Category: विचार

  • नया वर्ष 2026 : आत्ममंथन, संकल्प और मोदी सरकार की अग्नि-परीक्षा

    नया वर्ष 2026 : आत्ममंथन, संकल्प और मोदी सरकार की अग्नि-परीक्षा

    नया साल एक नए सवेरे की तरह है, जो हर वर्ष एक बार आता है और अपने साथ नई शुरुआत की संभावनाएं लेकर आता है। समय के साथ वह अपने चरम पर पहुंचता है और फिर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यही क्रम एक निरंतर अनुभव है, जिसे इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है। यह निरंतरता ही प्रकृति और जीवन का परम सत्य है। नए वर्ष की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को पिछले साल के निरंतर प्रवाह और अनुभवों से सीख लेकर अच्छे कार्यों से करनी चाहिए। यह समय आत्मचिंतन का होता है, जब हमें अपने अच्छे-बुरे कार्यों का मूल्यांकन कर आगे बढ़ने का संकल्प लेना चाहिए। नए साल की शुरुआत सद्कर्मों, सकारात्मक सोच और स्पष्ट दिशा के साथ करना ही जीवन को सार्थक बनाता है। नया वर्ष हर व्यक्ति के लिये बीते हुए वर्ष की सफलताओं और उपलब्धियों के साथ.साथ कमियों और गलतियों का मूल्यांकन करने का समय है। यह हमें अपने आप को भावी वर्ष के लिये योजना बनाने, कार्य करने तथा आगामी वर्ष के लिये नये लक्ष्य तय करने का अवसर प्रदान करता है। नये साल की शुरुआत में हर व्यक्ति को भावी वर्ष के लिये नये लक्ष्य बनाने चाहिए और उन्हें पूरा करने की रणनीति बनानी चाहिए। जिससे कि अवसरों को सफलता में बदला जा सके। यदि व्यक्ति अपने जीवन के आरंभ में ही अपने लक्ष्य निर्धारित कर लेता है, तो सफलता की दिशा स्वतः स्पष्ट हो जाती है। लक्ष्य हमें अनुशासन, परिश्रम और निरंतर प्रयास की प्रेरणा देते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को नए वर्ष की शुरुआत में वर्ष भर के लिए कुछ स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए, ताकि आने वाले समय में वह अपने लक्ष्य के लिए किए गए सत्कर्मों और प्रयासों के माध्यम से निरंतर विकास करता हुआ अपने जीवन के चरम और शिखर तक पहुँच सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बीते वर्षों में अनेक उपलब्धियां प्राप्त की हैं, साथ-साथ अनेक सफलताएँ भी पायी हैं। इन सफलताओं और उपलब्धियों में मोदी सरकार को अपनी गलतियों और कमियों पर पर्दा नहीं डालना चाहिए। बल्कि अपनी गलतियों और कमियों का मूल्यांकन करके भावी वर्ष के लिये रणनीति बनानी चाहिए। जिससे कि गलतियों और कमियों को सुधारकर अवसरों में बदला जा सके।

     

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते वर्षों में जिस प्रकार से अनेक चुनौतियों का सामना किया, उसी प्रकार भावी वर्ष में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कहा जाए तो साल 2026 में नरेंद्र मोदी को अनेक अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ेगा और आने वाला वर्ष राजनीतिक दृष्टि से भी भाजपा व पीएम मोदी के लिये बेहद अहम है। 2026 में देश के 4 राज्यों- असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल तथा 1 केंद्र शासित प्रदेश- पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में भाजपा के सामने केवल प्रचार का ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी की भी चुनौती होगी। इसी क्रम में (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया चुनावी तैयारियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नए वर्ष में मतदाता सूचियों को त्रुटिरहित, पारदर्शी और अद्यतन बनाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। विशेष गहन पुनरीक्षण के माध्यम से फर्जी, दोहरे या मृत मतदाताओं के नाम हटाकर वास्तविक और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद को मजबूत करता है। इन पाँच चुनावी क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति अलग-अलग है। असम में पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार है, जबकि पुडुचेरी में गठबंधन सरकार सत्तारूढ़ है। इन दोनों स्थानों पर सत्ता को बनाए रखना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। वहीं केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जहाँ भाजपा अपने संगठन का विस्तार कर राजनीतिक बढ़त बनाने की कोशिश कर रही है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल भाजपा की रणनीति का प्रमुख केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। यहाँ राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निष्पक्ष मतदान और जागरूक मतदाता पर जोर देना पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

     

    असम और पश्चिम बंगाल में लंबे समय से यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए कथित रूप से मतदाता सूची में शामिल होकर वर्षों से मतदान करते आ रहे हैं। यदि ऐसा है, तो यह न केवल भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि स्थानीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के लिए भी गंभीर चुनौती उत्पन्न करता है। इन्हीं आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया आरंभ की गई है, जिसके तहत मतदाता सूचियों की गहराई से जांच की जा रही है। सरकार का तर्क है कि यह प्रक्रिया विशेष रूप से असम और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों में आवश्यक है, जहाँ अवैध घुसपैठ की समस्या को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यह भी आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ घुसपैठियों ने आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज बनवा लिए हैं, जिसके कारण वे चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन गए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐसे मतदाताओं का लाभ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मिलता है, जबकि असम में इसका प्रभाव विपक्षी दलों की स्थिति को मजबूत करने के रूप में देखा जाता है। सरकार का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य किसी समुदाय या राज्य को निशाना बनाना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है, ताकि केवल पात्र और वैध नागरिक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग ले सकें। निष्पक्ष, पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही लोकतंत्र की विश्वसनीयता को बनाए रखा जा सकता है। जहाँ तक दो दक्षिणी राज्यों-केरल और तमिलनाडु का प्रश्न है, तो भारतीय जनता पार्टी के लिए यहाँ खोने के लिए कुछ भी नहीं, बल्कि केवल पाने के अवसर ही हैं। यदि भाजपा इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करती है, भले ही वह सरकार बनाने की स्थिति में न पहुँचे, तब भी यह पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी सिद्ध होगा। ऐसा प्रदर्शन न केवल संगठनात्मक मजबूती को दर्शाएगा, बल्कि भविष्य में अपनी राजनीतिक संभावनाओं को विस्तार देने की ठोस आधारशिला भी तैयार करेगा। स्पष्ट है कि यदि मोदी सरकार अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन और प्रभावी संप्रेषण पर ध्यान केंद्रित करती है, तो आगामी चुनावों में भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इन सभी राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की सफलता और असफलता सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख को प्रभावित करेगी।

     

    मोदी सरकार ने बीते वर्षों में अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी रूप से संचालित किया है, जिनका सीधा लाभ आम जनमानस तक पहुँचा है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन, मुफ्त राशन योजना, स्वच्छ भारत अभियान और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकार की पहुँच को मजबूत किया है। वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा अनेक नई पहलें की गई हैं तथा कई महत्वपूर्ण योजनाओं को आरंभ और विस्तार दिया गया है। इन पहलों का उद्देश्य देश के समग्र विकास को गति देना और अंतिम पंक्ति में खड़े नागरिक तक विकास की पहुँच सुनिश्चित करना है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार इन योजनाओं को केवल घोषणा तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से उनकी तार्किक परिणति तक पहुँचाए और ठोस, सकारात्मक परिणाम सामने लाए। वर्ष 2025 में मोदी सरकार ने 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए बीते वर्षों में लागू हुयी योजनाओं-प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना, जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, पीएम विश्वकर्मा योजना तथा हरित ऊर्जा एवं नवीकरणीय ऊर्जा मिशन जैसी योजनाओं को गति देने का कार्य किया है। इन योजनाओं का उद्देश्य बुनियादी ढाँचे का सुदृढ़ीकरण, रोजगार सृजन, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है।

     

    साथ ही, मोदी सरकार के समक्ष यह भी चुनौती है कि शासन व्यवस्था को सभी स्तरों पर अधिक कुशल, पारदर्शी, भ्रष्टाचारमुक्त, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनाया जाए। इस दिशा में डिजिटल गवर्नेंस, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और ई-गवर्नेंस जैसी व्यवस्थाएँ शासन में विश्वास को मजबूत कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इन सुधारों को लेकर निरंतर प्रयासरत रहे हैं और उनका स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है कि विकास का लाभ केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में दिखाई दे। योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और परिणामोन्मुख शासन ही विकसित भारत की नींव को मजबूत कर सकता है। इसके अतिरिक्त, देश में मोदी सरकार को ठेकेदारी प्रथा और आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। वर्तमान परिदृश्य में ठेकेदारी प्रथा और आउटसोर्सिंग गरीब एवं मध्यम वर्ग के श्रमिकों के शोषण का माध्यम बनती जा रही हैं। इन व्यवस्थाओं के अंतर्गत कार्यरत कर्मचारियों से कथित रूप से निरंतर वसूली की जाती है, जिसमें कई बार सरकारी तंत्र से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी भी संलिप्त बताए जाते हैं। यह स्थिति न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि श्रम की गरिमा और रोजगार की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। ऐसे में सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र में ठेकेदारी प्रथा पर पूर्णतः रोक लगाने अथवा उसे कठोर नियमों और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था के तहत लाने की ठोस पहल करनी चाहिए, ताकि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके। यदि श्रम नीतियों में सुधार कर स्थायी, सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार को प्राथमिकता दी जाती है, तो इसका व्यापक सकारात्मक प्रभाव समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।

