारी ने कहा की ये बिल संविधान के खिलाफ : कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि ये विधेयक संविधान के खिलाफ है। हमारा देश सेकुलर है, ये बिल उस अवधारणा को तोड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय नियम और संधि भी कहती है कि कोई भी शरणार्थी जो किसी भी धर्म से हो, आप उसे मदद देने से इनकार नहीं कर सकते। जब भी कोई शरणार्थी भारत आता है, हमसे शरण मांगता है, तो हम मानवीय आधार पर उसे मदद देते हैं।

     

    ये बहुत ही विचित्र कानून है, नेपाल-भूटान के लिए एक कानून, बांग्लादेश के लिए दूसरा कानून। अफगानिस्तान के लिए कुछ कानून, तो मालदीव के लिए कुछ और कानून। मैं पूछता हूं कि मालदीव का राजधर्म क्या है। इस बिल में विरोधाभास है और इसे दोबारा देखने की जरूरत है। किसी शरणार्थी का धर्म नहीं देखा जाता, सबको बराबरी का दर्जा दिया जाता है। ये बिल भारत की परंपरा के खिलाफ भी है। आज गृह मंत्री ने सदन में कहा कि कांग्रेस ने धर्म के आधार पर देश का विभाजन किया। मैं साफ करना चाहता हूं कि दो देश का सिद्धांत पहली बार 1935 में अहमदाबाद में  हिंदू महासभा में सावरकर ने रखा था, कांग्रेस ने नहीं।

     

    टीएमसी सांसद सौगत राय गृहमंत्री नए हैं, नियमों की जानकारी नहीं : नागरिकता संशोधन विधेयक पेश होने के बाद लोकसभा में टीएम सांसद सौगत राय ने कहा कि गृहमंत्री नए हैं, उन्हें शायद नियमों की जानकारी नहीं है। इसके बाद लोकसभा में हंगामा हो गया। टीएमसी सांसद सौगत राय ने लोकसभा में कहा कि आज संविधान संकट में है। इसके बाद भाजपा के सदस्यों ने उनके बयान का विरोध किया।

     

    अमित शाह और अधीर रंजन के बीच बहस : सियासी विवाद के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने आज लोकसभा में नागरिक संशोधन बिल पेश कर दिया। उनके बिल पेश करते ही सदन में हंगामा मच गया। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि इस बिल के जरिए अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। इस पर अमित शाह ने जवाब दिया कि ये बिल देश के अल्पसंख्यकों के .001 फीसदी खिलाफ भी नहीं है।

     

    लोकसभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने बिल के विरोध में कहा कि यह कुछ नहीं बल्कि हमारे देश के अल्पसंख्यक पर लक्षित कानून है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 13, अनुच्छेद 14 को कमजोर किया जा रहा है। इस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है। हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी से शाह ने कहा वॉकआउट मत कर जाना।

     

    एक दिलचस्प वाक्य जब अमित शाह ने याद दिलाया घोषणापत्र : 2014 और 2019 में हमने घोषणापत्र में इसका जिक्र किया था। हमने कहा था कि पड़ोसी देशों में प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए इसे लागू करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। साथ ही पूर्वोत्तर के लोगों की पहचान खत्म होने की आशंका को भी दूर करेंगे। तब विपक्ष विरोध नहीं कर रहा था। क्या पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को अधिकार नहीं मिलना चाहिए? तो अब क्यों विरोध कर रहे हैं? धार्मिक प्रताड़ना कर इन देशों से लाखों लोगों को भगा दिया गया। कोई अपना देश, क्या अपना गांव भी नहीं छोड़ता। इतने सालों बाद भी भारत में उन्हें नौकरी, शादी, शिक्षा, स्वास्थ्य, घर खरीदने का अधिकार नहीं है। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उन्हें सम्मान मिलेगा अधिकार मिलेगा।

     

    हम सब पंथनिरपेक्षता को स्वीकार करते हैं, किसी के साथ पंथ, धर्म के आधार पर दुर्रव्यवहार नहीं होना चाहिए। मगर किसी भी सरकार का कर्तव्य ये भी है कि वह देश की सुरक्षा करे। घुसपैठियों की पहचान करे, क्या देश को सबके लिए खुला छोड़ देंगे। कौन सा देश है जिसने नागरिकता देने के लिए कानून नहीं बनाया है। हमने भी बनाया है। अमित शाह ने कहा कि मणिपुर को भी नागरिकता संशोधन बिल से छूट मिलेगी।

