Category: मध्य प्रदेश

  • Rahul Gandhi के अनर्गल बयान की वजह से Congress कार्यकर्त्ता सर उठाकर चल नही पाता : Lakshman Singh

    Rahul Gandhi के अनर्गल बयान की वजह से Congress कार्यकर्त्ता सर उठाकर चल नही पाता : Lakshman Singh

    Lakshman Singh | Rahul Gandhi के अनर्गल बयान की वजह से Congress कार्यकर्त्ता सर उठाकर चल नही पाता | पहलगाम आतंकी घटना पर दिए गए बयानों की वजह से कांग्रेस से निष्कासित किए गए मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ने राहुल गाँधी पर जमकर निशाना साधा.

     

    इस दौरान उन्होंने कहा – Rahul Gandhi के अनर्गल बयान की वजह से Congress कार्यकर्त्ता सर उठाकर चल नही पाता, जबकि दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ता शान से चलते हैं. राहुल गाँधी के इशारे पर निरंतर सेना पर सवाल उठाए जाते हैं.

  • राजा और रानी की प्रेम कहानी बयां करता है ये किला, देखने वालों की लगी रहता है भीड़!

    Narwar Fort | जब भी खूबसूरत वादियों और संस्कृति की बात हो और उसमें मध्य प्रदेश का नाम ना हो? ऐसे कैसे हो सकता है, दोस्तों मध्य प्रदेश में ऐसे कई स्मारक, महल बने हुए हैं जो बरसों पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं। अब तक हमने आपको मध्य प्रदेश से जुड़े ऐसे कई महल और स्मारक के बारे में बताया जिनका बहुत महत्व है और यह मध्य प्रदेश की शान बढ़ाते हैं। इसी बीच हम लेकर आए हैं मध्य प्रदेश के एक और किले की जानकारी जो बहुत खास है और यह काफी प्रचलित भी है। इसका इतिहास अपने आप में काफी भव्य रहा है और यह किला भी काफी सुर्खियों में रहा है। तो चलिए जानते हैं इस किले के बारे में…

     

    दरअसल, हम जिस किले के बारे में बात कर रहे हैं वो मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से 302 किलोमीटर दूर और ग्वालियर से तकरीबन 82 किलोमीटर दूर कालीसिंध नदी के पूर्व में 50 फीट की ऊंचाई पहाड़ी पर बसा हुआ है। यह किला अपने आप में काफी भव्य है जो करीब 7 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है।

     

    इस किले का नाम नरवर किला (Narwar Fort) है और इसकी बहुत दिलचस्प कहानी है। दरअसल महाभारत में किले की चर्चा राजा नल की राजधानी के रूप में की गई है। नरवर को पहले नलपूल नाम से जाना जाता था। इतिहास की माने तो 12वीं शताब्दी में इस पर परिहार, तोमर कछवाहा जैसे शासको का अधिकार रहा। कहते हैं काफी समय तक इस पर मुगलों ने भी राज किया फिर 18वीं और 19वीं शताब्दी में मराठा सिंधियों के अधिनियम ये किला आ गया।

     

    इस किले का पूरा डिजाइन राजपूताना है जो बहुत ही खूबसूरत तरीके से बनाया गया है। किले की एक-एक दीवार में काफी बारीकी देखने को मिलती है। दोस्तों इस किले को देखने के लिए आपको कई सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती है तब कहीं जाकर इस किले की सुंदरता को आप निहार पाते हैं। चारों तरफ हरियाली से घिरा यह किला काफी चर्चा में रहता है और अक्सर इसे देखने वालों की भीड़ लगी रहती है।

     

    इस किले की एक ऐतिहासिक प्रेम कहानी भी बताई जाती है। कहा जाता है कि नरवर किला को नल और दमयंती की प्रेम कहानी की वजह से बनाया गया था। दरअसल दमयंती विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री थी जबकि नल निषाद के राजा वीर सिंह के पुत्र थे। कहा जाता है कि दोनों ही बहुत गुणी और रूपवान हुआ करते थे और उनकी सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक हुआ करती थी। लेकिन इन दोनों ने कभी भी एक दूसरे को नहीं देखा था। यह दोनों केवल एक दूसरे की सुंदरता और गुण के बारे में सुनकर ही एक दूजे से प्रेम करने लगे थे।

     

    इसी बीच जब दमयंती के स्वयंवर का समय आया तो इसमें वरुण, अग्नि, इंद्र, नल और यम भी आए। ऐसा कहा जाता है कि चारों स्वयंवर में नल का चेहरा धारण करके आए थे। नल की तरह दिखने वाले पांच पुरुषों को देखकर दमयंती खुद भी दंग रह गई थी। किंतु उनके प्रेम को कोई हारा नहीं सका। कहा जाता है कि दमयंती के प्यार में इतनी ताकत थी कि उन्होंने देवताओं से शक्ति मांग कर अपने असली प्रेम की पहचान की और उससे शादी कर ली, लेकिन कुछ समय साथ रहने के बाद यह दोनों एक दूसरे से अलग हो गए।

     

