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  • Bimashankar Jyotirlinga Darshan | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर दर्शन | धर्मं, अध्यात्म, प्रकृति का अद्भुत संगम

    Bimashankar Jyotirlinga Darshan | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर दर्शन | धर्मं, अध्यात्म, प्रकृति का अद्भुत संगम

    Bimashankar Jyotirlinga Darshan | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर दर्शन | धर्मं, अध्यात्म, प्रकृति का अद्भुत संगम | भीमाशंकर मंदिर, महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है। मंदिर के बाहर, पहाड़ों और उनके ऊपर प्राचीन किलों से घिरा एक वन क्षेत्र है, जहाँ दुर्लभ वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं। सह्याद्री पहाड़ियों में स्थित भीमाशंकर (Bimashankar) मंदिर आध्यात्मिकता, इतिहास और मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य का एक अद्भुत संगम है। भगवान शिव के बारह प्रतिष्ठित ज्योतिर्लिंगों में से एक यह पवित्र मंदिर लाखों भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रमाण है।

     

    एक पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रिपुरा की तपस्या से प्रसन्न होकर, ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उसे तीन इच्छाएँ प्रदान कीं। जिसके बाद त्रिपुरा ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए एक अभियान शुरू किया और देवताओं के राजा इंद्र को भी पराजित कर दिया। जिसके बाद इंद्र ने भगवान शिव को तपस्या से प्रसन्न किया। तब भगवान शिव ने इसी सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर “भीम शंकर” का रूप धारण किया था और त्रिपुरा से युद्ध कर उसका विनाश किया सबको उसके आतंक से मुक्त किया. वहीँ दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् शंकर ने जिस असुर का वध किया था उसका नाम था भिमासुर, और कुम्भकर्ण का पुत्र था। पौराणिक कथाओं में ये भी कहा जाता है की युद्ध के बाद भगवान् शंकर के शरीर से निकले पसीने से भीमरथी नदी का निर्माण हुआ।

     

    भीमाशंकरम (Bimashankar) तीर्थस्थल और भीमरथी नदी का उल्लेख 13वीं शताब्दी के लेखों में मिलता है, हालाँकि, मंदिर का वर्तमान स्वरुप तो उतना पुराना नहीं दीखता है, जिसका कारण ये बताया जाता है की इसका जीर्णोधार कई काल खंड किया जाता रहा है, जिसमें प्राचीन नागर शैली में बने मंदिर के वास्तुकला में मराठा शासकों द्वारा बाद में किए गए जीर्णोधार की छाप भी देखी जा सकती है. मंदिर के ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि इसे चालुक्य और पेशवा सहित कई राजवंशों का संरक्षण प्राप्त था, जिन्होंने इसके रखरखाव में योगदान दिया। शिवाजी महाराज ने मंदिर को खरोसी गाँव दान में दिया था, ताकि उससे मंदिर के नित्य धार्मिक अनुष्ठान का प्रबंध होता रहे।

     

    मंदिर के स्तंभ और चौखट देवताओं और मानव आकृतियों की जटिल नक्काशी से आच्छादित हैं। मंदिर की दीवारों पर भी उत्कृष्ट नक्काशी की गई है, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं, दिव्य प्राणियों और पौराणिक कथाओं को दर्शाया गया है, जो उस युग की अद्वितीय कला को दर्शाती है। मंदिर के गर्भगृह के ठीक मध्य में स्वयंभू ज्योतिरलिंग स्थित है, और शिवलिंग के सामने नंदी की एक मूर्ति है। मुख्य मंदिर के पास कमलजा माता का मंदिर है, जो देवी पार्वती का अवतार हैं और जिन्होंने त्रिपुरासुर के साथ युद्ध में भगवान् शिव की सहायता की थी। मंदिर के पीछे मोक्षकुंड तीर्थ है। मंदिर में जाने से पहले इस कुंड में स्नान करने की प्रथा है। मंदिर परिसर में भगवान शनि को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है। इसके अलावे, यहाँ ज्ञानकुंड और सर्वतीर्थ भी है। मंदिर के दक्षिण में कुषारण्य तीर्थ स्थित है, जहाँ से भीमा नदी बहती है।

     

    अगर भीमाशंकर (Bimashankar) के दर्शन के बाद आस पास घुमाने का मन करे तो मंदिर के पास भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य है, जो प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ की हरियाली, घने जंगल और मनोरम झरने इसे ट्रैकिंग और इको-टूरिज्म के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं। इसके अलावे भीमाशंकर मंदिर के पास ही गुप्त भीमाशंकर, हनुमान झील, भोरगिरी किला जैसे अन्य कई पर्यटक स्थल हैं, जहाँ घुमा जा सकता है.

     

    अगर बात करें भीमाशंकर पहुँचने की तो यहाँ का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पुणे (Pune) अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो यहाँ से 125 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। पुणे से निजी टैक्सी या बस के द्वारा यहाँ पहुंचा जा सकता है। यहाँ का निकटतम रेलवे स्टेशन कर्जत है, जो यहाँ से लगभग 65 किमी दूर है, जहाँ से टैक्सी या बस के जरिए यहाँ पहुंचा जा सकता है। अगर मुख्या शहरों की बात करें तो यह मुंबई से 223 किमी, पुणे से 125 किमी और नासिक से 230 किमी दूर है। Bhimashankar Jyotirlinga Darshan | Mharashtra Tourism | Incredible India | Hindu Temple Pilgrimage

  • Himachal Pradesh Tour | Shimla, Kullu, Manali, Dharamshala सहित हिमाचल के अन्य प्रमुख पर्यटक स्थल

    Himachal Pradesh Tour | Shimla, Kullu, Manali, Dharamshala सहित हिमाचल के अन्य प्रमुख पर्यटक स्थल

    Himachal Pradesh Tour | Shimla, Kullu, Manali, Dharamshala सहित हिमाचल के अन्य प्रमुख पर्यटक स्थल | अगर आप हिमाचल (Himachal Pradesh) घुमाने का प्लान बना रहे हैं तो जान लीजिए की हिमाचल में कौन कौन सी जगह घुमाने वाली है. हिमाचल प्रदेश को शांति का पर्याय माना जाता है. हिमाचल को देव भूमि और बर्फ की भूमि भी कहा जाता है. हरे भरे खेत, पवित्र स्थान, बर्फ से ढंके पहाड़ी, बहती नदियाँ, प्यारे प्यारे बाग़ और सुबह की शांत एवं मनमोहक सुगंध, ये किसी का मन मोह सकता है. हिमाचल अपने सुन्दर, मनोरम और रमणीय दृश्यों से न सिर्फ पर्यटकों का मन मोह लेता है, बल्कि उसे प्रकृति को करीब से महसूस करने का अवसर भी देता है. एकबार जो यहाँ का खुबसूरत नजारा देख लेता है, उसे इस भूमि से हमेसा के लिए प्रेम हो जाता है. वैसे तो पूरा हिमाचल ही घुमने वाली जगह है. लेकिन हम आपको बताएँगे वो कुछ सर्वश्रेष्ठ जगह जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र होता है.

     

    हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटक स्थलों में शिमला, कुल्लू, मनाली, धर्मशाला, मैकलोडगंज, डलहौजी, कल्पा, स्पीति घाटी, कांगड़ा, पालमपुर, कुफरी, कसौली, कसोल और खज्जियार बेहद प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय हैं.

     

    Shimla : इनमें सबसे पहले बात करते हैं शिमला की. शिमला अर्थात पहाड़ों की रानी और हिमचल प्रदेश की राजधानी है. यह भारत के लोकप्रिय हिल स्टेशनों में से एक और हिमाचल के लिए शीर्ष पर्यटन स्थलों में से एक है। शिमला का नाम देवी श्यामला से लिया गया है, जिन्हें देवी काली का अवतार माना जाता है। हरियाली और बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच हिमालय की तलहटी में स्थित यह शहर ट्रैकिंग के लिए भी मशहूर है। सर्दियों में पूरा शहर बर्फ से ढक जाता है और पर्यटक आइस स्केटिंग और स्कीइंग का आनंद भी लेते हैं। शिमला में घूमने के लिए शीर्ष स्थानों में से एक है “द रिज”. यह एक बड़ा खुला क्षेत्र है जो कभी शिमला बनाने वाली सात पहाड़ियों में से दो के बीच का एक रिज है। इसके अलावे पर्यटक यहाँ ऑब्ज़र्वेटरी हिल से सूर्यास्त और सूर्योदय के लुभावने दृश्यों का आनंद भी लेते हैं।

     

    Kullu Manali : हिमाचल के दुसरे प्रसिद्द स्थलों में है कुल्लू और मनाली. कुल्लू और मनाली वैसे तो दो स्थान हैं लेकिन बेहद आस पास होने की वजह से दोनों को अक्सर एक ही स्थान माना जाता है। लेकिन ब्यास नदी के तट पर स्थित कुल्लू घाटी में कुल्लू और मनाली दो रमणीय स्थल हैं। कुल्लू-मनाली हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है और यहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक और तीर्थयात्री आते हैं। यह बर्फ से ढके पहाड़ों, प्राकृतिक सुंदरता, इतिहास और संस्कृति के लिए जाना जाता है। कुल्लू ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क, सुल्तानपुर पैलेस, बिजली महादेव मंदिर, भृगु घाटी और पार्वती घाटी के लिए प्रसिद्ध। तो मनाली अपने तिब्बती मठों, रोहतांग दर्रे, सोलंग घाटी और हडिम्बा देवी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

     

