Navratri 2025 | शारदीय नवरात्रि में Maa Durga के नौ रूपों की पूजा की जाती है | Durga Puja | पुरे देश में नवरात्री (Navratri) की धूम है! हर तरफ माता की साधना और पूजा चल रहा है. लेकिन क्या आपको मालूम है साल में नवरात्रि का पर्व एक बार नहीं बल्कि चार बार आता है। पहला नवरात्री चैत्र के महीने में आता है, जिसे चैत्र नवरात्री कहा जाता है. इस नवरात्रि के साथ ही हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है। दूसरी नवरात्रि आश्विन माह में आती है, जिसे शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। इसके आलावा पौष और आषाढ़ के महीने में भी नवरात्रि का पर्व आता है, जिसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, और गुप्त नवरात्री को तंत्र साधना के लिए विशेष माना जाता है। लेकिन अगर बात की जाए गृहस्थ और सामान्य लोगों की उनके लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि को ही उत्तम माना गया है।
चैत्र नवरात्री और शारदीय नवरात्री में क्या अंतर है?
जहाँ चैत्र नवरात्री (Chitra Navratri) मनाने के पीछे की कहानी यह है की जब वरदान पाकर शक्तिशाली हो चुके महिषासुर का आतंक धरती पर बढ़ गया और वरदान की वजह से देवता भी उसे हरा पाने में असमर्थ हो गए। ऐसे में देवताओं ने माता को प्रसन्न कर उनसे रक्षा की विनती की। इसके बाद मातारानी ने अपने अंश से नौ रूप प्रकट किए। ये पूरा विधान चैत्र के महीने में प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर 9 दिनों तक चला, तब से इन नौ दिनों को चैत्र नवरात्रि के तौर पर मनाया जाने लगा।
वहीँ शारदीय नवरात्री (Sharadiya Navratri) मनाने का कारण यह माना जाता है की देवी दुर्गा ने आश्विन के महीने में ही महिषासुर से नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसलिए इन नौ दिनों को शक्ति की आराधना के रूप में तो दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है. चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रि का भगवान् राम से भी विशेष संबंध है. चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन रामनवमी आती है। प्रभु श्रीराम का जन्म रामनवमी के दिन ही हुआ था. जबकि शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी होता है और महानवमी के अगले दिन विजयदशमी होता है। विजयदशमी के दिन ही माता दुर्गा ने महिषासुर का मर्दन किया था और भगवान् श्रीराम ने रावण का वध किया था, जिसे दशहरा के रूप में भी मनाया जाता है।
नवरात्री के दौरान सात्विक जीवन, साधना, व्रत और, उत्सव आदि का महत्व है। नवरात्र के नौ दिनों को तीन भागों में बांटा गया है। पहले तीन दिन को ‘तमस’ को जीतने की साधना, अगले तीन दिन को ‘रजस’ और अंतिम तीन दिन को ‘सत्व’ को जीतने की साधना माना जाता है. अर्थात यह त्यौहार सृष्टी के त्रिगुणात्मक शक्तियों की साधना का भी त्यौहार है. नवरात्र की शुरुआत कलश स्थापना और जौ बोने की परंपरा से होती है, और नौ दिनों तक प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।
पहले दिन : माता शैल्पुरी (Maa Shailputri Devi)
प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है. इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल है और उनका वाहन वृषभ है। शैलपुत्री माता की पूजा से जीवन में स्थिरता, शक्ति और साहस प्राप्त होता है। भक्तों को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ मिलता है और जीवन के संकटों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।
दुसरे दिन : माता ब्रहाम्चारिणी (Maa Brahmacharini Devi)
नवरात्री के दुसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. जिसका अर्थ है ‘तपस्विनी’ या ‘धर्म का पालन करने वाली’। इनके एक हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल होता है। ब्रह्मचारिणी देवी तपस्या और भक्ति का प्रतीक हैं। इनकी पूजा से मनुष्य के अंदर आत्मनियंत्रण, धैर्य और दृढ़ संकल्प का विकास होता है।
तीसरे दिन : माता चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta Devi)
नवरात्री के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की की पूजा की जाती है. इनके मस्तक पर एक घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, जिसके कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. ये रणचंडी के नाम से भी जानी जाती हैं और युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहती हैं. उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं। चंद्रघंटा देवी के इस रूप की पूजा करने से साहस, आत्मविश्वास और शक्ति का संचार होता है।
