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  • Surya Chauhan Case | पुलिस ने सूर्या चौहान हत्याकांड के मुख्य आरोपी असद को मुठभेड़ में मार गिराया

    Surya Chauhan Case | पुलिस ने सूर्या चौहान हत्याकांड के मुख्य आरोपी असद को मुठभेड़ में मार गिराया

    Surya Chauhan Case | इंदिरापुरम के अभय खंड में पुलिस ने सूर्या चौहान हत्याकांड के मुख्य आरोपी असद को मुठभेड़ में मार गिराया है। गाजियाबाद के खोड़ा इलाके में, बकरीद के दिन एक हिन्दू सूर्या चौहान की हत्या कर दी गयी थी। हत्या के बाद से ही मुख्य आरोपी असद फरार चल रहा था।

     

    गाजियाबाद पुलिस को बीती देर रात एक पुख्ता सूचना मिली थी। जानकारी के मुताबिक इस हत्याकांड का मुख्य आरोपी असद अपने किसी दोस्त से पैसे लेने के लिए खोड़ा इलाके में आने वाला था। पैसे लेने के बाद, उसका प्लान शहर छोड़कर भागने का था।

     

    सूचना मिलते ही खोड़ा और इंदिरापुरम पुलिस ने असद को दबोचने के लिए संयुक्त अभियान चलाया और इलाके में घेराबंदी कर दी। कुछ ही समय बाद असद एक दूसके व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर वहां पहुंचा, तो पुलिस उसे चारो तरफ से घेर लिया।

     

    जिसके बाद असद ने पुलिस पर फायरिंग कर दी, जिसमें एक कांस्टेबल घायल हो गया। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में असद को गोली लगी, जिसके बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी असद को पकड़ लिया। लेकिन, मुठभेड़ के दौरान लगी गोली के कारण अस्पताल में इलाज के दौरान, असद की मौत हो गई है।

  • Bimashankar Jyotirlinga Darshan | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर दर्शन | धर्मं, अध्यात्म, प्रकृति का अद्भुत संगम

    Bimashankar Jyotirlinga Darshan | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर दर्शन | धर्मं, अध्यात्म, प्रकृति का अद्भुत संगम

    Bimashankar Jyotirlinga Darshan | भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर दर्शन | धर्मं, अध्यात्म, प्रकृति का अद्भुत संगम | भीमाशंकर मंदिर, महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है। मंदिर के बाहर, पहाड़ों और उनके ऊपर प्राचीन किलों से घिरा एक वन क्षेत्र है, जहाँ दुर्लभ वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं। सह्याद्री पहाड़ियों में स्थित भीमाशंकर (Bimashankar) मंदिर आध्यात्मिकता, इतिहास और मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य का एक अद्भुत संगम है। भगवान शिव के बारह प्रतिष्ठित ज्योतिर्लिंगों में से एक यह पवित्र मंदिर लाखों भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रमाण है।

     

    एक पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रिपुरा की तपस्या से प्रसन्न होकर, ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उसे तीन इच्छाएँ प्रदान कीं। जिसके बाद त्रिपुरा ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए एक अभियान शुरू किया और देवताओं के राजा इंद्र को भी पराजित कर दिया। जिसके बाद इंद्र ने भगवान शिव को तपस्या से प्रसन्न किया। तब भगवान शिव ने इसी सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर “भीम शंकर” का रूप धारण किया था और त्रिपुरा से युद्ध कर उसका विनाश किया सबको उसके आतंक से मुक्त किया. वहीँ दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् शंकर ने जिस असुर का वध किया था उसका नाम था भिमासुर, और कुम्भकर्ण का पुत्र था। पौराणिक कथाओं में ये भी कहा जाता है की युद्ध के बाद भगवान् शंकर के शरीर से निकले पसीने से भीमरथी नदी का निर्माण हुआ।

     

    भीमाशंकरम (Bimashankar) तीर्थस्थल और भीमरथी नदी का उल्लेख 13वीं शताब्दी के लेखों में मिलता है, हालाँकि, मंदिर का वर्तमान स्वरुप तो उतना पुराना नहीं दीखता है, जिसका कारण ये बताया जाता है की इसका जीर्णोधार कई काल खंड किया जाता रहा है, जिसमें प्राचीन नागर शैली में बने मंदिर के वास्तुकला में मराठा शासकों द्वारा बाद में किए गए जीर्णोधार की छाप भी देखी जा सकती है. मंदिर के ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि इसे चालुक्य और पेशवा सहित कई राजवंशों का संरक्षण प्राप्त था, जिन्होंने इसके रखरखाव में योगदान दिया। शिवाजी महाराज ने मंदिर को खरोसी गाँव दान में दिया था, ताकि उससे मंदिर के नित्य धार्मिक अनुष्ठान का प्रबंध होता रहे।

     

    मंदिर के स्तंभ और चौखट देवताओं और मानव आकृतियों की जटिल नक्काशी से आच्छादित हैं। मंदिर की दीवारों पर भी उत्कृष्ट नक्काशी की गई है, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं, दिव्य प्राणियों और पौराणिक कथाओं को दर्शाया गया है, जो उस युग की अद्वितीय कला को दर्शाती है। मंदिर के गर्भगृह के ठीक मध्य में स्वयंभू ज्योतिरलिंग स्थित है, और शिवलिंग के सामने नंदी की एक मूर्ति है। मुख्य मंदिर के पास कमलजा माता का मंदिर है, जो देवी पार्वती का अवतार हैं और जिन्होंने त्रिपुरासुर के साथ युद्ध में भगवान् शिव की सहायता की थी। मंदिर के पीछे मोक्षकुंड तीर्थ है। मंदिर में जाने से पहले इस कुंड में स्नान करने की प्रथा है। मंदिर परिसर में भगवान शनि को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है। इसके अलावे, यहाँ ज्ञानकुंड और सर्वतीर्थ भी है। मंदिर के दक्षिण में कुषारण्य तीर्थ स्थित है, जहाँ से भीमा नदी बहती है।

     

    अगर भीमाशंकर (Bimashankar) के दर्शन के बाद आस पास घुमाने का मन करे तो मंदिर के पास भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य है, जो प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ की हरियाली, घने जंगल और मनोरम झरने इसे ट्रैकिंग और इको-टूरिज्म के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं। इसके अलावे भीमाशंकर मंदिर के पास ही गुप्त भीमाशंकर, हनुमान झील, भोरगिरी किला जैसे अन्य कई पर्यटक स्थल हैं, जहाँ घुमा जा सकता है.

     

    अगर बात करें भीमाशंकर पहुँचने की तो यहाँ का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पुणे (Pune) अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो यहाँ से 125 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। पुणे से निजी टैक्सी या बस के द्वारा यहाँ पहुंचा जा सकता है। यहाँ का निकटतम रेलवे स्टेशन कर्जत है, जो यहाँ से लगभग 65 किमी दूर है, जहाँ से टैक्सी या बस के जरिए यहाँ पहुंचा जा सकता है। अगर मुख्या शहरों की बात करें तो यह मुंबई से 223 किमी, पुणे से 125 किमी और नासिक से 230 किमी दूर है। Bhimashankar Jyotirlinga Darshan | Mharashtra Tourism | Incredible India | Hindu Temple Pilgrimage

  • WATCH | Udupi के श्री कृष्ण मठ में PM Narendra Modi ने किए दर्शन

    WATCH | Udupi के श्री कृष्ण मठ में PM Narendra Modi ने किए दर्शन

    WATCH | Udupi के श्री कृष्ण मठ में PM Narendra Modi ने किए दर्शन | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को उडुपी के ऐतिहासिक श्री कृष्ण मठ पहुंचे। प्रधानमंत्री मोदी ने यहां “लक्ष गीता पाठन” में भाग लिया। यह एक ऐसा सामूहिक पाठ है जिसमें 1 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने भगवद् गीता के श्लोकों का पाठ किया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री कृष्ण मंदिर में प्रार्थना की और पीठासीन पर्याय स्वामीजी से आशीर्वाद लिया।

     

    प्रधानमंत्री ने कहा – श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश युद्ध की भूमि से दिया. शांति और सत्य की स्थापना के लिए अत्याचारियों का अंत करना भी जरुरी है. गीता में श्रीकृष्ण की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। भगवान श्रीकृष्ण, गीता में हमें लोक कल्याण का काम करने के लिए कहते हैं।

     

    पीएम मोदी ने कहा कि उडुपी ने 5 दशक पहले नया शासन मॉडल पेश किया था। राम जन्मभूमि आंदोलन में उडुपी के रोल से पूरा देश वाकिफ है। श्री विश्वेश तीर्थ स्वामीजी के मार्गदर्शन की वजह से ही अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर ध्वज फहरा। राम मंदिर में एक विशेष द्वार है जो उडुपी के श्री माधवाचार्य को समर्पित है।

     

    जान लें कि ये पीएम मोदी का उडुपी का तीसरा दौरा है। वह दूसरी बार श्री कृष्ण मठ दर्शन के लिए आए। पीएम मोदी पहली बार 1993 में उडुपी की यात्रा पर आए थे और उसके बाद वह 2008 में तब उडुपी आए थे जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इस दौरान, प्रधानमंत्री ने श्री कृष्ण मंदिर का दौरा भी किया था। प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे से उडुपी की आध्यात्मिक पहचान रेखांकित हुई। इस क्षेत्र की वैष्णववादी परंपराओं की तरफ नए सिरे से देश-दुनिया के लोगों का ध्यान ।