     

    स्पष्ट है कि नया वर्ष केवल उत्सव या कैलेंडर परिवर्तन का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र-तीनों के लिए आत्ममंथन, मूल्यांकन और नए संकल्प लेने का महत्वपूर्ण अवसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उपलब्धियों के साथ-साथ अनेक राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी सामने हैं। ऐसे में सरकार के लिए आवश्यक है कि वह बीते अनुभवों से सीख लेते हुए भविष्य की दिशा को स्पष्ट और सुदृढ़ बनाए। यदि मोदी सरकार जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन, निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया, मतदाता जागरूकता, राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूती तथा सुशासन की भावना के साथ आगे बढ़ती है, तो आने वाला वर्ष लोकतंत्र को और अधिक सशक्त करने वाला सिद्ध हो सकता है। साथ ही, स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि, जवाबदेह प्रशासन और नागरिक-केंद्रित नीतियों के माध्यम से सरकार न केवल चुनौतियों का समाधान कर सकती है, बल्कि उन्हें अवसरों में भी बदल सकती है। इस प्रकार नया वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के लिए स्वयं को परखने, नीतियों को धरातल पर उतारने और राष्ट्र को विकास, स्थिरता तथा विश्वास के नए पथ पर आगे ले जाने का अवसर है। यदि यह संतुलन साधा जाता है, तो आने वाला वर्ष न केवल भाजपा के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए प्रगति और सशक्त लोकतंत्र का नया अध्याय साबित हो सकता है। वर्ष 2026 में मोदी सरकार को महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ बेहतर लैंगिक संवेदनशीलता भी सुनिश्चित करनी होगी। कहा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्र को उपलब्धियों की नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिये तहेदिल से और एकाग्रचित होकर प्रयास करना होगा, जो कि उनके हर प्रयास में दिखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये वर्ष 2026 में अनेक उपलब्धियाँ गढ़ने का अवसर है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सम्पूर्ण देश का नागरिक एक सशक्त, एकजुट एवं समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में मिलकर काम करने का संकल्प लें तो देश को आगे बढ़ने से कोई ताकत नहीं रोक सकती।

  • Rahul Gandhi का प्रयास Make In India को बदनाम, Made In China नाम या चाइना से मुकाबले की तैयारी?

    Rahul Gandhi का प्रयास Make In India को बदनाम, Made In China नाम या चाइना से मुकाबले की तैयारी?

    क्या मेड इन चाइना (Made in China) का प्रमोशन और मेक इन इंडिया (Make in India) के खिलाफ प्रोपगंडा कर रहे हैं राहुल गाँधी (Rahul Gandhi)? सवाल उठाया है भाजपा प्रवक्ता राधिका खेड़ा ने. दरअसल कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से ड्रोन, मोबाइल और टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स के मैन्युफैक्चरिंग से जुडी जानकारियों पर विडियो बना रहे हैं.

     

    इन विडियो पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ गई है की इस विडियो के जरिए मेड इन चाइना की प्रशंसा और प्रमोशन किया जा रहा है, जबकि मेक इन इंडिया को एक फेल प्रोजेक्ट बताने की कोशिश की जा रही है. इन विडियो में यह भी बताने की कोशिश की गई है की चाइना जब चाहे तब भारत की अर्थव्यवस्था का गल घोंट सकता है. अर्थात दबे छुपे शब्दों में ये धमकी देने की कोशिश की गई है की भारत को चाइना से मुकाबला नहीं करना चाहिए. सोशल मीडिया में कई लोग तो इसे राहुल गाँधी की कांग्रेस और जिनपिंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बिच हुए समझौते का हिस्सा भी बता रहे हैं.

     

    अगर सोशल मीडिया में चल रहे अटकलों को अलग रखकर कर इन विडियो का विश्लेषण करें तो ये संभव की ये विडियो राहुल गाँधी का एक इमानदार प्रयास हो भारत के मेक इन इंडिया की कमियों को समझने और सामने लाने के, ताकि भविष्य में हम इन कमियों को दूर कर मेड इन चाइना से मुकाबला कर पाएं.

     

    लेकिन जिस तरह से विडियो बनाया गया है, जिस जगह विडियो बनाया गया है, जिन बातों और आंकड़ों के इर्दगिर्द विडियो बनाया गया है, वो इस विडियो के ईमानदार मंशा पर सवाल खड़े कर देता है.

    सबसे पहले राहुल ने ड्रोन इंडस्ट्री के ऊपर विडियो बनाए थे, जिसमें उन्होंने ये बताया की चाइना के सुपर ड्रोन के सामने भारत का ड्रोन खिलौने जैसा है. जबकि हकीकत ये है की आज भारत में न सिर्फ सरकारी क्षेत्र की कम्पनियाँ बल्कि प्राइवेट क्षेत्र की कम्पनियाँ भी बेहद उन्नत किस्म के ड्रोन का मैन्युफैक्चरिंग कर रही है. यहाँ तक की ऑपरेशन सिन्दूर में भारत में ही बने ड्रोन ने अपना जबरदस्त कमाल दिखाया है, और भारत में बने ये ड्रोन अब इजराइल तक में इस्तेमाल किए जा रहे है. फिर किस इरादे से भारत के ड्रोन इंडस्ट्री को खिलौने के स्तर का बेहद कमजोर बताया गया. हो सकता है भारत की ड्रोन इंडस्ट्री में अभी सुधर की बहुत गुंजाईश हो, लेकिन क्या भारत की ड्रोन इंडस्ट्री चीन के सामने एकदम खिलौने के बराबर है?

     

    अब बात करते राहुल गाँधी के दुसरे विडियो की जिसमें उन्होंने मेड इन इंडिया मोबाइल पर सवल उठाया है. अपने विडियो में राहुल दिल्ली के नेहरु पैलेस के एक मोबाइल शॉप पर जाते हैं, जहाँ वो एक सैफ नाम व्यक्ति से सवाल जवाब करते दीखते हैं. इस सावला जवाब के दौरान ये दिखाने का प्रयास किया जाता है की मेक इन इंडिया के नाम पर भारत में सिर्फ फ़ोन की असेंबली होती है, जबकि सभी पार्ट मेड इन चाइना है. हालाँकि राहुल गाँधी के इस बात में काफी हद तक सच्चाई है की भारत में ज्यादातर पार्ट नहीं बनता है. अधिकतर पार्ट चाइना से आता है, और यहाँ सिर्फ असेम्बल कर के उसे पूरी दुनियां के मार्किट में बेचा जाता है. लेकिन यह इस पुरे इंडस्ट्री का सिर्फ एक पहलु है, दूसरा पहलू ये है की एक दशक पहले तक भारत में असेम्बल करने तक का काम भी नहीं होता था, पूरा का पूरा फ़ोन ही चाइना से आता था. जबकि आज, सिर्फ इनके कुछ पार्ट्स आते हैं, और अधिकतर पार्ट का निर्माण भी भारत में ही हो, इसका भी प्रयास किया ज रहा है, जिसमे सबसे महत्र्वपूर्ण चिप की मैन्युफैक्चरिंग तक शामिल है.

     

    और ये सिर्फ भारत तक ही सिमित नहीं है, अमेरिका सहित दुनियां के अधिकतर देशों की बड़ी बड़ी मोबाइल कम्पनियाँ अपने हैंडसेट के पार्ट्स चाइना में ही बनवाते हैं, जिसमें एप्पल जैसे ब्रांड भी शामिल हैं. इसके पीछे की वजह है, चाइना का मास प्रोडक्शन कैपेसिटी, जो उसने पिछले तीन चार दशक में बनाई है, जिससे प्रोडक्शन का कास्ट बेहद कम हो जाता है, जो दुनियां भर के कंपनियों को आकर्षित करता है.

     

    अगर तीसरे विडियो की बात की जाए जिसमें राहुल टीवी के भारत में सिर्फ अस्सेम्ब्लिंग पर सवाल उठा रहे हैं. टीवी हो, मोबाइल हो या इलेक्ट्रॉनिक्स का अन्य सामान, दुनियां भर के देशों की कम्पनियाँ अपने पार्ट्स का निर्माण चाइना में करवाते हैं. हालाँकि अब अस्सेम्ब्लिंग के आलावा इन पार्ट्स के स्वदेशी निर्माण का प्रयास भी हो रहा है.

