Category: साहित्य

  • मंगलमय यह देश कहां मिलने वाला

    मंगलमय यह देश कहां मिलने वाला

    शुचि , दान ,धर्म-सत्कर्म सार का , श्रेय लिए जीवन स्तम्भ ;
    क्षमा, दया, धृति ,त्याग ज्ञेय , निष्कंटक ! नहीं कुटिल दंभ !

     

    विद्वता , बल-विक्रम का सिन्धु अपार, सर्वत्र सार ज्ञेय है –
    दीपित विधेय जग-जीवन प्रवाह में , रहा अजेय-दुर्जेय है।

     

    पुण्य रश्मियां , शुभ्र संस्कृति, वैदिक स्वर सींचित विहान ;
    धवल-धार, मूर्तिमनोरम , हे जन्मभूमि, श्रद्धावनत् प्रणाम !

     

    सुधन्य प्रवीर , हे धर्मप्राण ! हे तपोभूमि के पुण्यधाम ;
    सप्तसिन्धु सभ्यता के, उदात्त दर्शन , तूझे प्रणाम !

     

    आज पग-पग पर खण्डित धर्म-धार , सर्वत्र दाह के दु:सह स्वर ;
    बड़ी विकट है कालखण्ड , खण्डित भूमण्डल प्रहर-प्रहर !

     

    नदी नाले सिसक रहे , पर्वत-मिट्टी-रेत- पठार ;
    सिसक रहे हैं आत्मभाव , न्याय, अहिंस्र, सत्य धार !

     

    भू से खण्डित शैल-शिखर से , सरिता से सागर से ;
    घीरे जड़ताओं से , आक्रांताओं से , आच्छादित आहत स्वर से!

     

    खण्डित सत्कर्म सधर्म प्रखर , शील स्नेह अंतरण से ;
    संस्कृति टूट रही द्वीपांतर से , खण्डित नभश्चरण से !

     

    हे धन्य वीर ! यह प्रबल प्रताप, अग्निस्फुलिंग जिला दे ;
    मंगलमय यह पुण्य प्रकल्प, भारत को भव्य बना दे ।

     

    अग्नि की लपटें कराल हों , दुर्धर्ष नृत्य रचा दे ;
    आक्रांताओं को कर स्तम्भित , धवल-धार रचा दे ।

     

    भू के मानचित्र पर अंकित , सब तिमिर रोष हटाकर ;
    विस्तृत विशाल नेत्रों को – भू-नभ तक फैलाकर ।

     

    शत्रु दल में हा-हाकार मचे , पुरा घोष शांति का उठे स्वर ;
    धर्म दीप हों सुदीप्त प्रखर , सुदीप्त सनातन भारत भास्वर!

     

    मंगलमय यह देश धीर ! पुनः कहां मिलने वाला ;
    शुभ्र संस्कृतियों पर क्रूर आक्षेप को , कौन यहां सहनेवाला ?

     

    यही सोचकर वीर बलिदानी ! बार-बार मरना होगा ;
    स्वाभिमानी स्तम्भों पर , आघात् नहीं सहना होगा ।

  • काशी ! तू अविरल अविनाशी है

    काशी ! तू अविरल अविनाशी है

    काशी! तू अविरल अविनाशी है!

    शिव शंकर प्रलयंकर के अविमुक्त युक्त विन्यासी है …

    तेरी शुचिता के साथ हुआ नर का व्यवहार विनाशी है ;

    काशी , तू अविरल अविनाशी है !

     

    सूर्योदय की प्रथम प्रभा, पूर्वाभिमुख सौंदर्यप्राण ;

    गंगा की पुष्पोज्जवल धारा, जन की हरती, कलुषित त्राण !

     

    सप्तपुरी में तीर्थ पावनी, अतिप्राचीन भव्य सुहावनी !

    जहां सभ्यता पायी जय , तप-त्याग-पुण्य शीर्ष संचय !