     

    गृह मंत्री शाह ने कहा कि विधेयक कहीं भी देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है और इसमें संविधान के किसी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं किया गया। ‘अगर कांग्रेस पार्टी देश की आजादी के समय धर्म के आधार पर देश का विभाजन नहीं करती तो इस विधेयक की जरूरत नहीं पड़ती।’ शाह ने जब विधेयक पेश करने के लिए सदन की अनुमति मांगी तो कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने विधेयक पेश किए जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह अल्पसंख्यकों को लक्ष्य कर लाया गया विधेयक है। इस पर गृह मंत्री ने कहा कि विधेयक देश के अल्पसंख्यकों के 0.001 प्रतिशत भी खिलाफ नहीं है।

     

    उन्होंने चौधरी की टिप्पणियों पर कहा कि विधेयक के गुण-दोषों पर इसे पेश किए जाने से पहले चर्चा नहीं हो सकती। सदन की नियमावली के तहत किसी भी विधेयक का विरोध इस आधार पर हो सकता है कि क्या सदन के पास उस पर विचार करने की विधायी क्षमता है कि नहीं। शाह ने कहा कि विधेयक पर चर्चा के बाद मैं सदस्यों की हर चिंता का जवाब दूंगा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा कि सदस्यों को विधेयक पर चर्चा के दौरान उनकी विस्तार से बात रखने का मौका मिलेगा। अभी वह अपना विषय संक्षिप्त में रख दें।

     

    यह पार्टियां बिल के विरोध और पक्ष में हैं : जहां बिल के पक्ष में भाजपा, जनता दल यूनाइटेड, अकाली और लोक जनशक्ति पार्टी हैं। वहीं कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल और समाजवादी पार्टी इसका विरोध कर रही है। शिवसेना का स्टैंड क्लियर नहीं था, लेकिन उसने बिल के समर्थन में वोट किया।

     

    विपक्ष के भारी विरोध के बीच नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश हुआ : करीब एक घंटे तक इस बात पर तीखी नोकझोंक हुई कि इस बिल को सदन में पेश किया जा सकता है या नहीं। विधेयक पेश करने के बाद शाह ने कहा कि यह बिल संविधान के किसी भी अनुच्छेद को प्रभावित नहीं करता है। ऐसा नहीं है कि पहली बार सरकार नागरिकता के लिए कुछ कर रही है। कुछ सदस्यों को लगता है कि समानता का आधार इससे आहत होता है। इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश से आए लोगों को नागिरकता देने का निर्णय किया।

     

    पाकिस्तान से आए लोगों को नागरिकता फिर क्यों नहीं दी गई। अनुच्छेद 14 की ही बात है तो केवल बांग्लादेश से आने वालों को क्यों नागरिकता दी गई। गृह मंत्री ने कहा, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, ईसाइयों, पारसियों और जैनों के साथ भेदभाव किया गया है। इसलिए यह विधेयक इन सताए हुए लोगों को नागरिकता देगा। साथ ही यह आरोप कि विधेयक मुस्लिमों के अधिकारों को छीन लेगा गलत है।

     

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  • हिंदी पञ्चांग और अंग्रेजी तथा अरबी कैलेंडर

    हिंदी पञ्चांग और अंग्रेजी तथा अरबी कैलेंडर

    आज अगर बात करूँ पञ्चांग की तो अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 17 नवम्बर 2019 है। वैसे यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि ये ग्रेगोरी कैलेंडर का दिनाँक है जिसे 1582 में शुरू किया गया था, क्योंकि इससे पहले जुलियन कैलेंडर का प्रयोग किया जाता था। लेकिन 5 अक्टूबर 1582 को पता चला कि वास्तव में इस कैलेंडर के हिसाब से दिनाँक 10 दिन पीछे चल रहा था, इसलिए जूलियन के कैलेंडर को हटाकर ग्रेगोरी के कैलेंडर को अपनाया गया और उस दिन की दिनाँक को 15 अक्टूबर 1582 माना गया।

     