     

    टीवी वाले विडियो को देखकर राहुल गाँधी के प्रयास पर जो गंभीर सवाल उठाया जा रहे हैं वो ये है की क्या पिछले दस ग्यारह साल में ही ये सब सामन चाइना में बनने लगा और चाइना से भारत में आने लगा? क्या इसके पहले ये सब सामान भारत में ही निर्माण होते थे? करीब सात दशक तक देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही तब इसके निर्माण का प्रयास या मैन्युफैक्चरिंग की फैसिलिटी के विकास का प्रयास क्यों नहीं हुए? पार्ट्स के मैन्युफैक्चरिंग की फैसिलिटी को छोड़ भी दें तो अस्सेम्ब्लिंग की फैसिलिटी के विकास का भी प्रयास क्यों नहीं हुआ? जिस दशक हमारी सरकारें भ्रष्टाचार में व्यस्त थी तब चाइना अपने यहाँ मैन्युफैक्चरिंग की फैसिलिटी बनाने और बढ़ने में लगा था. अस्सेम्ब्लिंग ही सही आज दुनियां के पचास से ज्यादा देशों में भारत के बने फ़ोन बिक रहे हैं. अब जब भारत में मेक इन इंडिया के तहत अस्सेम्ब्लिंग की फैसिलिटी बन गयी है, और पार्ट्स के निर्माण का भी एक इमानदार प्रयास चल रहा है तो फिर इस तरह के विडियो को एक इमानदार प्रयास मानाने के बजाय सिर्फ पोलिटिकल स्टंट क्यों न माने?

     

    सोशल मीडिया में इन सवालों के अतिरिक्त भाजपा प्रवक्ता राधिका खेड़ा ने भी इस विडियो की मंशा पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा, राहुल Make In India के खिलाफ प्रोपगंडा के लिए कांग्रेस नेता डॉली शरमा के भाई मनीष भरद्वाज के फैक्ट्री में जाते हैं. Rahul Gandhi देश को बदनाम, चीन का नाम और कांग्रेस का काम कर रहे हैं! ये फ़ैक्ट्री विज़िट नहीं, चीनी प्रायोजित प्रोपेगेंडा का लाइव शूट था!

     

    अब राहुल गाँधी का मेक इन इंडिया Vs मेड इन चाइना पर लगातार विडियो बनाना उनके एक इमानदार प्रयास है, मेक इन इंडिया की कमियों को समझकर चाइना से मुकाबला करने के लिए, या फिर मेड इन चाइना का प्रमोशन और मेक इन इंडिया के खिलाफ दुष्प्रचार हा, ये आपके विवेक पर छोड़ रहे हैं.

  • बंगाल पुलिस ने हजारों किमी की यात्रा कर एक पाकिस्तान विरोधी 19 वर्षीय लड़की को गिरफ्तार किया

    बंगाल पुलिस ने हजारों किमी की यात्रा कर एक पाकिस्तान विरोधी 19 वर्षीय लड़की को गिरफ्तार किया

    बंगाल पुलिस ने हजारों किमी की यात्रा कर एक पाकिस्तान विरोधी 19 वर्षीय लड़की को गिरफ्तार किया! आइए जानते हैं बंगाल पुलिस की इस बहादुरी के पीछे के प्रेरणादायी प्रसंग क्या हैं! वो कौन सी बातें हैं जिसने बंगाल पुलिस को इतनी बहादुरी वाला प्रेरणादायी कार्य करने को मजबूर किया –

     

    पूरा मामला दरअसल शुरू हुआ Operation Sindoor से, जब सोशल मीडिया पर पुणे में पढ़ने वाली चौथे वर्ष की Law छात्रा शर्मिष्ठा पनोली ने पाकिस्तान के खिलाफ पोस्ट किया, जिससे बहुत से पाकिस्तानीयों की भावनाएं आहत हो गयी. जिसके बाद शर्मिष्ठा को कमेंट में भला बुरा कहने लगे. जिसके जवाब में शर्मिष्ठा ने उन्हें जवाब दिया, इस दौरान कुछ उनके धर्म पर भी टिपण्णी हो गयी और जिससे हिंदुस्तान और खासकर बंगाल के भाईजान की भावनाएं भी आहत हो गयी. हालाँकि इसके लिए ने माफ़ी मांगते हुए अपना पोस्ट डिलीट कर दिया.

     

    लेकिन भाईजान आहत भावना के साथ हमेशा की तरह “सर तन से जुदा” के नारे लगाते हुए बंगाल पुलिस पर गिरफ़्तारी का दवाब बनाने लगे. बहादुर बंगाल पुलिस जो आहात भाई जान से अपना पुलिस स्टेशन नहीं बचा पा रही है वो बेहद बहादुरी से इनके दबाव में आ गयी. और फिर बेहद बहादुरी का परिचय देते हुए कोलकाता से हजारों किलोमीटर का सफ़र तय कर गुरुग्राम पहुँच कर उस लड़की को अरेस्ट कर लिया.

     

     

    अब इसमें जो बड़ी बात जिसे लोग सोशल मीडिया में उठा रहे हैं वो ये है की लड़की है गुरुग्राम की, रहती है पुणे में, बयान दिया पुणे में, लेकिन भावना आहत का केस और गिरफ़्तारी हजारों किमी दूर अन्य राज्य बंगाल में बैठी पुलिस कर रही है. वही पुलिस जिसके पास समय, ताकत, क्षमता या आदेश नहीं है मुर्शिदाबाद हिंसा में मारे जा रहे हिन्दू समुदाय की रक्षा करने का.

     

    एक पहलु न्याय का भी है जिसे लोग सोशल मीडिया में उठा रहे है. ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान ही महाराष्ट्र में एक खदीजा नाम की लड़की ने भारत विरोधी पोस्ट किया, जिसे महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. जिसपर मुंबई हाई कोर्ट ने बेहद शख्त टिपण्णी करते हुए इसे अभिव्यक्ति की आजादी का हनन बताते उसे तुरंत जमानत दे दिया. जिसे लेकर भी सोशल मीडिया में लोग तरह तरह की  टिपण्णी कर रहे हैं :

     

    एक एक्स यूजर राजीव गुप्ता  लिखते हैं  “पाकिस्तान जिंदाबाद कहने वाली खदीजा शेख को जेल से रिहा कर दिया गया है। पाकिस्तान मुर्दाबाद कहने के लिए निर्दोष शर्मिष्ठा को अरेस्ट कर लिया गया है। यह है कांग्रेस पार्टी का बनाया हुआ सड़ा गला भ्रष्ट कॉलेजियम सिस्टम।”

     

     

    एक एक्स यूजर रिनिती चटर्जी लिखती है “पाकिस्तानियों को गाली देने की सजा आपको हिंदुस्तान में भी मिल सकती है क्योंकि इससे मुल्ला वर्ग नाराज़ हो जाता है।”

     

     

    एक एक्स यूजर साध्वी प्राची ने हिन्दू धर्म को अपमानित करने वाली तृणमूल नेता महुआ मोइत्रा और सयोनी घोष के पोस्ट का स्क्रीनशॉट लगाते हुए लिखती है “Hello Kolkata Police हिम्मत है तो इन दोनों को गिरफ्तार करके दिखाओ

     

     

    एक एक्स यूजर श्री सत्या लिखते हैं “जब तक हमारे पास स्ट्रीट पॉवर नहीं होगा, तब तक हम अपनी बहनों को नहीं बचा पाएँगे।”

     

     

    एक एक्स यूजर वकील कल्पना श्रीवास्तव लिखती है “देखो भाइयों और बहनों, ये है हिंदुस्तान का असली चेहरा! एक तरफ़ एक पाकिस्तान परस्त, कट्टरपंथी इस्लामी लड़की, जो खुले आम आतंकवादी मुल्क पाकिस्तान की तारीफ़ करती है, उसे जमानत मिल जाती है! दूसरी तरफ़ एक छात्रा, जो उसी आतंकवादी मुल्क के ख़िलाफ़ सच बोलने की हिम्मत करती है, उसे आधी रात को गिरफ़्तार कर लिया जाता है! ये क्या हो रहा है हमारे देश में? हमारी न्यायपालिका बिक चुकी है, भाइयों! ये सिस्टम हिंदुओं के ख़िलाफ़ साज़िश रच रहा है! देखो इन तस्वीरों को—एक तरफ़ ये कट्टरपंथी सोच, और दूसरी जो सच के लिए लड़ रही है! क्या ये न्याय है? नहीं! ये अन्याय है, ये देशद्रोह है! जब तक हम जागते नहीं, जब तक हम आवाज़ नहीं उठाते, ये सिस्टम हमें कुचलता रहेगा! जागो हिंदुओं, जागो! भारत माता की रक्षा करो! जय श्री राम!”