     

    घाटों की शुचिता सार यहां , समरांगण हुंकार यहां ।

    सान्ध्य वंदन त्रिकाल प्रहर , सर्वत्र प्रवाहित वैदिक स्वर

    विज्ञान यहां करता वंदन ; लिए , सिर मुकुट माथे चंदन ।

     

    प्राच्य संस्कृति विख्यात रही , स्वधर्म कर्म निष्ण्णात् रही ।

    सिद्ध गंधर्वों से सेवित , त्रिपथगा से प्रेरित !

     

    भव्य प्रट्टालिकायें विशेष , देती उच्चता का संदेश ।

    योग-दर्शन शाश्वत अलौकिक, लिए , ज्ञानी-विज्ञानी-बटुक-संन्यासी है ,

    काशी, तू अविरल अविनाशी है।

     

    ऋग्-यजु-साम-अथर्व गान यहां, अद्भुत पावन अधिष्ठान यहां ।

    कण-कण में शिव विद्यमान , विश्वेश्वर की नगरी महान ।

     

    पंचगंगा की अविरल धारा , दशाश्वमेध की धवल किनारा ।

    वही विलक्षण असि घाट , खोज रहा तुलसी के बाट।

     

    सिद्ध तपरत दिग्-दिगंत , जीवन्त प्राण , प्राची के मंत्र ।

    जीवन यात्रा भष्मीभूत , मणिकर्णिका के भभूत ।

     

    अनन्त पुण्यस्मृतियां समाहित, शिव घट-घट वासी है…

    क्रूर काल सदा से महाश्मशान में , विभीत कम्पित संत्रासी है ;

    काशी ! तू अविरल अविनाशी है।

     

    सप्तार्णव के सार यहां , सप्तसिन्धु के धार यहां ।

    भव्य वास्तुकला विज्ञान यहां , विविध शैली संधान यहां ।

     

    कला के प्राच्य स्वरुप यहां , भारत के विविध प्रारुप यहां ।

    ज्ञान विज्ञान के दिव्य-धार , चमत्कृत सारा संसार !

     

    उत्तरवाहिनी गंगा धारा , समेटी है भारत सारा ।

    आस्था के पाले में झूली , भष्मीभूत संपुरित धूली ।

     

    अन्नपूर्णा प्राणाधार यहां , विश्व पालक आधार यहां ।

    आचार्य शंकर के संदेश, अखण्ड निरत भारत स्वदेश !

     

    गंग-उर्मियों की, अकम्पित, धवल तरंगें , शाश्वत मुक्ति के वासी है ;

    काशी ! तू अविरल अविनाशी है, काशी ! तू अविरल अविनाशी है।

     

    विक्रमण से दग्ध हुई , वरुणा- असि की धार यहां;

    रुग्ण हुई सरिता धारा, चीर संस्कृतियों के सार यहां,

     

    सभ्यता कराह उठी है, आर्त्त भाव भर विकल बांह ;

    रुद्रवास अविमुक्त धरा पर ,यह विषाक्त भवितव्य ! आह ।

     

    मन्दिर विग्रह सब टूट रहे , सहस्त्रभाग्य सनातन फूट रहे ।

    अतिक्रमित हैं वैदिक स्वर – अनन्त काल से ध्वनित प्रखर ।

     

    इनसे ही स्वार्थ- परमार्थ है – भारत ही इनसे भारत है ।

    अब कम्पित है कण्ठ-गीत , जीवन के शाश्वत संगीत ।

     

    घाटों पर गुलछर्रे दिन-रात , संस्कृतियों पर प्रतिपल संघात्।

    पाणिनी के अष्टाध्यायी सूत्र , सब बिखेर रहे हैं – मल-मूत्र !

     

    वेद मंत्रों के भान कहां , कर्कश ध्वनित अजान यहां !

    कलुषित कलंक कहां सुहाती – यह देख सदा फटती छाती !