    यानी 1582 में अक्टूबर की 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14 तारीख आयी ही नहीं थी। वैसे इस ग्रेगोरी के कैलेंडर में 4 वर्ष बाद लीप वर्ष होता है, और फरवरी को 28 की जगह 29 दिन का कर दिया जाता है, जिससे एक दोष ठीक हो जाता है, लेकिन इसके बाद भी एक दोष रह जाता है, जिसका शुद्धिकरण 400 साल के हिसाब से होता है। यानि 400 साल में लीप वर्ष 100 होने चाहिए और सामान्य वर्ष 300 होने चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है, और 400 में 97 ही लीप वर्ष होते हैं, जबकि सामान्य वर्ष 303 होते हैं। यानी आखरी के 12 साल कोई लीप वर्ष नहीं आता है जबकि 4 वर्ष बाद आने के हिसाब से 3 लीप वर्ष को गुल कर दिया जाता है।

     

     

    ऐसे ही एक इस्लामिक कैलेंडर होता है, जिसको हिजरी कहा जाता है। इसकी शुरुआत 622 ई. में हुई थी जब मोहम्मद साहब को मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा था। इस हिसाब से अभी 2019 में देखा जाए तो (2019-622) 1397 वर्ष हुआ है। हिजरी सन की बात की जाए तो आज का दिनाँक 19 रबी-अल-अव्वल 1441 चल रहा है। यानी मुस्लिम के हिसाब से जो 1441 साल हुए हैं वो दुनिया के हिसाब से अभी मात्र 1397 ही साल हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से यानी हिजरी सन में 354 दिन का एक साल होता है जिसके कारण 33-34 साल में ये अंतर 1 साल का हो जाता है जैसे दुनिया के हिसाब से जो इंसान 100 साल का होता है वो मुस्लिम के हिसाब से 103 साल का होता है।

     

    हिंदुओं की जो पञ्चांग गणना है वो सबसे शुद्ध होती है और उसके हिसाब से हजारों वर्ष आगे-पीछे की दिनाँक देखी जा सकती है और उसमें कोई त्रुटि नहीं होती है क्योंकि उसको सूर्य चन्द्र और नक्षत्रों को ध्यान में रखकर काल-गणना की जाती है। काल गणना में मुख्यतः साल की गणना विक्रम-संवत से शुरू है। जिसमें सूर्य के हिसाब से साल को माना जाता है, लेकिन मास की गणना चन्द्र के हिसाब से होती है इसलिए 3 साल में 1 मास का अधिमास जोड़ा जाता है। विक्रम-संवत से आज की तिथि 5-मार्गशीर्ष-2076 है।

     

    वैसे एक साल में 12 महीने और एक सप्ताह में 7 दिन हिन्दू पञ्चांग के हिसाब से विक्रमी सम्वत से शुरू हुए थे यानी आज के 2076 साल पहले, और दुनियां के दूसरे सभी कैलेंडर इसके बाद शुरू किए गए थे, जिन्होंने इसी फार्मूला को कॉपी किया है। दुनियां के सभी कैलेंडर में 12 ही महीने होते हैं और सप्ताह में 7 दिन होते हैं। वैसे हिन्दू कैलेंडर में 15 दिन का पक्ष और 6 महीने का आयन भी होता है। यानी काल गणना की बहुत सी इकाइयां होती हैं जिनमें सूक्ष्म त्रुटि से लेकर कल्प तक की इकाइयां हैं, और ये सब ज्ञान हजारों साल पुराना है शायद तब दुनिया के दूसरे हिस्से के लोग इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

     

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  • अमरीका में हाऊडी मोदी कार्यक्रम को संबोद्धित करेंगे मोदी और ट्रम्प, जानें आखिर क्या है ये Howdy Modi

    अमरीका में हाऊडी मोदी कार्यक्रम को संबोद्धित करेंगे मोदी और ट्रम्प, जानें आखिर क्या है ये Howdy Modi

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 सितंबर को अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में Howdy Modi कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। Howdy Modi इवेंट पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई है। इस मेगा इवेंट में करीब 50 हजार से ज्यादा भारतीय हिस्सा लेने वाले हैं। इस कार्यक्रम में पीएम Narendra Modi और Donald Trump भारतीयों को संबोधित करेंगे।

     

    यह पहला मौका होगा जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति भारतीय समुदाय के ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल होंगे। इतना ही नहीं ऐसा भी पहली बार ही होगा कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इतना बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करेंगे। तीसरा ऐतिहासिक मौका भी यहीं होगा जब दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के अध्यक्ष संयुक्त रैली को संबोधित करेंगे।

     