     

     

    एक एक्स यूजर चंदन शर्मा लिखते हैं “क्या यह दोगलापन नहीं है? एक पाकिस्तान समर्थक लड़की को पाकिस्तान की तारीफ करने के बाद भी जमानत मिल जाती है वहीं एक छात्र को उसी आतंकी मुल्क पाकिस्तान के खिलाफ बोलने पर आधी रात को गिरफ्तार किया जाता है क्या यही न्याय हैं? क्या आप इसे उचित मानते हैं?।”

     

     

    एक एक्स यूजर अरुण राजन लिखते हैं “लश्कर भी तुम्हारा है, कानून भी तुम्हारा है, तुम झूठ को सच लिख दो, अख़बार भी तुम्हारा है। हम इसकी शिकायत करें तो कहाँ करें, बंगाल में निजाम तुम्हारा है, कोर्ट भी तुम्हारा है। कानून के दो अलग अलग चेहरे।”

     

     

    एक एक्स यूजर मिस भूमि लिखती है “क्या हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी केवल राष्ट्रद्रोहियों और राष्ट्र विरोधीयौ के लिए है ? क्या सबके लिए अलग अलग कानून है? क्या हम दो भारत में रह रहे हैं ? 1. जहाँ एक पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी इस्लामी लड़की को आतंकवादी देश पाकिस्तान की खुलेआम तारीफ करने के बाद जमानत मिल जाती है। 2. जहाँ एक छात्र को उसी आतंकवादी देश पाकिस्तान के खिलाफ बोलने के लिए आधी रात को गिरफ्तार कर लिया जाता है। सब बिक चुकी न्यायपालिका की बदौलत है।”

     

     

    पत्रकार  नुपुर शर्मा  लिखती है “कोलकाता पुलिस को एक तानाशाह चलाता है जो अपने मुल्ला आधार को खुश रखने के लिए निर्दोष, बेखबर हिंदुओं की जिंदगी बर्बाद कर देगा। हमने इसे चुनाव के बाद की हिंसा के दौरान देखा, हमने इसे राज्य में हर दंगे के दौरान देखा और हम इसे आज भी देख रहे हैं। शर्मिष्ठा के साथ जो हो रहा है, वह फासीवाद जैसा ही है।”

     

     

    एक एक्स यूजर सौरभ तिवारी लिखते हैं “अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ राष्ट्र द्रोहियो को हैं।”

     

     

    सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ट वकील अश्विनी उपाध्याय लिखते हैं “Sharmishta की गिरफ्तारी का मूल कारण है गुलामी की घटिया पुलिस व्यवस्था 1861 में बना पुलिस ऐक्ट आज भी चल रहा है इसलिए पुलिस पहले अंग्रेजों की गुलाम थी और अब सत्ता की गुलाम है स्थाई समाधान चाहते हैं तो Uniform Police Code और Police Charter लागू करने की मांग करिए।”

     

     

    इसे पुरे प्रकरण में पुलिस और न्यायपालिका की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं लोग. हालाँकि हमारा मानना है की पुलिस की अपनी कोई कार्यशैली नहीं होती है. पुलिस की कार्यशैली वैसी ही होती है जैसी सरकार की और सरकार में बैठे लोगों की होती है. इसलिए इस गिरफ़्तारी प्रकरण में पुलिस की तत्परता या मुर्शिदाबाद हिंसा में पुलिस की निष्क्रियता का पुलिस की कार्यशैली से कोई लेना देना नहीं है. बल्कि ये बंगाल सरकार में बैठे लोगों की मानसिकता और तुष्टिकरण की राजनीति का ही परिलक्षण मात्र है.

     

    शर्मिष्ठा की गिरफ़्तारी के बाद सोशल मीडिया में कमेंट्स की बाढ़ आ गयी है. लोग #ReleaseSharmistha हैशटैग केसाथ उसकी गिरफ़्तारी के विरोध में पोस्ट कर रहे हैं. ये है गिरफ़्तारी की पूरी कहानी और उसपर लोगों की प्रतिक्रियाएं. पुलिस के इस कार्यप्रणाली पर आपकी क्या राय है, ये हमें कमेन्ट के माध्यम से जरुर बताएं.

  • Congress प्रवक्ता Shama Mohamed के Rohit Sharma पर अपमानजनक टिप्पणी को TMC का समर्थन, महज इतेफाक या रणनीति?

    Congress प्रवक्ता Shama Mohamed के Rohit Sharma पर अपमानजनक टिप्पणी को TMC का समर्थन, महज इतेफाक या रणनीति?

    Congress प्रवक्ता शमा मोहम्मद (Shama Mohamed) ने जो भारतीय क्रिकेट कैप्टेन रोहित शर्मा (Rohit Sharma) पर अपमानजनक टिप्पणी की है. शमा मोहम्मद की टिपण्णी का तृणमूल नेता शौगात रॉय (Shaugat Roy) ने समर्थन किया है. लोग सोशल मीडिया में सवाल पूछ रहे हैं की जब चैंपियंस ट्राफी चल रही है, भारत लगातार विजयी बना हुआ है, यहाँ तक की डफली गैंग की प्रिय टीम पाकिस्तान को भी शिकस्त दे चूका है. फिर राजनितिक दलों द्वारा खिलाडियों पर अचानक से विवाद करने का क्या मतलब है? क्या ये सिर्फ भारतीय क्रिकेट टीम का मनोबल गिराने का प्रयास है या इससे भी आगे की कुछ रणनीति है?

     

    ये महज एक खेलप्रेमी होने के नाते सामान्य टिपण्णी भी हो सकती है, या फिर भारत तोड़ो गैंग की खतरनाक रणनीति भी हो सकती है. क्योंकि आजकल कुछ दल और लोग देश को जातिवाद की आग में झोंकने में लगे हुए हैं. उनका पूरा प्रयास है की कैसे समाज को जातिवाद में बनता जाए. इसके लिए वो तरह तरह के हथकंडों से आम लोगों के मन में भेद पैदा करने में लगे हैं. कभी जातिगत जनगणना के नाम पर, कभी जितनी आबादी के नाम पर तो कभी किसी और हथकंडा के जरिए एकजुट समाज में नफरत की खाई खोदने में लगे हुए हैं.

     

    कभी वो देश के अधिकारीयों की जाति गिनते हैं, कभी पत्रकारों की जाति गिनाते है, तो कभी सामान्य मानवी को जातियों में तोड़ने का प्रयास करते हैं. खैर सामान्य मानवी से उनका ज्यादा लेना देना है नहीं, उन्हें तो बस अपना राजनितिक उल्लू सीधा करने से मतलब है, जो एकजुट समाज समाज को जातियों में तोड़कर ही हासिल होगा, और उस काम में वो बखूबी लगे हैं.

     

    लेकिन इतने षड्यंत्रकारी प्रयासों के बावजूद उन्हें ज्याद कामयाबी मिल नहीं रही है, क्योंकि सामान्य मानवी को इसके पीछे के मनसूबे भली भाँती पता है. अपने विफल होते प्रयासों को नई धार देने के लिए बंटवारे की सोच को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए, सामान्य  मानवी से आगे बढ़कर आजकल खिलाडियों और बड़े सेलिब्रिटीज को भी जातियों में बांटने का प्रयास हो रहा है, जिसकी बानगी आप सोशल मीडिया में उनके समर्थकों की पोस्ट और टिपण्णीयों में देख सकते हैं.

     

    उनके समर्थक लगातार खिलाडियों को जातियों में बांटकर अपमानजनक टिपण्णी करके समाज को बांटने का प्रयास करते रहते हैं. यही नहीं खिलाडियों के लोकप्रियता के हलचल में अपना प्रोपगंडा मिलाकर वो अपने एजेंडे को पूरा करने में कुछ हद तक कामयाब भी हो रहे हैं. क्या यही कारण है की इस रणनीति को अधिक धार देने के लिए अब इसमें समर्थकों के साथ नेतागण भी जुड़ रहे है? इससे अधिक आगे के स्तर पर सोचेंगे तो खुद ही समझ आ जाएगा की रोहित शर्मा पर टिपण्णी की वजह क्या है? सबकुछ कहा नहीं जाता, समझदार को इशार काफी होता है.

     

    इस तरह के प्रयासों से एक फायदा तो ये है की समाज को बाँटने के एजेंडे में कामयाबी मिल रही है, दूसरा फायदा ये भी है की इस तरह के प्रयास से तुष्टिकरण की रणनीति भी सफल होती है, और पाकिस्तान की जीत पर ढपली बजाने वाला गैंग भी खुश होता है. अब ऐसे में ये बयान एक तीर से दो निशाना लगाने की एक बेहद शातिर रणनीति भी हो सकती है! या फिर ये महज एक खेलप्रेमी होने के नाते सामान्य टिपण्णी भी हो सकती है, कमेन्ट में अपनी राय दें.