    इतिहास में ऐसा कहा गया है कि नल अपने भाई पुष्कर से जुए में सब कुछ हार जाता है जिसके बाद दमयंती अपने परिवार के साथ रहने लगती है। वहीं सब कुछ हार जाने के बाद नल गायब हो जाते हैं। इसी बीच दमयंती के पिता दोबारा उसके स्वयंवर की घोषणा कर देते हैं। उधर दमयंती से अलग होने के बाद नल को कर्कोटक नाम के सांप ने काट लिया होता है जिसकी वजह से उसका पूरा रंग काला पड़ जाता है। यहां तक के उसे कोई पहचान भी नहीं पा रहा था।

     

    इसी बीच नल बावुक नाम से सारथी बनकर विदर्भ पहुंचे। नल का चेहरा कुछ ऐसा हो गया था कि, दमयंती के लिए भी पहचानना थोड़ा मुश्किल था हालांकि उसने अपने प्रेम को पहचान लिया। इसके बाद नल ने अपने भाई पुष्कर के साथ एक बार फिर से जुआ खेला और हारी हुई सारी चीज अपने नाम कर ली। इसके बाद ही इस किले का निर्माण किया गया।

     

    जब आप इस किले में प्रवेश करेंगे तो आपको चार द्वार पार करने पड़ते हैं। पहले द्वारा पिसनारी दरवाजा कहलाता है जो हिंदू शैली में निर्मित है। इसके अलावा दूसरा द्वारा किरणपुर तथा तीसरा गणेशपुर और चौथा द्वारा हवापुर के नाम से मशहूर है। इस किले के अंदर आपको एक साथ 8 कुँए और 16 बावड़िया देखने को मिलेगी। कहा जाता है कि यहां से 1600 पणिहारान पानी भरने एक साथ आई थी और यह नजारा बहुत खूबसूरत हुआ करता था। इतना ही नहीं बल्कि किले के अंदर एक पूरा नगर बसा हुआ करता था जिसमें मीना बाजार सबसे मुख्य था जहां से लोग अपनी जरूरत की चीज ख़रीदा करते थे।

     

    यदि आप नरवर किला देखना चाहते हैं तो यह किला ज्यादा दूर नहीं है। आप यहां पहुंचने के लिए ट्रेन, बस और हवाई जहाज का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। दरअसल, आपको हवाई जहाज से ग्वालियर एयरपोर्ट पर आना पड़ेगा। इसके बाद आप नरवर किला तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा ट्रेन से आपको शिवपुरी स्टेशन आना पड़ेगा। यहां से भी नरवर किला करीब पड़ता है। यहां से आप टैक्सी या बस से जा सकते हैं। इसके अलावा आप किसी भी राज्य से शिवपुरी बस स्टॉप आ सकते हैं और यहां से नरवर किले के लिए निकल सकते हैं। Narwar Fort | Madhya Pradesh Tourism | Nal Damyanti Love Story

  • प्राकृतिक सौंदर्य समेटे हुए हैं कंचना घाट, यहां शांति की तलाश में पहुंचते हैं पर्यटक!

    यदि आप प्राकृतिक सौंदर्य देखने के शौकीन है और इसे देखने के लिए दूर दूर तक जाते है। तो अब आपको इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। दरअसल दोस्तों मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है जो अपने अंदर प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे हुए है। यहां पर आपको ऐसी कई जगहे मिल जाएगी जो प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है। जी हाँ… आज हम बात करेंगे मध्य प्रदेश में स्थित एक ऐसी जगह के बारे में जो अपनी प्राकृतिक सौंदर्यता के लिए बहुत मशहूर है और यहां की सुंदरता निहाने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। इतना ही नहीं बल्कि यह स्थान इतिहास को भी दर्शाता है जिसे देखना काफी रोमांचक महसूस हो सकता है। ये एक ऐसी जगह हैं जहां आप फेमली ट्रिप पर भी आ सकते हैं, इसके अलावा यहां पर अकेले घूमना भी काफी रोमाँचक है। तो चलिए जानते हैं इस खूबसूरत जगह के बारे में…

     

    हम आपसे बात कर रहे हैं और ओरछा में बेतवा नदी के तट पर बसा कंचना घाट के बारे में। कहा जाता है कि कंचना घाट का निर्माण राजा वीर सिंह जूदेव ने करवाया था। कंचना घाट की खूबसूरती देखकर आप मंत्र मुग्ध हो जाए हो जाओगे। यहां पर प्राकृतिक सौंदर्यता के साथ-साथ इतिहास को समझने का मौका भी मिलने वाला है। ऐसा कहा जाता है दोस्तों कंचना घाट ओरछा के सबसे प्रसिद्ध घाटों में से एक है और यहां पर कई ऐसे परिसर मौजूद है जो अपने आप काफी भव्य है। इतना ही नहीं बल्कि कंचना घाट को लेकर यह भी कहा जाता है कि, ओरछा राज्य की रानियां एवं पटरानियां स्नान करने इसी घाट पर आती थी और यह नजारा बहुत खूबसूरत हुआ करता था।

     