    अमेरिका के Houston में NRG Stadium में होने वाले हाउडी मोदी का नारा है, ‘शेयर्ड ड्रीम्स, ब्राइट फ्यूचर’ यानी ‘साझा सपने, उज्ज्वल भविष्य।’ इस कार्यक्रम के लिए 50 हजार से अधिक लोगों ने रजिस्टर कराया है, हालांकि यह कार्यक्रम मुख्य रूप से भारतीय समुदाय के लिए है, लेकिन इसमें कोई भी शामिल हो सकता है।

     

    Howdy Modi, अमेरिका और भारत के रिश्तों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होने वाला है। इस कार्यक्रम में Donald Trump की मौजूदगी का मकसद भी यही है कि कैसे अमेरिका और भारत के रिश्तों को और मजबूती दी जाए। Howdy Modi का मकसद पिछले दिनों व्यापार को लेकर पैदा हुए भारत और अमेरिका के बीच तनाव को कम करना भी है। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच व्यापार वार्ता और कश्मीर मुद्दे को लेकर भी अमेरिका समर्थन दर्शाना चाहता है।

     

    Houston में Howdy Modi इवेंट से ठीक पहले भारत और अमेरिका के अधिकारी एक व्यापार समझौते पर चर्चा कर रहे हैं और उसे जल्द अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। भारत द्वारा अमेरिकी सामानों पर लगाए जाने वाले शुल्क को लेकर दोनों देशों के बीच पिछले दिनों काफी तनाव बढ़ गया था। Howdy Modi के जरिए उसे कम करने की कोशिश की जाएगी।

     

    Howdy Modi कार्यक्रम का आयोजन Texas India Forum कर रहा है। टेक्सास इंडिया फोरम एक गैर-लाभाकारी संगठन है। इस संगठन का मकसद भारत और अमेरिका के बीत सहयोग को बढ़ाना है। Howdy Modi कार्यक्रम के लिए 1000 से ज्यादा Voulnteer और 650 टेक्सास स्थित वेलकन पार्टनर ऑर्गनाइजेशन के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

     

     

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  • बंगाल की पुरातन संस्कृति से परहेज कब तक?

    बंगाल की पुरातन संस्कृति से परहेज कब तक?

    “कृत्तिवासी रामायण” के रचयिता ‘कृतवास ओझा’ थे जिन्होने पन्द्रहवी सदी के पूर्व में कृत्तिवासी रामायण की रचना की। कृत्तिवासी रामायण में राम-कथा परम्परा को पूरी तरह से भजन-शैली में लिखा गया है, जिसे जनमानस गा सके, संकीर्तन उठा सके। यह रामायण केवल राम-चरित को ही दृष्टिगत नहीं करती बल्कि बंगाल के पंद्रहवी सदी के जन-जीवन को चित्रित करती है। यह रामायण दिखाती है कि राम जन- मानस में व्याप्त हैं, चलायमान हैं, मनुष्य में ईश्वरीय तत्त्व के समाहित होने का प्रयास राम हो जाना है।

     

    यह रामचरितमानस का अनुवाद बिल्कुल भी नहीं है बल्कि अपने तरह का काव्य है जिसमें चरित्र, मनुष्य ज़्यादा लगते हैं यानी लोक-मानस, लोक-जीवन में से एक हैं और इसी कारण लोक के ज़्यादा करीब हैं। इतने प्राचीन समय से जिसे सुना, सुनाया और गाया जाता रहा हो, उसके विषय में बहुत बड़े अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन बिल्कुल नहीं जानते और यकीनन उन्होंने इसे कभी सुना भी नहीं होगा।

     

    कैसे सुनते, सुने भी तो इस तरह के ग्रथों को बंगाल की वामपंथी सरकारों ने साजिशन पब्लिक स्पेस से हटा दिया होगा, हटवा दिया गया होगा। यही कारण है कि विमर्श में भाग लेने वाले बंगाल के प्रवक्ता भी इसका ज़िक्र नहीं करते, क्योंकि उन्हें नहीं पता, उन्हें नहीं पता, क्योंकि उन्हें पता होने ही नहीं दिया गया। इसी साज़िश की कड़ी को बढ़ावा देने ड्रैकुला जैसे दिखने वाले अर्थशास्त्री राम के नाम को उपद्रव को बढ़ावा देने वाला बताते हैं, वह भी तब जब उन्हें गरीबी पर अपनी बासी हुई थ्योरी को बताने बुलाया गया हो।