    Dharamshala and Mcleodganj : हिमाचल में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल धर्मशाला और ऊपरी धर्मशाला या मैक्लोडगंज भी हैं, जो एक दूसरे से मात्र 5 किमी दूर हैं। धर्मशाला से मैक्लोडगंज स्काईवे के जरिए दस मिनट में पहुंचा जा सकता है। तिब्बत पर चीन के कब्जे और तिब्बती बौद्धों के निर्वासन के बाद धर्मशाला उनका मुख्य निवास बन चूका है। यहाँ जो देखने लायक स्थान हैं वो दलाई लामा मंदिर, नामग्याल मठ और ग्युतो तांत्रिक मठ मंदिर हैं। प्राकृतिक रूप से बनी डल झील भी धर्मशाला में एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।

     

    Dalhousie : डलहौजी भी हिमाचल प्रदेश में घूमने के लिए सबसे अच्छी जगहों में से एक है। अपनी सुखद जलवायु और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाने वाला यह स्थान, विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों से भरा हुआ है. यह धौलाधार पर्वत श्रृंखला के करीब पाँच पहाड़ियों में फैला हुआ है। यहाँ डैनकुंड चोटी, चामुंडा देवी मंदिर, भूरी सिंह संग्रहालय और सुभाष बावली प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं। इसके अलावे करेलानु में स्थित प्राकृतिक झरना भी डलहौजी के पर्यटक आकर्षणों में से एक है, जिसमें औषधीय गुण हैं।

     

    Khajjiar : चंबा जिले में स्थिति खजियार एक पहाड़ी शहर है जो अपने देवदार के जंगलों, प्राचीन मंदिरों और झीलों के लिए जाना जाता है। खजियार को ‘भारत का मिनी स्विट्जरलैंड’ भी कहा जाता है। खजियार झील और खजिनाग मंदिर, यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं। यह पैराग्लाइडिंग, ज़ोरबिंग और ट्रैकिंग जैसे गतिविधियों के लिए जा सकता है। खजियार काला टॉप वन्यजीव अभयारण्य के लिए भी प्रसिद्ध है.

     

    Kasol : कसोल हिमाचल प्रदेश का एक खूबसूरत गांव है। कसोल पार्वती नदी, ट्रैकिंग बेसकैंप, और इसके इज़रायली निवासियों के लिए प्रसिद्ध है. इसे अक्सर ‘भारत का छोटा इज़राइल’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ की पार्वती नदी राफ्टिंग के लिए मशहूर है।

     

    Kasauli : कसौली चंडीगढ़ से लगभग 60 किमी दूर है। यह हिल स्टेशन बहुत सारी वनस्पतियों और शांति के लिए पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। कसौली पैदल यात्रियों के लिए बेहद उत्तम है और इसे ज़्यादातर पैदल ही कवर किया जा सकता है। मनकी कसौली का सबसे ऊँचा स्थान है और माना जाता है कि यह वह स्थान है जहाँ भगवान हनुमान ने रामायण में लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी की खोज करते हुए अपना पैर रखा था।

     

    Kufri : कुफरी हिमाचल प्रदेश का एक छोटा सा हिल स्टेशन है जो अपने ट्रैकिंग और हाइकिंग ट्रेल्स के लिए जाना जाता है। सर्दियों में, रोमांच चाहने वाले पर्यटक बर्फ से ढकी ढलानों पर स्कीइंग और टोबोगनिंग का आनंद लेने के लिए कुफरी आते हैं। कुफरी अपने सेब के बागों, हरे-भरे देवदार और चीड़ के पेड़ों के लिए भी प्रसिद्ध है।

     

    Palampur : पालमपुर में सुगंधित चाय के बागान एक विशाल क्षेत्र में फैले हुए हैं और यहाँ प्रसिद्ध कांगड़ा चाय का उत्पादन होता है। इसलिए इसे जिसे उत्तरी भारत की चाय की राजधानी के रूप में भी जाना जाता है,. यह पैराग्लाइडिंग और लोकप्रिय टॉय ट्रेन की सवारी के लिए भी जाना जाता है.

     

    Kangra : कांगड़ा में घूमने के लिए कई जगहें हैं। कांगड़ा गग्गल हवाई अड्डे से मात्र 13 किमी दूर है। कांगड़ा में मसरूर मंदिर 15 चट्टान काटकर बनाए गए मंदिर हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि इन्हें पांडवों ने वनवास के दौरान बनाया था। प्रत्येक मंदिर नक्काशीदार है और मूर्तियों से सजाया गया है। कांगड़ा जिले को देवभूमि के नाम से भी कहा जाता है क्योंकि इसमें बज्रेश्वरी देवी मंदिर, बैजनाथ शिव मंदिर, चिंतपूर्णी मंदिर, चामुंडा देवी मंदिर और ज्वालामुखी मंदिर जैसे कई मंदिर और तीर्थस्थल है।

     

    Spiti Valley : स्पीति हिमालय में स्थित एक रेगिस्तानी पहाड़ी घाटी है। स्पीति नाम का तात्पर्य मध्य भूमि से है, अर्थात तिब्बत और भारत के बीच की भूमि। यह घाटी दुनिया के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में से एक है और भारी बर्फबारी के कारण हर साल लगभग छह महीने तक बाकी दुनियां से कटी रहती है।

     

    Kalpa : किन्नौर जिले में स्थित, कल्पा किन्नौर कैलाश पर्वतों और हरे-भरे देवदार के जंगलों के विस्तृत दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यह स्थान सेब के बागों के लिए प्रसिद्द है, और यहाँ के लोगों की मुख्या आजीविका भी सेबों के बाग़ ही है. कल्पा के ऊंचे स्थान से, कोई भी व्यक्ति पूरे दिन मनमोहक रंग परिवर्तन प्रदर्शित करते हुए, पूजनीय कैलाश शिवलिंग को देख सकता है।

     

    Shopping in Himachal : अब बात कर ली जाए खरीददारी की, तो हिमाचल में पर्यटकों के खरीदारी के लिए बहुत कुछ है. इनमें प्रमुख रूप से शामिल है हस्तशिल्प, टोपियाँ, तिब्बती कालीन, लड्कड़ी और धातु से बने जजटिल नक्काशी और प्रतिक चिन्ह के काम जो घरों की सजावट के लिए बेहद आदर्श है. इसके अलावे हिमाचल ऊनी कपड़ों के लिए भी प्रसिद्द है. पश्मीना शॉल और कुल्लू शॉल भी बेहद लोकप्रिय है.

     

    हिमाचल प्रदेश घूमने के लिए सबसे अच्छा समय मार्च से जून के बीच है। इस अवधि में मौसम की स्थिति सबसे अच्छी होती है, जो इसे बाहरी गतिविधियों और दर्शनीय स्थलों की यात्रा के लिए आदर्श बनाती है।

     

    हिमाचल प्रदेश में तीन घरेलू हवाई अड्डे हैं: मनाली के पास भुंतर, शिमला के पास जुब्बड़हट्टी और कांगड़ा में गग्गल हवाई अड्डा। ये हवाई अड्डे दिल्ली और चंडीगढ़ के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों से जुड़े हुए हैं. ट्रेन के जरिए आप पठानकोट और पठानकोट से सोलन और उना के लिए जा सकते हैं. कालका को जोड़ने वाली टॉय ट्रेन भी चलती है जो बेहद रमणीय स्थानों से गुजरती है. सडक के रास्ते दिल्ली और चंडीगढ़ से बस और टैक्सी के जरिए आप हिमाचल जा सकते हैं.

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  • Patna Zoo | पटना चिड़ियाघर में एक दिन | Sanjay Gandhi Biological Park | Patna Chidiyaghar

    Patna Zoo | पटना चिड़ियाघर में एक दिन | Sanjay Gandhi Biological Park | Patna Chidiyaghar

    Patna Zoo | पटना चिड़ियाघर में एक दिन | Sanjay Gandhi Biological Park | Patna Chidiyaghar | Sanjay Gandhi Jaivik Udyan | कवरेज के दौरान हमारी टीम पहुंची पटना! तो आज हम आपको बताएँगे पटना का मुख्य आकर्षण में से एक संजय गांधी जैविक उद्यान में. बिहार में इसके अतिरिक्त एक और चिड़ियाघर प्रस्तावित है लेकिन फ़िलहाल यह बिहार का एकमात्र चिड़ियाघर है। इसे आम तौर पर ‘पटना जू’, ‘पटना चिड़ियाखाना’ या ‘पटना चिड़ियाघर’ के नाम से जाना जाता है।

     

    संजय गांधी जैविक उद्यान, पटना की स्थापना सन 1969 – 1970 में बिहार सरकार के वन विभाग द्वारा राजभवन के 34 एकड़ भूमि पर वनस्पति उद्यान के रूप में की गई थी। तब इसका नाम गार्डन अर्थात उद्यान रखा गया था. सन 1972 में वन विभाग द्वारा इसका नाम बदलकर जैविक उद्यान कर दिया गया और बाद में अन्य विभागों की भूमि को वन विभाग को हस्तांतरित कर मौजूदा जैविक उद्यान में जोड़ दिया गया। इस प्रकार, जैविक उद्यान का क्षेत्रफल लगभग 153 एकड़ हो गया। और सन 1973 में इसे चिड़ियाघर के रूप में घोषित करके आम लोगों के लिए खोल दिया गया.