    यानी कि कम शब्दों में कहा जाए तो कंचना घाट प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ इतिहास और आध्यात्मिक शांति भी दर्शाता है और यही वजह है कि हजारों पर्यटक यहां पर पहुंचते हैं। यहां का माहौल काफी शांत है, ऐसे में आपको यहां पर एक अलग ही अनुभव महसूस होने वाला है। नदी की प्राचीन सुंदरता और शांत वातावरण विश्राम आत्मनिरीक्षण और प्रकृति की गोद में जाने के लिए एक बेहतर स्थान है। इतना ही नहीं बल्कि साल 1592 में महाराज मधुकर शाह के दिवंगत होने पर कंचन घाट पर ही उनकी समाधि बनाई गई। इसके अलावा इसी घाट पर जुझार सिंह की रानी की मडिया भी है जो भाभी जी की मडिया के नाम से प्रसिद्ध है।

     

    कंचना घाट का एक ऐतिहासिक महत्व रहा है क्योंकि यहां भव्य किला परिसर के बहुत ही नजदीक है। जब आप यहां पर जाएंगे तो आपको घुमावदार रास्ता, हरी भारी हरियाली, पहाड़ से घिरा हुआ मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है जो आपको मोहित कर लेता है। यहां पर पानी की मधुर ध्वनि, ठंडी हवा, शांति, साथ ही पक्षियों के गीत सुनने को मिलेंगे जो आपके इस यात्रा को बहुत सुखद महसूस करवाने वाले हैं।

     

    ओरछा झांसी से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ओरछा का पुराना नाम तुंगारण्य बताया जाता है। इसे महर्शि तुंग की तपोभूमि भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां पर सारस्वत ऋषि ने अन्य ऋषियों को वेद अध्ययन करवाया था इतना ही नहीं बल्कि बुंदेली से पहले परिहारो ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया हालांकि बाद में चंदेलों ने उसे ढहा दिया। इसका प्राचीन नाम ऊॅंदछा, ओंदछा तथा ओड़छा है। जिससे परिवर्तित हो कर कालान्तर में इसका नाम ओरछा हो गया।

     

    कंचना घाट स्थानीय लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताया जाता है। कहते हैं यहां पर हर दिन पूजा अर्चना विशेष रूप से होती है। इसके अलावा यहां पर अक्सर धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं। इतना ही नहीं बल्कि रामनवमी जैसे बड़े त्यौहार के दौरान यहां पर राम कथा के विविध प्रसंगों की प्रस्तुति होती है और हजारों लोगों की भीड़ लगी रहती है।

     

    जब आप यहां पर पहुंचेंगे तो आपको कंचना घाट के पास ओरछा के शासको के लिए करीब 15 छतरियां स्मारक देखने को मिलेंगे जो बहुत ही खूबसूरत तरीके से बनाए गए हैं। यह छतरियां और स्मारक इस बात का प्रमाण है कि इतिहास काफी भव्य रहा होगा जो आज भी उनके द्वारा बनाई गई छतरियां वैसी की वैसी ही खड़ी है। यहां के अधिकांश छतरी आपको तीन मंजिला देखने को मिलेगी।

     

    सूचना फलक पर मधुकर शाह, वीर सिंह देव, जसवंत सिंह, उद्वित सिंह, पहाड़ सिंह आदि नाम का अंकित है। यह छतरियां पंचायतन शैली के मंदिरों जैसी बनी हुई है। कहा जाता है दोस्तों ओरछा की स्थापना बुंदेला राजपूत सरदार रुद्र प्रताप सिंह के द्वारा हुई थी। जब आप कंचना घाट देखने पहुंचे तो यहां के नजदीक श्री राम राजा मंदिर, सावन भादो स्तंभ, हरदौल की बैठक और लक्ष्मी मंदिर भी जा सकते हैं। ये जगह भी काफी खूबसूरत है। यहां जाकर आप इतिहास जुडी कई चीजें समझने को मिलेगी।

     

    ओरछा जाने के लिए सबसे पहले आपको ग्वालियर जाना पड़ेगा। ग्वालियर यहां का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से बस या टैक्सी से ओरछा जा सकते हैं। वही झांसी मानिकपुर रेलवे लाइन पर स्थित ओरछा रोड स्टेशन से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप चाहे तो रेल के माध्यम से भी जा सकते हैं। इसके अलावा ग्वालियर से ओरछा के लिए बस मिलती है। आप चाहे तो अपने निजी वाहन से भी ओरछा जा सकते हैं और सुखद यात्रा कर सकते हैं।

  • सालों पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं ओरछा किला | Orchha Fort

    Orchha Fort | अगर आप घूमने फिरने के शौकीन है और हर बार एक नई जगह की तलाश करते हैं तो आज हम आपको बताएंगे मध्य प्रदेश में स्थित एक ऐसे किले के बारे में जो बहुत अनोखा है। यह किला अपनी बनावट और सुंदरता की वजह से काफी चर्चा में रहता है और इस किले को देखने के लिए हमेशा ही लोगों का हुजूम उमडा रहता है। तो चलिए जानते हैं इस किले की खासियत और इस किले का इतिहास…।

     

    दरअसल, हम जिस किले के बारे में बात कर रहे हैं वो किला मध्य प्रदेश, भारत के झांसी जिले में स्थित ओरछा किला है जो एक वस्तुकला का रूप माना जाता है। इस किले में आपको मध्यकालीन भारतीय इतिहास की भव्यता और स्मृति देखने को मिलेगी। 16वीं शताब्दी में ओरछा के पहले राजा रूद्र प्रताप सिंह द्वारा बनाया गया यह किला राजपूत और मुगल स्थापत्य शैलियों का एक मिश्रण है।