     

    इन्हें नैरेटिव को सेट करने बुलाया गया था, नैरेटिव जो हत्याएँ करवा सके, घृणा बो सके। रक्त और उत्पात बुद्धिजीवियों की ख़ुराक है, जिसे वो क्रांति का नाम दिया करते हैं। राम के नाम से हत्याएँ करते नहीं लोग, यह फॉल्स नैरेटिव गढ़ कर लोगों को उकसाना और अस्थिरता पैदा करना इनका पसंदीदा शग़ल है। वरना ऐसा क्या है कि “Jai Shri Ram” के उच्चारण पर ममता बनर्जी खाल खिंचवा लेने की बात करती हैं, वह नारा ए तक़बीर पर तो ऐसा कुछ नहीं करती।

     

    सांस्कृतिक पराधीनता से स्वतंत्र होने देना कभी नहीं चाहते हैं वामपंथी, जिन्हें भारतीय संस्कृति को दिखाती हर किताब, ग्रंथ, वाक्य, प्रतीक ढकोसला लगता है। नोबल और भारत-रत्न के बाद अब किस और सम्मान की प्रतीक्षा है सेन को, यह तो ममता बनर्जी ही बेहतर समझती होंगी, पर यह एक स्थापित सत्य है कि राम ने अगर सम्पूर्ण आर्यावर्त को रावण जैसे आतताई से मुक्त न किया होता तो न बंगाल होता और न ही वहाँ दुर्गा-पूजा की धूम होती।

     

    संस्कृति और समानता का समभाव जो पुरातन इतिहास दिखाता है उसके अंदर ऐसे- ऐसे तथ्य निहित हैं जो हर विघटनकारी ताकतों पर व्राजपात कर सकते हैं, आवश्कता है अंतर्दृष्टि की।

  • बीता हुआ वक़्त व्यक्ति का परिचय और राष्ट्र का इतिहास हुआ करता है

    बीता हुआ वक़्त व्यक्ति का परिचय और राष्ट्र का इतिहास हुआ करता है

    अतीतविहीन होने का ऐतिहासिक दर्द वक़्त; जिसे हमने बाँट रखा है घड़ियों, पलों, घण्टों, तारीखों में, जो कभी कटता नहीं तो कभी मिलता नहीं, जो कभी अटका, लटका रह जाता है यादों की गलियारों में, जिसे भुला देने की पैरवी होती है गर ज़ख्म और खरोचें ज़्यादा लगी हों, यही बीता हुआ वक़्त व्यक्ति का परिचय और राष्ट्र का इतिहास हुआ करता है। बीता हुआ अतीत भविष्य को दिशा देता हैै।

     

    इस अतीत का न होना अमरीकियों को कितना सालता रहा है, इतना कि वो पुरातनता और अतीत को न सुन पाते हैं न बोल ही पाते हैं। जिन मिथकों को झुठला देने के अभूतपूर्व प्रयास भारत में होते हैं ऐसे एक भी मिथक अगर अमरीकियों को मिल पाते तो वो उसे न जाने कहाँ तक लिख जाते, गा लेते, रंग लेते, क्योंकि पुरातनता का यह आभास यह जता जाता कि उनकी जड़ें कहीं और से उखाड़ कर नहीं फेंक दी गईं। इसी मिथक को गले लगा गौरवान्वित होने की प्रतियोगिता के कारण इजराइल दुर्गति झेलता जा रहा है।

     

    इसी अतीत के प्रश्न को भुलाए रखने की ख़ातिर जी-तोड़ मेहनत कर स्थापित किया ख़ुद को, अमेरिका ने भी और इजराइल ने भी।यह ज़िद बना ली कि वर्तमान को इतना सुदृढ़ बनाया जाए कि अतीत की बात न आने पाए किसी की जुबां पर। अतीतविहीन होने ने उन्हें भविष्य को वर्तमान में ले आने को तत्त्पर किया, लिहाजा उन्होंने भविष्य को ले कर ही फिल्में बनाई और फ्यूचरिस्टिक फिल्मों की एक बड़ी श्रृंखला खड़ी कर दी। एक ऐसा समाज जिसने, “किधर से आ रहे हो?” “किधर को जा रहे हो?” जैसे प्रश्नों को ही सामाजिक पृष्ठभूमि से हटा दिया। वो नहीं पूछते थे कभी कि कहाँ से आए हो और यहाँ क्यों आना पड़ा, चूँकि क्या पता, किस सजा को काटने के क्रम में उन्हें आना पड़ा हो वहाँ।