  • Bihar Election | सीटों के पेंच में उलझे NDA के जातीय समीकरण में Tejashwi Yadav की सेंधमारी

    Bihar Election | सीटों के पेंच में उलझे NDA के जातीय समीकरण में Tejashwi Yadav की सेंधमारी

    Bihar Election | सीटों के पेंच में उलझे NDA के जातीय समीकरण में Tejashwi Yadav की सेंधमारी | बिहार के चुनाव में पहले चरण के लिए नामांकन शुरू हो चूका है लेकिन दोनों तरफ के गठबंधन के बिच अभी सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया है. NDA और महागठबंधन के दलों के बिच सीटों के बंटवारे को लेकर अभी भी खींचतान का दौर जारी है. जहाँ शुरुआत में NDA का जातिय समीकरण काफी मजबूत दिख रहा था, वहीँ राजद के नेतृत्व में महागठबंधन, जातिय समीकरण की रेस में पिछड़ता दिख रहा था. लेकिन बदलते समीकरणों के बिच बिहार का चुनाव अब दूसरी करवट लेने लगा है. ये चुनाव अब कहीं से भी NDA के लिए आसन नहीं दिख रहा है.

     

    इसकी एक बड़ी वजह है तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) का ग्राउंड लेवल पर माइक्रो मैनेजमेंट और कागजों पर मजबूत दिख रहे NDA के जातिय समीकरण में सेंध लगाने की रणनीति. जहाँ एक तरफ NDA की मीटिंग और रणनीति सिर्फ बड़े जातिय नेताओं को साधने तक सिमित हो चुकी है, वहीँ तेजस्वी अपनी नई रणनीति के तहत जमीनी और क्षेत्रीय लेवल के सामाजिक नेताओं और NDA के वोट बैंक वाले स्थानीय नेताओं को साधने पर काम कर कर रहे हैं.

     

    अगर पिछले दिनों राष्ट्रिय जनता दल में नेताओं के शामिल होने के ट्रेंड को देखें तो इस रणनीति की झलक साफ़ तौर पर देखी जा सकती है. इनमें ज्यादातर नेता वो हैं जिनकी पकड़ अपने क्षेत्र में अपनी जाति या समुदाय पर काफी है, और दिलचस्प बात ये है की ये सभी वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा या जदयू का वोटर रहा है. पिछले दिनों बांका के मौजूदा जदयू सांसद गिरधारी यादव (Girdhari Yadav) के बेटे चाणक्य प्रकाश रंजन (Chanakya Prakash Ranjan) ने तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल का दामन थाम लिया। जदयू के ही संतोष कुशवाहा (Santosh Kushwaha) और राहुल शर्मा (Rahul Sharma) ने भी राजद ज्वाइन कर लिया. खबर तो ये भी है की कभी लोजपा सांसद रहे बाहुबली नेता सूरजभान सिंह (Surajbhan Singh) भी परिवार के साथ राजद ज्वाइन करने वाले हैं. ये सभी वो नेता हैं जिनका अपने क्षेत्र में और अपने समाज पर काफी प्रभाव है. ये लोग न सिर्फ अपने क्षेत्र में बल्कि आस पास की सीटों पर भी NDA का खेल ख़राब कर सकते हैं. इसके आलावा राजद, जनता के बिच भी ये संदेश देने में भी सफल दिख रहा है की राजद अब सिर्फ कुछ जातियों सिमित नहीं है, बल्कि सर्वसमाज के प्रतिनिधित्व के साथ आगे बढ़ेगी.

     

    दूसरी बड़ी वजह जो NDA के लिए चुनौती बन रही है वो है, वर्तमान समय में चल रहे जातिय ध्रुवीकरण वाली राजनीति, जो खासकर भाजपा के लिए हमेशा से चुनौती रही है. जब जब जातिय ध्रुवीकरण हुआ है भाजपा को हार मिली है. भाजपा हमेशा अपना चुनावी दंगल हिंदुत्व और हिन्दू एकता के अखाड़े में लड़ना चाहती है. लेकिन मध्यप्रदेश प्रकरण से लेकर CJI जूता काण्ड तक जो जातिय ध्रुवीकरण शुरू हुआ है वो भी भी NDA की परेशानी एक बड़ी वजह बन रही है.

     

    शायद यही वजह है जिसने कभी आराम से बिहार का चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त दिख रहे NDA को चुनाव से पहले विचलित कर दिया है. NDA नेतृत्व इस रणनीति की काट खोजने में लग गयी है. नए नए जातिय और स्थानीय नेताओं की जोइनिंग की रणनीति बनाई जा रही है. टिकट कटने से नाराज राजद नेताओं के जोइनिंग पर भी विचार चल रहा है. हालाँकि वास्तविकता ये है की NDA अभी भी सीटों के खींचतान में ही उलझी हुई दिख रही है.

     

    NDA के नेता उपेन्द्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) ने अपने एक पोस्ट से NDA के दलों के बिच सीटों का समझौता फाइनल होने के दावे की पोल खोल दी. उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने पोस्ट में लिखा “’इधर-उधर की खबरों पर मत जाइए। वार्ता अभी पूरी नहीं हुई है। इंतजार कीजिए! मीडिया में कैसे खबर चल रही है, मुझको नहीं पता। अगर कोई खबर प्लांट कर रहा है तो यह छल है, धोखा है। आप लोग ऐसे ही सजग रहिए”. उपेंद्र कुशवाहा की इस पोस्ट ने न सिर्फ बिहार चुनाव के बिच सियासी खलबली मचा दी, NDA के दलों के बिच सहमती बनने के उस दावे की भी हवा निकाल दी, जिसमें ये दावा किया जा रहा था की की NDA बिच सहमती बन गयी है. जिसमें नीतीश कुमार की जेडीयू 101 सीट, बीजेपी 100 सीट, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास 26 सीट, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा 7 सीट और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा 6 सीट पर चुनाव लड़ेगी।

     

    अगर सबकुछ तय हो ही गया है तो NDA के सभी सहयोगी दल के नेता क्षेत्र में जाने के बजाय दिल्ली में क्यों जुट रहे हैं? केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी (Jitanram Manjhi) ने पोस्ट कर लिखा की “एनडीए में सीट बंटवारे पर फैसला होना है। हम एनडीए के गठबंधन सहयोगी हैं, एनडीए के नेता दिल्ली में हैं, और हम भी अब दिल्ली जा रहे हैं। हम अनुशासित लोग हैं और हम अनुशासन में ही रहेंगे।”

     

    एक तरफ तेजस्वी यादव युवाओं से लेकर सर्वसमाज तक को जोड़कर चुनाव जीतने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. वहीँ दूसरी तरफ NDA अभी तक सीटों के बंटवारे और दलों के दलदल में फंसा हुआ दिख रहा है. हालाँकि बिहार का चुनाव अभी भी काफी खुला हुआ है, लेकिन दोनों गठबंधनों के लिए अभी भी दूर की कौड़ी लग रही है क्योंकि सीटों का पेंच तो अभी महागठबंधन में भी फंसा हुआ है. इसके अलावे बहुत सारी सीटों पर दोनों गठबंधन को नई नवेली जनसुराज से भी चुनौती मिलने वाली है. अब इस तेजी से बदलते समीकरण के बिच बिहार चुनाव का ऊंट किस करवट बैठता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा.

  • भारत के अपने स्वदेशी Apps Arattai की धूम, Whatsapp को दे रहा कड़ी टक्कर

    भारत के अपने स्वदेशी Apps Arattai की धूम, Whatsapp को दे रहा कड़ी टक्कर

    भारत का अपना स्वदेशी एप Arattai इन दिनों काफी चर्चा में है. भारत में मैसेजिंग ऐप्स की दुनिया में नई सनसनी बनकर उभर रहा है Arattai। इस एप को whatsapp का भारतीय विकल्प बताया जा रहा है. आइए जानते हैं विस्तार से क्या है Arattai एप, कौन है इसका मालिक और क्या सच में ये भारतीय एप, whatsapp जैसे ग्लोबल प्लेटफार्म को चुनौती दे सकता है, जिसका अभी भारतीय मेस्सगिंग एप के क्षेत्र में एकाधिकार बना हुआ है.

     

    आरताई Zoho Corporation द्वार पेश किया गया एक स्वदेशी मेसेंजर एप है जो बेहद तेजी से भारतीय यूजर्स का ध्यान अपनी तरफ खिंच रहा है. इसकी पैरेंट कंपनी जोहो कारपोरेशन आज किसी पहचान की मोहताज़ नहीं है. जोहो कारपोरेशन पहले ही Zoho Mail, Zoho Books, Zoho Projects, Zoho Payments, Zoho Desk, Zoho CRM और Zoho One suite जैसी कई वर्ल्ड क्लास सर्विसेज लांच कर चुकी है. जिसे न सिर्फ भारतीय यूजर्स द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की क्मपनियाँ और मंत्रालय इन सर्विसेज को अपना रहे हैं. इसी क्रम में चेंन्नई स्थित Zoho कारपोरेशन ने इस एप को इंडिजिनस कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म के रूप में यूजर्स को पेश किया, जो अपने लांच के बाद से ही चर्चा में बना हुआ है. और अब तक इस एप को50 लाख से ज्यादा डाउनलोड किया जा चूका है.