     

    23 जून 1980 को विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हो गई. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और संजय गांधी की मां इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी. तब बिहार में भी कांग्रेस की सरकार थी और बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा थे, तब सन 1980 में चिड़ियाघर का नाम जैविक उद्यान के बदले संजय गांधी बायोलॉजिकल पार्क कर दिया गया.
    इस चिड़ियाघर में मौजूद जंगली जानवरों की लगभग 108 विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 50 प्रजातियाँ तो लुप्तप्राय श्रेणी में हैं। पटना चिड़ियाघर में मौजूद जानवरों और पक्षियों की कुल संख्या 1160 से अधिक बताई जाती है। जिसे देखने के लिए हर साल लगभग 25 लाख से अधिक पर्यटक इस चिड़ियाघर को देखने आते हैं. संजय गांधी जैविक उद्यान के अंदर का नजारा बेहद खुबसूरत और हरियाली से भरा होता है. इस वजह से रोजाना मोर्निंग वाक के लिए भी हजारों स्थानीय नागरिक यहाँ आते हैं, जिसके लिए जू प्रशासन की तरफ से पास जारी किया जाता है.

     

    आइए अब हम आपको इस चिड़ियाघर में मौजूद जीवों की प्रजातियों से परिचय करवाते हैं.

    पटना चिड़ियाघर में मौजूद जानवरों में एक सींग वाले गैंडा, रॉयल बंगाल टाइगर, व्हाइट टाइगर, ब्लैक बीयर, जिराफ़, साही, तेंदुआ, दरियाई घोड़ा, मगरमच्छ, हाथी, हिमालयी काले भालू, सियार, काले हिरन, चित्तीदार हिरण, मोर, पहाड़ी मैना, घड़ियाल, अजगर, गैंडा, चिंपांज़ी, जिराफ़, ज़ेबरा, एमू और सफ़ेद मोर आदि शामिल हैं।

     

    इस चिड़ियाघर को नंदन कानन चिड़ियाघर, भुवनेश्वर से मार्च के पहले सप्ताह में एक सफेद बाघ मिला था। इसके अलावे इस चिड़ियाघर में ज़ेबरा भी है, जिसे चहलकदमी करते हुए देखना काफी आकर्षक होता है। यहाँ जिराफ की भी अच्छी संख्या है जिन्हें मैदान में घूमते देखना काफी अच्छा लगता है. इस चिड़ियाघर में घड़ियालों की भी अच्छी संख्या है. बताया जाता है की पिछले पांच वर्षों में यहाँ घड़ियालों की संख्या 13 से 129 हो गई है।

     

    पटना का संजय गांधी जैविक उद्यान लुप्तप्राय जानवरों की श्रेणी में शामिल एक सींग वाले गैंडों का भी बसेरा बना हुआ है. यहां ऐसे दस गैंडे हैं, जिसमें से पांच नर और पांच मादा गैंडे हैं. बताया जाता है की यहाँ से अधिक सिर्फ अमरीका के कैलिफोर्निया स्थित सैन डिएगो चिड़ियाघर में ही इस प्रजाति के ग्यारह गैंडे हैं. इस चिड़ियाघर में भारतीय गैंडों के अलावा गैंडों की दूसरी प्रजातियां भी मौजूद हैं. ज़ू के पास अभी गैंडों की ‘चार ब्लड लाइन’ मौजूद है.

     

    चिड़ियागहर में मौजूद विभिन्न आकर्षणों में एक चिम्पैंजी भी है. चिंपांज़ी जिसका वैज्ञानिक नाम है पैन ट्रोग्लोडाइट्स. ऐसा मन जाता है की चिम्पांजी हमारे सबसे करीबी जीवित रिश्तेदार हैं, जो उप-सहारा अफ्रीका के मूल निवासी हैं और कांगो के जंगल में पाए जाते हैं। चिम्पांजी को एक सामाजिक प्राणी भी कहा जाता है और ऐसा माना जाता है कि मानव और चिम्पांजी का पूर्वज एक ही है। चिड़ियाघर में एक नर और एक मादा चिम्पांजी हैं जिनका नाम क्रमशः कार्तिक और सुभद्रा है। इन दोनों जानवरों को 2012 में पशु विनिमय के माध्यम से नंदनकानन चिड़ियाघर, भुवनेश्वर से लाया गया था। इस चिड़ियाघर में एक सांप घर भी है. बताया जाता है की इस सांप घर में 5 प्रजाति के 32 सांप मौजूद हैं।

     

    जानवरों के आलावा इस चिड़ियाघर में पक्षियों की भी अच्छी खासी संख्या संख्या है, जिसमें विभिन्न प्रकार और रंगों के तोता, मैना, चिल, गिद्ध आदि शामिल हैं. यह स्थान पक्षि प्रेमियों के लिए भी एक अच्छा दृश्य प्रदान करता है। इस चिड़ियाघर में बच्चों का मुख्य आकर्षण एक्वेरियम अर्थता मछली घर है जिसका उद्घाटन सन 1993 में हुआ था। मछलीघर में मछलियों की विभिन्न प्रकार के प्रजातियों को देखने का अवसर मिलता है. सफ़ेद, काला, लाल, गुलाबी, पिला विभिन्न रंगों की मछलियाँ जल में अठखेली करते हुए बच्चों को काफी आकर्षित करता है. मछली में थाई एल्बिनो मांगुर, ओरांडा गोल्डफिश, डॉलर मछली, ज़ेबरा मछली, गुलाबी बार्ब मछली जैसे अनेक प्रजातियाँ मौजूद है. बताया जाता है की एक्वेरियम में मछलियों की लगभग 35 प्रजातियां हैं. इस मछलीघर को देखने के लिए प्रवेश टिकट के अतिरिक्त अलग से टिकट लगता है. जो सामान्य प्रवेश शुल्क के बाद सबसे बड़ा राजस्व जनरेटर है।

     

    इसके अतिरिक्त पर्यटकों के आकर्षण का एक केंद्र नौकायन भी है. यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए नौका विहार की सुविधा भी उपलब्ध है। उद्यान के अंदर मौजूद तालाब के आकर का जल उद्यान में नौका की सुविधा भी उपलब्ध है. जो अतिरिक्त शुल्क पर पर्यटकों को उपलब्ध कराइ जाती है.

     

    इस चिड़ियाघर की स्थापना एक वनस्पति उद्यान के रूप में की गई थी, जिसे बाद में चिड़ियाघर में बदला गया. लेकिन अभी भी ये चिड़ियाघर अपने अंदर पेड़ों, जड़ी बूटियों और झाड़ियों की 300 से अधिक प्रजातियों को समेटे हुए है। पौधों के संरक्षण और विकास के लिए यहाँ औषधीय पौधों के लिए एक नर्सरी, एक जलीय उद्यान, एक आर्किड घर, एक फ़र्न हाउस, ग्रीन हाउस, एक ग्लास हाउस और एक गुलाब उद्यान शामिल हैं। खासकर गुलाब उद्यान तो प्रेमी जोड़ों के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता है.

     

    इस चिड़ियाघर में बच्चों के मुख्य आकर्षण के केंद्र हुआ करता था, टॉय ट्रेन. टॉय ट्रेन का ट्रैक कुछ इस तरह बिछाया गया था की ये टॉय ट्रेन चिड़ियाघर के हर एक हिस्से को कवर करता था. टॉय ट्रेन में बैठकर लोग चिड़ियाघर में पशु पक्षी और जानवरों को देखने का आनंद लिया करते थे, लेकिन पिछले कई सालों से तकनिकी कारणों से टॉय ट्रेन बंद है. हालाँकि चिड़ियाघर प्रशासन ये पहल कर रही है की उद्यान में इलेक्ट्रिक टॉय ट्रेन शुरू की जाए. आगंतुकों के लिए चिड़ियाघर प्रशासन की तरफ से यहाँ शौचालय, कैंटीन, पेयजल जैसी सार्वजनिक उपयोगिता की सुविधाओं की भी ठीकठाक व्यवस्था की गई है.

     

    अगर आप पटना जाएं तो एकबार संजय गाँधी जैविक उद्यान (Patna Zoo) घुमा जा सकता है. इसकी रोड, रेल और एयर कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है. यह पटना शहर के प्रमुख सड़क बेली रोड पर स्थिति है. इसके आलावा पटना के जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से मात्र पंच मिनट की दुरी पर है. रेल कनेक्टिविटी की बात करें तो पटना जंक्शन से बीस मिनट तो दानापुर रेलवे स्टेशन से मात्र पंद्रह मिनट की दुरी पर है. रेलवे स्टेशन, और एअरपोर्ट से ऑटो, कैब और बस की अच्छी सुविधा है.

  • राजा और रानी की प्रेम कहानी बयां करता है ये किला, देखने वालों की लगी रहता है भीड़!