     

    जहाँ हम भारतीय अपने अतीत से बाहर नहीं आ पाते और आना नहीं चाहते, क्योंकि पूर्वजों ने एक गौरवशाली इतिहास दिया है गर्व करने को, वर्तमान बार-बार अतीत से प्रभावित हो लेता है वहीं यह एक ऐसा देश है, जिसका इतिहास एक ग्लानि से ज्यादा कुछ नहीं, पर यह देश सर्वशक्तिमान है। जहाँ उसके अतीत की छाया उसे ब्रिटेन से ऊपर उठने नहीं देती वही अमेरिका अपने वर्तमान की दक्षता पर भविष्य और दूसरे देशों का भविष्य तय कर पाने की क्षमता रखता है।

     

    अतीत पर गर्व रखना, यादों की राजनीति करना कभी खुशी देता है, कभी गम पर कुछ कहानियाँ वर्तमान में लिख डालने की ताकत एक सुदृढ़ भविष्य के साथ एक तर्कपूर्ण इतिहास दे सकती है। पाकिस्तान जैसे पड़ोसी की खीज़ प्रमाण है कि अतीत से एक झटके से अलग कर देने पर एक शून्यता भरी यात्रा की शुरुआत होती है जिसका अतीत कोई गर्व-भरा इतिहास न होकर मात्र एक प्रतिद्वंद्वी बन सामने खड़ा हो जाता है, जो सफल भी ज़्यादा है और ताकतवर भी।

  • Screenshot के इस दौर में संदर्भ की गारंटी मत रखो

    Screenshot के इस दौर में संदर्भ की गारंटी मत रखो

    ये पोस्ट नहीं, आज के Social Media, फेसबुक की कहानी है, पात्र काल्पनिक है, कोई जीवित या मृत व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है!

    Manish जी का एक पोस्ट आता है जो इस प्रकार है : कावंर यात्रा के दौरान कावंरियों के द्वारा कहर बरपाया गया…गांजा और शराब के नशे में कावंरियों ने दो लड़कियों से छेड़-छाड़ करने के साथ एक ट्रक वाले से पैसा छीना।

    Manish जी के इस पोस्ट पर आए लोगों के Comment कुछ इस प्रकार है :

    Anil : ये सब गलत है!
    Vijay : तमाशा है, कोई मतलब हुआ ये सब करने का, हिन्दू धर्म को शर्मसार कर देने वाला कृत है!
    Ajay : बोल बम का ये क्या मतलब है? बोल बम के नाम पर ऐसा करना पाप है!
    Manoj : ये भगवाधारी गुंडे हैं, ये सब हिन्दू धर्म के नाम पर कलंक हैं, ऐसे लोगों को बीच चौराहे चार जुता मारना चाहिए, कौन दे रखा है इनको ऐसा करने का लाइसेंस?

    Suresh को मसाला चाहिए…वो चुपचाप Manish के इस पोस्ट को देख रहा होता है…जबरदस्त मसाला मिल गया है अब उसे…Manoj के comment का screenshot लेकर रख लेता है!

     

    दो दिन बाद :

    एक बाबा अपने किसी शिष्या के साथ बलात्कार कर देता है…शिष्या इसकी शिकायत थाने में दर्ज कराती है, Print Media, Broadcast Media से लेकर Social Media पर केवल इस घटना को लेकर ही चर्चा होने लगते है…Social Media के site Facebook पे लोग पोस्ट करना शुरू कर देते हैं…हर कोई बाबा को गलत ठहरा रहा होता है अपने अपने अंदाज में…Ashok भी एक पोस्ट डालता है इस घटना को लेकर जो इस प्रकार होता है :

    हिन्दू धर्म के ऐसे भगवाधारी पुरोधाओं को चार जुता मारना चाहिए…ये भगवाधारी क्या खाक करेगें हिन्दू धर्म की रक्षा…बाबा तो मस्त हैं शिष्या को लेकर बिस्तर पे… माल बना रहे हैं धर्म के नाम की अफीम को बेचकर और उस पैसे का इस्तेमाल कर रहे हैं भोग विलासिता में…ऐसे बाबा तो गलत हैं ही…इनसे गलत हैं इनको मानने और follow करने वाले इनके च* follower…घंटा बेड़ा पार होगा हिन्दू धर्म का जब तक च*यों की भरमार रहेगी हिन्दू धर्म में!