     

    अगर बात करे इस एप के फीचर्स की तो ये एप न सिर्फ whatsapp को कड़ी टक्कर दे रहा है, बल्कि कई मामलों में तो whatsapp से भी आगे है. Whatsapp के जो सामान्य मेसेंगेर वाले फीचर्स तो इसमें हैं ही, लेकिन जो फीचर्स उससे अलग है हम आपको वो बताएँगे.

     

    इसमें सबसे पहले नंबर पर आता है बिना नंबर के चैटिंग. ये Arattai की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें आप अपने मोबाइल नंबर को शेयर किए बिना भी किसी से चैट कर सकते हैं। यूजर्स बस अपना यूनिक यूजरनेम बनाकर किसी अंजान व्यक्ति से चैट, विडियो और फोट शेयर कर सकता हैं। व्हाट्सएप में इस तरह की सुविधा का ऑप्शन फिलहाल नहीं है।

     

    दूसरा फीचर्स जो whatsapp से अलग है वो है मीटिंग. इस फीचर्स के जरिए यूजर्स विशेष मीटिंग क्रिएट कर सकते हैं। यह वीडियो और ऑडियो कॉल से अलग है और बिजनेस मीटिंग्स या ग्रुप डिस्कशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जबकि व्हाट्सएप में मीटिंग्स के लिए केवल कॉल लिंक या शेड्यूलिंग की सुविधा मिलती है।

     

    तीसरा फीचर्स जो इसे whatsapp से अलग बनता है वो है मेंशन. Arattai का Mentions फीचर यूजर्स को यह दिखाता है कि उन्हें किन-किन चैट्स में मेंशन किया गया है। यह फीचर खासकर व्यस्त चैट ग्रुप्स के लिए बेहद उपयोगी है।

     

    चौथा और सबसे प्रीमियम फीचर्स जो Arattai को whatsapp से अलग और प्रीमियम बनता है वो है पॉकेट. Arattai का पॉकेट फीचर एक क्लाउड स्टोर की सुविधा प्रदान करता है, जिसमें उसेर्स आपमें महत्वपूर्ण मेसेज, मीडिया या नोट्स सुरक्षित रख सकता है, जिसे वो किसी भी डिवाइस से किसी भी समय एक्सेस कर सकता है.

     

    इन तमाम फीचरों की वजह से और खासकर स्वदेसी होने की वजह से Arattai एप मार्किट में चर्चा का विषय बना हुआ है. सामान्य यूजर्स से लेकर बड़े सेलिब्रिटी, नेता और उद्योगपति तक इस एप की तारीफ कर रहे हैं. जाने माने उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने न सिर्फ अपने फोन में इस एप को डाउनलोड किया, बल्कि इसे लेकर जोहो के मालिक श्रीधर वेम्बू को अपने x अकाउंट के जरिए खास अंदेश भी दिया. अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा की अपने फोन में Arattai डाउनलोड किया है और वह इसे गर्व के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। आनंद महिंद्रा के पोस्ट के जवाब में ऐप के फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने कहा कि आनंद महिंद्रा का सपोर्ट उन्हें और अधिक प्रेरित कर रहा है।

  • F-16 किलर बाहुबली Mig-21 हुआ वायुसेना से रिटायर, दी गई भव्य विदाई

    F-16 किलर बाहुबली Mig-21 हुआ वायुसेना से रिटायर, दी गई भव्य विदाई

    F-16 किलर बाहुबली Mig-21 हुआ वायुसेना से रिटायर, दी गई भव्य विदाई | भारतीय वायुसेना में छह दशक तक सेवा देने के बाद आज रिटायर हुआ मिग-21 लड़ाकू विमान. विमान को चंडीगढ़ में पारंपरिक विदाई दी गई। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सीडीएस अनिल चौहान, वायु सेना प्रमुख एपी सिंह सहित वायु सेना के कई पूर्व अध्यक्ष और इस फ्लीट के रिटायर्ड पायलट्स मौजूद रहे.

     

    भारतीय वायुसेना के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा रहे इस विमान को आज चंडीगढ़ में अपने आखिरी उड़ान के बाद भव्य विदाई दी गई. छह दशक से ज्यादा समय तक आसमान में दहाड़ने वाले मिग-21 लड़ाकू विमान ने चंडीगढ़ में अपनी अंतिम उड़ान भरी। 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध हो, 1999 का कारगिल युद्ध हो या 2019 के बालाकोट हवाई हमला, इस विमान ने हर बार अपनी अहम् भूमिका निभाई और अपनी निर्णायक क्षमता साबित की. यही वो विमान है जिससे विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान ने आधुनिक एफ-16 को मार गिराया था.

     

    इस विदाई समारोह के दौरान वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने भी आखिरी उड़ान भर रहे मिग 21 विमान में उड़ान भरी. मिग-21 के तीन विमानों ने बादल फॉर्मेशन में और चार विमानों ने पैंथर फॉर्मेशन में अंतिम उड़ान भरी। इस दौरान मिग-21 जेट विमानों के साथ जगुआर और तेजस विमानों ने भी फ्लाईपास्ट में हिस्सा लिया। मिग 21 के पीछे फ्लाइंग करते हुए तेजस विमान को देखकर ऐसा लगा रहा था मानो भारतीय आकाश की सुरक्षा की जिम्मेवारी का आदान प्रदान हो रहा हो, और मिग 21 एक गौरवशाली इतिहास को सँभालने की जिम्मेवारी तेजस को दे रहा हो. गौतलब बात ये है की वायुसेना के बेड़े में मिग 21 की जगह तेजस ही लेने वाला है.

  • Donald Trump की Afghanistan को धमकी, अगर Bagram Airbase नहीं दिया तो बहुत बुरा होगा

    Donald Trump की Afghanistan को धमकी, अगर Bagram Airbase नहीं दिया तो बहुत बुरा होगा

    Donald Trump की Afghanistan को धमकी, अगर Bagram Airbase नहीं दिया तो बहुत बुरा होगा | बगराम एयरबेस को लेकर अमेरिका, अफगानिस्तान और चीन के बिच माहौल गर्म हो गया है. अफगानिस्तान के बगराम एयरबेस पर गड चुकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नजर. अमेरिका अब इस एयरबेस पर फिर से कब्ज़ा करना चाहता है.

     

    पूरा मामला तब शुरू हुआ जब ब्रिटेन की राजकीय यात्रा पर गए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुलेआम ये घोषणा कर दी की अफगानिस्तान के बगराम हवाई अड्डे पर दोबारा कब्जे को लेकर उनका प्रशासन काम कर रहा है। वह चीन के बगराम बेस पर नियंत्रण की संभावना से परेशान हैं और इस पर फिर से अपना कब्जा चाहते हैं। अमेरिका को यह हवाई अड्डा कभी छोड़ना ही नहीं चाहिए था। वह इस एयरबेस को वापस पाने की कोशिश इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह चीन के परमाणु हथियार बनाने वाले स्थान के बहुत नजदीक है। और इस एयर बेस पर अमेरिकी सैनिक जल्द वापस लौट सकते हैं।

     

    ट्रम्प के इस बयान के बाद माहौल काफी गर्म हो गया. इस पुरे मामले को लेकर चीन ने तो अपनी सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा की बगराम एयर बेस पर अमेरिकी उपस्थिति का फैसला अफगानिस्तान की सरकार पर छोड़ देना चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने शुक्रवार को ट्रंप की टिप्पणियों के जवाब में कहा कि चीन ने हमेशा अफगानिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान किया है। अफगानिस्तान का भविष्य अफगान लोगों के हाथों में होना चाहिए।

     

    लेकिन पीछे से चीन की शह पाकर अफगानिस्तान की हुकूमत चला रहे तालिबान ने ट्रम्प के इस बड़े बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. तालिबान ने अपनी प्रतिक्रिया में ट्रम्प को साफ़ कह दिया, कि बगराम एयरबेस को अमेरिका को वापस देने का कोई सवाल ही नहीं उठता. तालिबानी विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि अफगानिस्तान और अमेरिका को आपस में बातचीत करनी चाहिए और आपसी सम्मान और साझा हितों के आधार पर दोनों आर्थिक व राजनीतिक रिश्ते बना सकते हैं, लेकिन अफगानिस्तान में अमेरिका की किसी भी सैन्य मौजूदगी के बिना.

     

    अब सवाल उठता है की क्या ही इस बगराम ऐस्र्बसे में जिसे लेकर अमेरिका इतना उतावला हो रहा है. तो आप बगराम को सिर्फ एक एयरबेस मत समझिए, ये एक छोटे मोटे शहर जितना बड़ा क्षेत्र है जो करीब करीब 3300 एकड़ में फैला है. जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर वहां की शासन व्यवस्था को अपने हाथ में लिया था, तब बगराम एयरबेस अफगानिस्तान में अमेरिका का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा था. इसका मुख्य रनवे 7 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा है. और एक समय में यहां करीब 40,000 सैनिक और कॉन्ट्रैक्टर तैनात थे. यही वो मुख्य सैन्य ठिकाना था, जहां से अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ पूरे अफगानिस्तान में ऑपरेशन चलाए थे. लेकिन 2021 में जब तालिबान, अफगानिस्तान की सरकारी फौजों पर हावी होने लगी तब अमेरिका ने अपनी सेना यहाँ से हटा ली और इस एयरबेस पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया.