  • मर्यादा पुरुषोत्तम को आदिपुरुष कहना अभद्रता है

    मर्यादा पुरुषोत्तम को आदिपुरुष कहना अभद्रता है

    आदि यानी आदिम, पहला जो असभ्य रहा, जिसने सभ्यता न देखी, न सुनी बल्कि पशुवत ही व्यवहार करता हो।सृष्टि की उत्पत्ति ग्रंथ में जल से मानी जाती है। यानी कि मछली ही प्रथम जीव थी, ऐसा विज्ञान कहता है, ईसाई धर्मग्रंथ कहते हैं और हमारे यहां प्रथम अवतार “मत्स्यावतार” है। जीव जो केवल जल में ही जीवित रहते हैं।

     

    फिर सृष्टि की रचना में, जो विज्ञान पुष्टि करता है आते हैं amphibians, turtle , यानी ऐसे जीव जो जल और थल दोनों जगहों पर समान रूप में रह सकते हों। हमारे यहां cosmic orgin में इसे नाम दिया गया ” “कूर्मवतार”। फिर वाराहवतार की उत्पत्ति हुई। ऐसे जीव जो चारो पैरों पर खड़े होकर चल सकता था, दौड़ सकता था, बहुत बलशाली था, जिसने पूरी पृथ्वी पर घूम कर यह जान लिया था कि पृथ्वी गोल है। चित्रों में वाराहवतार अपने नथुनों पर पृथ्वी को उठाए दिखते हैं।

     

    फिर उत्पत्ति होती है, नरसिंहवतार की। इनमें पैश्विक दिव्यता का भान होता है। कुद्ध रुप, प्रचण्ड बलशाली , दया का भाव प्रचुर है इनमें। फिर आते हैं परशुराम। यहां rationality की कमी है। क्रोध की अधिकता है। मनुष्य अपनी इंद्रियों के आधीन है और प्राथमिकता उसे ही दे रहा है।

     

    फिर आता है “वामनावतार”। मनुष्य बनने की प्रक्रिया अब शुरु हो चुकी है। छोटे कद के मनुष्यों से पृथ्वी पट चुकी है। अहंकार, दुर्भावना, घृणा को खत्म कर भक्ति, ध्यान, तप को मनुष्यत्व का गुण बनाना है और इसी कार्य के लिए विष्णु वामनावतार लेते हैं।

     

    अब आते हैं “राम” जिनका युग मर्यादा का युग है। यहां हमें दशरथ जैसे पिता दिखते हैं जो पुत्र के साथ हुए अन्याय को सहन नहीं कर पाते और प्राण त्याग देते हैं। राम जैसे आज्ञाकारी पुत्र, समर्पित पति, भाई और न्यायप्रिय राजा दिखते हैं। सीता, उर्मिला जैसी पत्नियां हैं, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जैसे मर्यादित भाई हैं। राक्षसराज भी महापंडित, ज्ञानी है जिसकी स्त्री सतियों में गिनी जाती है। मनुष्य और पशु के बीच की रेखा बहुत क्षीण है, उनके बीच संवाद होता है, गहरी मैत्री है और भक्ति की पराकाष्ठा है। यहां जीवन अद्वितीय नैतिकता की नींव पर टिका है। सब कुछ balanced, proper, principled है। यही राम के युग की पहचान है।

     

    कृष्ण का युग कला, कोमलता ,संगीत, प्रेम,वास्तुकला, अद्भुत इंजीनियरिंग का युग है। कृष्ण की द्वारिका नगरी अपने आप में उत्कृष्ठ स्थापत्य का उदाहरण है, फिर इंद्रप्रस्थ, हस्तिनापुर आदि। यह राजनीति, धर्मनीति का युग है। कृष्ण कर्मयोगी स्वयं भी हैं और इसे ही सिद्धांत मानकर चलते हैं। कृष्णावतार भावों और भंगिमाओं का उत्कृष्ठ बोध है।

     

    किस तरह राम आदिपुरूष हुए यह कहना युगों के क्रम को झुठला कर पूरी सृष्टि का अनादर है, जिसे श्री हरि विष्णु ने क्रमशः समय की बेदी पर परीक्षण कर रचा है।

  • संतों की मनोरम भूमि के उत्कृष्ट संत स्वामी विवेकानंद को नमन

    संतों की मनोरम भूमि के उत्कृष्ट संत स्वामी विवेकानंद को नमन

    21 मार्च 1894 में ए मिशन इन इंडिया के निर्देशक आर ए ह्यूम ने ऑबर्नडेल,मैसाच्यूट्स से स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखा। जाहिर था, पत्र लिखकर वे उन्हें पब्लिक डिबेट में लाना चाहते थे। मि. ह्यूम का जन्म भारत में ही हुआ था तो उन्होंने अपने पत्र में उन्हें,” Swami Vivekanand, my fellow -countryman from India” लिखा।

     

    हयूम ये मानते थे कि जिस तरह से मिशनरी अपना काम भारत में करते हैं और जिस तरह से भारत की छवि बाहर के देशों में प्रस्तुत करते हैं वह पूरी तरह न्यायपूर्ण है। ह्यूम यह बात ज़ोर देकर कहते थे कि स्वामी विवेकानंद डेट्रॉयट और दूसरी जगहों पर भारत को और ईसाई मिशनरियों को ग़लत तरह से दिखाते हैं, उन्हें misrepresent करते हैं।

     

    29 मार्च,1894 को स्वामीजी हयूम के पत्र का जवाब लिखते हैं, जिसमें वह यह बताते हैं कि ” मेरे पास किसी भी धर्म या उसके मानने वालों के विरोध में कहने के लिए एक भी शब्द नहीं है। सभी धर्म मेरे लिए पूर्णतः पवित्र हैं। दूसरी बात यह कहना गलत है कि मैंने यह कहा हो कि मिशनरी हमारे ग्रंथ नहीं पढ़ते। मैं यह फिर कहता हूँ कि उनमें से कुछ ही संस्कृत में लिखे ग्रंथों को पढ़ते हैं पर मैं इस पर दृढ़ता से कायम हूँ कि भारत को कभी भी ईसाईयत में पूरी तरह से कन्वर्ट नहीं किया जा सकेगा।

     

    मैं यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता कि ईसाई धर्म में धर्मांतरण के बाद निचली जाति के लोगों का जीवन सुधरा है। दक्षिण के ज़्यादातर भारतीय ईसाई धर्मांतरण के बाद भी अपनी जाति साथ लगाते हैं जिसका मतलब है कि वह अपनी जातिगत पहचान को छोड़ना नहीं चाहते। मैं पूरी तरह से मानता हूँ कि अगर हिंदू समाज़ अपनी “exclusive policy” को छोड़ दे तो उनमें से नब्बे प्रतिशत वापस हिन्दू धर्म में लौट आएँगे।

     

    मैं आपको मुझे fellow-countryman कहने पर हृदय तल से धन्यवाद देता हूँ। यह पहली बार है कि किसी यूरोपीय मूल के विदेशी ने एक मूल निवासी को इस नाम से संबोधित करने का साहस किया है। क्या आप भारत में भी मुझे इसी नाम से संबोधित करेंगें? आप भारत में रह रहे अपने मिशनरी भाइयों से भी ऐसा ही कहने और करने को कहें।

     

    अंत में, आप शायद मुझे स्वयं मूर्ख ही कहें अगर मैं यह स्वीकार करूँ कि मेरा धर्म और समाज स्वयं को घुम्मकड़ों और घुमंतू कहानीकारों द्वारा स्वयं के हीे मूल्यांकन के लिए प्रस्तुत करता है। मेरे भाई आप मेरे समाज और धर्म के विषय में क्या जानते हैं तब भी जब आप यही जन्म लिए हों। यह असंभव है क्योंकि समाज खुलता नहीं है और सभी इसे अपने ही पूर्वानुमान से आंकलन करते हैं। प्रभु आपको मुझे fellow-contryman कहने पर आशीष दें।”

     

    इस देश और धर्म की ट्रोलिंग कोई नई बात नहीं है। यह पुरानी प्रक्रिया है और अपने समय में जब भारत की सही पहचान को स्थापित करने को स्वामी विवेकानंद संघर्ष रत थे, उन्हें कितनी दुःसह कठिनाइयों को झेलना पड़ा होगा। स्वामी विवेकानंद हमारे बीच जीवन्त होते थे, रामकृष्ण मिशन के स्कूल में जहाँ से मेरी स्कूली शिक्षा हुई। सुबह की प्रार्थना में हममें से कोई एक उनके लेटर्स पढ़ा करता था। यह प्रार्थना सभा का मुख्य आकर्षण हुआ करता था। संतों की मनोरम भूमि के उत्कृष्ट संत को नमन!