     

    तर्पण , अर्पण , शुचि मंत्र समर्पण , लघुता-कटुता की साक्षी है …

    तेरी शुचिता के साथ हुआ, नर का व्यवहार विनाशी है ;

    काशी ! तू अविरल अविनाशी है ।

     

    ✍? पण्डित आलोक पाण्डेय ‘विश्वबन्धु’
    वाराणसी , भारतभूमि ।
    भाद्रपद शुक्ल वामन द्वादशी , वि. सं. २०७७

  • स्वतंत्रता के स्वर्ण विहान हिन्दुस्थान हो!

    स्वतंत्रता के स्वर्ण विहान हिन्दुस्थान हो!

    स्वतंत्रता के स्वर्ण विहान हिन्दुस्थान हो!

     

    गीत, अगीत, अनुगीत के विधान तुम

    कविता की शब्द-चारूत्ता के शोभा-धाम हो!

    भूधर-विपिन-लतादिक, भूति-भावित

    स्मरण बारंबार, दिव्य-शक्ति कीर्तिमान हो!

     

    उपमा के, उपमान के प्रकटित नव्य विधान

    राष्ट्रदूत वीर-व्रती धीर तू महान हो!

    शत्रुहंता, निजधरती की अस्मिता के रक्षक

    स्वतंत्रता के स्वर्ण विहान हिन्दुस्थान हो!

     

    मातृभूमि के प्रहरी जागे तू स्वदेश हित

    करने स्वतंत्र उन्हें जो बन्धनों में बन्ध थे!

    उखाड़ने, करने विद्रुप दासता के बेड़ियों को

    नहीं कहीं उचित कुछ और अनुबन्ध थे!

     

    आये बन नायक उदात्त कवि-कल्पना के

    या किसी अन्य सुन्दर काव्य-धारा के प्रबन्ध थे!

    करने को क्रान्ति, आतंक और जिहाद मिटाने

    वीर-धीर तुम ही तो केवल स्वर्ण-मलय सी सुगन्ध थे !

     

    भारतभू के प्रहरी जागे तू स्वदेश हित

    धीर वीर तुम, तुम आस अभिमान हो

    सत्य संधान, विज्ञान अनुसंधान तुम

    करोड़ों देशवासियों के ह्रदय के ध्यान हो!

     

    शत्रुहंता, वीरव्रती, सभ्यता के रक्षक

    जड़ता विनाशक, घनघोर तूफान हो

    विश्ववन्द्य! उन्नतशील सदृश वीरों में

    शत बार नमन, धीर – वीर तू महान हो!

     

    स्वतंत्रता के स्वर्ण विहान हिन्दुस्थान हो!

     

    उम्मीद है बलिदानी वीरों को समर्पित कवि आलोक पाण्डेय जी की भावपूर्ण प्रस्तुति आपको जरुर पसंद आया होगा! आलोक जी की आवाज में आप इस कविता विडियो भी आप सुन सकते हैं! पढ़ें और अपने मित्रों को भी पढाएं (शेयर करें) तथा अपने विचार, प्रतिक्रिया, शिकायत या सुझाव से नीचे दिए कमेंट बॉक्स के जरिए हमें अवश्य अवगत कराएं! आप गंगा न्यूज़ के साथ  ट्विटर  और  फेसबुक  पर भी जुड़ सकते हैं!

  • मूल्यपरक देशभक्ति कविता, दुर्दमनीय तलवारें लिखें!

    मूल्यपरक देशभक्ति कविता, दुर्दमनीय तलवारें लिखें!

    दुर्दमनीय तलवारें लिखें!

    विश्व धरातल पर हुए अक्षम्य

    इतिहासों के लिकों को लिखें

    मानवता के गहनों के

    विध्वंसक चीखों को लिखें!

     

    प्रतिमानों के स्तम्भों पर हुए

    भयावह पशुता को लिखें

    पुण्यभूमि पर विविध विग्रहों के

    लूटी गयी शुचिता लिखें!

     

    सभ्यता संस्कृतियों पर हुए

    बर्बर असंख्य आघातों से सीखें

    स्वतंत्रता के स्वर्ण विहानों पर

    क्रूर संघातों से सीखें!