    Narwar Fort | जब भी खूबसूरत वादियों और संस्कृति की बात हो और उसमें मध्य प्रदेश का नाम ना हो? ऐसे कैसे हो सकता है, दोस्तों मध्य प्रदेश में ऐसे कई स्मारक, महल बने हुए हैं जो बरसों पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं। अब तक हमने आपको मध्य प्रदेश से जुड़े ऐसे कई महल और स्मारक के बारे में बताया जिनका बहुत महत्व है और यह मध्य प्रदेश की शान बढ़ाते हैं। इसी बीच हम लेकर आए हैं मध्य प्रदेश के एक और किले की जानकारी जो बहुत खास है और यह काफी प्रचलित भी है। इसका इतिहास अपने आप में काफी भव्य रहा है और यह किला भी काफी सुर्खियों में रहा है। तो चलिए जानते हैं इस किले के बारे में…

     

    दरअसल, हम जिस किले के बारे में बात कर रहे हैं वो मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से 302 किलोमीटर दूर और ग्वालियर से तकरीबन 82 किलोमीटर दूर कालीसिंध नदी के पूर्व में 50 फीट की ऊंचाई पहाड़ी पर बसा हुआ है। यह किला अपने आप में काफी भव्य है जो करीब 7 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है।

     

    इस किले का नाम नरवर किला (Narwar Fort) है और इसकी बहुत दिलचस्प कहानी है। दरअसल महाभारत में किले की चर्चा राजा नल की राजधानी के रूप में की गई है। नरवर को पहले नलपूल नाम से जाना जाता था। इतिहास की माने तो 12वीं शताब्दी में इस पर परिहार, तोमर कछवाहा जैसे शासको का अधिकार रहा। कहते हैं काफी समय तक इस पर मुगलों ने भी राज किया फिर 18वीं और 19वीं शताब्दी में मराठा सिंधियों के अधिनियम ये किला आ गया।

     

    इस किले का पूरा डिजाइन राजपूताना है जो बहुत ही खूबसूरत तरीके से बनाया गया है। किले की एक-एक दीवार में काफी बारीकी देखने को मिलती है। दोस्तों इस किले को देखने के लिए आपको कई सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती है तब कहीं जाकर इस किले की सुंदरता को आप निहार पाते हैं। चारों तरफ हरियाली से घिरा यह किला काफी चर्चा में रहता है और अक्सर इसे देखने वालों की भीड़ लगी रहती है।

     

    इस किले की एक ऐतिहासिक प्रेम कहानी भी बताई जाती है। कहा जाता है कि नरवर किला को नल और दमयंती की प्रेम कहानी की वजह से बनाया गया था। दरअसल दमयंती विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री थी जबकि नल निषाद के राजा वीर सिंह के पुत्र थे। कहा जाता है कि दोनों ही बहुत गुणी और रूपवान हुआ करते थे और उनकी सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक हुआ करती थी। लेकिन इन दोनों ने कभी भी एक दूसरे को नहीं देखा था। यह दोनों केवल एक दूसरे की सुंदरता और गुण के बारे में सुनकर ही एक दूजे से प्रेम करने लगे थे।

     

    इसी बीच जब दमयंती के स्वयंवर का समय आया तो इसमें वरुण, अग्नि, इंद्र, नल और यम भी आए। ऐसा कहा जाता है कि चारों स्वयंवर में नल का चेहरा धारण करके आए थे। नल की तरह दिखने वाले पांच पुरुषों को देखकर दमयंती खुद भी दंग रह गई थी। किंतु उनके प्रेम को कोई हारा नहीं सका। कहा जाता है कि दमयंती के प्यार में इतनी ताकत थी कि उन्होंने देवताओं से शक्ति मांग कर अपने असली प्रेम की पहचान की और उससे शादी कर ली, लेकिन कुछ समय साथ रहने के बाद यह दोनों एक दूसरे से अलग हो गए।

     

    इतिहास में ऐसा कहा गया है कि नल अपने भाई पुष्कर से जुए में सब कुछ हार जाता है जिसके बाद दमयंती अपने परिवार के साथ रहने लगती है। वहीं सब कुछ हार जाने के बाद नल गायब हो जाते हैं। इसी बीच दमयंती के पिता दोबारा उसके स्वयंवर की घोषणा कर देते हैं। उधर दमयंती से अलग होने के बाद नल को कर्कोटक नाम के सांप ने काट लिया होता है जिसकी वजह से उसका पूरा रंग काला पड़ जाता है। यहां तक के उसे कोई पहचान भी नहीं पा रहा था।

     

    इसी बीच नल बावुक नाम से सारथी बनकर विदर्भ पहुंचे। नल का चेहरा कुछ ऐसा हो गया था कि, दमयंती के लिए भी पहचानना थोड़ा मुश्किल था हालांकि उसने अपने प्रेम को पहचान लिया। इसके बाद नल ने अपने भाई पुष्कर के साथ एक बार फिर से जुआ खेला और हारी हुई सारी चीज अपने नाम कर ली। इसके बाद ही इस किले का निर्माण किया गया।

     

    जब आप इस किले में प्रवेश करेंगे तो आपको चार द्वार पार करने पड़ते हैं। पहले द्वारा पिसनारी दरवाजा कहलाता है जो हिंदू शैली में निर्मित है। इसके अलावा दूसरा द्वारा किरणपुर तथा तीसरा गणेशपुर और चौथा द्वारा हवापुर के नाम से मशहूर है। इस किले के अंदर आपको एक साथ 8 कुँए और 16 बावड़िया देखने को मिलेगी। कहा जाता है कि यहां से 1600 पणिहारान पानी भरने एक साथ आई थी और यह नजारा बहुत खूबसूरत हुआ करता था। इतना ही नहीं बल्कि किले के अंदर एक पूरा नगर बसा हुआ करता था जिसमें मीना बाजार सबसे मुख्य था जहां से लोग अपनी जरूरत की चीज ख़रीदा करते थे।

     

    यदि आप नरवर किला देखना चाहते हैं तो यह किला ज्यादा दूर नहीं है। आप यहां पहुंचने के लिए ट्रेन, बस और हवाई जहाज का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। दरअसल, आपको हवाई जहाज से ग्वालियर एयरपोर्ट पर आना पड़ेगा। इसके बाद आप नरवर किला तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा ट्रेन से आपको शिवपुरी स्टेशन आना पड़ेगा। यहां से भी नरवर किला करीब पड़ता है। यहां से आप टैक्सी या बस से जा सकते हैं। इसके अलावा आप किसी भी राज्य से शिवपुरी बस स्टॉप आ सकते हैं और यहां से नरवर किले के लिए निकल सकते हैं। Narwar Fort | Madhya Pradesh Tourism | Nal Damyanti Love Story

  • प्राकृतिक सौंदर्य समेटे हुए हैं कंचना घाट, यहां शांति की तलाश में पहुंचते हैं पर्यटक!

    यदि आप प्राकृतिक सौंदर्य देखने के शौकीन है और इसे देखने के लिए दूर दूर तक जाते है। तो अब आपको इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। दरअसल दोस्तों मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है जो अपने अंदर प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे हुए है। यहां पर आपको ऐसी कई जगहे मिल जाएगी जो प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। जी हाँ… आज हम बात करेंगे मध्य प्रदेश में स्थित एक ऐसी जगह के बारे में जो अपनी प्राकृतिक सौंदर्यता के लिए बहुत मशहूर है और यहां की सुंदरता निहाने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। इतना ही नहीं बल्कि यह स्थान इतिहास को भी दर्शाता है जिसे देखना काफी रोमांचक महसूस हो सकता है। ये एक ऐसी जगह हैं जहां आप फेमली ट्रिप पर भी आ सकते हैं, इसके अलावा यहां पर अकेले घूमना भी काफी रोमाँचक है। तो चलिए जानते हैं इस खूबसूरत जगह के बारे में…

     

    हम आपसे बात कर रहे हैं और ओरछा में बेतवा नदी के तट पर बसा कंचना घाट के बारे में। कहा जाता है कि कंचना घाट का निर्माण राजा वीर सिंह जूदेव ने करवाया था। कंचना घाट की खूबसूरती देखकर आप मंत्र मुग्ध हो जाए हो जाओगे। यहां पर प्राकृतिक सौंदर्यता के साथ-साथ इतिहास को समझने का मौका भी मिलने वाला है। ऐसा कहा जाता है दोस्तों कंचना घाट ओरछा के सबसे प्रसिद्ध घाटों में से एक है और यहां पर कई ऐसे परिसर मौजूद है जो अपने आप काफी भव्य है। इतना ही नहीं बल्कि कंचना घाट को लेकर यह भी कहा जाता है कि, ओरछा राज्य की रानियां एवं पटरानियां स्नान करने इसी घाट पर आती थी और यह नजारा बहुत खूबसूरत हुआ करता था।

     

    यानी कि कम शब्दों में कहा जाए तो कंचना घाट प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ इतिहास और आध्यात्मिक शांति भी दर्शाता है और यही वजह है कि हजारों पर्यटक यहां पर पहुंचते हैं। यहां का माहौल काफी शांत है, ऐसे में आपको यहां पर एक अलग ही अनुभव महसूस होने वाला है। नदी की प्राचीन सुंदरता और शांत वातावरण विश्राम आत्मनिरीक्षण और प्रकृति की गोद में जाने के लिए एक बेहतर स्थान है। इतना ही नहीं बल्कि साल 1592 में महाराज मधुकर शाह के दिवंगत होने पर कंचन घाट पर ही उनकी समाधि बनाई गई। इसके अलावा इसी घाट पर जुझार सिंह की रानी की मडिया भी है जो भाभी जी की मडिया के नाम से प्रसिद्ध है।

     

    कंचना घाट का एक ऐतिहासिक महत्व रहा है क्योंकि यहां भव्य किला परिसर के बहुत ही नजदीक है। जब आप यहां पर जाएंगे तो आपको घुमावदार रास्ता, हरी भारी हरियाली, पहाड़ से घिरा हुआ मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है जो आपको मोहित कर लेता है। यहां पर पानी की मधुर ध्वनि, ठंडी हवा, शांति, साथ ही पक्षियों के गीत सुनने को मिलेंगे जो आपके इस यात्रा को बहुत सुखद महसूस करवाने वाले हैं।

     

    ओरछा झांसी से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ओरछा का पुराना नाम तुंगारण्य बताया जाता है। इसे महर्शि तुंग की तपोभूमि भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां पर सारस्वत ऋषि ने अन्य ऋषियों को वेद अध्ययन करवाया था इतना ही नहीं बल्कि बुंदेली से पहले परिहारो ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया हालांकि बाद में चंदेलों ने उसे ढहा दिया। इसका प्राचीन नाम ऊॅंदछा, ओंदछा तथा ओड़छा है। जिससे परिवर्तित हो कर कालान्तर में इसका नाम ओरछा हो गया।