     

    यह ओरछा किला मध्य प्रदेश में झांसी से 16 किलोमीटर दूर बेतवा नदी के किनारे बना हुआ है। किले का मुख्य आकर्षण यहां बना हुआ राजमहल है। इसके अलावा इस किले में आपको फूल बाग, शीश महल, राय प्रवीण महल, जहांगीर महल जैसे बड़े-बड़े आलीशान महल देखने को मिल जाएंगे। कहा जाता है कि इस किले के एक हिस्से को रामराज में बदल दिया गया।

     

    किले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों पूजा करने आते हैं। दरअसल इस परिसर में राजा महल बना जिसका निर्माण 1556 से 1591 के बीच में राजा मधुकर शाह ने करवाया यही वीर सिंह देव ने 1605 और 1627 के बीच सावन भादो महल और जहांगीर महल बनवाया। ऐसे में आपको इस किले की वास्तुकला में बुंदेलखंडी और मुगल प्रभाव का मिश्रण देखने को मिलता है। वहीं इसमें मौजूद शीश महल, बुंदेला शासको की भव्य जीवन शैली को प्रतिबिंबित करता है। यहां का शीश महल अभी हेरिटेज होटल बन चुका है जो शीशे का बना हुआ है।

     

    ओरछा में स्थित प्रभु राम को लेकर एक बात यह भी बहुत प्रचलित है कि 16वीं सदी में जिस समय भारत में विदेशी आक्रांता मंदिर और मूर्तियों को तोड़ रहे थे तब यहां अयोध्या के संतों ने जन्मभूमि में विराजमान श्री राम के विग्रह को जलसमाधि देकर श्री राम की मूर्ति को बालू में दबा दिया था। कहा जाता है कि यही प्रतिमा रानी कुमारी गणेश ओरछा लेकर आई थी। साहित्यकार कहते हैं कि 16वीं सदी में ओरछा के शासक मधुकर शाही एकमात्र ऐसे पराक्रमी हिंदु राजा थे जो अकबर के दरबार में बगावत कर चुके थे।

     

    ओरछा का ये किला ऐसा किला है जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर में भी शामिल कर लिया गया है। जी हां साल 2021 में ओरछा को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया जो इसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को मान्यता देता है।

     

    यदि आप इस किले में जाना चाहते हैं तो ओरछा का किला प्रतिदिन सुबह 9:00 से लेकर शाम बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश करने का शुल्क केवल 10 रुपए हैं जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 250 रुपए के आसपास बताया जाता है। यहां पर घूमने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से लेकर मार्च के बीच होता है। इस बीच आप इसे देखने के लिए आ सकते हैं।

     

    ओरछा किले के अलावा आप यहां पर बेतवा नदी के तट पर स्थित छतरियां भी देख सकते हैं। इन छतरियों को देखने के बाद आप इतिहास को समझ पाएंगे। इसके अलावा यहां पर ओरछा वन्य जीव अभ्यारण भी है। ऐसे में यदि आप प्रकृति और पक्षी के प्रेमी है तो यहां पर आपको जरूर जाना चाहिए। इसके अलावा आपको यहां पर एक सुंदर बाग परिसर भी देखने का मिलेगा जिसे देखने के लिए हजारों लोग आते हैं।

     

    ओरछा जाना बहुत ही आसान है। आप यहां पर ट्रेन बस और हवाई रास्ते भी जा सकते हैं। ओरछा जाने के लिए आपको सबसे पहले ग्वालियर जाना पड़ेगा। हवाई जहाज से भी आपको ग्वालियर जाना पड़ेगा। इसके बाद आप झांसी जा सकते हैं और झांसी से सीधे ओरछा जा सकते हैं। वही ट्रेन भी आपको झाँसी ही छोड़ेगी और झांसी से आप ओरछा के लिए बस या टैक्सी ले सकते हैं। इसके अलावा यदि आप बस से जा सकते हैं तो दिल्ली, राजस्थान, मुंबई, आगरा जैसे कई शहरों से झांसी के लिए बस मिलती है। झांसी बस स्टैंड पर आने के बाद आप ओरछा के लिए रिक्शा या टैक्सी ले सकते हैं। Orchha Fort | Madhya Pradesh | Incredible India | MP Tourism

  • रानीलक्ष्मी बाई की मौत का कारण बना था ये किला, दिलचस्प है इसकी कहानी

    Gwalior Fort | देश के सबसे खूबसूरत किलों में एक ग्वालियर का किला भी माना जाता है। आज भी यह किला पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। शहर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्वालियर किले का निर्माण आठवीं शताब्दी के दौरान किया गया था। कहते हैं इस किले का निर्माण दो भागों में हुआ है। दोस्तों इस किले में आपको कई ऐतिहासिक स्मारक भी देखने को मिलेंगे। इसमें बुद्ध जैन मंदिर और आलीशान महल के साथ-साथ सास बहू का भी मंदिर देखने को मिलेगा। तो चलिए जानते हैं ग्वालियर के किले से जुड़े कुछ रोचक तथ्य.