     

    अब अमेरिका फिर से इस हवाई अड्डे पर वापस अपना कब्ज़ा चाहता है. हालाँकि अमेरिका के कई रक्षा विशेषज्ञ, फिर से कब्जा करने को व्यावहारिक नहीं मानते क्योंकि तालिबान के अफगानिस्तान पर पूर्ण कब्जे के बाद इस एयरबेस को सुरक्षित रखना चुनौतीपूर्ण होगा. इतने बड़े एयरबेस को इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों के राकेट हमले के खतरों से सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती होगी. बगराम पर कब्जा बनाए रखने के लिए हजारों सैनिकों की भी जरूरत होगी. इस बेस को फिर से इस्तेमाल लायक दुरुस्त करने में भारी खर्च आएगा और रसद की सप्लाई भी बड़ी समस्या होगी. अब ऐसे में ट्रम्प तो ऐलान कर दिया लेकिन क्या ये इतना आसन होने वाला है और क्या तालिबान ट्रम्प के प्रस्ताव को आसानी से मान लेगा?

     

    क्या सच में अमेरिका चीन पर ही नजर रखने के लिए इस एयरबेस पर वापस अपना कब्ज़ा चाहता है या उसका मकसद कुछ और है? बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंसेज़ के डेटा के मुताबिक, बगराम एयरबेस के 1,000 किलोमीटर के दायरे में चीन का परमाणु ठिकाना होने का कोई पक्का सुबूत नहीं है, उसके सभी परमाणु ठिकाने बगराम से काफी दुरी पर हैं, हालाँकि सिर्फ एक जगह काश्गर है जो बगराम से सिर्फ 700 किलीमीटर की दुरी पर है, जहाँ परमाणु ठिकाना होने की संभावना है. फिर किस पर नजर रखने के लिए ट्रम्प को बगराम एयरबेस चाहिए? कहीं ऐसा तो नहीं की ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान पाकिस्तान में रखे अमेरिकी परमाणु हथियारों की सुरक्षा को पैदा हुए खतरे के बाद अब अमेरिका को उसे सुरक्षित रखने के लिए नया ठिकाना चाहिए? या फिर भारत के परमाणु गतिविधि पर नजर रखने के लिए अमेरिका को ये ठिकाना चाहिए? इस पुरे पहल के पीछे अमेरिका की क्या सोच है ये तो वक्त ही बताएगा!

     

    लेकिन इस प्रस्ताव को तालिबान द्वारा नकारे जाने के बाद ट्रम्प तरह बौखला गए हैं और अब धमकी पर उतर आए हैं. ट्रम्प ने ट्रुथसोशल पर अपने पोस्ट में लिखा की अगर अफगानिस्तान, बगराम एयरबेस को अमेरिका को नहीं देता है तो बहुत बुरा होने वाला है.

  • Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja

    Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja

    Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja | पुरे देश में नवरात्री (Navratri) की धूम है! हर तरफ माता की साधना और पूजा चल रहा है. लेकिन क्या आपको मालूम है साल में नवरात्रि का पर्व एक बार नहीं बल्कि चार बार आता है। पहला नवरात्री चैत्र के महीने में आता है, जिसे चैत्र नवरात्री कहा जाता है. इस नवरात्रि के साथ ही हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है। दूसरी नवरात्रि आश्विन माह में आती है, जिसे शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। इसके आलावा पौष और आषाढ़ के महीने में भी नवरात्रि का पर्व आता है, जिसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, और गुप्त नवरात्री को तंत्र साधना के लिए विशेष माना जाता है। लेकिन अगर बात की जाए गृहस्थ और सामान्य लोगों की उनके लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि को ही उत्तम माना गया है।

     

    चैत्र नवरात्री और शारदीय नवरात्री में क्या अंतर है?

    जहाँ चैत्र नवरात्री (Chitra Navratri) मनाने के पीछे की कहानी यह है की जब वरदान पाकर शक्तिशाली हो चुके महिषासुर का आतंक धरती पर बढ़ गया और वरदान की वजह से देवता भी उसे हरा पाने में असमर्थ हो गए। ऐसे में देवताओं ने माता को प्रसन्न कर उनसे रक्षा की विनती की। इसके बाद मातारानी ने अपने अंश से नौ रूप प्रकट किए। ये पूरा विधान चैत्र के महीने में प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर 9 दिनों तक चला, तब से इन नौ दिनों को चैत्र नवरात्रि के तौर पर मनाया जाने लगा।

     

    वहीँ शारदीय नवरात्री (Sharadiya Navratri) मनाने का कारण यह माना जाता है की देवी दुर्गा ने आश्विन के महीने में ही महिषासुर से नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसलिए इन नौ दिनों को शक्ति की आराधना के रूप में तो दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है. चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रि का भगवान् राम से भी विशेष संबंध है. चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन रामनवमी आती है। प्रभु श्रीराम का जन्म रामनवमी के दिन ही हुआ था. जबकि शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी होता है और महानवमी के अगले दिन विजयदशमी होता है। विजयदशमी के दिन ही माता दुर्गा ने महिषासुर का मर्दन किया था और भगवान् श्रीराम ने रावण का वध किया था, जिसे दशहरा के रूप में भी मनाया जाता है।

     

    नवरात्री के दौरान सात्विक जीवन, साधना, व्रत और, उत्सव आदि का महत्व है। नवरात्र के नौ दिनों को तीन भागों में बांटा गया है। पहले तीन दिन को ‘तमस’ को जीतने की साधना, अगले तीन दिन को ‘रजस’ और अंतिम तीन दिन को ‘सत्व’ को जीतने की साधना माना जाता है. अर्थात यह त्यौहार सृष्टी के त्रिगुणात्मक शक्तियों की साधना का भी त्यौहार है. नवरात्र की शुरुआत कलश स्थापना और जौ बोने की परंपरा से होती है, और नौ दिनों तक प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।

     

    पहले दिन : माता शैल्पुरी (Maa Shailputri Devi)

    प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है. इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल है और उनका वाहन वृषभ है। शैलपुत्री माता की पूजा से जीवन में स्थिरता, शक्ति और साहस प्राप्त होता है। भक्तों को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ मिलता है और जीवन के संकटों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

     

    दुसरे दिन : माता ब्रहाम्चारिणी (Maa Brahmacharini Devi)

    नवरात्री के दुसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. जिसका अर्थ है ‘तपस्विनी’ या ‘धर्म का पालन करने वाली’। इनके एक हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल होता है। ब्रह्मचारिणी देवी तपस्या और भक्ति का प्रतीक हैं। इनकी पूजा से मनुष्य के अंदर आत्मनियंत्रण, धैर्य और दृढ़ संकल्प का विकास होता है।

     

    तीसरे दिन : माता चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta Devi)

    नवरात्री के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की की पूजा की जाती है. इनके मस्तक पर एक घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, जिसके कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. ये रणचंडी के नाम से भी जानी जाती हैं और युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहती हैं. उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं। चंद्रघंटा देवी के इस रूप की पूजा करने से साहस, आत्मविश्वास और शक्ति का संचार होता है।

     

    चौथे दिन : माता कुष्मांडा (Maa Kushmanda Devi)

    नवरात्री के चौथे दिन माता कुष्मांडा की पूजा होती है. इन्हें असंख्य ब्रह्मांडों की रचना करने वाली माता मान जाता है. वह सिंह पर सवार होती हैं, और इनके आठ हाथों में कमल, अमृत कलश, धनुष-बाण, चक्र, गदा और जप माला धारण है। कूष्मांडा देवी ऊर्जा और जीवन की स्रोत मानी जाती हैं। कूष्मांडा माता की पूजा से जीवन में समृद्धि, ऊर्जा और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

     

    पांचवे दिन : माँ स्कंदमाता (Maa Skandamata Devi)

    नवरात्री के पांचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाति है. इन्हें भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेय की माता के रूप में जाता है, और यह मातृत्व का प्रतीक हैं. देवी स्कंदमाता चार भुजाओं वाली हैं और अपनी गोद में स्कंद को लिए सिंह पर विराजमान हैं। स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को उनके परिवार और संतान की रक्षा और कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

     

    छठे दिन : माता कात्यायनी (Maa Katyayani Devi)

    नवरात्री के छठे दिन माता कात्यायनी की आराधना की जाती है. इन्हें स्त्री की उस शक्ति का प्रतीक माना जाता है जो परिवार को बुराइयों से बचाती है. माता कात्यायनी के चार हाथ हैं और वह सिंह पर सवार होकर आती हैं। कात्यायनी माता की पूजा करने से भक्तों को साहस और बल मिलता है।

     

    सातवें दिन : माता कालरात्रि (Maa Kaalratri Devi)