  • तानाजी द अनसंग वारियर, इतिहास आज भी करवट ले चुका है

    तानाजी द अनसंग वारियर, इतिहास आज भी करवट ले चुका है

    “गढ़ आया पर सिंह गया”! फ़िल्म में एक दृश्य में यह कहा गया कि मैंने तानाजी की आँखों में इतिहास को करवट लेते देखे है। यानी वह युग भी हताशा से भरा हुआ था जब राजस्थानी शूरवीरों का इतिहास मानो सुसुप्तावस्था में चला गया था। इतिहास आज भी करवट ले चुका है देश में।

     

    राजस्थानी राजपूत अपने इतिहास को जीवंत देखना चाहता है। भारतवर्ष का इतिहास करवट लेता है तो प्राचीन गौरव नवीन ऊर्जा में मिल कर वर्तमान और आने वाले भविष्य को प्रखर, उन्मुख, आत्मविश्वासी बना सकता है। इतिहास की परतें जब खुलेंगी तो अक्षर-अक्षर शाश्वत हो उठेगा।

     

    “तानाजी” के उत्कृष्ट निर्देशक ‘श्री ओम राउत’ का देश आभारी रहेगा जिन्होंने सिनेमा में इतिहास का एक सुनहरा पन्ना सामने रखा। पन्ने पर हमने देखा कि किस तरह किसी भी सभ्यता के मूल में भावनाओं का बवंडर है – प्रेम, त्याग, गरिमा, देशप्रेम, निष्ठा, ईमानदारी।

     

    देश की मिट्टी के प्रेम में उसमें मिल जाने की उत्कंठा ही शिवभक्ति हो उठती है। यहाँ “ईश्वर” और “देश” दोनों मिलकर मानो एक हो उठते हैं, जितना सच ईश्वर है उतना ही यह देश। मुगलिया सल्तनत न यह समझ सकती थी और न ही कभी यह समझ पाई कि ऐसी कौन-सी अद्भुत शक्ति होती है पत्थर की मूर्तियों में जिसके सम्मुख ली गई प्रतिज्ञा अग्नि की तरह साक्षात हो जाती है।

     

    अपनी मिट्टी को, स्पेस को ऑर्गनाइज, सुस्थापित करना ही स्वराज्य का प्रथम सोपान है। स्वाभिमान, गौरव, आत्मविश्वास से भरी जीजाबाई जैसी माताएँ, सावित्री जैसी पत्नियाँ, कमला जैसी कन्याएं शक्ति का मूर्त रूप बन कर युद्ध में जीत की राह को मार्गी रही हैं।इन गरिमामयी स्त्रियों ने शौर्य के दर्प को कई गुना बढ़ा दिया था।

     

    उदयभान वह हिन्दू राजा है जो औरंगजेब की ही तरह हिंसक, खूंखार, शक्तिशाली होना चाहता है फिर इसके लिए उसे अपने ही लोगों के विरुद्ध क्यों न होना पड़े। उदयभान की महत्वकांक्षा और निर्दयता उसके निजी जीवन का परिणाम है, उसकी हीनता का। पर यह हीनता बहुत ज़्यादा हानि पहुँचाती है। कोंडाणा को जीतकर, उसका सामंत बन कर वह ऊँचा उठना चाहता है ताकि राजपूत कन्या कमला को हासिल कर सके।

     

    उदयभान औरंगजेब और उसके शासन की दहशतगर्दी की नकल है जो एक मूल निवासी की हताशा का परिणाम है। हिंसा से वह स्वयं को मुक्त करना चाहता है, उसे मिट्टी, निष्ठा आदि से कोई सरोकार नहीं। पहाड़ की तरह अडिग रहने वाली तानाजी की निष्ठा, साहस और श्रद्धा समाज के लिए जीवन्त उदाहरण हो जाना चाहिए क्योंकि सभ्यताएँ इन्हीं भावों से सुरक्षित और संरक्षित रह सकती हैं।

     

    देश ऐसे रचनाकारों, बुद्धिजीवियों, फ़िल्म निर्देशको का कृतज्ञ रहेगा जो जन-चेतना के इन सच्चाइयों को दिखा सकें। इतिहास के भीतर सांस्कृतिक परंपराओं और उससे उपजी असंख्य संवेनाओं की अनदेखी है। स्वयं की अनुभूति का सांस्कृतिक अनुभव और सांस्कृतिक बोध सुसुप्तावस्था में है इतिहास में, और इतिहास अब बिना थमे निरंतर को जाना चाहिए। ऐतिहासिक फिल्में समाज को इतिहास से जोड़ उसे स्वाभिमानी और सुदृढ़ बना सकती हैं।

     

    फ़िल्म के नाम को देखें तो यह “तानाजी- द अनसंग वारियर” है, यानी तानाजी की गाथा न कभी गाई गई, न सुनाई गई। ओम राउत द्वारा निर्देशित “लोकमान्य तिलक” पर बनी फिल्म भी देखनी चाहिए। सिनेमा ने इतिहास को थामा है, साहित्य, कला, नृत्य, पत्रकारिता आदि विधाओं को भी इतिहास के पन्नों पर बिखरे अनदेखे हीरे के कणों को कोयले की खान से निकाल बाहर करना चाहिए। हॉल भरा हुआ था। ज़ाहिर है, देश कहीं न कहीं ठहरता ज़रूर है, चाहे वह दिल हो या दिमाग। इस बार हॉल में राष्ट्र गान नहीं हुआ। शायद यह बंद हो चुका है। पर यह अखर गया।

  • सहिष्णुता के ठेकेदारों को आखिर दुसरों के विचार सहन क्यों नहीं होते?

    सहिष्णुता के ठेकेदारों को आखिर दुसरों के विचार सहन क्यों नहीं होते?

    जाधवपुर यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह में जा रहे महामहिम राज्यपाल को यह कह कर रोका जाता है कि यह BJP के एजेंट हैं क्योंकि यह CAA के समर्थन में ट्वीट करते हैं। CAA के समर्थन में ट्वीट करने वाले राज्यपाल अगर BJP के एजेंट हैं तो वह छात्र-छात्राएं और प्रोफेसर किसके एजेंट हैं, जो उसके विरोध में राज्यपाल को कैंपस में प्रवेश लेने नहीं देते, नारेबाज़ी करते हैं और उनके साथ अभद्रता करते हैं। क्या इन्हें TMC या अन्य विरोधी पार्टियों का एजेंट न माना जाए।

     

    यानी अगर कोई इनके विचारधारा के, इनकी मान्यताओं और इनके इष्ट देवों के विरुद्ध होगा तो ये उसके साथ अभद्रता करेंगे, उसे बोलने नहीं देंगे, आने नहीं देंगे। कितने ज़्यादा असहिष्णु हैं! महामहिम राज्यपाल मोहम्मद आरिफ़ को बोलने, कहने न देना, कौन-सी सहिष्णुता का पाठ है जो वामपंथी राष्ट्रवादियों को पढ़ने की शिक्षा देते आए हैं? विगत दिनों से चल रही घटनाओं में सारी सहिष्णुता, समानता आदि आदि की असलियत सामने आ चुकी है।

     

    सदी के महानतम इतिहासकार बौखला कर कहते हैं कि आप अबुल कलाम को quote न करिये, गोडसे को करिए। जहाँ गोडसे को quote करने की ज़रूरत होगी, गोडसे को भी quote किया जाएगा, ऐसा क्या है कि इरफान हबीब के डर से गोडसे को quote नहीं करेंगे। इससे ज्यादा आवश्यक बात यह कि यह इरफ़ान हबीब नहीं बताएंगे कि महामहिम राज्यपाल को किसे quote करना है, किसे नहीं। अबुल कलाम पर इरफ़ान हबीब का कोई आधिपत्य या कॉपीराइट नहीं है। इतने वर्षों से आपके एक पक्षीय एजेंडा को पढ़ने,सुनने में हमने तो ऐसी अराजकता कभी नहीं दिखाई,जब एक सिरे से आप एक समृद्ध संस्कृति को नकारते रहे, उसे हेय दृष्टि से देखते और दिखाते रहे।

     

    हालांकि गोडसे को quote करने का महामहिम का कोई इरादा भी नहीं था न होगा पर गोडसे का नाम लेकर उन्हें चिढ़ाने या provoke करने का अधिकार इतिहासकार हबीब को बिल्कुल नहीं है। अगर मोपला में हज़ारों हिंदुओ की हत्या करवाने वाले और उनकी हत्या के समर्थक रहे गाँधी अहिंसक हैं और उन्हें पढ़ा, पढ़ाया जा सकता है, अगर उनकी हत्या के प्रतिशोध में हुई हज़ारों ब्राह्मणों की हत्या उनके गांधीवादी विचारधारा की सहिष्णुता है तो उनके समर्थकों को गोडसे को quote करने पर विरोध दर्ज़ करने का कोई अधिकार नहीं है।