    Suresh को एक बार फिर से मसाला मिल गया…चुपचाप Ashok के इस पोस्ट का screenshot लेकर रख लेता है!

    8 महीने बाद :

    Suresh इन दो screenshot को Mayank, Umesh, Amit, Ajit, Naresh, Pooja, Somya, Neeraj के inbox में भेजता है…ये लिखते हुए…देख लो तुम भी…ये है Manoj और Ashok का असली चेहरा…ये खुद को हिन्दू हृदय सम्राट कहते हैं…भगवाधारी हिन्दू को गुंडा बता रहा है और बाबा को चोर-अय्याश…तुम लोग ही फैसला करो…Manoj और Ashok क्या है? ऐसे लोग से ही हिन्दू धर्म बदनाम है…खुद को रक्षक बताते हैं और इनके अंदर कुछ और हैं…असल में तो ये कलंक हैं…ये agent हैं!

    Suresh तो मसाला के रूप में इस्तेमाल कर लिया Manoj के genuine comment और Ashok के genuine post का…वो भला क्यों बताने जाए लोगों से कि Manoj का comment किस संदर्भ में था और Ashok का पोस्ट किस संदर्भ में था…इस तेज चलते दुनिया में लोगों के पास भी कहां time है कि वो याद रखे 8 महीने पहले की बात…संदर्भ चला जाता है तेल लेने और सामने रह जाता है तो केवल screenshot जो काफी होता है आग लगाने के लिए!

    इसके बाद फेसबुक पर महाभारत शुरू…दे गाली-दे ताली!  लेख: Manoj Kumar Singh

  • मंदिरों में चुपचाप विराजमान पत्थरों के देवता से इतना डरते क्यों हैं लोग?

    मंदिरों में चुपचाप विराजमान पत्थरों के देवता से इतना डरते क्यों हैं लोग?

    साबरीमाल मुस्कुराते रहेंगे!

    इतना डरते क्यों हैं लोग, मंदिरों में स्थापित पत्थरों के देवता और उनके अलिखित सम्राज्य से? जबकि वह चुप है, वह न तो दिखता है, और न ही बोलता है, फिर उसके सम्राज्य को हिलाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है?

    महज़ इसलिए कि उसका अलिखित कानून हर लिखित कानूनी व्याख्या पर भारी पड़ता है! यह अलिखित कानून समग्र दिखता है, जिसके पीछे जनमानस न कोई शिकायत दर्ज़ करता है और न उसे मानने से मना करता है!

    एक तरफ़ उस सम्राज्य को स्थापित रखने को सामूहिक चेतना है और दूसरी ओर उसे झुठला देने की आस्था, जो एक क्षुद्र प्रतिक्रिया से ज़्यादा कुछ भी नहीं! यहाँ विरोध सबरीमाला से ज़्यादा इस बात का है कि अथाह जनसमूह कुछ बेतुका कहता क्यों नहीं, करता क्यों नहीं, मानता क्यों जाता है हर अलिखित दस्तावेज को!

    दरअसल यह सामाजिक उर्ज़ा किसी सैनिटरी पैड से ख़त्म हो जाने वाली चीज़ नहीं है, न यह ऊर्ज़ा ख़त्म होगी, न उसके दस्तूर पर कोई फ़र्क ही पड़ेगा! हाँ, यह वैचारिक हमला पत्थरों की दीवारों, दरवाज़ों से टकराकर लौट ज़रूर जाएगा और सबरीमाल फिर भी मुस्कुराते रहेंगे!

    इस प्रतिक्रियात्मक रवैया के बाद भी ऐसा बिल्कुल नहीं होगा कि सबरीमाल की पूजा रुक जाएगी या बंद हो जाएगी, वह तो होती आई है, न जाने किस काल से, होती ही रहेगी भविष्य के आने वाले कई कालों तक!