    नवरात्री सातवें दिन माता कालरात्रि की उपासना की जाती है. माता कालरात्रि को अंधकार और भय को नष्ट करने वाली देवी माना जाता है। यह देवी का सबसे उग्र रूप है, जिसमें वह काले रंग की होती हैं, उनके चार हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं और वह गधे पर सवार रहती हैं। कालरात्रि की पूजा से सभी प्रकार के भय और बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है। यह स्वरूप शत्रुओं के नाश के लिए जाना जाता है।

     

    आठवें दिन : माता महागौरी (Maa Mahagauri Devi)

    नवरात्री के आठवें दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है. माता महागौरी का वर्ण श्वेत है, जिसके कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है। वह बैल पर सवार होती हैं और उनके चार हाथ होते हैं। महागौरी को माता का सबसे उत्कृष्ट रूप माना जाता है, जो चरित्र की पवित्रता और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है. महागौरी की पूजा से पवित्रता, शांति और करुणा का आशीर्वाद मिलता है। यह रूप जीवन में शांति और सौंदर्य का प्रतीक है।

     

    नौवें दिन : माता सिद्धिदात्री (Maa Siddhidatri Devi)

    नवरात्री के आखिरी और नौवें दिन माता के सिद्धिदात्री रूप की पूजा की जाती है. इन्हें सभी सिद्धियों की दाता माना जात है. इनके चार हाथ होते हैं। वह कमल पर विराजमान होती हैं और उनका वाहन सिंह होता है। उनका यह स्वरूप ज्ञान और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देता है। सिद्धिदात्री की आराधना से सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति होती है।

     

    मौसम और विज्ञानं का रहस्य

    नवरात्री के इन त्यौहारों के पीछे जीवन, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ा एक वैज्ञानिक पहलु भी है. जब नवरात्र मनाए जाते हैं तब का समय मौसम बदलने का भी होता है, और शरीर को नए वातावरण के अनुसार ढालने की जरूरत होती है। ऐसे में उपवास और हल्का भोजन करने से शरीर को शुद्ध रखने और शरीर के रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलती है। जीवन के उतार चढाव और नियमित तनाव, खासकर आज के तेज रफ्तार वाली आधुनिक जीवन शैली में नवरात्र का त्यौहार न सिर्फ नए उत्साह का संचार करता है, बल्कि हमें थोड़ा ठहरकर आत्मचिंतन करने का अवसर भी देता है।

     

    नवरात्री (Navratri) को बुराई पर अच्छाई की जीत, शक्ति की साधना, जीवन में नई शुरुआत, आध्यात्मिक उन्नति, और सामाजिक समरसता के उत्सव के रूप मनाया जाता है. नवरात्रि के दौरान, लोग उपवास करते हैं, पूजा करते हैं, और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह त्योहार लोगों को एकसाथ जोड़ता है और उन्हें अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है. इस दौरान भारत के हर कोने में एक अलग ही उल्लास और उत्साह देखने को मिलता है। चाहे वह व्रत-उपवास हो रामलीला का मंचन हो गरबा की धूम हो या भव्य दुर्गा पूजा, नवरात्र हर रूप में हमें अपनी परंपराओं से जोड़ता है। भारतीय संस्कृति में नवरात्र सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम है।

  • Narendra Modi के 75 साल, संघर्ष, उपलब्धि और चुनौती की दास्तान बेमिसाल

    Narendra Modi के 75 साल, संघर्ष, उपलब्धि और चुनौती की दास्तान बेमिसाल

    PM Narendra Modi @ 75 | आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना 75वां जन्मदिन मनाने जा रहे हैं. वह भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ है। 2014 में उन्होंने लोकसभा के चुनावों में मिली जबरदस्त जीत के बाद भारत के 14 वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। तब से लेकर अब तक वो लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने हुए है. इससे पहले उन्होंने लगातार चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी काम किया.

     

    हालाँकि आज आप जिस नरेंद्र मोदी को जानते हैं वो सब उन्हें विरासत में नहीं मिला है. उन्होंने ये सब अपनी मेहनत, लगन, दृढ निश्चय और मूल्यों के बल पर हासिल किया है। उनका जीवन काफी उतार चढाव भरा रहा है. गुजरात के एक गाँव वडनगर और एक बेहद गरीब परिवार से सात लोक कल्याण मार्ग तक का सफ़र आसान तो नहीं रहा होगा.

     

    नरेन्द्र मोदी का जन्म 17 सितम्बर, 1950 में गुजरात के एक कस्बे मेहसाणा के वडनगर में हुआ था। वह दामोदरदास मूलचंद मोदी और हीराबेन मोदी के छह संतानों में से तीसरी संतान हैं। उनका परिवार मोध घांची तेली समुदाय से है। वे अपने पिता को वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में मदद करते थे। जीवन की इन आरंभिक कठिनाइयों ने उन्हें न सिर्फ कठोर परिश्रम के मूल्य की समझ दी बल्कि इसके साथ ही आम लोगों की पीड़ा को समझने का मौका भी दिया। यही कारण है कि मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अंत्योदय अर्थात् अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की सेवा करने के सिद्धांत का अनुकरण करते हुए जीवन जिया है.

     

    जब नरेंद्र मोदी आठ साल के थे, तब उन्होंने आरएसएस ज्वाइन की और अपने स्थानीय शाखों में भाग लेना शुरू कर दिया। वहां, वे लक्ष्मणराव इनामदार से मिले, जिन्होंने उन्हें आरएसएस में बाल स्वयंसेवक के रूप में शामिल किया और उनके राजनीतिक गुरु बन गए। उन्होंने छोटी उम्र से ही देशभक्त संस्थाओं के साथ काम कर अपने आपको देश सेवा में समर्पित कर दिया। हालाँकि उनके माता-पिता ने घांची परंपरा के अनुसार बचपन में ही उनकी शादी करा दी। 13 साल की उम्र में उनकी सगाई जशोदाबेन से हो गई, और जब वह 18 साल के थे तब उनकी शादी कर दी गई। लेकिन उनका मन तो पारिवारिक जीवन में नहीं लगा, और उन्होंने घर का त्याग कर भ्रमण पर निकाल गए. जिसके बाद घर में उनका अपनी मां हीराबेन के साथ ही घनिष्ठ संबंध रहा, और कई मौके पर इसकी तस्वीर देखने को मिलती रही।

     

    शादी के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी ने भारत की यात्रा शुरू की और गुजरात लौटने से पहले बेलूर मठ, रामकृष्ण आश्रम जैसे कई धार्मिक केंद्रों और हिमालयी क्षेत्रों का दौरा किया, जहाँ ढेर साधू संतों से मुलाकात की, जिसकी कई सारी कहानियां हैं। शायद यही कारण है की उनके जीवन में विवेकानंद का बड़ा प्रभाव बताया जाता है।

     

    अहमदाबाद लौटने के बाद मोदी ने हेडगेवार भवन में रह रहे इनामदार के साथ फिर से जुड़ गए और आरएसएस के लिए पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। ये आरएसएस का ही प्रभाव है की शाकाहारी और नशामुक्त जीवनशैली है मोदी जी की। और मज़बूरी में बनाए गए उनके आधी बांह वाला कुर्ता एक फैशन आइकॉन बन गया, जिसका युवाओं में भी काफी क्रेज है।

     

    1975 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल की घोषणा की जो 1977 तक चली। इस अवधि के दौरान, इंदिरा जी ने अपने कई राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया और विपक्षी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया। इस दौरान मोदी जी को “गुजरात लोक संघर्ष समिति” का महासचिव नियुक्त किया गया, जो गुजरात में आपातकाल के विरोध में समन्वय करने वाली आरएसएस की एक समिति थी। हालाँकि कुछ समय बाद ही, आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। उन्हें गुजरात में भूमिगत होने के लिए मजबूर होना पड़ा और गिरफ्तारी से बचने के लिए बार-बार भेस में यात्रा करना पड़ता था। उन्होंने इमरजेंसी के दौरान की घटनाओं का वर्णन करते हुए गुजराती में “संघर्ष मा गुजरात” नामक एक पुस्तक भी लिखी है। इस भूमिका में वे जिन लोगों से मिले, वे ट्रेड यूनियन और समाजवादी कार्यकर्ता जॉर्ज फर्नांडीस के साथ-साथ कई अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक हस्तियां भी थीं।

     

    1985 में आरएसएस द्वारा उन्हें भाजपा में स्थानांतरित कर दिया गया, यहीं से शुरू हुआ नरेंद्र मोदी का राजनितिक सफ़र. 1987 में अहमदाबाद नगरपालिका चुनाव में भाजपा के अभियान को व्यवस्थित करने में उन्होंने मदद की, जिसे भाजपा ने आराम से जीता; जिसका श्रेय उनकी योजना को दिया गया, और एक साल बाद उन्हें पार्टी की गुजरात शाखा का महासचिव बनाया गया।

     