     

    कंचना घाट स्थानीय लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताया जाता है। कहते हैं यहां पर हर दिन पूजा अर्चना विशेष रूप से होती है। इसके अलावा यहां पर अक्सर धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं। इतना ही नहीं बल्कि रामनवमी जैसे बड़े त्यौहार के दौरान यहां पर राम कथा के विविध प्रसंगों की प्रस्तुति होती है और हजारों लोगों की भीड़ लगी रहती है।

     

    जब आप यहां पर पहुंचेंगे तो आपको कंचना घाट के पास ओरछा के शासको के लिए करीब 15 छतरियां स्मारक देखने को मिलेंगे जो बहुत ही खूबसूरत तरीके से बनाए गए हैं। यह छतरियां और स्मारक इस बात का प्रमाण है कि इतिहास काफी भव्य रहा होगा जो आज भी उनके द्वारा बनाई गई छतरियां वैसी की वैसी ही खड़ी है। यहां के अधिकांश छतरी आपको तीन मंजिला देखने को मिलेगी।

     

    सूचना फलक पर मधुकर शाह, वीर सिंह देव, जसवंत सिंह, उद्वित सिंह, पहाड़ सिंह आदि नाम का अंकित है। यह छतरियां पंचायतन शैली के मंदिरों जैसी बनी हुई है। कहा जाता है दोस्तों ओरछा की स्थापना बुंदेला राजपूत सरदार रुद्र प्रताप सिंह के द्वारा हुई थी। जब आप कंचना घाट देखने पहुंचे तो यहां के नजदीक श्री राम राजा मंदिर, सावन भादो स्तंभ, हरदौल की बैठक और लक्ष्मी मंदिर भी जा सकते हैं। ये जगह भी काफी खूबसूरत है। यहां जाकर आप इतिहास जुडी कई चीजें समझने को मिलेगी।

     

    ओरछा जाने के लिए सबसे पहले आपको ग्वालियर जाना पड़ेगा। ग्वालियर यहां का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से बस या टैक्सी से ओरछा जा सकते हैं। वही झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित ओरछा रोड स्टेशन से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप चाहे तो रेल के माध्यम से भी जा सकते हैं। इसके अलावा ग्वालियर से ओरछा के लिए बस मिलती है। आप चाहे तो अपने निजी वाहन से भी ओरछा जा सकते हैं और सुखद यात्रा कर सकते हैं।

  • दुनिया के सात अजूबों में शामिल ‘ताजमहल’ के ये राज, आप नहीं जानते होंगे | Taj Mahal

    Taj Mahal | ताजमहल दुनिया के सात अजूबों में शामिल है। इसकी खूबसूरती और नक्काशी इतनी बारीकी से की गई है कि देखने वाला देखता रह जाता है। यही वजह है कि हर साल ताजमहल देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है। अब तक आपने ताजमहल को लेकर कई तरह की बातें सुनी होगी। आज हम आपको बताएंगे ताजमहल से जुड़े कुछ ऐसे राज जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। आज हम ताजमहल में बंद उन 22 कमरों के बारे में भी बात करने वाले हैं जो कई सालों से बंद है। लोग यह तक नहीं जानते हैं कि इन बंद कमरों में देवी देवता की मूर्तियां है या फिर किसी तरह का कोई शिलालेख है? तो चलिए जानते हैं ताजमहल से जुड़े कुछ अनसुने रहस्य.

     

    इतिहास के पन्नों को यदि पलटा जाए तो ताजमहल को शाहजहां ने मुमताज के लिए बनवाया था लेकिन आज भी इस ताजमहल को लेकर यह सवाल उठते रहे हैं कि आखिर यह ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था या किसी और ने? ताजमहल को प्रेम का प्रतीक माना जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है की शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की याद में इस ताजमहल को बनाया था। हालाँकि कई लोगों का यह भी मानना है कि ताजमहल को शाहजहां ने नहीं बल्कि किसी और ने बनवाया था लेकिन अंत में इसमें हेरा फेरी करके इसे इस्लामिक लुक दे दिया गया।

     

    मशहूर शोधकर्ता और इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी किताब ‘ताजमहल के रहस्य’ से पर्दा उठाया। उन्होंने इस किताब में इस बात का भी जिक्र किया है कि शाहजहां ने अपनी लूट की दौलत यहां पर छुपाए रखी है और उसके बाद इसे एक कब्र में तब्दील कर दिया।

     

    यही नहीं इस किताब को पढ़ने के बाद यह भी सवाल खड़े होते हैं कि यदि शाहजहां ने यहां पर मुमताज को दफनाया होता तो इतिहास में ताजमहल में मुमताज को किस दिन शाही ठाट-बाठ के साथ दफनाया गया, इसका उल्लेख जरूर होता लेकिन इसका उल्लेख कहीं भी नहीं मिलता है जिसके बाद तरह-तरह के सवाल सामने आते हैं।

     

    यही नहीं बल्कि यह तक कहा जाता है कि शाहजहां ने जीवित मुमताज के लिए एक भी निवास या महल नहीं बनाया तो फिर उनके मरने के बाद यहां पर भव्य महल क्यों बनाएगा? कहा जाता है कि शहंशाह के लिए मुमताज के कोई मायने नहीं थे क्योंकि जिस जगह वह रहते थे उनके आसपास हजारों सुंदर स्त्रियां रहती थी, ऐसे में सिर्फ मुमताज के लिए ताजमहल बनवाना कोई और चाल हो सकती है। इस किताब में ऐसे ही ढेर सारे सवाल लिखे गए हैं जो इंसान को सोचने पर मजबूर कर देता है।

     

    आगरा से 600 किलोमीटर दूर बुरहानपुर में मुमताज की कब्र देखने को मिलती है जो आज भी वैसी की वैसी है। ऐसा कहा जाता है कि बुरहानपुर से मुमताज का शव लाया गया और उसे ताजमहल के नीचे दफनाया गया। ताजमहल का निर्माण ईंटों, लाल पत्थरों और सफेद संगमरमर से हुआ है। इसकी जालियों पर की गई बारीकी आज भी लोगों का ध्यान खींचती है। यही वजह है कि ताजमहल दुनिया के सबसे चर्चित पर्यटन स्थल में से एक है और हर रोज इसे देखने वालों की भीड़ बनी रहती है।

     

    ताजमहल में करीब 22 कमरे हैं जो बंद है। कहा जाता है कि, मुख्य मकबरे और चमेली फर्श के नीचे 22 कमरे हैं जो मुगल काल से बंद है। रिपोर्ट कि माने तो इन कमरों को आखिरी बार 1934 के समय खोला गया था, उस दौरान भी केवल इन्हें निरीक्षण के लिए खोला गया जिसके बाद इसे बंद कर दिया गया, और आज तक इन कमरों को नहीं खोला गया। इन कमरों में क्या है इसका राज कोई नहीं जानता! इतना ही नहीं, ताजमहल के फर्श पर यमुना की और बनी दो सीढ़ियां भी है जिनके ऊपर लोहे का जाल बिछा दिया गया।

     

    कई लोगों का ऐसा मानना है कि ताजमहल के बेसमेंट में जो कमरे बने हुए हैं वह मार्बल के बने हैं। ऐसा कहा जाता है कि तहखाना में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है तो कैल्शियम कार्बोनेट में बदल सकती है और कार्बोनेट डाइऑक्साइड मार्बल्स को पाउडर का रूप देना शुरू कर देते हैं, और शायद इसी वजह से इन कमरों को बंद किया गया है ताकि ताजमहल की दीवारों को किसी प्रकार के नुकसान से बचाया जा सके। इसके अलावा भी ताजमहल को लेकर कई तरह के सवाल खड़े होते हैं जिनका जवाब अब तक कोई नहीं जान पाया है। हालाँकि इन सभी कहानियों के बीच यहां पर आज भी इसे मोहब्बत के प्रतिक के रूप में देखने वालों की भीड़ लगी रहती है।

     

    यदि आप अभी तक ताजमहल नहीं गए हैं और ताजमहल की खूबसूरती को करीब से निहारना चाहते हैं तो आपको जानकारी दे दूँ की यहां पर जाने के लिए कई रास्ते हैं। यदि आप आगरा पहुंचने का सबसे तेज रास्ता ढूंढते है तो इसमें हवाई मार्ग पहले नंबर पर है। आगरा का अपना हवाई अड्डा है जो शहर से लगभग 7 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा रेल के माध्यम से भी आप जा सकते हैं। आगरा को देश के कई हिस्सों से जोड़ने वाली ट्रेनों का अच्छा नेटवर्क है। यहां पर आगरा के मुख्य रेलवे स्टेशन के अलावा दो अन्य स्टेशन भी है जिनका नाम राजा की मंडी और आगरा का किला स्टेशन है। यदि आप बस से जाना चाहते हैं तो आगरा के लिए कई महत्वपूर्ण शहरों से नियमित बस चलती है।

    अगर आप आगरा घुमने के लिए जाने का प्लान करने वाले हैं तो आपको बता दूँ की आगरा में ताजमहल के अलावा फतेहपुर सीकरी, आगरा किला, मेहता बाग जैसे कई स्मारक है। आप यहां भी घूम सकते हैं। आगरा में आपको इतिहास, संस्कृति और सुंदरता का एक आदर्श मिश्रण देखने को मिलेगा जो आपके सफर को रोमांचक कर सकता है।

  • सालों पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं ओरछा किला | Orchha Fort