     

    ग्वालियर का किला एक ऐसा किला है जो कई बार एक राजवंश के कब्जे से दूसरे राजवंश तक गया है। कहते हैं इस किले पर कई राजपूत राजाओं ने राज किया है। किले की स्थापना के बाद करीब 989 सालों तक इस पर पाल वंश ने राज किया। इसके बाद इस पर प्रतिहार वंश ने राज किया। यही नहीं 1023 ईस्वी में मोहम्मद गजनी ने इस किले पर आक्रमण किया हालांकि उसे इस दौरान हर का सामना करना पड़ा।

     

    इस किले पर राज करने वाले आखिरी वंश महादजी सिंधिया को बताया जाता है। कहते हैं कि 1804 और 1844 के बीच इस किले पर अंग्रेजों और सिंधिया के बीच नियंत्रण बदलता रहा। हालांकि साल 1844 में महाराजपुर की लड़ाई के बाद ये किला आखिर में सिंधिया परिवार के हिस्से में आया।

     

    1 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने मराठा विद्रोह के साथ मिलकर इस किले पर कब्जा किया था लेकिन जब वह जीत के जश्न में शामिल हुई तो 16 जून को जनरलहूज के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना ने उन पर हमला कर दिया। इस दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने खूब लड़ाई लड़ी और दुश्मनों को किले से बाहर कर दिया। हालांकि इसी बीच उन पर दुबारा हमला कर दिया गया और इसी दौरान 17 जून को वो वीरगति को प्राप्त हो गई. इतिहास के पन्नों को उठाकर देखा जाए तो इसमें ग्वालियर की लड़ाई के लिए लक्ष्मी बाई का नाम स्वर्ण अक्षरों वर्णित है। हालाँकि लक्ष्मीबाई की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने अगले तीन दिन में ही इस किले पर कब्जा कर लिया था।

     

    जब आप इस किले में प्रवेश करेंगे तो आपको कई ऐतिहासिक स्मारक दिखाई देंगे। जैसे बुद्ध और जैन मंदिर, गुजारी महल और मानसिंह महल, जहांगीर महल, करण महल और शाहजहां महल मौजूद है। कहते हैं गुजारी महल को पुरातात्विक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है।

     

    इस महल को राजा मानसिंह ने अपनी रानी मृगनयनी के लिए करवाया था। इस संग्रहालय में दुर्लभ मूर्तियां रखी हुई है जो पहले के इतिहास की गवाही देती है। कहते हैं इस किले की संरचना रक्षात्मक है। यानिकि किला इतना मजबूत है कि अगर कोई किले पर अटैक करने की कोशिश करता है, तो किला गिरेगा नहीं।

     

    इस किले के अंदर प्रवेश करने के लिए दो आलीशान दरवाजे बने हुए हैं। पहले रास्ते से आप केवल पैदल जा सकते हैं जबकि दूसरे पर आप गाड़ी से भी जा सकते हैं। ये किला 350 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। किले का मुख्य प्रवेश द्वार हाथी पुल के नाम से जाना जाता है जो सीधा मान मंदिर महल की ओर ले जाता है।

     

    इस किले के निर्माण को लेकर ये कहानी भी काफी प्रचलित है कि, राजा सूर्यसेन कुष्ठ रोग से पीडि़त थे। इस दौरान ग्वालिपा नाम के एक ऋषि ने उन्हें एक पवित्र तालाब से पानी लाकर दिया था। जैसे ही राजा ने ये पानी पिया तो वह पूरी तरह से ठीक हो गए। इसलिए सूरजसेन ने उनके नाम पर किला बनवाने का फैसला किया।

     

    इस किले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें आपको सास बहू का मंदिर भी देखने को मिलेगा। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर किले में सास बहू के मंदिर का क्या काम? तो दोस्तों अभी ही नहीं बल्कि पुराने समय में भी सास बहू के बीच नोंकझोंक हुआ करती थी।

     

    दरअसल, 19वीं शताब्दी में शाही सास और बहू के बीच विवाद हुआ कि किस देवता की पूजा करनी चाहिए? अब इन दोनों सास बहू को संतुष्ट करने के लिए यहां पर एक अनोखा मंदिर का निर्माण किया गया जिसमें भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा की जाती है। इसके बाद यह भगवान नहीं बल्कि सास बहू मंदिर के नाम से जाना गया। Gwalior Fort | Rani Laskhmi Bai | Scindia

  • क्यों अधूरा है भोजपुर का शिवलिंग मंदिर? पांडवों से है इसका संबंध | Bhojpur Shivling Mandir

    Bhojpur Shivling Mandir | मनुष्य का मन हमेशा ही रहस्य और पहेलियां को जानने के लिए उत्सुक रहा है। आपने जरूर देखा होगा दोस्तों की कोई भी कहानी सुनने या सुनाने के दौरान काफी आकर्षक लगती है और यही उस कहानी का असली रूप होता है जिसे अंत तक लोग सुनते रहते हैं। ठीक इसी तरह दुनिया भर में कई रहस्यमयी जगह, मंदिर, इमारत और महल है जिनका रहस्य कोई नहीं जान पाया लेकिन इनका रहस्य जानने के लिए हर कोई उत्सुक रहता है। हमने आपको अब तक कई ऐसी जगह बताई जो अपने आप में बेहद खास रही। इसी बीच हम लेकर आए हैं आपके लिए एक और ऐसे मंदिर की जानकारी जो बहुत ही प्रचलित है। तो चलिए जानते हैं इस मंदिर की कहानी.