    1990 में वह भाजपा के उन सदस्यों में से एक थे जिन्होंने राज्य में गठबंधन सरकार बनाने में मदद की थी। इसके बाद पार्टी में उनका कद बढ़ता चला गया और 1990 में वे भाजपा की राष्ट्रीय चुनाव समिति के सदस्य नामित किए गए. 1990 में उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा और 1991-92 में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा को व्यवस्थित करने में अपना योगदान दिया। परिणाम स्वरुप नरेंद्र मोदी को पार्टी का राष्ट्रिय सचिव बनाया गया, जहाँ उन्होंने हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में पार्टी की गतिविधियों की जिम्मेदारी संभाली।

     

    1998 के गुजरात विधानसभा चुनाव में आतंरिक गुटबाजी के बावजूद नरेंद्र मोदी की रणनीति की वजह से भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ जिसके परिणाम स्वरुप उन्हें भाजपा महासचिव के रूप में पदोन्नत किया गया। हालाँकि विपरीत माहौल में 2002 के चुनावों के लिए भाजपा को तैयार करने की जिम्मेदारी के रूप में नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में दिल्ली से गुजरात भेज दिया गया। तब उन्होंने 7 अक्टूबर 2001 को Gujarat के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार शपथ ली, और 24 फरवरी 2002 को राजकोट से उपचुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा के सदस्य बने।

     

    हालाँकि उनके मुख्यंमंत्री बनने के थोड़े समय में ही गोधरा में ट्रेन जलाने के बाद गुजरात में भयंकर दंगे हुए और उनके ऊपर भी विपक्ष द्वारा दंगे के दाग लगाए गए. लेकिन उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व से न सिर्फ गुजरात को इन सब से बाहर निकाला, बल्कि खुद को भी एक सक्षम प्रशासक के रूप में स्थापित किया. उन्हें राज्य की अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास करने के लिए श्रेय दिया जाएं लगा। जिसकी वजह से आगामी विधानसभा चुनाव में जबरदस्त सफ़लता मिली और वो दूसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने.

     

    नरेंद्र मोदी लगातार चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और इस दौरान उनकी नीतियों को राज्य में भ्रष्टाचार को कम करने का श्रेय दिया गया। उन्होंने गुजरात में वित्तीय और प्रौद्योगिकी पार्क स्थापित किए और वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन के दौरान बड़े निवेश को गुजरात में स्थापित किया। सूखे से जूझ रहे गुजरात के कई इलाकों भूजल संरक्षण परियोजनाओं को बढ़ावा दिया। इसके परिणामस्वरूप कई जलस्तर में कमी वाली तहसीलों ने 2010 तक अपने सामान्य भूजल स्तर को पुनः प्राप्त कर लिया था। परिणामस्वरूप, राज्य का कृषि उत्पादन बड़ा हो गया, और गुजरात का कृषि विकास दर लगभग 10.97 हो गया! इसके साथ ही उनकी सरकार ने गुजरात में तमाम आधारभूत सुविधाएँ और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार की और गुजरात का विकास पुरे देश में गुजरात मॉडल के नाम से जाना जाने लगा.

     

    उस समय नरेंद्र मोदी पहले वे राजनेता थे जिनकी एक मज़बूत ऑनलाइन उपस्थिति थी. वो प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल लोगों से जुड़ने और उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए करते थे. वो सर्वाधिक प्रौद्योगिकी मूलक सोच रखने वाले नेता के रूप में जाने जाने लगे. फेसबुक, ट्वीटर, गूगल सहित अन्य सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता ने उनके व्यक्तिगत संपर्क को और मजबूती दी।

     

    परिणाम ये हुआ की नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पुरे देश में फ़ैल गयी, जिससे वे न केवल पार्टी के भीतर सबसे प्रभावशाली नेता बने, बल्कि भारत के प्रधान मंत्री के लिए एक संभावित उम्मीदवार भी बन गए। तब जून 2013 में उन्हें लोकसभा के 2014 के चुनावों के लिए भाजपा के अभियान का नेता चुना गया और 2014 के आम चुनाव में उन्होंने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में भाजपा का नेतृत्व किया. 2014 के चुनाव में भाजपा को जबरदस्त सफ़लत मिली और 1984 के बाद किसी भी एक पार्टी के लिए पहली बार लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ।

     

    प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएम मोदी ने व्यवस्थाओं में बड़े आधारभूत बदलाव किए. उन्होंने योजना आयोग को बदलक्र इसकी जगह नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया अर्थात NITI Aayog बनाया। इसके साथ ही 1,200 अप्रचलित कानूनों को भी निरस्त किया, अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ाया, और शिथिल पद रही नौकरशाही के कामकाज में भी सुधार करने का प्रयास किया।

     

    इसके अलावे डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, उच्च मूल्यवर्ग के बैंक नोटों के विमुद्रीकरण अर्थात डिमोनेटाईजेशन, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन के लिए उज्ज्वला योजना, और जनधन योजना जैसी अनेक गरीब कल्याण की योजनाएं चलायी, जिसका परिणाम ये हुआ की नरेंद्र मोदी को दूसरे कार्यकाल में भी शानदार जीत मिली, और 30 मई 2019 को उन्होंने दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

     

    सत्ता में दुबारा लौटने के बाद उनकी सरकार को कोरोना जैसी गंभीर वैश्विक संकट का सामना करना पड़ा, जिसमें पूरा देश लॉकडाउन हो गया, अर्थव्यवस्था चरमराने लगी, सरकार विरोधी स्वर मुखर होने लगे. लेकिन उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व न सिर्फ अर्थव्यवस्था को संभाला बल्कि अपने घोषणापत्र को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण और मजबूत फैसले भी लिए, जिसमें तिन तलाक ख़त्म करना, जम्मू कश्मीर से धारा 370 ख़त्म करना, CAA का कानून बनाना, कृषि सुधार बिल लाना आदि शामिल है। हालाँकि इन फैसलों की वजह से उन्हें काफी विरोध भी झेलना पड़ा. इस दौरान उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी भावनात्मक झटका लगा. 2022 में नरेंद्र मोदी की माँ हीरा बा का 99 वर्ष की अवस्था में स्वर्गवास हो गया.

     

    हालाँकि साल 2024 में हुए आम चुनाव में नरेंद्र मोदी फिर से लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री तो बने. लेकिन इसबार चुनौतियाँ पहले से ज्यादा बढ़ गयी. जहाँ पिछली दो बार उन्होंने पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई थी, वहीँ इस बार उन्हें गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी. और बात की जाए गठबंधन सरकार की तो पीएम मोदी को गठबंधन सरकार और इसके खींचतान के पूर्व अनुभव नहीं रहा है, न मुख्यमंत्री रहते हुए और न प्रधानमंत्री रहते हुए. एक तरफ गठबंधन की मज़बूरी, दूसरी तरफ मजबूत विपक्ष सरकार के लिए चुनौती बढ़ने वाले, तो तीसरी तरफ गठबंधन सरकार की वजह से वैश्विक शक्तियों का मुखर होता षड़यंत्र. चुनौतियाँ चारो तरफ से आने लगी. और इसे पीएम मोदी के राजनितिक पारी का अंतिम चरण माना जाने लगा. लेकिन केवल एक साल में ही पीएम मोदी ने हमेशा की तरह शानदार वापसी करते हुए हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में लगातार जीत हासिल कर अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया.

     

    अगर बात करें वर्तमान चुनौतियों की तो यह भी चौतरफा खड़ा नजर आ रहा है. चीन के साथ बड़ा व्यापारिक घाटा, बांग्लादेश में तख्तापलट, ऑपरेशन सिन्दूर के बाद पाकिस्तान के साथ तल्ख़ रिश्ते, पाकिस्तान अमेरिका की बढ़ती नजदीकीयां, अमेरिका की तरफ से भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ, और भारत में भी पडोसी देश की तरह राजनितिक उलटफेर के उम्मीद में लगा हुआ देशी और विदेशी शक्तियां. अगर इन तमाम घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो ये यही इशारा कर रही है की अभी भी आगे राह आसन नहीं है.

     

    अगस्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए, और भारत की अर्थव्यवस्था को डेड इकॉनमी कहकर भारतीय अर्थव्यवस्था की एक वैश्विक नकारात्मक छवि बनाकर दबाव बनने की कोशिश की. भारत की विपक्षी पार्टियों ने भी खुलकर ट्रम्प का समर्थन किया. इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जाने लगा. लेकिन ऐसी विषम परिस्थिति में भी पीएम मोदी ने हार नहीं मानी. छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और देश के हितों के लिए ट्रम्प के किसी भी दबाव का सामना करने की घोषणा कर दी.

     

    जहाँ घरेलु मोर्चे पर अर्थव्यवस्था की रफ़्तार बनाए रखने के लिए 15 अगस्त को लाल किले से पीएम मोदी ने ऐतिहासिक GST संशोधन की घोषणा कर दी. जिसमें केवल दो टैक्स स्लैब होंगे – 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत. इससे घरेलु खपत बढेगा, आम नागरिक को सस्ते सामान मिलेंगे और व्यापार को अधिक बिक्री से लिक्विडिटी और आत्म निर्भरता मिलेगी. वहीँ वैश्विक स्तर पर पीएम मोदी ने कूटनीतिक कदम उठाते हुए ब्राजील के राष्ट्रपति लूला, रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से बातचीत की. और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन सम्मेलन में उनकी भागीदारी ने तो अमेरिका को इतना असहज कर दिया की अमेरिका के पूर्व सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा, कि ट्रंप की कार्रवाई ने मोदी को रूस-चीन ब्लॉक के करीब ला दिया है. बिना कुछ बोले पीएम मोदी के इन सब प्रयासों का प्रभाव ये हुआ की टैरिफ के बावजूद भी भारत की दुनियां की सबसे तेज ग्रोथ रेट वाले देशों में बना हुआ है. इतना ही नहीं, प्रेसिडेंट ट्रम्प को भी इस बदलते जियोपॉलिटिक्स पर कई बार बयान देना पड़ा और दबाव में रुका हुआ ट्रेड डील फिर से दबाव में ही बैक चैनल शुरू हो गया.