     

    दया-दान-सत्कर्म-धर्म

    के प्रबल प्रतापों को लिखें

    वीरों के वक्षस्थल पर विराट

    ज्वाल- तापों को लिखें!

     

    वीरों के चिंतन विराट

    पुण्य सुदीर्घ प्रतापों को लिखें

    रण में -वन में- समरांगण में

    घोर शत्रु विलापों को लिखें!

     

    अभी समर भयंकर है भारी

    भैरवी-रणचण्डी, हुंकारें लिखें

    अखण्ड भारत विस्तारों में

    शत्रुञ्जय दुर्दमनीय तलवारें लिखें !

    दुर्दमनीय तलवारें लिखें!

     

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  • भाई भाई को लूटे, सर्वत्र विघटन के पांव, बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

    भाई भाई को लूटे, सर्वत्र विघटन के पांव, बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    खोद रहे नित रेत माफिया नदिया की सब रेती

    चर डाले हरियाली सारी धरती की सब खेती

    आम-पीपल-नीम-बरगद काट ले गए, लग रहे बबूल पर दांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    समरसता अब खो चुकी धर्म खतरे में घट रहा

    स्वदेशी घुट रही घर में समाज देश भी बंट रहा

    भाई भाई को लूटे, सर्वत्र विघटन के पांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    होली और दशहरा में लोग हिल-मिल सब डोले

    सारे झगड़े वैर भुला, प्रिय मधुर सरसमय बोले

    दुर्लभ वह चौपाल हो गई और वह दुर्लभतम् भाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    रामायण की कथा खो गई, खो गई बूढ़ी मां की अमर कहानी

    खो गये वीर शिवा पेशवा महाराणा, वीरांगना झांसी की रानी

    दुर्लभ वह संस्कार हो गए, मिट रहे नित सभ्यता के नांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    बिलख रही धरती सारी सिसक रही जननी प्यारी

    सिमट रही दुख की भारी, तडप रही पग पग हारी

    खग-विहग, जलचर दुखिया आहत सब प्राणी, कहां एक भाव से ठांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    सुख रहे नदी सरोवर लूट रहे वन उपवन

    लूट रहा पर्वत धरा-व्योम, लूट रहा हर क्षण यौवन

    स्वार्थ में परमारथ लूटे मिल रहे नित नए घाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    हा-हा कार मचा निशिदिन क्रूरता का प्रतिरूप खड़ा

    दगाबाज चहुं ओर लुटेरे हिंसा-पशुता का रूप अड़ा

    नित द्रौपदी पर लगते कौरव पांडव के दांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    वन उपवन अब कहां हंसते वृक्ष लता गुल्म नहीं खिलते

    सहस्त्रों गाय कटने पर भी वह शौर्य हुंकार नहीं दिखते

    कंपित कत्ल की धार खड़ी अवध्या, हाय! लेकर दैन्य भाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    आकाश चांदनी विलसे, मलयाचल चोटी शिर से

    कर रही विलाप वसुधा आक्रांत, करुण पुकार आहत स्वर से

    जलते छप्पर-छाजन आज, नहीं शांति सुस्थिरता की छांव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

    वर्षों से शीतल सुरभित समीर व्यथित

    मुरझा रहे सुमन खिले बहु रीत

    हर सांझ सबेरे अनाचार, डूब रही सत्य की नाव

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव!

     

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  • प्यासे कौवे की छोटी सी प्रेरक कहानी

    प्यासे कौवे की छोटी सी प्रेरक कहानी

    तपती गर्मी का दिन था। आसमान में उड़ते एक कौवा को तेज गर्मी की वजह अचानक बहुत तेज प्यास लगी, वो पानी की तलाश में इधर उधर भटकने लगा, लेकिन उसके कहीं भी पानी नही मिला। गर्मी अत्यधिक होने के कारण प्यास से उसकी हालत ख़राब होने लगी, वह बेहाल सा होने लगा। उसे ऐसा लगने लगा कि अगर उसे पानी न मिला, तो वो मर ही जायेगा।

     