     

    हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के भोजपुर के बारे में। भोजपुर की पहाड़ी पर एक अद्भुत और विशाल शिव मंदिर है। यह मंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध है लेकिन यह एक अधूरा शिव मंदिर है। अब आप यह सोच रहे होंगे कि आखिर मंदिर अधूरा कैसे हो सकता है? भोजपुर मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोजपुर द्वारा किया गया था। यही वजह है कि इस मंदिर का नाम भोजपुर मंदिर पड़ा, यह मंदिर पहाड़ी के बीचों बीच बना हुआ है और इसके पास से बेतवा नदी गुजरती है।

     

    इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह अधूरा है और इसका पूरा निर्माण नहीं हुआ है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण सिर्फ एक रात में ही करना था लेकिन निर्माण से पहले ही सूर्योदय हो गया और इसके बाद इसका काम वैसा का वैसा ही रोक दिया गया। कहा जाता है कि उसी दिन से यह मंदिर अधूरा है और इस अधूरे मंदिर की ही पूजा की जाती है।

     

    इस मंदिर में पूजा अर्चना भी विशेष तरीके से की जाती है। दरअसल, इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग इतना बड़ा है कि आप यहां खड़े होकर भी अभिषेक कर सकते हैं। कहते हैं यहां अभिषेक हमेशा जलहरी पर चढ़कर ही किया जाता है। कुछ समय पहले श्रद्धालु भी जलहरी तक पूजा कर सकते थे, लेकिन अब यहां केवल पुजारियों को ही जाने की अनुमति है।

     

    ये भी मान्यता है कि पांडवों ने माता कुंती के साथ इस मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा अर्चना की थी, लेकिन जैसे ही सुबह हुई तो पांडव लुप्त हो गए और यह मंदिर भी अधूरा रह गया। हालांकि दोस्तों इन कहानियों में कितनी सच्चाई है यह तो कोई नहीं, लेकिन हां आज भी इस मंदिर की बहुत मान्यता है और हर दिन यहां पर दर्शन करने वालों भक्तों की भीड़ लगी होती है।

     

    जब भी आप इस मंदिर में जाएंगे तो आप देखेंगे कि यहां पर अधूरे पिलर दिखाई देंगे। यहां की मूर्तियां भी अधूरी ही है। और ये सब इस बात की गवाही जरूर देते हैं कि इस मंदिर का काम बीच में ही रोक दिया गया। मंदिर में शिवलिंग का आकार बहुत बड़ा है जिसे देखने के बाद आपके मन में यह सवाल जरूर उठेगा कि आखिर इतने बड़े पत्थर को यहां पर कैसे लाया गया?

     

    तो बता दे की मंदिर के पीछे एक ढलान है जिसका उपयोग यहां पर विशाल पत्थरों को लाने के लिए किया गया था। कहा जाता है कि ढलान की सहायता से ही लगभग 7 हजार किलो के पत्थरों को निर्माण के लिए पहाड़ी की चोटी तक पहुंचाया गया।

     

    यह मंदिर 106 फुट लंबा और 77 फुट चौड़ा है। मंदिर 77 फुट ऊँचे एक चबूतरे पर बनाया गया है। मंदिर के गर्भगृह की अपूर्ण छत 40 फुट ऊंची बताई जाती है जो सिर्फ चार स्तंभों पर टिकी हुई है। वही गर्भ ग्रह का विशाल द्वारा दो तरफ से गंगा और यमुना की प्रतिमाओं से सजा है। वही इसके चार स्तंभ पर शिव पार्वती, सीताराम, लक्ष्मी नारायण और ब्रह्मा सावित्री की प्रतिमाओं का निर्माण किया गया है।

     

    गर्भ ग्रह में स्थिति यह शिवलिंग करीब 22 फुट ऊंचा है जो दुनिया के विशाल शिवलिंग में से एक माना जाता है। शिवलिंग का व्यास 7.5 फुट है और यह शिवलिंग एक ही पत्थर से बनाया है। इस शिवलिंग को बनाने में चिकनी बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है जो अपने आप में बहुत खास है।

  • मैहर का शक्तिशाली मंदिर, यहां आज भी आल्हा-उदल करते हैं पूजा | Maihar

    मैहर का शक्तिशाली मंदिर, यहां आज भी आल्हा-उदल करते हैं पूजा | Maihar

    Maihar Mandir (Maa Sharda Bhawani Temple | अब तक हमने जाना भारत के अलग-अलग राज्यों के ऐतिहासिक मंदिर और स्मारक के बारे में जो अपने आप ही बहुत खास रहे हैं। इनका अपना एक इतिहास रहा है। आज की इस कड़ी में लेकर आए हैं एक और ऐतिहासिक मंदिर की जानकारी। यह एक ऐसा मंदिर है जिसकी शक्तियों के बारे में आज भी बात होती है। इतना ही नहीं बल्कि यह तक कहा जाता है कि इस मंदिर में आज भी आल्हा मां शारदा की पूजा करने आते हैं और मंदिर के पट खोलने के दौरान ताजे फूल मिलते हैं। तो चलिए जानते हैं दोस्तों इस शक्तिशाली मंदिर के बारे में.