    अगर इस तरह की प्रतिक्रियाओं पर आस्थाओं की नदियां या समुद्र अपना मार्ग बदल लेते या बहना रोक लेते, तो यह समूची दुनिया शायद बहुत पहले ही मृत महासागर बन चुकी होती, जहाँ पत्थरों के देवता मानवीय संवेदनाओं को आकार देने की वज़ह नहीं बनते। Save Sabarimala

  • वर्जनिटी टेस्ट से इनकार पर समाज से बहिष्कार, डांडिया समारोह से निकाला

    वर्जनिटी टेस्ट से इनकार पर समाज से बहिष्कार, डांडिया समारोह से निकाला

    पुणे के भाटनगर में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें एक महिला को डांडिया में शामिल होने से सिर्फ इसलिए रोक दिया गया, क्योंकि वह अपने समुदाय के उस रिवाज का विरोध कर रही है, जिसमें शादी की रात के अगले दिन महिलाओं का Virginity Test होता है। युवती के विरोध के बाद कंजारभाट समाज ने उसका बहिष्कार कर दिया था। पुलिस ने मामले में केस दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है।

    पीड़िता Aishwarya Tamaichikar ने एक न्यूज़ एजेंसी को बताया कि सोमवार को वह पिंपरी में एक डांडिया कार्यक्रम में हिस्सा लेने गई थीं। यह डांडिया समारोह जाट पंचायत द्वारा आयोजित किया गया था। जैसे ही ऐश्वर्या यहां पहुंची और डांडिया खेलना शुरू किया, अचानक संगीत बंद कर दिया गया, जिसके बाद उन्हें वहां से जाने के लिए कहा गया। ऐश्वर्या ने बताया, ‘घटना के बाद मैं पंडाल के पीछे चली गई, लेकिन फिर भी संगीत शुरू नहीं हुआ। एक वृद्ध व्यक्ति ने घोषणा की कि अब डांडिया का समारोह तभी शुरू होगा जब वह पंडाल के बाहर चली जाएंगी।’

    उन्होंने आगे बताया कि उस समय कार्यक्रम में लगभग चार सौ लोग मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी मेरा समर्थन नहीं किया। मैंने जैसे ही पंडाल छोड़ा संगीत फिर से बजना शुरू हो गया। इससे साफ है कि समुदाय ने मेरा बहिष्कार कर दिया है। ऐश्वर्या के पति विवेक तमायचीकर ने कहा कि हमने समुदाय में प्रचलित प्रथा वर्जनिटी टेस्ट का विरोध किया था, जिसके कारण मेरी पत्नी का समुदाय से बहिष्कार कर दिया गया है। यह असंवैधानिक है।

    आठ लोगों के खिलाफ एफआइआर

    ऐश्वर्या ने पिंपरी थाने में तहरीर देकर आठ लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई है। सभी आरोपित जाट पंचायत के सदस्य हैं। इनके ऊपर आरोप है कि उन्होंने महिला को समुदाय से बहिष्कार करने का फरमान सुनाया। पिंपरी की डीसीपी ने कहा कि ऐश्वर्या ने शिकायत की थी कि कंजारभाट समुदाय में प्रचलित Virginity Test का विरोध करने के कारण उन्हें दांडिया समारोह में भाग नहीं लेने दिया गया। आरोपितों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है, इस घटना के लिए एक जांच आयोजित की जाएगी।

    जानिए क्या है वर्जनिटी टेस्ट

    कंजारभाट समाज में रिवाज है कि शादी के बाद सुहागरात के अगले दिन जोड़े को यह साबित करना जरूरी है कि महिला का कौमार्य भंग हो चुका है। इसके लिए पंचायत के सदस्य बेडशीट चेक करते हैं। अगर बेडशीट पर पंचायत के सदस्यों को महिला के कौमार्य भंग होने का सबूत नहीं मिलता है, तो वह शादी को अवैध करार दे दिया जाता है।

    दो साल पहले भी उठी थी आवाज

    बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब किसी महिला ने इस कुरीती का विरोध किया है। इससे पहले भी दो साल पहले एक दूसरी महिला ने इसके खिलाफ कैंपेन शुरू किया था। इस कैंपेन का नाम ‘स्टॉप द वी टेस्ट’ दिया गया था। ऐश्वर्या और उनके पति ने इस रिवाज का विरोध किया। उन्होंने पंचायत के सदस्यों को बेडशीट दिखाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद कैंपेन ने फिर से तूल पकड़ा।

    मई में पंचायत ने इस जोड़े का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। ऐश्वर्या ने बताया कि इस पहले जब वो जून में वह एक शादी में शामिल होने गई थी, वहां उसके ऊपर हमला हुआ था। इस घटना के बाद ऐश्वर्या ने केस दर्ज कराया था और पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार किया था। बाद में आरोपियों को जमानत मिल गई थी।