     

    हालाँकि न तो घरेलु चुनौतियाँ अभी समाप्त हुई और न ही वैश्विक. न तो अभी अमेरिका ने अपनी साजिशें रोकी है और न ही पश्चिमी ताकतों ने. हालांकि अगर इतिहास और पीएम की पिछले सफ़र पर नजर डालें तो यह पता चलता है की जब जब पीएम मोदी के सामने कठिन चुनौती या संकट आई है तब तब वह और मजबूत बनकर निकले हैं. गठबंधन की सरकार चलाते हुए भी पीएम मोदी ने पश्चिमी दबाव का सामना करते हुए भारत को ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के रूप में खड़ा कर दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बुलावे को नजरअंदाज कर यह भी दिखा दिया की उनके लिए भारतीय हित सबसे पहले है. विकास पर उनकी पैनी नज़र और परिणाम हासिल करने की उनकी प्रामाणिक क्षमता ने उन्हें भारत के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक बनाया है। इस मजबूत इरादों का ही परिणाम है की आज वैश्विक स्तर पर पीएम मोदी की स्वीकृति दर 75 प्रतिशत से अधिक है. अब तक उन्हें कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार सहित रूस, युएई, सऊदी अरब सही कई देशों के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा जा चूका है.

     

    एक तरफ भारत की अर्थव्यवस्थ चौथे से तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ दौड़ लगा रहा है तो वहीँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने राजनितिक जीवन की समाप्ति के हर भविष्यवाणी को झुठला कर नया इतिहास लिखते जा रहे हैं. वो हर नई चुनौती को न सिर्फ जीत की सीढ़ियों में बदलते जा रहे हैं, बल्कि 75 की उम्र भी अपनी उर्जा, क्षमता और कार्यकुशलता से सबको आश्चर्यचकित भी कर रहे हैं.

  • Radha Ashtami | राधा रानी के अवतरण दिवस को राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है, क्यों श्रीजी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है?

    Radha Ashtami | राधा रानी के अवतरण दिवस को राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है, क्यों श्रीजी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है?

    Radha Ashtami : Radha Ashtmi | राधा रानी के अवतरण दिवस को राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है, क्यों श्रीजी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है? | सनातन संस्कृति में कृष्णप्रिया राधा रानी का अवतरण भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को माना जाता है, जिसे राधा अष्टमी के रूप पर मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि राधा रानी को प्रसन्न करने से कान्हा जी की कृपा बहुत सहज ही प्राप्त हो जाती है। कान्हाजी को राधा रानी अतिप्रिय हैं, ऐसे में जब भक्त राधा जी को प्रसन्न करते हैं तो भगवान कृष्ण भी प्रसन्न हो जाते हैं।

     

    श्रीजी अर्थात राधाजी महाराज वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। श्री राधाजी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी अर्थात बरसाना में माना जाता है. राधा रानी का गुणगान कृष्ण वल्लभा, श्री वृन्दावनेश्वरी और कृष्णप्रिया जैसे नामों से भी किया जाता है। राधा नाम जपने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और मां लक्ष्मी की असीम कृपा बरसती है.

     

    राधा-कृष्ण का प्रेम केवल दो व्यक्ति, या दो आत्माओं के मिलन जैसा कोई साधारण प्रेम नहीं है, बल्कि परमात्मा और उनकी शक्ति के मिलन से निकली प्रेम, भक्ति और परमार्थ की वह अविरल धारा है, जो युगों-युगों से भक्तों के हृदय को निर्मल कर रही है. श्री राधा रानी को श्रीकृष्ण की शाश्वत शक्ति स्वरूपा और प्राणों की अधिष्ठात्री देवी बताया गया है. मान्यता है कि बिना राधा रानी के श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी है. ये भी माना जाता है कि जब भक्त राधा का नाम लेता है, तो भगवान श्रीकृष्ण अतिप्रसन्न हो जाते हैं और जीवन के सभी कष्ट दूर कर देते हैं. स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा था राधा मेरी आत्मा है. मैं राधा में और राधा मुझमें वास करती हैं.

     

    आपने हमेशा राधा कृष्ण का जप सुना होगा, कभी कृष्ण राधा का जप नहीं सुना होगा. तो श्रीराधा जी का नाम श्रीकृष्ण से पहले क्यों लिया जाता है? वैसे तो इसके कई कारण है जिनका जुड़ाव भारत की संस्कृति और शास्त्रों से है, लेकिन इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता भी है, जिस के अनुसार, शुकदेव जी ने तोते का रूप लेकर राधा के महल में निवास किया था और दिन-रात राधा-राधा जपते थे. एक दिन राधा रानी ने उनसे कहा कि वे अब कृष्ण-कृष्ण नाम जपा करें. जिसके बाद नगर में हर कोई कृष्ण नाम जप करने लगा. यह देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत उदास हो गए थे. उन्होंने नारद जी से कहा कि उन्हें राधा नाम सुनकर ही आनंद मिलता है. कृष्ण को ऐसा बोलते सुनकर राधा रानी की आंखें भर आईं और उन्होंने शुकदेव जी से कहा कि अब से राधा-राधा ही जपा करें. तभी से यह परंपरा बन गई और यहाँ तक कि कृष्ण से पहले भी राधा का नाम ही लिया जाने लगा.

     

    वैसे तो हमारे यहाँ भगवत प्राप्ति के लिए ज्ञान मार्ग, योग मार्ग, भक्ति मार्ग और प्रेम मार्ग जैसे अनेक मार्ग बताए गए हैं, लेकिन कहा जाता है इनमें प्रेम मार्ग जहाँ सरल, सहज, सर्वोत्तम और भगवान को अतिप्रिय है, वहीँ अन्य मार्ग साधारण जीवों के लिए बेहद कठिन है, इसलिए सामन्य गृहस्थ जन भगवत प्राप्ति के लिए ज्यादातर प्रेम मार्ग और भक्ति मार्ग पर ही चलते हैं.

     

    श्री राधायै स्वाहा षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा का विलक्षण महिमा के वर्णन में श्री राधा रानी की पूजा की अनिवार्यता बताते हुए कहा गया है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा रानी की पूजा और अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है।

     

    राधा अष्टमी के इस खास अवसर पर बरसाना के राधा रानी मंदिर समेत देशभर के किशोरी जी को समर्पित मंदिरों को बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया जाता है और राधा रानी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर विशेष चीजों का दान किया जाता है। इस दिन साधक व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से किशोरी जी प्रसन्न होती हैं। Radha Ashtami

  • Hobosexuality | होबोसेक्सुअलिटी आधुनिक जीवनशैली, नए ज़माने का रिश्ता, मॉडर्न प्यार या फिर घर के किराए की व्यवस्था?

    Hobosexuality | होबोसेक्सुअलिटी आधुनिक जीवनशैली, नए ज़माने का रिश्ता, मॉडर्न प्यार या फिर घर के किराए की व्यवस्था?

    Hobosexuality | होबोसेक्सुअलिटी आधुनिक जीवनशैली, नए ज़माने का रिश्ता, मॉडर्न प्यार या फिर घर के किराए की व्यवस्था? | होबोसेक्सुअलिटी (Hobosexuality) एक ऐसा पाश्चात्य ट्रेंड है जिसका चलन आज भारत के महानगरों में बेहद तीव्र गति से हो रहा है. मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे महानगरों में ये चलन आम हो चूका है. कुछ लोग इसे आधुनिक जीवन शैली कह रहे हैं तो कुछ लोग इसे लिव इन रिलेशनशिप भी कहते हैं. हालाँकि होबोसेक्सुअलिटी (Hobosexuality) लिव इन रिलेशनशिप से थोडा अलग है, जिसे समझाने की जरुरत है. भारत के बड़े शहरों में तेजी से बढ़ रहा ये चलन भारत की सामाजिक व्यवस्था को भी तेजी से बदल रहा है.

     

    होबोसेक्सुअल शब्द मूल रूप से पश्चिमी इंटरनेट कल्चर से उभरा है, जिसका इस्तेमाल बोलचाल की भाषा में ऐसे इंसान के लिए किया जाता है जो खास तौर से रहने की जगह हासिल करने के लिए डेटिंग करता है या रिश्ता बनाता है. अर्थात होबोसेक्सुअलिटी एक ऐसा रिश्ता है जिसमें कोई इंसान घर और वित्तीय मदद के लिए किसी रोमांटिक रिश्ते में आता है. अगर खुले शब्दों में कहें तो इस तरह के रिश्ते प्रेम या सामाजिक न होकर विशुद्ध आर्थिक और रणनीतिक होता है.