     

    हर ग़लत बात को नैरेटिव चला कर, एजेंडा के तहत सही साबित करने की कोशिश, किसी एक वर्ग द्वारा की गई हिंसा को अनदेखा कर, क्रिमिनल्स को सही या कमज़ोर ज़रूरतमंद दिखा देने की मानसिकता और अपने एजेंडा को स्थापित करने को किसी भी अन्य बात, विचार को स्पेस न देने की मानसिकता इनका हिंसक अत्यधिक असहिष्णु और वहशी होना दिखाता है।

  • जीसस, स्त्री-प्रेम से स्वयं को बचाते एक देवदूत

    जीसस, स्त्री-प्रेम से स्वयं को बचाते एक देवदूत

    जीसस जन्म से लेकर जीवन में घटित घटनाओं में कृष्ण के करीब महसूस होते हैं। कृष्ण की मनोहर छवि गायों के साथ, जीसस की मनोरम छवि लैम्ब्स के साथ। तीर लगने पर कृष्ण का शरीर छोड़ना और जीसस के सर पर काँटों का ताज।

     

    दोनों के जीवन में माँ का अस्तित्व अह्म है। यानी जहाँ वर्जिन मेरी जीसस को जन्म देकर देवदूत की माँ का स्थान पा कर पूज्यनीय हैं, वहीं कृष्ण को अपने जीवनकाल में दो माओं का संरक्षण मिला और दोनों माओं ने मातृत्व के उत्कृष्ट भाव को प्रस्तुत किया। जहाँ कृष्ण अपनी माओं से शिशुभाव में पिटते हैं, रोते हैं, रूठते हैं, शिकायतें और ज़िद करते दिखते हैं, जीसस की यह बाल-सुलभ चेष्टा कहीं सुनने, पढ़ने को नहीं मिलती। जीसस अपनी माँ से अलग या दूर दिखते हैं।

     

    किशोरावस्था में जहाँ कृष्ण राधा के साथ प्रेम में होते हैं जिसका चित्रण हर जगह मिलता है, जीसस किसी भी स्त्री के करीब नहीं है। जहाँ प्रेम, अनुराग, विरह मानव जीवन की सहज प्रक्रिया को मान शिव, राम, कृष्ण आदि देवता स्त्री को न केवल अपने समकक्ष मानते हैं बल्कि उन्हें पूजते भी दिखते हैं, जीसस के जीवन में कभी कोई स्त्री स्थान पाती नहीं दिखती है।

     

    क्या यह भेदभाव सृष्टि के आरम्भ की प्रकिया से उपजा कि रोशनी करने के बाद चाँद, तारों, आकाश, पृथ्वी बना लेने के बाद गॉड आदम की रचना करते हैं, यानी आदम का होना प्रथम भाव है और आदम के अकेलापन और उनके साथ के लिए ईव को गॉड ने बनाया। यह ईव ही थीं जिनकी ग़लती की वज़ह से उनसे स्वर्ग छूट गया और उन्हें धरती पर आना पड़ा।

     

    क्या यही कारण रहा होगा कि जीसस कभी किसी स्त्री के साथ प्रेम-संबंध में नहीं रहे। प्रेम और सद्भावना का प्रतिरूप यह देवदूत स्त्री-प्रेम से दूर क्यों रहा, या स्वयं को उससे दूर क्यों रखा? मेरी के साथ जीसस का बाल्यावस्था में न होना, दिखना, दिखाना या पढ़ा जाना भी या इसी कारण से हुआ? यह ज़ोर देकर कहा, लिखा और बताया गया कि मेरी वर्जिन थीं यानी स्त्री से प्राप्त शारीरिक सुख को पाप समझा जाता रहा।

     

    गॉड ईव की रचना एडम की रिब से करते हैं और उसे एडम को सौप देते हैं। देवी दुर्गा की रचना भी विभिन्न पुरुष शक्तियों से होती हैं, सूर्य, चंद्र, शिव, इंद्र, पवन, विष्णु सभी अपनी शक्तियों को सम्मिलित कर दुर्गा की रचना करते हैं और उनके अस्तित्व में आते ही उनकी आराधना करते हैं। दुर्गा की रचना सृष्टि और पुरुष की रक्षा हेतु होती है, उनके साथ सभी देवता भय-मिश्रित श्रद्धा-भाव रखते हैं। यह स्त्री की रचना में दिखने वाला अंतर दोनों समाजों में स्त्री के स्थान को स्पष्ट दिखा जाता है। स्त्री के होने को पाप या कमतर मानने की वज़ह शायद वह बड़ी वज़ह है जिसके कारण जीसस स्त्रियों से दूर दिखते हैं।

  • विरोध के नाम पर देश के प्रधानमंत्री को हिटलर कहना बंद कीजिए

    विरोध के नाम पर देश के प्रधानमंत्री को हिटलर कहना बंद कीजिए

    राष्ट्रवाद के विरोध के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी की तुलना हिटलर से बंद कीजिए। यहाँ इस झूठ पर कम से कम हम विश्वास नहीं करते। राष्ट्रवाद की भावना स्पष्ट है कि इस देश ने पश्चिम से या हिटलर से नहीं सीखी है। भारत का राष्ट्रवाद, अगर राष्ट्र किसी “वाद” की परिकल्पना है तो यह पश्चिम के राष्ट्रवाद से भिन्न है।

     

    पश्चिम का राष्ट्रवाद लूट-पाट, अमानवीय युद्ध, असभ्य प्रतियोगिता, दमन और सीमाओं को किसी भी तरह विस्तारित करना या फिर दूसरे देशों में अपनी शक्ति को स्थापित करने की असभ्य अनाधिकृत चेष्टाओं का दस्तावेज है। पर भारत का राष्ट्रवाद अगर यह वाक़ई वाद है तो हमारे सम्मुख इस उदाहरण के साथ प्रस्तुत है कि राम अपने देशवासियों को रावण के आतंक से मुक्त करने को युद्ध करते हैं, पर समृद्धशाली लंका से एक पत्थर अयोध्या नहीं लाया गया।

     

    राष्ट्र को सुखी और संरक्षित रखने की परंपरा त्रेता युग से चली आ रही है। राम और रावण का युद्ध केवल सीता के लिए नहीं था बल्कि आर्यावर्त पर रावण की बढ़ती अनाधिकृत चेष्टा के अंत करने को था। सीता माध्यम बनीं थी और माध्यम बनी रहीं अंत तक। वरना स्वयं शक्ति की स्वरूप भगवती सीता अपने हरण के समय ही रावण को भस्म करने की शक्ति रखती थीं।

     

    राम का वनवास माध्यम था कि पूरे सिंधु प्रदेश को जोड़ दिया जाए जिसकी ख़ातिर उनका लोक में जाना आवश्यक था। राम ने अयोध्या से निकल हर प्रदेश को एक किया और सभी जन-समूह से मदद ली क्योंकि यह राष्ट्र-निर्माण का समय था, केवल अयोध्या और सीता के स्वाभिमान की बात नहीं थी। हर युद्ध को नारी अस्मिता से जोड़ कर देखा जाता है क्योंकि स्त्री ही पृथ्वी का रूप और उसकी प्रतीक बन सकती है, पुरूष नहीं।

     

    अयोध्या के पास लंका की तरह अकूत सम्पदा नहीं था, अयोध्या के पास रावण की तरह सोने का महल भी नहीं था, पर अयोध्या के पास थी धैर्य की शक्ति और self-control. इसी स्वनियंत्रण की वजह से अयोध्या आज अयोध्या है और लंका, लंका है। अयोध्या का धैर्य आज भी जीवन्त दिखता है।

     

    भारत के राष्ट्रवाद को पश्चिमी राष्ट्रवाद से जोड़ कर देखने की कुचेष्टा एक boomrang के अलावा और कुछ भी साबित नहीं होगी। भारत देश की चेतना में हिटलर और उसके राष्ट्रवाद का कोई प्रभाव हो नहीं सकता क्योंकि यह भाव भारतीय चेतना में पूरी तरह अनुपस्थित है। जबरजस्ती किसी और विचारधारा को भारतीयों पर थोपना कहीं से भी स्वीकार नहीं होगा जनमानस को।

     

    प्रधानमंत्री से उनके विरोधियों के डर का कारण कोई हिटलरवाद और नाजीवाद नहीं बल्कि यह है कि उनके पास खोने को कुछ नहीं है और जो है- धैर्य, देशसेवा,साहस और बिना रुके लक्ष्य प्राप्ति के लिए उनका समर्पण। यह वो चीज़ें हैं जिन्हें संभालना उन्हें भली-भांति आता है। ख़ैर, आप लगे रहिए मोदी को हिटलर बताने में, पर धोबी के कहने भर से न सीता का चरित्र मलिन होता है और न राम का गौरव।

  • बढ़ती जनसँख्या पर न हो विचार, सिकुड़ते जंगल पर करें चीख पुकार

    बढ़ती जनसँख्या पर न हो विचार, सिकुड़ते जंगल पर करें चीख पुकार

    प्रत्येक देश की अपनी कुछ समस्याएँ होती है! ये समस्याएँ ही उस देश को कमजोर करती रहती है! हमारे देश में तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसँख्या की समस्या वर्तमान समय में यहाँ की सबसे विकराल समस्या है! इस समस्या के कारण आज भारतवासियों का जीवन नारकीय सा हो चला है! हालात यहाँ तक पहुँच गया है की भारत की धरती और यहाँ की आधारभूत सुविधाएँ इस विशाल जनसँख्या का बोझ वहन करने में असमर्थ हो रहा है! व्यवस्थाएं चरमराने के स्तर तक पहुँच चूकी है! गरीबी उन्मूलन के अनेक सरकारी उपायों और योजनाओं के बावजूद, जनसँख्या की असीमित वृद्धि गरीबी के बिज को लगातार पोषित कर रही है! अशिक्षा, रोगवृद्धि, आवास की समस्या आदि के कारण करोड़ों भारतीय, पशुओं के समान जीवन व्यतीत करने को विवश हैं!