    Orchha Fort | अगर आप घूमने फिरने के शौकीन है और हर बार एक नई जगह की तलाश करते हैं तो आज हम आपको बताएंगे मध्य प्रदेश में स्थित एक ऐसे किले के बारे में जो बहुत अनोखा है। यह किला अपनी बनावट और सुंदरता की वजह से काफी चर्चा में रहता है और इस किले को देखने के लिए हमेशा ही लोगों का हुजूम उमडा रहता है। तो चलिए जानते हैं इस किले की खासियत और इस किले का इतिहास…।

     

    दरअसल, हम जिस किले के बारे में बात कर रहे हैं वो किला मध्य प्रदेश, भारत के झांसी जिले में स्थित ओरछा किला है जो एक वस्तुकला का रूप माना जाता है। इस किले में आपको मध्यकालीन भारतीय इतिहास की भव्यता और स्मृति देखने को मिलेगी। 16वीं शताब्दी में ओरछा के पहले राजा रूद्र प्रताप सिंह द्वारा बनाया गया यह किला राजपूत और मुगल स्थापत्य शैलियों का एक मिश्रण है।

     

    यह ओरछा किला मध्य प्रदेश में झांसी से 16 किलोमीटर दूर बेतवा नदी के किनारे बना हुआ है। किले का मुख्य आकर्षण यहां बना हुआ राजमहल है। इसके अलावा इस किले में आपको फूल बाग, शीश महल, राय प्रवीण महल, जहांगीर महल जैसे बड़े-बड़े आलीशान महल देखने को मिल जाएंगे। कहा जाता है कि इस किले के एक हिस्से को रामराज में बदल दिया गया।

     

    किले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों पूजा करने आते हैं। दरअसल इस परिसर में राजा महल बना जिसका निर्माण 1556 से 1591 के बीच में राजा मधुकर शाह ने करवाया यही वीर सिंह देव ने 1605 और 1627 के बीच सावन भादो महल और जहांगीर महल बनवाया। ऐसे में आपको इस किले की वास्तुकला में बुंदेलखंडी और मुगल प्रभाव का मिश्रण देखने को मिलता है। वहीं इसमें मौजूद शीश महल, बुंदेला शासको की भव्य जीवन शैली को प्रतिबिंबित करता है। यहां का शीश महल अभी हेरिटेज होटल बन चुका है जो शीशे का बना हुआ है।

     

    ओरछा में स्थित प्रभु राम को लेकर एक बात यह भी बहुत प्रचलित है कि 16वीं सदी में जिस समय भारत में विदेशी आक्रांता मंदिर और मूर्तियों को तोड़ रहे थे तब यहां अयोध्या के संतों ने जन्मभूमि में विराजमान श्री राम के विग्रह को जलसमाधि देकर श्री राम की मूर्ति को बालू में दबा दिया था। कहा जाता है कि यही प्रतिमा रानी कुमारी गणेश ओरछा लेकर आई थी। साहित्यकार कहते हैं कि 16वीं सदी में ओरछा के शासक मधुकर शाही एकमात्र ऐसे पराक्रमी हिंदु राजा थे जो अकबर के दरबार में बगावत कर चुके थे।

     

    ओरछा का ये किला ऐसा किला है जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर में भी शामिल कर लिया गया है। जी हां साल 2021 में ओरछा को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया जो इसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को मान्यता देता है।

     

    यदि आप इस किले में जाना चाहते हैं तो ओरछा का किला प्रतिदिन सुबह 9:00 से लेकर शाम बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश करने का शुल्क केवल 10 रुपए हैं जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 250 रुपए के आसपास बताया जाता है। यहां पर घूमने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से लेकर मार्च के बीच होता है। इस बीच आप इसे देखने के लिए आ सकते हैं।

     

    ओरछा किले के अलावा आप यहां पर बेतवा नदी के तट पर स्थित छतरियां भी देख सकते हैं। इन छतरियों को देखने के बाद आप इतिहास को समझ पाएंगे। इसके अलावा यहां पर ओरछा वन्य जीव अभ्यारण भी है। ऐसे में यदि आप प्रकृति और पक्षी के प्रेमी है तो यहां पर आपको जरूर जाना चाहिए। इसके अलावा आपको यहां पर एक सुंदर बाग परिसर भी देखने का मिलेगा जिसे देखने के लिए हजारों लोग आते हैं।

     

    ओरछा जाना बहुत ही आसान है। आप यहां पर ट्रेन बस और हवाई रास्ते भी जा सकते हैं। ओरछा जाने के लिए आपको सबसे पहले ग्वालियर जाना पड़ेगा। हवाई जहाज से भी आपको ग्वालियर जाना पड़ेगा। इसके बाद आप झांसी जा सकते हैं और झांसी से सीधे ओरछा जा सकते हैं। वही ट्रेन भी आपको झाँसी ही छोड़ेगी और झांसी से आप ओरछा के लिए बस या टैक्सी ले सकते हैं। इसके अलावा यदि आप बस से जा सकते हैं तो दिल्ली, राजस्थान, मुंबई, आगरा जैसे कई शहरों से झांसी के लिए बस मिलती है। झांसी बस स्टैंड पर आने के बाद आप ओरछा के लिए रिक्शा या टैक्सी ले सकते हैं। Orchha Fort | Madhya Pradesh | Incredible India | MP Tourism

  • इसी किले से मिला था कोहिनूर का हिरा, खजाने से लबरेज है गोलकोंडा किला

    एक बार फिर हम आपके लिए लेकर आए हैं इतिहास से जुड़े एक ऐसे किले की जानकारी जिसकी सच्चाई जानकर हर कोई दंग रह जाता है। यह किला अपने आप में बहुत खास है और कई सालों पुराना बताया जाता है। किले का इतिहास कुछ ऐसा है कि सुनने वाले भी दंग रह जाते हैं। इस किले से कई बेशकीमती हीरे भी निकले हैं। तो चलिए जानते हैं दोस्तों इस किले के बारे में.

     

    जिस किले के बारे में हम आपसे बात करने वाले हैं उस किले का नाम ‘गोलकोंडा किला’ है जो तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के पास स्थित है। कहा जाता है कि, यह किला 1143 का है जब इसे कुतुब शाही राजवंश द्वारा बनवाया गया था। इस किले का नाम एक तेलुगू शब्द ‘गोल्ला कोंडा’ से लिया गया है जिसका अर्थ होता है चरवाहा।

     

    कहते हैं, शुरुआत में यह किला मिट्टी का बनाया गया था लेकिन कुतुब शाही राजवंश के दौरान इसे ग्रेनाइट में बदल दिया गया। यह किला अपनी वास्तुकला के साथ-साथ पौराणिक कथाओं, इतिहास और रहस्यों के लिए जाना जाता है। इतिहासकारों का कहना है कि, एक दिन एक चरवाहे लड़के को पहाड़ी पर आकर्षण मूर्ति मिली जब उस मूर्ति की सूचना तत्कालीन शासक काकतीय राजा को दी गई तो उसे पवित्र स्थान मानकर उसके चारों ओर मिट्टी का एक किला बना दिया. लेकिन बाद में इसी किले को ग्रेनाइट से तैयार किया और इसे गोलकुंडा नाम दिया गया।

     

    400 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला अपने आप में काफी आकर्षक लगता है। यही वजह है कि लोग इसे दूर-दूर से देखने आते हैं। इस किले में आपको 8 आलीशान दरवाजे और 87 गढ़ देखने को मिलेंगे। इस किले में फतेह नाम का एक दरवाजा है जो 13 फीट चौड़ा और 25 फीट लंबा बताया जाता है। इस किले की भव्यता का अंदाज आप इसका दरबार हॉल देखकर लगा सकते हैं। जब आप इस किले में पहुंचेंगे तो देखेंगे कि यहां पर एक आलीशान हाल है जिसमें दरबार लगाया जाता था और यहां पर आम जनता की पुकारे सुनी जाती थी।

     

    वैसे इस किले तक पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं। दरअसल किले में जाने के लिए आपको हजार सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। किले का निर्माण पहाड़ी की एक चोटी पर किया गया है। इस किले की सबसे रहस्य बात यह है कि जब कोई इस किले के अंदर ताली बजाता है तो उसकी आवाज बाला हिसार गेट से घूमते हुए पूरे किले में सुनाई देती है और यह अपने आप में काफी रोमांचक भी होती है। इसे ‘तालियां मंडप’ और ‘ध्वनि अलार्म’ भी कहा जाता है।

     

    ऐसा कहते हैं की इस किले में एक रहस्यमयी सुरंग भी है जिसका रास्ता दरबार हॉल के नीचे से बनाया गया है। कहा जाता है कि आपातकालीन स्थिति में शाही परिवार को इसी सुरंग से सुरक्षित बाहर निकाला जाता था, हालांकि अभी सुरंग का कोई पता नहीं है। लेकिन उस दौरान यह शाही परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बनाई गई थी।

     

    आप यह जानकर भी हैरान हो जाएगी की दुनिया भर में जिस कोहिनूर की चर्चा होती है, वो कोहिनूर भी इसी गोलकुंडा से मिला था। जी हां… गोलकुंडा वही जगह है जहां से हमें कोहिनूर प्राप्त हुआ लेकिन आज यह कोहिनूर ब्रिटिशर्स के पास है। न केवल इस जगह से कोहिनूर मिला बल्कि दरिया-ए-नूर, नूर-उल-ऐन हीरा, होप डायमंड और रीजेंट डायमंड भी गोलकुंडा की खुदाई के दौरान ही मिले थे।

     