     

    हम जिस मंदिर के बारे में बात कर रहे हैं वह मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर धाम है जो विश्व भर में प्रसिद्ध है। यह मां भवानी के 52 शक्तिपीठों में से एक है जिसे मां शारदा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह शक्तिशाली मंदिर विंध्याचल पर्वत श्रेणियां के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित है जहां हर रोज लोगों का हुजूम लगा रहता है।

     

    मेहर पर्वत का नाम प्राचीन ग्रंथो में भी मिलता है। इसका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। यदि आप मां शारदा देवी के दर्शन करने पहुंचे तो यहां पर आपको 1063 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचाना पड़ेगा। इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। धार्मिक ग्रंथो में यह उल्लेख किया गया है कि, दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी किंतु राजा दक्ष को यह मंजूर नहीं था। हालांकि सती अपनी जीत पर अड़ी रही और उन्होंने भगवान शिव से विवाह कर लिया।

     

    इसी बीच राजा दक्ष ने अपने यहां यज्ञ करवाया जिसमें उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी देवताओं को आमंत्रित किया। किंतु सती के पति यानी कि भगवान शंकर को नहीं बुलाया। ऐसे में सती ने जब भगवान शंकर को ना बुलाने का कारण पूछा तो उनके पिता राजा दक्ष ने भगवान शंकर को अपशब्द कह दिए। ये सुन सती बहुत दुखी हुई और उन्होंने यज्ञ अग्निकुंड में कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

     

    इधर जब भगवान शंकर को अपनी सती के खोने का कारण पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ। कहते हैं कि उन्हें इतना क्रोध आया कि उनका तीसरा नेत्र खुल गया। ऐसे में ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने यहां पर सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित कर दिया। कहते हैं जहां-जहां सती के यह अंग गिरे हैं वहां वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई है।

     

    मेहर भी वही जगह है जहां पर सती का हार और कंठ गिरा था, इसलिए इस जगह को माई का हार यानिकि मैहर कहा जाता है। कहते हैं दोस्तों 10वीं सदी में इस मंदिर में सबसे पहले आदि गुरु शंकराचार्य ने पूजा अर्चना की थी, हालांकि बाद में यह मंदिर मैहर राजघराने के पास चला गया। इसके बाद राज परिवार के पुजारी को मंदिर के में पूजा करने का मौका मिला। हालांकि अब मंदिर का संचालन सरकार के अधीन हो चुका है।

     

    इस मंदिर को लेकर एक ऐतिहासिक कहानी यह भी है कि, आल्हा खंड के नायक आल्हा ऊदल दो सगे भाई मां शारदा के भक्त थे। कहा जाता है कि मैहर के इसी जंगल में आल्हा ऊदल ने मंदिर की खोज की थी। दरअसल आल्हा ने इस मंदिर की तलहटी में 12 साल तक तपस्या की थी जिससे मां शारदा देवी बहुत प्रसन्न हुई थी और उन्हें अमर होने का आशीर्वाद दिया था।

     

    कहते हैं आज भी आल्हा इस मंदिर में आते हैं और हर सुबह पूजा करते जाते हैं। मंदिर में हर रोज ताजे फूल मिलना इस बात की गवाही भी देते हैं। इतना ही नहीं बल्कि मंदिर की तलहटी में आज भी अल्लाह के कई अवशेष देखने को मिलते हैं। यहां पर आल्हा उदल का एक अखाड़ा भी है जिसमें उनकी तलवार और खड़ाऊ आम भक्तों के दर्शन करने के लिए रखी गई है।

     

    नवरात्रि के मौके पर यहां पर एक अलग ही धूम देखने को मिलती है। यहां साल में दो बार शारदे नवरात्रि और चैत्री नवरात्रि में 9 दिन का भव्य मेला लगता है जिसमें हजारों लोग शामिल होते हैं। कहते हैं इस मंदिर में दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है।

     

    मैहर तक पहुंचने के लिए आप निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर, खजुराहो, इलाहाबाद, भोपाल इंदौर से जा सकते हैं। इसके अलावा आप ट्रेन से भी मैहर पहुंच सकते हैं। नवरात्र उत्सव के दौरान ज्यादातर ट्रेन मैहर में रूकती है। इसके अलावा आप सड़क मार्ग से भी यहां पहुंच सकते हैं। आप अपने करीब बस स्टैंड से मैहर की बस ले सकते हैं। Maihar Temple | Alha Udal | Incredible Temple | Madhya Pradesh Tourism