चौथे दिन : माता कुष्मांडा (Maa Kushmanda Devi)
नवरात्री के चौथे दिन माता कुष्मांडा की पूजा होती है. इन्हें असंख्य ब्रह्मांडों की रचना करने वाली माता मान जाता है. वह सिंह पर सवार होती हैं, और इनके आठ हाथों में कमल, अमृत कलश, धनुष-बाण, चक्र, गदा और जप माला धारण है। कूष्मांडा देवी ऊर्जा और जीवन की स्रोत मानी जाती हैं। कूष्मांडा माता की पूजा से जीवन में समृद्धि, ऊर्जा और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
पांचवे दिन : माँ स्कंदमाता (Maa Skandamata Devi)
नवरात्री के पांचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाति है. इन्हें भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेय की माता के रूप में जाता है, और यह मातृत्व का प्रतीक हैं. देवी स्कंदमाता चार भुजाओं वाली हैं और अपनी गोद में स्कंद को लिए सिंह पर विराजमान हैं। स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को उनके परिवार और संतान की रक्षा और कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
छठे दिन : माता कात्यायनी (Maa Katyayani Devi)
नवरात्री के छठे दिन माता कात्यायनी की आराधना की जाती है. इन्हें स्त्री की उस शक्ति का प्रतीक माना जाता है जो परिवार को बुराइयों से बचाती है. माता कात्यायनी के चार हाथ हैं और वह सिंह पर सवार होकर आती हैं। कात्यायनी माता की पूजा करने से भक्तों को साहस और बल मिलता है।
सातवें दिन : माता कालरात्रि (Maa Kaalratri Devi)
नवरात्री सातवें दिन माता कालरात्रि की उपासना की जाती है. माता कालरात्रि को अंधकार और भय को नष्ट करने वाली देवी माना जाता है। यह देवी का सबसे उग्र रूप है, जिसमें वह काले रंग की होती हैं, उनके चार हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं और वह गधे पर सवार रहती हैं। कालरात्रि की पूजा से सभी प्रकार के भय और बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है। यह स्वरूप शत्रुओं के नाश के लिए जाना जाता है।
आठवें दिन : माता महागौरी (Maa Mahagauri Devi)
नवरात्री के आठवें दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है. माता महागौरी का वर्ण श्वेत है, जिसके कारण इन्हें महागौरी कहा जाता है। वह बैल पर सवार होती हैं और उनके चार हाथ होते हैं। महागौरी को माता का सबसे उत्कृष्ट रूप माना जाता है, जो चरित्र की पवित्रता और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है. महागौरी की पूजा से पवित्रता, शांति और करुणा का आशीर्वाद मिलता है। यह रूप जीवन में शांति और सौंदर्य का प्रतीक है।
नौवें दिन : माता सिद्धिदात्री (Maa Siddhidatri Devi)
नवरात्री के आखिरी और नौवें दिन माता के सिद्धिदात्री रूप की पूजा की जाती है. इन्हें सभी सिद्धियों की दाता माना जात है. इनके चार हाथ होते हैं। वह कमल पर विराजमान होती हैं और उनका वाहन सिंह होता है। उनका यह स्वरूप ज्ञान और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देता है। सिद्धिदात्री की आराधना से सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति होती है।
मौसम और विज्ञानं का रहस्य
नवरात्री के इन त्यौहारों के पीछे जीवन, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ा एक वैज्ञानिक पहलु भी है. जब नवरात्र मनाए जाते हैं तब का समय मौसम बदलने का भी होता है, और शरीर को नए वातावरण के अनुसार ढालने की जरूरत होती है। ऐसे में उपवास और हल्का भोजन करने से शरीर को शुद्ध रखने और शरीर के रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलती है। जीवन के उतार चढाव और नियमित तनाव, खासकर आज के तेज रफ्तार वाली आधुनिक जीवन शैली में नवरात्र का त्यौहार न सिर्फ नए उत्साह का संचार करता है, बल्कि हमें थोड़ा ठहरकर आत्मचिंतन करने का अवसर भी देता है।
नवरात्री (Navratri) को बुराई पर अच्छाई की जीत, शक्ति की साधना, जीवन में नई शुरुआत, आध्यात्मिक उन्नति, और सामाजिक समरसता के उत्सव के रूप मनाया जाता है. नवरात्रि के दौरान, लोग उपवास करते हैं, पूजा करते हैं, और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह त्योहार लोगों को एकसाथ जोड़ता है और उन्हें अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है. इस दौरान भारत के हर कोने में एक अलग ही उल्लास और उत्साह देखने को मिलता है। चाहे वह व्रत-उपवास हो रामलीला का मंचन हो गरबा की धूम हो या भव्य दुर्गा पूजा, नवरात्र हर रूप में हमें अपनी परंपराओं से जोड़ता है। भारतीय संस्कृति में नवरात्र सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम है।