     

    अगर हम भारत के सांस्कृतिक परिपेक्ष में इस तरह के रिश्ते को देखें तो होबोसेक्सुअलिटी जैसे शब्द अपने आप में थोडा असहज जैसा लगता है, लेकिन जो हकीकत है, उससे आँख बंद करना या इसे हल्के में लेना सही नहीं होगा. क्योंकि आज यह ट्रेंड भारत के शहरी क्षेत्र में चुपचाप और बहुत तेजी से उभर रहा है. हम भी उसी समाज का हिस्सा है जिसमें आज होबोसेक्सुअलिटी जैसा रिश्ता फल फुल रहा है.

     

    भारत की संस्कृति में पहले अरेंज मैरिज का ही चलन था, लेकिन बदलते वक्त के साथ 80-90 के दशक में प्रेम विवाह का चलन बढ़ा और जातियों के बंधन टूटने लगे. फिर पिछले दो दशक में लिव इन रिलेशन का दौर चल पड़ा. बदलते परिस्थिति, सामाजिक बंधन और क़ानूनी दबाव के चलते, नई पढ़ी की उन्मुक्त सोच के युवाओं ने, किसी भी प्रकार के बंधन में बंधने से बचते हुए, लिव इन रिलेशनशिप को अपने सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाया. वहीँ अब बदलती आर्थिक परिस्थिति और महानगरों की दमतोड़ महंगाई में अब नया ट्रेंड भारत के शहरी समाज का हिस्सा बनने लगा है जिसे होबोसेक्सुअलिटी कहते हैं.

     

    होबोसेक्सुअलिटी और लिव इन में क्या है अंतर?

    दरअसल लिव इन में जहाँ दो कपल प्रेम तो करते हैं लेकिन बिना विवाह के या बिना किसी बंधन या स्थाई कमिटमेंट के एक साथ रहना स्वीकार करते हैं, वहीँ होबोसेक्सुअलिटी का आधार प्रेम न होकर आर्थिक होता है. होबोसेक्सुअलिटी में महानगरों के बढ़ते खर्च और घरों के महंगे किराए के बोझ को कम करने के लिए कपल एकसाथ रहना स्वीकार करते हैं.

     

    होबोसेक्सुअलिटी (Hobosexuality) जैसे रिश्ते के तेजी से बढ़ने के पीछे की वजह क्या है?

    दरअसल मुंबई, बेंगलुरु या दिल्ली जैसे महानगरों में काम कर रहे पेशेवर वयस्कों के लिए शहरों में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना तक काफी मुश्किल होता है. किराया चुकाने में ही उनकी मासिक आय का आधा हिस्सा खर्च हो जाता है। अगर Deloitte द्वार की गई 2025 Gen Z and Millennial Work Survey की बात करें तो यह बताती है कि 2025 में मिलेनियल और जेन जी के 50 प्रतिशत से ज्यादा कर्मचारी बड़ी मुश्किल से महीने का खर्चा चला पा रहे हैं और उनकी सेविंग न के बराबर है. महानगरों में आवास की लागत अक्सर एक व्यक्ति की आय का 40 से 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा निगल जाती है. मुंबई जैसे शहर में एक बेडरूम फ्लैट का मासिक किराया कई हाई प्रोफाइल इलाकों में 35,000 से 50,000 तक है. ऐसे में महंगे किरायों के साथ-साथ अकेले रहने की लागत और शहरी जीवन की भावनात्मक अकेलापन, ये सब मिलकर होबोसेक्सुअलिटी जैसे एक नई तरह की रिलेशनशिप ट्रेंड को जन्म दे रहे हैं. इस बात को कहने में थोड़ी असहजता जरुर होती है लेकिन ये सच्चाई है की महानगरों में काफी लोग प्रेम की वजह से कम और रहने की जगह के लिए ज्यादा रिश्तों में आ रहे हैं. ऐसे लोग अक्सर सीरियल डेटर्स होते हैं, जिनका कोई दीर्घकालिक रिश्ते का कोई इरादा नहीं होता।

     

    अब अगर आर्थिक खर्चों के बोझ को कम करने, घर बसाने के सामाजिक दबाव, अपने संघर्ष और उपलब्धियों का दिखावा करने और दूसरों पर एहसान करने की भावना को एकसाथ जोड़ लें, तो एक ऐसा माहौल तैयार होता है, जो होबोसेक्सुअलिटी को पनपने और फलने फूलने का अनुकूल माहौल देता है. इस तरह के रिश्ते काफी सुविधाजनक और आकर्षक तो लगते हैं लेकिन दूसरी तरफ ये खतरनाक भी होते हैं, क्योंकि इसमें आप सिर्फ किराया नहीं दे रहे होते, बल्कि साथ रहने के भ्रम में भी जी रहे होते हैं. जैसे-जैसे होबोसेक्सुअलिटी के रोमांटिक पहलु सामने आते हैं, भावनात्मक दुविधाएँ भी उभरती हैं। हालाँकि सच्चा प्यार ऐसी परिस्थिति में भी पनप सकता है, लेकिन भावनात्मक भ्रम, सामाजिक विसंगति और भविष्य की दुविधा कभी-कभी असुरक्षा, आक्रोश, निर्भरता और अपराध की भावनाओं को जन्म दे सकता है।

     

    इतना ही नहीं, ऐसे रिश्तों में भावनात्मक और आर्थिक संतुलन भी बिगड़ जाता है, जिससे पावर इंबैलेंस और मानसिक परेशानी बढ़ती है. यह सिर्फ आर्थिक मजबूरी का मामला नहीं, बल्कि भावनात्मक हेरफेर और रिश्तों में शक्ति-संतुलन का भी मामला है. यह रिश्ता ऊपर से तो प्यार भरा लगता है, लेकिन अंदर से एक पार्टनर दूसरे पर ज्यादा निर्भर रहता है. लंबे समय तक ऐसे रिश्तों में रहने से एक व्यक्ति की बचत और वित्तीय स्थिरता पर भी असर पड़ता है. और जब एक पार्टनर बार-बार जिम्मेदारियां निभाता है, और दूसरा सिर्फ सुविधा लेता है, तो रिश्ते में उबाऊपन और नाराज़गी बढ़ती है. जिस पर निर्भरता होती है, वही फैसलों में हावी हो जाता है, और दूसरा पार्टनर भावनात्मक रूप से खुद को कमजोर और असहज महसूस करता है. अंततः यह रिश्ता वैचारिक भावनात्मक और आर्थिक बोझ बन जाता है, और समय के साथ टॉक्सिक भी हो जाता है।

     

    न तो हम बदलते आर्थिक और अमाजिक परिवेश को नकार सकते हैं, और न ही रिश्तों की बदलती परिभाषा को नकार सकते हैं. फिर इस नई पारिस्थि में एक स्वास्थ्य रिश्ता बने और प्रेम से चले, इसके लिए समाधान क्या है? तो इसके लिए कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखें! आप भले ही लिव इन रिलेशन में हों या होबोसेक्सुअल रिलेशन में हो, लेकिन इस बात का ध्यान रखें की पार्टनर का आर्थिक योगदान बराबर नहीं हो तो बिलकुल नगण्य भी न हो. आपके पार्टनर की दिलचस्पी आपकी प्रॉपर्टी या पैसे के बजाय आपमें हो. रिश्ते में आर्थिक पारदर्शिता रखने के साथ यह भी देखें की आपके भावनात्मक जरूरत के समय आपके पार्टनर का रवैया और उपस्थति कैसा है. रिश्ते में दोनों को भावनात्मक और व्यावहारिक योगदान देना चाहिए. आर्थिक और भावनात्मक रूप से खुद को मजबूत बनाएं, ताकि किसी पर मजबूरी में निर्भर न होना पड़े. यदि कभी भी ऐसा महसूस हो रहा है कि रिश्ता एकतरफा हो रहा है, तो या तो सीमाएं तय करें या फिर ऐसे रिश्ते को न कहना सीखें.

     

    होबोसेक्सुअलिटी के टॉपिक पर चर्चा करने के पीछे हमारा उद्देश्य इसकी निंदा करना या महानगरों में आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे लोगों को शैतान बताना नहीं है. हमारा उद्देश्य बदलते सामजिक परिवेश में भी एक सामजिक संतुलन और स्वस्थ रिश्ते बनाए रखना और संभावित डिप्रेशन से लोगों को आगाह करना है. ताकि रिश्तों के बदलते सामजिक स्वरुप को अपनाने पर भी वो सजग और खुशहाल रहें. रिश्ते सिर्फ सुविधा पर नहीं, बल्कि बल्कि सम्मान, प्रेम, समानता, जागरूकता और भविष्य की संभावना पर भी आधारित हो. अगर आप शहरी जीवन में डेटिंग कर रहे हैं, तो रिश्ते में योगदान और संतुलन को लेकर शुरुआत से स्पष्ट रहें। क्योंकि प्यार का मकसद केवल साथ रहना नहीं, बल्कि साथ निभाना है। प्यार का मतलब आश्रय देना हो सकता है, लेकिन उसे एकतरफा जिम्मेदारी में बदलना, किसी के लिए भी सेहतमंद नहीं है.