  • 400 साल से वीरान पड़ा है ये आलीशान महल, उस रात के बाद कोई नहीं ठहरा यहां

    400 साल से वीरान पड़ा है ये आलीशान महल, उस रात के बाद कोई नहीं ठहरा यहां

    Satkhanda Palace | Datia Palace | Datia Mahal | Badnaseeb Mahal | भारत में अद्भुत किलों का इतिहास काफी पुराना रहा है। कई राजाओं ने आलीशान महल बनवाए जो आज भी इतिहास को दर्शाते हैं। देश में आंधी, तूफान भूकंप जैसी कई घटनाएं घटित होती है लेकिन इन महलों कुछ नुकसान नहीं होता। यह ज्यों के त्यों खड़े हैं। आज हम एक बार फिर लेकर आए हैं भारत के गौरवशाली इतिहास का एक ऐसा आलीशान महल जो 400 साल से वीरान पड़ा हुआ है। आखिर ऐसा क्या था इस महल में जो कोई नहीं रुका? क्या यहां पर कोई अदृश्य शक्ति रहती है या फिर कुछ और रहस्य है? आपको इस वीडियो में इस महल से जुड़े सारे राज देखने को मिलने वाले हैं। तो चलिए जानते हैं दोस्तों इस महल की कहानी और इससे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें.

     

    हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित ‘सतखंडा महल’ के बारे में.. यह महल अपनी अद्भुत कला और बनावट के लिए मशहूर है। कहा जाता है कि 1620 में दतिया के राजा बीर सिंह ने इस महल को बनवाया था। कहते हैं यहां पर जहांगीर आने वाले थे जिसकी चलते राजा बीर सिंह ने उनके लिए यह महल बनवाया था। ताकि भव्य तरीके से उनका स्वागत हो सके।

     

    इस खूबसूरत महल में 440 कमरे हैं, लेकिन बदनसीबी की बात यह है कि, इस किले में 400 साल से कोई नहीं रहा। यानी कि यह किला 400 साल तक वीरान पड़ा रहा। इसलिए इस किले को बदनसीब महल के नाम से भी जाना जाता है। इस महल की सबसे खासियत यह है कि, इसमें ना तो लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है और ना ही इसमें लोहे के कण मिलाए गए हैं। यह महल पूरी तरह से ईंटों और पत्थर से मिलकर बनाया गया है। इसकी खूबसूरती देख कर आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले के राजा महाराजा किसी भी महल को बनाने के लिए कितनी मेहनत करते थे। यही वजह है कि आज भी उनके द्वारा बनाए गए किले और महल ज्यों के त्यों खड़े मिलते हैं।

     

    कहा जाता है, इस खूबसूरत 7 मंजिला महल में केवल कोई सिर्फ एक रात के लिए ही रुका था। इसके बाद यह 400 साल से वीरान पड़ा हुआ है। इसके वीरान पड़े रहने की पीछे की कहानी बताई जाती है कि दतिया जिला बीरसिंह देव को जहांगीर की तरफ से तोहफे में मिला था और उन्होंने यह तोहफा इतना सहज कर रखा कि यह कभी भी यहां रहने के लिए नहीं आए।

     

    कहा जाता है कि, बीर सिंह देव के जहांगीर पर कई एहसान थे। ऐसे में जहांगीर ने अपने मित्र को खुश करने के लिए घोषणा करते हुए अपने साम्राज्य में 52 इमारतों के निर्माण स्थान के लिए हरी झंडी दे दी, जिसमें एक दतिया स्थान भी था। दतिया को उन्होंने बीर सिंह देव को उपहार स्वरूप दिया था। बताया जाता है कि एक बार यहां पर शहंशाह महल में आए थे और वह सिर्फ एक रात रूके थे। इसके बाद यह सात खंडा महल सालों से सुना पड़ा हुआ है।

     

    वैसे तो इस महल को साथ खंडा महल के नाम से जाना जाता है लेकिन जब आप इस पर नजर डालेंगे तो केवल आप पांच मंजिल ही देख पाएंगे। अब आप सोच रहे होंगे आखिर ऐसा क्यों? दरअसल, इसके पीछे का कारण है कि इसकी दो मंजिला इमारत जमीन के नीचे बनी हुई है और पांच जमीन के ऊपर बनी हुई है। जमीन के नीचे बनी हुई मंजिल में जाने के लिए खुफिया रास्ते का इस्तेमाल किया जाता था।

     

    इस महल को सतखंडा महल के अलावा वीर सिंह देव महल और गोविंद महल के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि, उस दौर में इस पूरे महल को बनाने के लिए 35 लाख का खर्चा आया था। वहीं इसकी नकाशी के चलते इसे बनाने में मजदूरों को करीब 9 साल का समय लग गया था। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसमें भगवान गणेश और मां दुर्गा का मंदिर है। साथ ही इसमें आपको एक दरगाह भी बनी हुई दिखाई देगी। Histroy of Satkhanda Mahal | Badnasib Mahal | Madhya Pradesh

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  • सिंगरौली में CM शिवराज का कार्यक्रम

    सिंगरौली में CM शिवराज का कार्यक्रम

    आज रक्षामंत्री Rajnath Singh के साथ सिंगरौली में CM Shivraj Singh Chouhan का कार्यक्रम।

     

    यहाँ मुख्यमंत्री आवासीय भू-अधिकार योजना के अंतर्गत 25 हजार 500 गरीब लोगों को निःशुल्क प्लॉट का वितरण किया जाएगा।

     

    इस मौके पर CM शिवराज ने कहा – ये कार्यक्रम गरीबों के जीवन को बदलने वाला कार्यक्रम है।