    इस गोलकुंडा किले के सबसे ऊपर श्री जगदंबा महामंदिर भी स्थित है। कहते हैं राजा इब्राहिम कुली कुतुब शाह अपनी प्रजा के बीच इतने लोकप्रिय थे कि उन्होंने हिंदुओं के लिए एक मंदिर भी बनाया था। दोस्तों, इस किले के अंदर एक बहुत पुराना अफ्रीकी बाओबाब पेड़ भी है। कहते हैं यह पेड़ करीब 400 साल पुराना है। ऐसा कहा जाता है दोस्तों, इस पेड़ को कुछ अरब ट्रेडर्स ने सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाह को तोहफा में दिया था। इसके बाद उन्होंने इस पेड़ को अपने किले के अंदर लगाया जिसे आज ‘हथिया का झाड़’ के नाम से जाना जाता है।

     

    गोलकुंडा किला सुबह 9:00 बजे से शाम के 5:30 तक खुला रहता है। यहां पर साउंड एंड लाइट शो भी होता है जिसे देखने के लिए आपको 130 रुपए शुल्क देना पड़ता है। दोस्तों यदि आप भी गोलकुंडा किला देखना चाहते हैं तो आप यहां पर बस, ट्रेन और हवाई यात्रा के माध्यम से जा सकते हैं। गोलकोंडा किला हैदराबाद के मुख्य बस स्टैंड से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। जी हाँ… जब आप हैदराबाद बस स्टेशनपहुँच जाते हैं, तो आप स्थानीय टैक्सी ले सकते हैं या ऑनलाइन कैब बुक करके गोलकोंडा किले तक पहुंच सकते हैं, यहां से आपको केवल 35 से 40 मिनट का समय लगेगा।

     

    आप हैदराबाद में गोलकोंडा किले के अलावा चारमीनार, मौला अली हिल, हुसैन सागर झील, नेहरू जूलॉजीकल पार्क, मक्का मस्जिद, कुटुम शाही मकबरे और पब्लिक गार्डन जैसी जगह भी देख सकते हैं। Golkonda Fort | Hyderabad | Telangana Tourism | Incredible India

  • रानीलक्ष्मी बाई की मौत का कारण बना था ये किला, दिलचस्प है इसकी कहानी

    Gwalior Fort | देश के सबसे खूबसूरत किलों में एक ग्वालियर का किला भी माना जाता है। आज भी यह किला पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। शहर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्वालियर किले का निर्माण आठवीं शताब्दी के दौरान किया गया था। कहते हैं इस किले का निर्माण दो भागों में हुआ है। दोस्तों इस किले में आपको कई ऐतिहासिक स्मारक भी देखने को मिलेंगे। इसमें बुद्ध जैन मंदिर और आलीशान महल के साथ-साथ सास बहू का भी मंदिर देखने को मिलेगा। तो चलिए जानते हैं ग्वालियर के किले से जुड़े कुछ रोचक तथ्य.

     

    ग्वालियर का किला एक ऐसा किला है जो कई बार एक राजवंश के कब्जे से दूसरे राजवंश तक गया है। कहते हैं इस किले पर कई राजपूत राजाओं ने राज किया है। किले की स्थापना के बाद करीब 989 सालों तक इस पर पाल वंश ने राज किया। इसके बाद इस पर प्रतिहार वंश ने राज किया। यही नहीं 1023 ईस्वी में मोहम्मद गजनी ने इस किले पर आक्रमण किया हालांकि उसे इस दौरान हर का सामना करना पड़ा।

     

    इस किले पर राज करने वाले आखिरी वंश महादजी सिंधिया को बताया जाता है। कहते हैं कि 1804 और 1844 के बीच इस किले पर अंग्रेजों और सिंधिया के बीच नियंत्रण बदलता रहा। हालांकि साल 1844 में महाराजपुर की लड़ाई के बाद ये किला आखिर में सिंधिया परिवार के हिस्से में आया।

     

    1 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने मराठा विद्रोह के साथ मिलकर इस किले पर कब्जा किया था लेकिन जब वह जीत के जश्न में शामिल हुई तो 16 जून को जनरलहूज के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना ने उन पर हमला कर दिया। इस दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने खूब लड़ाई लड़ी और दुश्मनों को किले से बाहर कर दिया। हालांकि इसी बीच उन पर दुबारा हमला कर दिया गया और इसी दौरान 17 जून को वो वीरगति को प्राप्त हो गई. इतिहास के पन्नों को उठाकर देखा जाए तो इसमें ग्वालियर की लड़ाई के लिए लक्ष्मी बाई का नाम स्वर्ण अक्षरों वर्णित है। हालाँकि लक्ष्मीबाई की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने अगले तीन दिन में ही इस किले पर कब्जा कर लिया था।

     

    जब आप इस किले में प्रवेश करेंगे तो आपको कई ऐतिहासिक स्मारक दिखाई देंगे। जैसे बुद्ध और जैन मंदिर, गुजारी महल और मानसिंह महल, जहांगीर महल, करण महल और शाहजहां महल मौजूद है। कहते हैं गुजारी महल को पुरातात्विक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है।

     

    इस महल को राजा मानसिंह ने अपनी रानी मृगनयनी के लिए करवाया था। इस संग्रहालय में दुर्लभ मूर्तियां रखी हुई है जो पहले के इतिहास की गवाही देती है। कहते हैं इस किले की संरचना रक्षात्मक है। यानिकि किला इतना मजबूत है कि अगर कोई किले पर अटैक करने की कोशिश करता है, तो किला गिरेगा नहीं।

     

    इस किले के अंदर प्रवेश करने के लिए दो आलीशान दरवाजे बने हुए हैं। पहले रास्ते से आप केवल पैदल जा सकते हैं जबकि दूसरे पर आप गाड़ी से भी जा सकते हैं। ये किला 350 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। किले का मुख्य प्रवेश द्वार हाथी पुल के नाम से जाना जाता है जो सीधा मान मंदिर महल की ओर ले जाता है।

     

    इस किले के निर्माण को लेकर ये कहानी भी काफी प्रचलित है कि, राजा सूर्यसेन कुष्ठ रोग से पीडि़त थे। इस दौरान ग्वालिपा नाम के एक ऋषि ने उन्हें एक पवित्र तालाब से पानी लाकर दिया था। जैसे ही राजा ने ये पानी पिया तो वह पूरी तरह से ठीक हो गए। इसलिए सूरजसेन ने उनके नाम पर किला बनवाने का फैसला किया।

     

    इस किले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें आपको सास बहू का मंदिर भी देखने को मिलेगा। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर किले में सास बहू के मंदिर का क्या काम? तो दोस्तों अभी ही नहीं बल्कि पुराने समय में भी सास बहू के बीच नोंकझोंक हुआ करती थी।

     

    दरअसल, 19वीं शताब्दी में शाही सास और बहू के बीच विवाद हुआ कि किस देवता की पूजा करनी चाहिए? अब इन दोनों सास बहू को संतुष्ट करने के लिए यहां पर एक अनोखा मंदिर का निर्माण किया गया जिसमें भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा की जाती है। इसके बाद यह भगवान नहीं बल्कि सास बहू मंदिर के नाम से जाना गया। Gwalior Fort | Rani Laskhmi Bai | Scindia

  • क्यों अधूरा है भोजपुर का शिवलिंग मंदिर? पांडवों से है इसका संबंध | Bhojpur Shivling Mandir

    Bhojpur Shivling Mandir | मनुष्य का मन हमेशा ही रहस्य और पहेलियां को जानने के लिए उत्सुक रहा है। आपने जरूर देखा होगा दोस्तों की कोई भी कहानी सुनने या सुनाने के दौरान काफी आकर्षक लगती है और यही उस कहानी का असली रूप होता है जिसे अंत तक लोग सुनते रहते हैं। ठीक इसी तरह दुनिया भर में कई रहस्यमयी जगह, मंदिर, इमारत और महल है जिनका रहस्य कोई नहीं जान पाया लेकिन इनका रहस्य जानने के लिए हर कोई उत्सुक रहता है। हमने आपको अब तक कई ऐसी जगह बताई जो अपने आप में बेहद खास रही। इसी बीच हम लेकर आए हैं आपके लिए एक और ऐसे मंदिर की जानकारी जो बहुत ही प्रचलित है। तो चलिए जानते हैं इस मंदिर की कहानी.

     

    हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के भोजपुर के बारे में। भोजपुर की पहाड़ी पर एक अद्भुत और विशाल शिव मंदिर है। यह मंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध है लेकिन यह एक अधूरा शिव मंदिर है। अब आप यह सोच रहे होंगे कि आखिर मंदिर अधूरा कैसे हो सकता है? भोजपुर मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोजपुर द्वारा किया गया था। यही वजह है कि इस मंदिर का नाम भोजपुर मंदिर पड़ा, यह मंदिर पहाड़ी के बीचों बीच बना हुआ है और इसके पास से बेतवा नदी गुजरती है।

     

    इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह अधूरा है और इसका पूरा निर्माण नहीं हुआ है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण सिर्फ एक रात में ही करना था लेकिन निर्माण से पहले ही सूर्योदय हो गया और इसके बाद इसका काम वैसा का वैसा ही रोक दिया गया। कहा जाता है कि उसी दिन से यह मंदिर अधूरा है और इस अधूरे मंदिर की ही पूजा की जाती है।

     

    इस मंदिर में पूजा अर्चना भी विशेष तरीके से की जाती है। दरअसल, इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग इतना बड़ा है कि आप यहां खड़े होकर भी अभिषेक कर सकते हैं। कहते हैं यहां अभिषेक हमेशा जलहरी पर चढ़कर ही किया जाता है। कुछ समय पहले श्रद्धालु भी जलहरी तक पूजा कर सकते थे, लेकिन अब यहां केवल पुजारियों को ही जाने की अनुमति है।

     

    ये भी मान्यता है कि पांडवों ने माता कुंती के साथ इस मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा अर्चना की थी, लेकिन जैसे ही सुबह हुई तो पांडव लुप्त हो गए और यह मंदिर भी अधूरा रह गया। हालांकि दोस्तों इन कहानियों में कितनी सच्चाई है यह तो कोई नहीं, लेकिन हां आज भी इस मंदिर की बहुत मान्यता है और हर दिन यहां पर दर्शन करने वालों भक्तों की भीड़ लगी होती है।

     

    जब भी आप इस मंदिर में जाएंगे तो आप देखेंगे कि यहां पर अधूरे पिलर दिखाई देंगे। यहां की मूर्तियां भी अधूरी ही है। और ये सब इस बात की गवाही जरूर देते हैं कि इस मंदिर का काम बीच में ही रोक दिया गया। मंदिर में शिवलिंग का आकार बहुत बड़ा है जिसे देखने के बाद आपके मन में यह सवाल जरूर उठेगा कि आखिर इतने बड़े पत्थर को यहां पर कैसे लाया गया?