     

    सन 1931 में अविभाजित भारत की जनसँख्या लगभग 20 करोड़ थी! किंतु अब हमारी जनसँख्या एक अरब को पार करके डेढ़ अरब के नजदीक पहुँच रही है! इस बढ़ती जनसँख्या के कारण हमारा देश भिन्न भिन्न समस्याओं से घिर गया है! ये सही है की जो बच्चा पैदा होता है वो मेहनत करके अपना पेट भर सकता है, और औद्योगिक क्रांति की दृष्टि से देखें तो देश के श्रम शक्ति में इजाफा भी कर सकता है! तो लेकिन उसकी भी सीमाएं हैं! कितनी भी औद्योगिक क्रांति हो जाए, रोजगार के अवसर बढ़ जाएं, लेकिन भूभाग को बढ़ाया नहीं जा सकता! प्राकृतिक संसाधनों को बढ़ाया नहीं जा सकता! कहने का तात्पर्य ये है की रोजगार के अवसर पैदा कर भी लिए गए तो एक सिमित भूभाग एक सीमा तक ही मानव का बोझ वहन कर सकता है!

     

    भारत की भूमि का क्षेत्रफल विश्व की धरती का कुल २.४ % ही है, जबकि आबादी पूरे विश्व की आबादी के लगभग चौथा बनने की तरफ है! यहाँ हर वर्ष एक नया ऑस्ट्रेलिया बन जाता है! इससे यहाँ कृषियोग्य भूमि का आभाव हो गया है! आवास बनाने, आधारभूत सुविधाएँ विकसित करने की भूमि का भी आभाव हो गया! इसकी वजह से हमारे जीवन में बहुमूल्य योगदान देने वाले अमूल्य जंगलों को काटा जा रहा है! सब जगह कंक्रीट निर्माण जारी है! इसकी वजह से हमें खेती योग्य भूमि का आभाव भी झेलना पड़ रहा है और जंगलों के कटने प्रदुषण की समस्या भी सुरसा की तरह मुंह फैला रही है! हमारी अमूल्य वन संपदा का विनाश, दुर्लभ वनस्पति का आभाव, वर्षा पर घातक प्रभाव एवं दुर्लभ जंगली जानवरों के वंश का लोप हो रहा है! इससे प्राकृतिक आपदाएं भी दिन प्रतिदन बढ़ती जा रही है!

     

    बढ़ती जनसँख्या का बोझ ग्रामीण अर्थव्यवस्था जिसमें खेती-किसानी, कुटीर उद्योग, हस्त शिल्प उद्योग और ग्रामीण आजीविका के साधन भी नहीं उठा पा रहे हैं! अधिक जनसँख्या के लिए अधिक खाद्यान की आवश्यकता होती है! धरती से अधिक उपज के लोभ में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बढ़ गया है! इन उर्वरकों की वजह से खाने स्वाद नष्ट होने के साथ विषैला केमिकल भी पेट में जा रहा है जो अनेक रोगों को जन्म दे रही है! इसकी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों से तीव्र गति से शहरों में पलायन जारी है!

     

    ग्राम से शहर की ओर पलायन की वजह से शहरों में भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही है, जिसमें कुपोषण, अपराध, प्रदुषण, आवास की समस्या, पेयजल की समस्या, भीषण गंदगी, अवैध बस्ती, कमरतोड़ महंगाई, चिकित्सा सेवाओं का आभाव जैसी समस्याएँ तो एकदम विकराल रूप ले चूकी है, और शहरी जीवन को भी नारकीय बना रहा है! अभी आपने देखा होगा, आरे में पेड़ों की कटाई करनी पड़ी, मेट्रो शेड बनाने के लिए! सबने विरोध भी किया, लेकिन किसी ने ये नहीं कहा की जनसँख्या बढ़ रही है तो उसके लिए सुविधाओं का विस्तार तो करना ही पड़ेगा, इसलिए जनसँख्या नियंत्रण पर भी चर्चा हो!

     

    भारत में जनसँख्या वृद्धि के अनेक कारण हैं! अज्ञानता, शिक्षा की कमी, भाग्यवाद तथा ऊपर वाले की मेहरबानी जैसे प्रमुख कारण हैं! जनसँख्या की वृद्धि के लिए सरकार की गलत नीतियाँ भी कम जिम्मेदार नहीं है! एक तो अपनी तीव्र गति से बढ़ती जनसँख्या, ऊपर से भारत में इस समय दो करोड़ बंगलादेशी शरण डाले हुए हैं! काफी बड़ी मात्रा में रोहिंग्या भी घुस चुके हैं! ये विदेशी घुसपैठिए यहाँ पर तश्करी और अपराध को बढ़ावा देने के व्यवसाय में लगे रहते हैं! भारत सरकार की नीतियाँ एकदम लचीला है! लचीला तो ठीक है लेकिन लचीला का मतलब देश को धर्मशाला बना तो नहीं हो चाहिए!

     

    बाल विवाह, गर्म जलवायु, बहुविवाह और रूढ़िवादिता का भी जनसँख्या वृद्धि में काफी योगदान है! जहाँ हिन्दुओं में पुत्र की प्राप्ति तक संतानोत्पति चलते रहता है, पुत्र की लालसा में अनेक पुत्रियों का जन्म हो जाता है, हालाँकि अब इसमें कमी देखने को मिल रही है, लेकिन ये कमी संतोषप्रद नहीं है! वही मुसलमानों में बच्चों को अल्लाह की देन मानकर लगातार प्रजनन का क्रम चलते रहता है! अपनी गलती और नासमझी का ठीकरा अल्लाह पर फोड़ना कहाँ तक जायज है!

     

    कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है की तमाम प्रयासों और जागरूकता अभियानों के बावजूद भारत जनसँख्या वृद्धि पर नियंत्रण कर पाने में बुरी तरह असफल रहा है! यदि हमें देश के भविष्य को सुधारना है और देश के सामान्य मानव को एक मानव जैसा जीवन देना तो हमें जनसँख्या नियंत्रण करना ही होगा! इसके लिए हम चीन जैसे देशों से कुछ सीख सकते हैं, जिसने काफी सफल तरीके अपने देश में ‘एक दम्पति, एक बच्चे’ के लक्ष्य का कठोरतापूर्वक पालन करके जनसँख्या को नियंत्रित किया! हालाँकि ये केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है! इसके लिए न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता और गैर सरकारी संगठनों को सामूहिक योगदान देना होगा! शिक्षा भी इसमें अहम भूमिका निभा सकता है! परिवार नियोजन के तरीकों को घर घर तक पहुँचाने की मुहीम भी शुरू किया जाना चाहिए और समझ समझ के भी ना समझने वालों के लिए कठोर कानून का प्रावधान भी करना चाहिए!

     

    अगर समय रहते ही जनसँख्या वृद्धि पर नियंत्रण नहीं किया गया तो इसके भयंकर परिणाम भुगतने होंगे! अगर हम इस पर रोक नहीं लगाएँगे तो फिर प्रकृति इस पर रोकक लगाएगी, जो और भी वीभत्स होगा! जब प्रकृति बढ़ती जनसँख्या का भार वहन करने से इंकार कर देगी तो, भूकंप, सुनामी, नई नई बीमारियाँ, महामारी, बाढ़, सुखाड़, जल कमी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अपराध, युद्ध जैसे चीजें जनसँख्या नियंत्रण करेगी तो दर्द असहनीय हो जाएगा! समय से नियंत्रण कर लेने पर इससे जुड़ी समस्याएँ स्वतः ही सुलझ जाएगी! प्रकृति भी सुरक्षित, मानव भी सुरक्षित और सुखी होगा!

     

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