    तभी वो पानी की तलाश में उड़ते उड़ते एक गाव में पहुंचा; उसने घरों, मुंडेरों और खेतों के आस पास पानी की तलाश करने लगा; लेकिन उसे कहीं पानी नहीं मिला। बहुत समय तक पानी की तलाश करते करते उसे अचानक एक पेड़ के पास पानी का एक घड़ा रखा हुआ दिखाई दिया। पानी के घड़े को देख कर कौवा बहुत खुश हो गया।

     

    प्यास से बेहाल कौवा तुरंत पानी पिने के लिए घड़े के पास गया, लेकिन जब उसने घड़े में देखा तो उसमें पानी बहुत कम था। फिर भी प्यास से बेहाल कौवा पानी पिने के लिए घड़े में अपना चोंच लगाने लगा, लेकिन घड़े में पानी का स्तर बहुत कम इसलिए कौवे का चोंच निचे पानी तक नहीं पहुँच पा रहा था। कौवा बार बार पानी तक अपनी चोंच पहुँचाने की चेष्टा करता रहा, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।

     

    ये देखकर कौवा बहुत परेशान हो गया। एक तो की तपती गर्मी की प्यास से हाल बेहाल, ऊपर से पानी तक न पहुँच पाने से और निराश। वो इधर उधर देखने लगा कि शायद उसे कहीं और पानी मिल जाए, जिससे वो अपनी व्यास बुझा सके। लेकिन उसे कहीं और पानी नही मिला। अंत में थककर वो फिर से उस घड़े के पास आया और फिर से पानी पीने का प्रयास करने लगा। कभी वो अपनी चोंच को घड़े में पानी तक पहुँचाने का प्रयास करता तो कभी घड़े को धक्का देकर पानी को बाहर गिराने का प्रयास करता, लेकिन वो सफल नहीं हुआ।

     

    वो बहुत परेशान गया, आस पास कहीं और पानी भी नही दिख रहा था, और जिस घड़े में पानी था उसमें पानी इतना कम था की वो बार बार प्रयास करने पर भी पी नहीं पा रहा था। बहुत देर तक पानी पीने की कोशिश करने से वह बहुत थक भी गया था। वो पानी की तलाश में कहीं और जाने की सोच रहा था, लेकिन प्यास से बेहाल होने और लगातार प्रयास से थके होने की वजह से उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी अचानक उसकी नजर पास पड़े छोटे छोटे कंकडो पर पड़ी, और उसके दिमाग में एक उपाय सूझा।

     

    कौवे ने हिम्मत जुटाकर पास पड़े कंकड़ों के पास गया और वहां से एक एक कंकड़ चोंच से उठाकर घड़े में डालना शुरू कर दिया। कुछ देर तक कौवा लगातार कंकड़ को घड़े में डालता रहा। थोड़ी देर की कड़ी मेहनत से पानी का स्तर ऊपर आने लगा, और अंत में कुछ समय बाद पानी ऊपर आ गया। इसके बाद कौवे ने जी भर कर पानी पिया और अपनी प्यास बुझाई, जिससे कौवे में नई उर्जा का संचार हुआ तथा उसे प्यास की व्याकुलता से बहुत आराम मिला। और थोड़ी देर वहीँ पर आराम करने के बाद वो अपने मंजिल की तारफ ख़ुशी ख़ुशी उड़ गया।

     

    इस कहानी से क्या सीखे? ( Moral of the story?) –

    प्यासे कौवे की कहानी सुनने के बाद आपको क्या सीखे? – हमें कभी भी अपनी परेशानियों से से हार नही मानना चाहिए। हमें बुरे से बुरे परिस्थितियों में भी अपने परेशानियों को हल करने के बारे में सोचना चाहिए, और परेशानियों को हल करने के लिए लगातार प्रयास करना चाहिए। क्योंकि, लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, और कोशिश करने वालों की कभी हार नही होती। वो कहते हैं न की ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’, मतलब अगर आप एक बार चाह लो, दृढ निश्चय कर लो, तो हर परेशानी से निकलने का रास्ता जरुर मिलेगा।

     

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