     

    तो बता दे की मंदिर के पीछे एक ढलान है जिसका उपयोग यहां पर विशाल पत्थरों को लाने के लिए किया गया था। कहा जाता है कि ढलान की सहायता से ही लगभग 7 हजार किलो के पत्थरों को निर्माण के लिए पहाड़ी की चोटी तक पहुंचाया गया।

     

    यह मंदिर 106 फुट लंबा और 77 फुट चौड़ा है। मंदिर 77 फुट ऊँचे एक चबूतरे पर बनाया गया है। मंदिर के गर्भगृह की अपूर्ण छत 40 फुट ऊंची बताई जाती है जो सिर्फ चार स्तंभों पर टिकी हुई है। वही गर्भ ग्रह का विशाल द्वारा दो तरफ से गंगा और यमुना की प्रतिमाओं से सजा है। वही इसके चार स्तंभ पर शिव पार्वती, सीताराम, लक्ष्मी नारायण और ब्रह्मा सावित्री की प्रतिमाओं का निर्माण किया गया है।

     

    गर्भ ग्रह में स्थिति यह शिवलिंग करीब 22 फुट ऊंचा है जो दुनिया के विशाल शिवलिंग में से एक माना जाता है। शिवलिंग का व्यास 7.5 फुट है और यह शिवलिंग एक ही पत्थर से बनाया है। इस शिवलिंग को बनाने में चिकनी बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है जो अपने आप में बहुत खास है।

  • क्या है जगन्नाथ मंदिर का रहस्य? धड़कता हैं श्रीकृष्ण का दिल, आपदा से पहले मिलते हैं संकेत | Jay Jagannath

    क्या है जगन्नाथ मंदिर का रहस्य? धड़कता हैं श्रीकृष्ण का दिल, आपदा से पहले मिलते हैं संकेत | Jay Jagannath

    Jagannath Temple | जब भी चार धाम यात्रा की बात होती है तो इसमें जगन्नाथ मंदिर का जिक्र जरूर होता है। यह अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है और कई सारी मान्यताओं के साथ-साथ कई सारे रहस्यों के लिए भी जाना जाता है। जी हां.. इस मंदिर में आज तक ऐसे कई चमत्कार हो चुके हैं जिनका जवाब आज तक साइंस को भी नहीं मिला। आज की इस वीडियो में हम जानेंगे जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी विशेषताओं और इस मंदिर के खास रहस्य के बारे में। यह दुनिया का एक ऐसा मंदिर है जहां पर लोगों को आपदा आने से पहले ही संकेत मिल जाते हैं। तो चलिए डिटेल में जानते हैं जगन्नाथ पुरी धाम के बारे में…

     

    जगन्नाथ मंदिर, पुरी, भारत के ओडिशा राज्य में स्थित है जो भगवान जगन्नाथ यानी कि श्री कृष्ण को समर्पित है। यह एक ऐसा मंदिर है जिसे वैष्णव संप्रदाय के चार धामों में से एक माना जाता है। कहते हैं यहां पर मंदिर में स्थित श्री कृष्ण का दिल धड़कता है। यही नहीं इस मंदिर में दर्शन मात्र से लोगों की मनोकामना पूरी हो जाती है। यही वजह है कि हर साल यहां पर लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं। ओडिशा के पौराणिक मंदिरों में जगन्नाथ मंदिर को अपने आप में काफी अलौकिक बताया जाता है। ये मंदिर 800 साल से भी ज्यादा पुराना है।

     

    इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि यहां पर मंदिर का झंडा हमेशा विपरीत दिशा में लहराता है। दरअसल, आमतौर पर दिन के समय हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती है और शाम को धरती से समुद्र की तरफ लेकिन यहां पर एक अनोखा ही चमत्कार देखने को मिलता है। इस मंदिर का झंडा हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराता है जो अपने आप में काफी रहस्यमय है। यही नहीं, कई बार इस झंडे की दिशा भी बदल कर देख ली गई लेकिन हमेशा ही यह झंडा उसकी विपरीत दिशा में लहराता है और इसका कारण आज तक नहीं चल पाया, जिसकी वजह से इसे एक चमत्कार भी कहा जाता है।

     

    जगन्नाथ मंदिर को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई भी कहा जाता है। रसोई का रहस्य यह है कि यहां भगवान का प्रसाद पकाने के लिए मिटटी के बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान सबसे पहले पकता है फिर नीचे की तरफ एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। यहां पर चाहे कितने भी भक्त आ जाए लेकिन प्रसाद में कभी कोई कमी नहीं पड़ती और ना ही यहां का प्रसाद कभी व्यर्थ जाता है। जैसे ही मंदिर के बंद होने का समय आता है प्रसाद भी खत्म हो जाता है।

     

    इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यह भी है कि यहां मंदिर के शिखर की छाया हमेशा अदृश्य रहती है। किसी भी वस्तु या इंसान, पशु पक्षियों की परछाई बनना हमेशा से ही एक विज्ञान का नियम माना गया है लेकिन जगन्नाथ मंदिर में इसका उल्टा है। करीब चार लाख वर्ग फीट एरिया में फैला जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई 214 फिट है लेकिन मंदिर का ऊपरी हिस्सा विज्ञान के इस नियम को भी चुनौती देता है। दरअसल मंदिर के शिखर की छाया हमेशा अदृश्य रहती है।

     

    यही नहीं यह एक ऐसा मंदिर है जिस पर कभी भी पक्षी नहीं बैठते। जी हां.. आपने आमतौर पर देखा होगा कि मंदिर मस्जिद या फिर बड़ी इमारत पर हमेशा पक्षी बैठे हुए दिखते हैं लेकिन पूरी के इस मंदिर के ऊपर से ना कभी कोई प्लान उड़ता है और ना ही कोई पक्षी मंदिर के शिखर पर बैठता है।

     

    जगन्नाथ पुरी मंदिर की सीढ़ियों का भी एक अनोखा महत्व बताया जाता है। कहते हैं कि इसकी सीढ़ियों का संबंध सीधे यमराज से हैं। दरअसल, इस मंदिर की तीसरी सीढ़ी अपने आप में काफी रहस्यमय बताई जाती है। जगन्नाथ मंदिर में पूरी 22 सीढ़ियां है जिसमें से प्रवेश करते समय तीसरी सीढ़ी को यमराज की सीढ़ी कहा जाता है। लोग मंदिर में प्रवेश करते समय इस पर पैर रख सकते हैं लेकिन उतरते समय इस पर पैर नहीं रखते हैं। इतना ही नहीं बल्कि इस सीढ़ी पर लोगों का ध्यान जाए जिसकी वजह से इसका रंग भी काला कर दिया गया है।

     

    कहते हैं जगन्नाथ पुरी मंदिर में समय-समय पर बड़ी आपदा का संकेत भी मिलता है। दरअसल, 2020 में मंदिर पर बिजली गिरी थी जिसके बाद देशभर में कोरोना जैसी महामारी देखने को मिली थी। कहा जाता है कि जब इस मंदिर में कोई बड़ी घटना घटती है तो लोगों को भी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है। अब हाल ही में जगन्नाथ पुरी मंदिर में एक चील को ध्वज के साथ उड़ने की घटना ने हर किसी को हैरान कर दिया।

     

    दरअसल, यहां पर एक चील शिखर पर मौजूद ध्वज को उड़ा ले गई, जिसका विडियो सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है, जिसके बाद लोग तरह तरह की टिपण्णीयां कर रहे हैं, कई लोग यह मान रहे हैं कि यह किसी बड़ी घटना का संकेत है। हालाँकि कई लोग इसे मात्र एक संयोग भी मान रहे हैं।

     

    यदि आप जगन्नाथ पुरी मंदिर जाना चाहते हैं तो भुवनेश्वर स्थित बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है। यदि आप सड़क के रास्ते से जाना चाहते हैं तो देश के अलग-अलग शहरों से भुवनेश्वर तक बस चलती है। वही भुवनेश्वर से पूरी तक पहुंचने में सिर्फ एक घंटा लगता है। इसके बाद मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। आप चाहे तो रेल मार्ग के जरिए भी पूरी जाने का प्लान बना सकते हैं। दिल्ली, आगरा, कोलकाता समेत कई शहरों से आपको भुवनेश्वर के लिए ट्रेन मिल जाएगी और आप यहां से बस या ऑटो रिक्शा से पूरी जा सकते हैं। Jay Jagannath | Jagannath Temple | Jagannath Mandir | Odisha Tourism | Sanatan Dharma | Incredible India